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साफ़ माथे का समाज/भगदड़ में पड़ी सभ्यता

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साफ़ माथे का समाज  (2006)  द्वारा अनुपम मिश्र
भगदड़ में पड़ी सभ्यता
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भगदड़ में पड़ी सभ्यता

हर समाज में उत्सव प्रियता की एक बड़ी जगह रहती है। इसमें मेले-ठेलों का आयोजन स्वागत योग्य ही होता है। लेकिन जोहान्सबर्ग में 'स्थायी विकास पर विश्व सम्मेलन' समझ से परे है।

दुनिया के अधिकांश देशों, भागों के 'पिछड़ेपन' पर तरस खाकर कोई साठ बरस पहले 'विकास' नाम की 'जादुई दवा' की पुड़िया हरेक को थमा दी गई थी। फिर 3 दशक बाद इन्हीं चिकित्सकों ने पाया कि विकास से विनाश भी हो रहा है। तो तुरंत विनाश रहित विकास का नारा भी सामने आ गया था। फिर उससे भी दुनिया की समस्याएं जब ठीक होती नहीं दिखीं तो 'बुंटलैंड आयोग' के समझदार सदस्यों ने पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर 'स्थायी विकास' का विचार सामने रखा। तब से अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ के ढांचे में इसकी कोई सत्तर से अधिक परिभाषाएं विकसित हो चुकी हैं।

हर देश में विकास के नाम पर अपने ही संसाधनों की छीना-झपटी चलती रही है। बाद में यह देशों की सीमाएं लांघकर बड़े क्षेत्र तक भी फैली है। और अब तो 'भूमंडलीकरण' जैसे विचित्र शब्दों की मदद से पूरी दुनिया में एक नए क़िस्म की लूटपाट का कारण बन गई है। संसाधनों [ १५७ ] की ऐसी लूटपाट पहले कभी देखी नहीं गई थी। इसमें माओ का चीन हो या गांधी का भारत-सभी देश कोका कोला के चुल्लू भर पानी में डूब मरने को ही विकास का उत्सव मान बैठे हैं।

भूमंडलीकरण की होड़ में, ऐसी भगदड़ में फंसी सरकारों से, उनके कर्ता-धर्ताओं से किसी तरह के स्वस्थ, स्थायी विकास की उम्मीद कर लेना भोलापन या साफ़ शब्दों में कहें तो पोंगापन ही होगा। 'स्थायी विकास' की एक सर्वमान्य परिभाषा इसे ऐसा विकास बताती है जो देशों और दुनिया के स्तर पर कुछ ऐसा करे कि वर्तमान पीढ़ी की बुनियादी ज़रूरतें आने वाली पीढ़ी की ज़रूरतों को चोट पहुंचाए बिना सम्मानजनक ढंग से पूरी हो सकें। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि विकास का यह ढांचा तो इसी पीढ़ी की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहा। वह इसी पीढ़ी के एक ज़रा से भाग की सेवा में शेष बड़े भाग को वंचित करता जा रहा है।

पूरी दुनिया को रोंदने वाले इस विकास से पहले लगभग सभी समाजों में, यूरोप आदि में भी अपनी समस्याओं को अपने ढंग से हल करने की स्फूर्ति रही है। पर लंबे समय की गुलामी और उसके बाद मिली विचित्र आज़ादी ने उन समाजों की उस स्फूर्ति का हरण कर लिया है। आज सभी मंचों से 'परंपरागत ज्ञान' का खूब बखान होने लगा है पर यह कुछ इस ढंग से होता है मानो परंपरा हमें पीछे लौटा ले जाएगी। परंपरा का अर्थ है जो विचार और व्यवहार हमारे कल आज और कल को जोड़ सके। नहीं तो उसका गुणगान भी स्थायी विकास के ढोल की तरह होता जाएगा।

इस पखवाड़े जब दुनिया भर से जोहान्सबर्ग गए लोग वहां से अपने-अपने देश लौटेंगे तो क्या वे भगदड़ में पड़ी इस सभ्यता या असम्यता के लिए एक स्थायी, कल आज और आने वाले कल के लिए टिक सकने वाले एक टिकाऊ विचार को वापस ला सकेंगे?