कामायनी

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
कामायनी (1936) 
by जयशंकर प्रसाद
[  ]
कामायनी.djvu
[  ]











मयूर पेपरबैक्स[सम्पादन]

ए-95, सेक्टर-5, नोएडा-201301


संस्करण : 1992


मूल्य : 12.00


सरस्वती प्रिटिंग प्रेस
ए-95, सेक्टर-5, नोएडा-201301
में मुद्रित।


KAMAYANI (Poetry)[सम्पादन]

by Jayshankar Prasad



ISBN 81-7198-030-9 [  ]




कामायनी
जयशंकर प्रसाद









कामायनी.djvu
मयूर पेपरबैक्स
[  ] [  ]

आर्य साहित्य में मानवों के आदिपुरुष मनु का इतिहास वेदों से लेकर पुराण और इतिहासों में बिखरा हुआ मिलता है । श्रद्धा और मनु के सहयोग से मानवता के विकास की कथा को, रूपक के आवरण में, चाहे पिछले काल में मान लेने का वैसा ही प्रयत्न हुआ हो जैसाकि सभी वैदिक इतिहास के साथ निरुक्त के द्वारा किया गया किंतु मन्वंतर के अर्थात मानवता के नवयुग के प्रवर्तक के रूप में मनु की कथा आर्यों की अनुश्रुति में दृढ़ता से मानी गयी है । इसलिए वैवस्वत मनु को ऐतिहासिक पुरुष ही मानना उचित है । प्राय: लोग गाथा और इतिहास में मिथ्या और सत्य का व्यवधान मानते हैं । किंतु सत्य मिथ्या से अधिक विचित्र होता है । आदिम युग के मनुष्यों के प्रत्येक दल ने ज्ञानोन्मेष के अरुणोदय में जो भावपूर्ण इतिवृत्त संगृहीत किये थे, उन्हें आज गाथा या पौराणिक उपाख्यान कहकर अलग कर दिया जाता है, क्योंकि उन चरित्रों के साथ भावनाओं का भी बीच-बीच में संबंध लगा हुआ-सा दीखता है । घटनाएं कहीं कहीं अतिरंजित-सी भी जान पड़ती हैं । तथ्य-संग्रह-कारिणी तर्कबुद्धि को ऐसी घटनाओं में रूपक का आरोप कर लेने की सुविधा हो जाती है । किंतु उनमें भी कुछ सत्यांश घटना से संबद्ध है, ऐसा तो मानना ही पड़ेगा । आज के मनुष्य के समीप तो उसकी वर्तमान संस्कृति का क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परंतु उसके इतिहास की सीमा जहां से प्रारंभ होती है, ठीक उसी के पहले सामूहिक चेतना की दृढ़ और गहरे रंगों की रेखाओं से, बीती हुई और भी पहले की बातों का उल्लेख स्मृति-पट पर अमिट रहता है, परंतु कुछ अतिरंजित-सा । वे घटनाएं आज विचित्रता से पूर्ण जान पड़ती हैं । संभवत: इसीलिए हमको अपनी प्राचीन श्रुतियों का निरुक्त के द्वारा अर्थ [  ] करना पड़ा; जिससे कि उन अर्थों का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय ।

यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है, तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाघ्य है। यह मनुष्यता का मनोवैज्ञानिक इतिहास बनने में समर्थ हो सकता है । आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते हैं । तब भी, उसके तिथि-क्रम मात्र से संतुष्ट न होकर, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण के द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना चाहते हैं । उसके मूल में क्या रहस्य है ? आत्मा की अनुभूति ! हां, उसी भाव के रूप-ग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बन कर प्रत्यक्ष होती है । फिर, वे सत्य घटनाएं स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणत हो जाती हैं किंतु सूक्ष्म अनुभूति या भाव, चिरंतन सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग-युग के पुरुषों और पुरुषार्थों की अभिव्यक्ति होती रहती है ।

