हिन्दी साहित्य का इतिहास

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[  ]प्रकाशक
नागरी प्रचारिणी सभा,
काशी।












मुद्रक

के॰ कृ॰ पावगी,

हितचिंतक प्रेस,

रामघाट, काशी


विषय-सूची

( दिए हुए अंक पृष्ठों के हैं )

जनता और साहित्य का संबंध, १; हिंदी साहित्य के इतिहास के चार काल १; इन कालों के नामकरण का तात्पर्य, १-२ ।

आदि-काल

प्रकरण १

हिंदी-साहित्य का आविर्भाव-काल ३; प्राकृतभास हिंदी के सबसे पुराने पद्य ३ ; आदिकाल की अवधि ३ ; इस काल के आरंभ की अनिर्दिष्ट लोकप्रवृत्ति ३; 'रासो' की प्रबंध-परंपरा ३-४ ; इस काल की साहित्यिक सामग्री पर विचार ४ अपभ्रंश-परंपरा ५ ; देशी भाषा, ५


प्रकरण २

अपभ्रंश या लोक-प्रचलित काव्य-भाषा के साहित्य का आविर्भाव-काल, ६ ; इस काव्य-भाषा के विषय, ६ ; 'अपभ्रंश' शब्द की व्युत्पत्ति, ६ ; जैन ग्रंथकारों की अपभ्रंश रचनाएँ, ७ ; इनके छंद, ७; बौद्धों का वज्रयान संप्रदाय, ७ ; इसके सिद्धों की भाषा, ७, इन सिद्धों की रचना के कुछ नमूने, ९-११ ; बौद्ध धर्म का तात्रिक रूप, ११ ; संध्या भाषा, १२ ; वज्रयान संप्रदाय का प्रभाव, १२ ; इसकी महासुहं अवस्था, १३ : गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल, १३ ; इसकी वज्रयानियों से भिन्नता, १३ ; गोरखनाथ का समय,
१३-१४; नवनाथ, १५ ; मुसलमानो और भारतीय योगियों का संसर्ग, १५ ; गोरखनाथ की हठयोग-साधना, १६; नाथ संप्रदाय' के सिद्धांत, १६-१७; इनका वज्रयानियों से साम्य, १७ 'नाथपंथ' की भाषा, १८ ; इस पंथ का प्रभाव, १८ ; इसके ग्रंथ, १८ ; इन ग्रंथों के विषय १९ ; साहित्य के इतिहास में केवल भाषा के विकास की दृष्टि से इनका विचार, १९-२० ; ग्रंथकार-परिचय २१-२६ ; विद्यापति की अपभ्रंश रचनाएँ २६; अपभ्रंश कविताओं की भाषा २७ २८

प्रकरण ३

वीरगाथा

देशभाषा-काव्यों की प्रामाणिकता मे संदेह २९ ; इन काव्यों की भाषा और छंद २९; तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति, २९-३० ; वीरगाथाओं का आविर्भाव, ३० ; इनके दो रूप, ३१ ; 'रासो' शब्द की व्युत्पत्ति, ३२ ; ग्रंथ-परिचय, ३२-३८, ग्रंथकार-परिचय, ३८-५२

प्रकरण ४

लोकभाषा के पद्य, ५३ ; खुसरो, ५३-५६ ; विद्यापति ५७ ५६ ।

पूर्व मध्यकाल

प्रकरण १

सामान्य परिचय

इस काल की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति, ६०-६२ ; भक्ति का प्रवाह, ६२ ; इसका प्रभाव ६२-६३ ; सगुण भक्ति की प्रतिष्ठा, ६३ ; हिंदू-
मुसलमान दोनों के लिये एक सामान्य ‘भक्तिमार्ग' का विकास, ६३ ; इसके मूल स्रोत, ६४; नामदेव का भक्तिमार्ग, ६४; कबीर का ‘निर्गुन-पंथ', ६४;निर्गुनपथ और नाथपंथ की अंतस्साधना में भिन्नता, ६४ ; निगुणोपासना के मूल स्रोत, ६४ ; निर्गुन-पंथ का जनता पर प्रभाव ६४ ६५ ; भक्ति के विभिन्न मार्गों पर सापेक्षिक दृष्टि से विचार, ६५ ; कबीर के सामान्य भक्तिमार्ग का स्वरूप, ६५-६६ नामदेव, ६६ ; इनकी हिंदी-रचनाओ की विशेषता, ६६ ; 'इन पर नाथपंथ का प्रभाव, ६६ ; इनकी गुरु-दीक्षा, ६८; इनकी भक्ति के चमत्कार ६८; इनकी निर्गुन बानी, ६६'; इनकी भाषा, ७० ; निर्गुन ग्रंथ के मूल स्रोत, ७० ; इसके प्रवर्तक, ७० ; निर्गुण धारा की दो शाखाएँ, ७१: ज्ञानाश्रयी शाखा और उसका प्रभाव, ७१ ; प्रेममार्गी सूफी शाखा का स्वरूप, ७१-७२ ; सूफी कहानियों का आधार, ७२ ; कवि ईश्वरदास की ‘सत्यवती : कथा ७२-७४, सूफियों के प्रेम-प्रबंधों की विशेषताएँ, ७४ ; कबीर के रहस्यवाद की सूफी रहस्यवाद से भिन्नता, ७४; सूफी कवियों की काव्य भाषा, ७४; सूफी रहस्यवाद में भारतीय साधनात्मक रहस्यवाद का समावेश, ७४ ।

प्रकरण २

निर्गुण धारा

कवि-परिचय, ७५-६१; निर्गुणमार्गी संत कवियो पर समष्टि रूप से विचार, ६२-६३ ।

प्रकरण ३

कवि-परिचय, ६४-१६०; सूफी कवियों की कबीर से भिन्नता, १०१; प्रेम गाथा-परंपरा की समाप्ति, ११५; सूफी आख्यान-काव्य का हिंदू कवि, ११५ ।।

प्रकरण ४

सगुण धारा

अद्वैतवाद के विविध-स्वरूप, ११६; वैष्णव श्रीसंप्रदाय, ११६; रामानंद का समय ११६-११७; इनकी गुरु-परंपरा, ११७-११८, इनकी उपासना-पद्धति, ११; इनकी उदारता, १२-११६: इनके शिष्य, ११६; इनके ग्रंथ, ११६; इनके वृत्त के संबध से प्रवाद, १२०; इन प्रवादों-पर विचार, १२०-१२४; कवि-परिचय, १२४-९५०; हनुमान जी की उपासना के ग्रंथ, १५०-१५१; रामभत्ति काव्य-धारा की सबसे बड़ी विशेषता, १५ १; भक्ति के पूर्ण स्वरूप का विकास, १५१-५२; रामभक्ति की श्रृगारी भावना, १५२-५४ ।

प्रकरण ५

वैष्णवधर्म आंदोलन के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य, १५५; इनका दार्शनिक सिद्धांत, १५५; इनकी प्रेम-साधना, १५६; इनके अनुसार जीव के तीन भेद, ३६६; इनके समय की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति, १५६-५७, इनके ग्रंथ, १५७; वल्लभ-संप्रदाय की उपासना-पद्धति का स्वरूप, १५७; कृष्णभक्ति काव्य का स्वरूप, १५८; वैष्णव धर्म का साप्रदायिक स्वरूप, १५८; देश की भक्ति-भावना पर सूफियों का प्रभाव, १५९, कवि-परिचय, १५९-१९५; 'अष्टछाप' की प्रतिष्ठा, ६६३-१६४; कृष्णभक्ति-परंपरा के श्रीकृष्ण, १६४; कृष्णचरित कविता का रूप, १६४-१६५ ।

प्रकरण ६

भक्तिकाव्य-प्रवाह उमड़ने का मूल कारण, १६६ ; पठान शासको का भारतीय साहित्य एव संस्कृति पर प्रभाव, १६६-१६७; कवि परिचय, १६८-२३०; सूफी रचनाओं के अतिरिक्त भक्तिकाल के अन्य आख्यान-काव्य, २३०-२३१ ।