जल-प्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी ही प्राचीन घटना है, जिसने मनु को देवों से विलक्षण मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया । वह इतिहास ही है । 'मनवे वै प्रात:' इत्यादि से इस घटना का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में मिलता है । देवगण के उच्छृंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अंतिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को एक नये युग की सूचना मिली । इस मन्वंतर के प्रवर्तक मनु हुए । मनु भारतीय इतिहास के आदिपुरुष हैं। राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं । शतपथ ब्राह्मण में उन्हें श्रद्धादेव कहा गया है, 'श्रद्धादेवो वै मनु:' (का॰ 1 प्र॰ 1) । भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना गया है ।

'ततो मनु: श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत
श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान् ।' (9-1-11)

छांदोग्य उपनिषद् में मनु और श्रद्धा की भावमूलक व्याख्या भी मिलती है । 'यदावै श्रद्धधाति अथ मनुते नाऽश्रद्धधन् मनुते'—--यह कुछ निरुक्त की-सी व्याख्या है। ऋग्वेद में श्रद्धा और मन, दोनों का नाम [  ]
ऋषियों की तरह मिलता है । श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है, ‘कामगोत्रजा श्रद्धानामर्षिका ।' श्रद्धा काम-गोत्र की बालिका है, इसीलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है । मनु प्रथम पथ-प्रदर्शक और अग्निहोत्र प्रज्वलित करने वाले तथा अन्य कई वैदिक कथाओं के नायक हैं : 'मनुर्हवा अग्रे यज्ञेनेजे यदनुकृत्येमा: प्रजा यजन्ते’ (5.1 शतपथ)। इनके संबंध में वैदिक साहित्य में बहुत-सी बातें बिखरी हुई मिलती हैं; किंतु उनका क्रम स्पष्ट नहीं है। जल-प्लावन का वर्णन शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय से आरंभ होता है, जिसमें उनकी नाव के उत्तरगिरि हिमवान प्रदेश में पहुंचने का प्रसंग है । वहां ओघ के जल का अवतरण होने पर मनु भी जिस स्थान पर उतरे, उसे मनोरवसर्पण कहते हैं । अपीपरं वै त्वा, वृक्षे नावं प्रतिबध्नीष्व, तै तु त्वा मा गिरौ सन्त मुदकमन्तश्चैत्सीद् यावद् यावदुदकं समवायात्---तावत् तावदन्ववसर्पासि इति स ह तावत् तावदेवान्ववससर्प । तदप्येतदुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पणमिति । (8.1)

श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरंभ करने का प्रयत्न हुआ । किंतु असुर पुरोहित के मिल जाने से इन्होंने पशु-बलि की—--'किलाताकुली-इति हासुर ब्रम्हावासतु: । तौ होचतु:- श्रद्धादेवो वै मनुः--आवं नु वेदावेति । तो हागत्योचतुः---मनो । बाजयाव त्वेति ।'