उत्तर मध्यकाल

प्रकरण १

सामान्य परिचय

रीतिकाल के पूर्ववर्ती लक्षण-ग्रंथ, २३२; रीति परंपरा का आरंभ, २३२; रीति-ग्रंथों के आधार, २३३; इनकी अखंड परंपरा का प्रारंभ, २३३; संस्कृत रीति-ग्रंथों से इनकी भिन्नता, २३३; इस भिन्नता का परिणाम, २३३; लक्षण ग्रंथकारों के आचार्यत्व पर विचार, २३४; इन ग्रंथों के आधार, २३४; शास्त्रीय दृष्टि से इनकी विवेचना, २३४-२३६; रीति-ग्रंथकार कवि और उनका उद्देश्य, २३६-३७; इनकी कृतियों की विशेषताएँ, २३७; साहित्य-विकास पर रीति-परंपरा का प्रभाव, २३७; रीति ग्रंथों की भाषा, २३७-४०; रीति-कवियों के छंद और रस, २४१।

प्रकरण २

रीति ग्रंथकार कवि-परिचय, २-

प्रकरण ३

इनके काव्य के स्वरूप और विषय, ३२२; रीति ग्रंथकारों से इनकी भिन्नता ३२२; इनकी विशेषताएँ, ३२२; इनके ६ प्रधान वर्ग-१-१ ) श्रृंगारी कवि, ३२२; ( २ ) कथा-प्रबंधकार, ३२२-३२३; (३ ) वर्णनात्मक प्रबंधकार ३२३; (४) सूक्तिकार, ३२३-२४; (५) ज्ञानोपदेशक पद्यकार, ३३४; (६) भक्त कवि, ३२४, वीररस की फुटकल कविताएँ, ३२४-२५; इस काल का गद्य साहित्य, ३२५, कवि-परिचय, ५-

(संवत् १९००-१९८० )

गद्य खंड

'प्रकरण १

गद्य का विकास

आधुनिक काल के पूर्व गद्य की अवस्था

( ब्रजभाषा-गद्य)

गोरखपंथी ग्रथों की भाषा का स्वरूप ४०३-०४; कृष्ण-भक्ति शाखा के गद्यग्रंथों की भाषा का स्वरूप, ४०४-०५; नाभादास के गद्य का नमूना, ४०५; उन्नीसवीं शताब्दी मे और उसके पूर्व लिखे गए अन्य गद्य ग्रंथ, ४०५-०६; इन ग्रंथों की भाषा पर विचार, ४:६; काव्यों की टीकाओं के गद्य का स्वरूप, ४०६-०७ ।।

शिष्ट समुदाय में खड़ी बोली के व्यवहार का आरंभ, ४०७; फारसी-मिश्रित खड़ी बोली या रेखता में शायरी, ४०८; उर्दू-साहित्य का आरंभ, ४०८; खड़ीबोली के स्वाभाविक देशी रूप का प्रसार, ४०८; खड़ी बोली के अस्तित्व और उसकी उत्पत्ति के सबंध में भ्रम, ४०८; इस भ्रम का कारण, ४०८; अपभ्रंश काव्य-परपरा में खड़ी बोली के प्राचीन रूप की झलक, ४०६; संत कवियों की बानी की खड़ी बोली, ४०६; गंग कवि के गद्य-ग्रंथ में उसका रूप, ४०६-१०; इस बोली का पहला ग्रंथकार, ४१०-११; पंडित' दौलतराम के अनुवाद-ग्रंथ में इसका रूप, ४११-१२; ‘मडोवर का वर्णन' में इसका रूप,४१२; इसके प्राचीन कथित साहित्य का अनुमान,४१२; व्यवहार के शिष्ट-भाषा रूप में इसका ग्रहण, ४१३. इसने स्वभाविक रूप का मुसलमानी दरबारको रूप-उद्-से भिन्नता, १५३; गद्य साहित्य में इसके प्रादुर्भाव और व्यापकता का कारण, ४१३-१४; जान गिल क्राइस्ट द्वारा इस स्वतंत्र अस्तित्व की स्वीकृति, ४१४; गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले चार प्रमुख लेखक,-(१) मुंशी सदासुख लाल और उनकी भाषा, ४१४-१६; (२) ईशा अल्ला खां और उनकी भाषा, ४१६-१६; (३) लल्लूलाल और उनकी भाषा, ४१६-२१; सदासुख लाल की भाषा में इनकी भाषा की भिन्नता, ४२०; (४) सदल मिश्र और उनकी भाषा, ४२१• २२; लल्लूलाल की भाषा से इनकी भाषा की भिन्नता, ४२२; इन चारो लेखकों की भाषा का सापेक्षिक महत्व, ४२१; हिंदी में गद्य-साहित्य-परंपरा का प्रारंभ, ४२२; इस गद्य के प्रसार में ईसाइयों को योग, ४२३:-ईसाई धर्म प्रचारकों के भाषा का रूप, ४२३:२४; मिशन सोसाइटियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की हिंदी, ४२४-२६; ब्रह्म-समाज की स्थापना, ४२६: राजा राममोहन राय के वेदांत-भाष्य अनुवाद की हिंदी, ४२७; उदंत मार्तंड' पत्र की भाषा, ४२७-२८; अँगरेजी शिक्षा-प्रसार, ४२८-२९; सं० १८६० के पूर्व की अदालती भाषा, ४२६-३०, अदालतों में हिंदी-प्रवेश और उसका निष्कासन, ४३०;, उर्दू-प्रसार के कारण, ४६०; काशी और आगरे के समाचार-पत्रों की भाषा, ४३१-३२; शिक्षा-क्रम में हिदी-प्रवेश का विरोध, ४३३; हिंन्दी-उर्दू के सम्बंध में गार्सा द तासी का मत,

प्रकरण २

हिंदी के प्रति मुसलमान अधिकारियों के भाव, ४३६; शिक्षोपयोगी हिंदी पुस्तकें, ४३७; राजा शिवप्रसाद की भाषा, ४३७-३६; राजा लक्ष्मण सिंह के अनुवाद की भाषा, ४४०: फ्रेडरिक पिंकाट का हिंदी प्रेम, ४४१; राजा शिवप्रसाद के गुटका की हिंदी, ४४२; लोकमित्र' और 'अवध-अखबार की भाषा, ४४२-४३; बाबू नवीनचद्र राय की हिंदी-सेवा, ४४३; गासो द तासी उर्दू-पक्षपात, ४४४; हिंदी गद्य-प्रसार में आर्य-समाज का योग, ४४५; ५० श्रद्धाराम की हिंदी-सेवा, ४४५-४७; हिंदी-गद्य-भाषा का स्वरूप:निर्माण, ४४७-४८},

आधुनिक गद्य साहित्य का प्रवर्तन
प्रथम उत्थान

(सं० १९२५-५०)

भारतेंदु का प्रभाव, ४६; उनके पूर्ववर्ती और समकालीन लेखको से उनकी शैली की भिन्नता, ४४९; गद्य साहित्य पर उनका प्रभाव, ४४६; खड़ीबोलीं गद्य की प्रकृत-साहित्यिक-रूप-प्राप्ति, ४५०; भारतेंदु और उनके सहयोगियो की शैली, ४५०-६२; इनका दृष्टि-क्षेत्र और मानसिक अवस्थान, ४५२; हिंदी का प्रारंभिक नाट्य-साहित्य, ४५३-५४; भारतेंदु के लेख और निबंध,४५४-५५; हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास, ४५५; इसका परवर्ती उपन्यास-साहित्य, ४५५-५६; भारतेंदु-जीवन-काल की पत्र-पत्रिकाएँ, ४५६-५६; भारतेंदु हरिश्चंद्र-४५६-६४; उनकी जगन्नाथ-यात्रा, ४५६; उनका पहला अनूदित नाटक,४५६; उनकी पत्र-पत्रिकाएँ, ४५६; उनकी ‘हरिश्चंद-चंद्रिका' की भाषा, ४३६; इस 'बद्रिका' के सहयोगी, ४६०; इस मनोरंजक लेख, ४६०, भारतेंदु-के नाटक, ४६०-६१; इनकी विशेषताएँ, ४६१; उनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा, ४६१-६२; उनके सहयोगी, ४३२; उनकी शैली के दो रूप, ४६२-६४ ।

प्रतापनारायण मिश्र-४६४-६८: भारतेंदु से उनकी शैली की भिन्नता, ४६५; उनका पत्र, ४६५; उनके विषय, ४६५; उनके नाटक, ४६६ । पं० बाल कृष्ण भट्ट-४६६-६८; उनका हिंदी-प्रदीप', ४६६; उनकी शैली, ४६६; उनके गद्य-प्रबध, ४६७; उनके नाटक, ४६८; पं० बदरीनारायण चौधरी-४६८-७२; उनकी शैली की विलक्षणता, ४६६; उनके नाटक ४६९-७०; उनकी पत्र-पत्रिकाएँ, ४७०-१; समालोचना का सूत्रपात, ४७१ । लाला श्रीनिवासदास़़-४७२-७४; उनके नरिक, ४७२-७३; उनका उपन्यास, ४७३; ठाकुर जगमोहन सिंह----४७४-७६; उनका प्रकृति-प्रेम, ४७४; उनकी शैली की विशेषता, ४७४-७५; बाबू तोताराम---४७६-७७, उनको पत्र, ४७६; उनकी हिंदी-सेवा, ४७६; भारतेंदु के अन्य सहयोगी, ४५७-६२ । हिन्दी का प्रचार कार्य-४८२-८७; इनमे बाधाएँ, ४८२; भारतेंदु और उनके सहयोगियों को उद्योग ४८२-८३; काशी-नागरी प्रचारिणी


सभा की स्थापना, ४८३; इसके सहायक और इसका उद्देश्य, ४८३; बलिया में भारतेंदु का व्याख्यान, ४८४; पं० गौरीदत्त का प्रचार-कार्य, ४८४; सभा द्वारा नागरी-उद्धार के लिये उद्योग, ४८५; सभा के साहित्यिक आयोजन, ४८५ ८७; सभा की स्थापना के बाद की चिंता और व्यग्रता, ४८७ ।

प्रकरण ३

द्वितीय उत्थान

( १९५०-७५ )

सामान्य परिचय

इस काल की चिंताएँ और आकाक्षाएँ, ४८८; इस काल के लेखकों की भाषा, ४८८-९०; इनके विषय और शैली, ४९०-९१; इस काल के नाटक, निबंध, समालोचना और जीवनचरित, ४९१-९२; नाटक-----४९३-९६; बंग भाषा से अनूदित, ४९३; अँगरेजी और संस्कृत से अनूदित, ४९३-९५; मौलिक, ४९५-९६; उपन्यास--४९६-५०१; अनूदित, ४९७-९८; मौलिक, ४९८-५०१; छोटी कहानियाँ--५०२-०५; आधुनिक कहानियों का स्वरूप-विकास, ५०२; पहली मौलिक कहानी, ५०३-०४; अन्य भावप्रधान कहानियों, ५०४; हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी, ५०४--०५; प्रेमचंद का उदय, ५०५; निबंध-५०५-२५; इसके भेद, ५०५; इसका आधुनिक स्वरूप, ५०५; निबंध-लेखक की तत्त्वचितक या वैज्ञानिक से भिन्नती, ५०६-०७; निबंध-परंपरा का आरंभ, ५०७; दो अनूदित ग्रंथ, ५०७-०८; निबध-लेखक परिचय, ५०८-२५; समालोचना--५२५-३१; भारतीय समालोचना का उद्देश्य, ५२५-२६; योरोपीय समालोचना, ५२६-२७; हिंदी में समालोचना-साहित्य-विकास, ५२७-३१ ।

तृतीय उत्थान,

( सं० १९७१ से)

परिस्थिति-दिग्दर्शन, ५३२; लेखकों और ग्रंथकारों की बढ़ती संख्या का
परिणाम, ५३२; कुछ लोगो की अनधिकार चेष्टा, ५३२-३३; आधुनिक-भाषा का स्वरूप, ५३३; गद्य-साहित्य विविध अंगो का सक्षिप्त विवरण और उनकी प्रवृत्तियाँ, ५३३-३४---( १ ) उपन्यास-कहानी, ५३५-४२; ( २ ) छोटी कहानियाँ, ५४२-४८ ( ३ ) नाटक, ५४८-५८ ( ४ ) निबंध, ५५८-६१: ( ५ ) समालोचना और काव्य-मीमांसा, ५६२-७६ ।

आधुनिक काल

(सं० १९०० से )

प्रकरण १

पुरानी धारा

प्राचीन काव्य-परंपरा, ५७७; ब्रजभाषा काव्य परम्परा के देवियों का परिचय, ५७८-८० ; पुरानी परिपाटी से संबध रखने के साथ ही साहित्य की नैवीन गति के प्रदर्शन में योग देनेवाले कविः ५८०; भारतेंदु द्वारा भाषा-परिष्कार का कार्य, ५८०; उनके द्वारा स्थापित कवि-समाज, ५८१; उनके भक्ति-शृंगार के पद, ५८१: कवि परिचय, ५८१-८७ ।

प्रकरण २

प्रथम उत्थान

( सं० १९२९.९९०)

काव्य-धारा का क्षेत्र-विस्तार, ५८८ ; विषयों की अनेकरूपता और उनके विधानढंग में परिवर्त्तन, ५८९ : इस काल के प्रमुख कवि, ५८९.; भारतेंदु वाणी का उच्चतम स्वर, ५८९ ; उनके काव्य-विषय और विधान का ढंग, ५९०-९१ प्रतापनारायण मिश्र के पद्यात्मक निबंध, ५९१ ; बदरीनारायण चौधरी का कार्य, ५९२-९३ ; कविता में प्राकृतिक दृश्यों की संश्लिष्ट योजना, ५९४-९५; नए विषयों पर कविता, ५९६; खड़ी बोली कविता का विकास-क्रम, ५९६ ९९ ।

(.सं० १९५०-७५-)

पडित श्रीधर पाठक की कथा की सार्वभौम मार्मिकता ६००, ग्रामगीतों की मार्मिकता ६००-०१, प्रकृत स्वच्छंदतावाद का स्वरूप, ६०१-०३; हिंदी-काव्य में 'स्वच्छंदता' की प्रवृत्ति का सर्वप्रथम आभास, ६०३; इसमें अवरोध, ६०४, इस अवरोध की प्रतिक्रिया, ६०४; श्रीधर पाठक, ६०४-०७, हरिऔध, ६०७ ०९; महावीरप्रसाद द्विवेदी, ६१०-१२; द्विवेदी-मंडल के कवि, ६१२; इस मंडल के बाहर की काव्य-भूमि, ६२२ ३८।


तृतीय उत्थान

( स० १९७५ से )

सामान्य परिचय

खड़ी बोली पद्य के तीन रूप और उनका सापेक्षिक महत्त्व, ६३९; हिंदी के नए छंदों पर विचार, ६३९ ४१; काव्य के वस्तु-विधान और अभिव्यंजन-शैली में प्रकट होने वाली प्रवृत्तियाँ, ६४१-४४ खड़ी बोली में काव्यत्व का स्फुरण, ६४४-४५; वर्तमान काव्य पर काल का प्रभाव, ६४५-४६; चली आती हुई काव्य-परंपरा के अवरोध के लिये प्रतिक्रिया, ६४ ; नूतन परंपरा प्रवर्त्तक कवि, ६४७ ४९; इनकी विशेषताएँ, ६५०; इनका वास्तविक लक्ष्य, ६५०; रहस्यवाद, प्रतीकवाद और छायावाद, ६५०; हिंदी में छायावाद का स्वरूप और परिणाम, ६५०-५१; भारतीय काव्यधारा से इसका पार्थक्य, ६५१, इसकी उत्पत्ति का मूल स्रोत, ६५१-५२, ‘छायावाद' शब्द का अनेकार्थी प्रयोग ६२५-५३; 'छायावाद' के साथ ही योरप के अन्य वादों के प्रवर्त्तन की अनधिकार चेष्टा, ६५३; 'छायावाद’ की कविता का प्रभाव, ६५३ ५४, आधुनिक कविता की अन्य धाराएँ, ६५४ ६५३, स्वाभाविक स्वच्छंदता की ओर प्रवृत्त कवि, ६५६-५७, खड़ी बोली पद्य की तीन धाराएँ, ६५७ ५८, ब्रजभाषा काव्य- २-द्विवेदीकाल में प्रवर्तित खड़ी बोली की काव्य-धारा, ६६०; छायावाद, ६६५;जयशंकर प्रसाद, ६७८; सुमित्रानंदन पंत, ६९४; सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, ७१४; महादेवी वर्मा, ७१९; अनुक्रमणिका (साहित्यकार), ७२३; अनुक्रमणिका (साहित्य), ७४३; 


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