इस यज्ञ के बाद मनु में जो पूर्व-परिचित देव-प्रवृत्ति जाग उठी--उसने इड़ा के संपर्क में आने पर उन्हें श्रद्धा के अतिरिक्त एक दूसरी ओर प्रेरित किया । इड़ा के संबंध में शतपथ में कहा गया है कि उसकी उत्पत्ति या पुष्टि पाक यज्ञ से हुई और उस पूर्ण पोषिता को देखकर मनु ने पूछा कि 'तुम कौन हो ?' इड़ा ने कहा,'तुम्हारी दुहिता हूं। ' मनु ने पूछा कि 'मेरी दुहिता कैसे ?' उसने कहा 'तुम्हारे दही, घी इत्यादि के हवियों से ही मेरा पोषण हुआ है ।’ ‘तां ह' मनुरुवाच —-'का असि' इति । 'तव दुहिता' इति। 'कथं भगवति ? मम दुहिता' इति । (शतपथ 6 प्र॰ 3 ब्रा॰) [  ]इड़ा के लिए मनु को अत्यधिक आकर्षण हुआ और श्रद्धा से वे कुछ खिंचे। ऋग्वेद में इड़ा का कई जगह उल्लेख मिलता है। यह प्रजा पति मनु की पथ-प्रदर्शिका, मनुष्यों का शासन करने वाली कही गयी है । 'इड़ामकृण्वन्मनुषस्य शासनीम्' (1-31-11 ऋग्वेद)। इड़ा के संबंध में ऋग्वेद में कई मंत्र मिलते हैं। 'सरस्वती साधयंती धियं न इड़ा देवी भारती विश्वतूर्तिः तिस्रो देवी: स्वधयावर्हिरेदमच्छिद्रं पान्तु शरणं निषद्य।' (ऋग्वेद 2-3.8) 'आनो यज्ञं भारती तूय मेत्विड़ा मनुष्वदिह चेतयंती। तिस्रो देवीर्वर्हिरेदं स्योनं सरस्वती स्वपस: सदंतु।" (ऋग्वेद—10-110.8) इन मंत्रों में मध्यमा, वैखरी और पश्यंती की प्रतिनिधि भारती, सरस्वती के साथ इड़ा का नाम आया है। लौकिक संस्कृत में इड़ा शब्द पृथ्वी अर्थात् बुद्धि, वाणी आदि का पर्यायवाची है---'गो भू र्वाचत्स्विड़ा इला'---(अमर)। इस इड़ा या वाक् के साथ मनु या मन के एक और विवाद का भी शतपथ में उल्लेख मिलता है जिसमें दोनों अपने महत्व के लिए झगड़ते हैं-'अथातोमनसश्च' इत्यादि (4 अध्याय 5 ब्राह्मण)। ऋग्वेद में इड़ा को घी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है। पिछले काल में संभवतः इड़ा को पृथ्वी आदि से संबद्ध कर दिया गया हो, किंतु ऋग्वेद 5-5-8 में इड़ा और सरस्वती के साथ मही का अलग उल्लेख स्पष्ट है। 'इड़ा सरस्वती मही तिस्रोदेवी मयोभुवः' से मालूम पड़ता है कि मही से इड़ा भिन्न है। इड़ा को मेधसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है।

अनुमान किया जा सकता है कि बुद्धि का विकास, राज्य- स्थापना इत्यादि इड़ा के प्रभाव से ही मनु ने किया। फिर तो इड़ा पर भी अधिकार करने की चेष्टा के कारण मनु को देवगण का कोपभाजन होना पड़ा। 'तद्वै देवानां आग आस' (7-4 शतपथ)। इस अपराध के कारण उन्हें दंड भोगना पड़ा---‘तंरुद्रोऽभ्यावत्य विव्याघ' (7-4 शतपथ)। इड़ा देवताओं की स्वसा थी। मनुष्यों को चेतना प्रदान करने वाली थी। इसीलिए यज्ञों में इड़ा-कर्म होता है। यह इड़ा का बुद्धिवाद श्रद्धा और मनु के बीच व्यवधान बनाने में सहायक होता है। फिर [  ]
बुद्धिवाद के विकास में, अधिक सुख की खोज में, दुख मिलना स्वाभाविक है। यह आख्यान इतना प्राचीन है कि इतिहास में रूपक का भी अद्भुत मिश्रण हो गया है । इसीलिए मनु, श्रद्धा और इड़ा इत्यादि अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए, सांकेतिक अर्थ की भी अभि-व्यक्ति करें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमशः श्रद्धा और इड़ा से भी सरलता से लग जाता है। 'श्रद्धां हृदय्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु!' (ऋग्वेद 10-151-4) इन्हीं सबके आधार पर 'कामायनी' की कथा-सृष्टि हुई है। हां, 'कामायनी' की कथा-शृंखला मिलाने के लिए कहीं-कहीं थोड़ी- बहुत कल्पना को भी काम में ले आने का अधिकार मैं नहीं छोड़ सका हूं।


महारात्रि, 1992 ---जयशंकर 'प्रसाद'
[ १० ] [ ११ ]


आमुख

चिंता 1
आशा 7
श्रद्धा 14
काम 20
वासना 26
लज्जा 35
कर्म 39
ईर्ष्या 49
इड़ा 55
स्वप्न 66
संघर्ष 76
निर्वेद 87
दर्शन 97
रहस्य 111
आनंद 118
[ १२ ]



आमुख

चिंता 1
आशा 7
श्रद्धा 14
काम 20
वासना 26
लज्जा 35
कर्म 39
ईर्ष्या 49
इड़ा 55
स्वप्न 66
संघर्ष 76
निर्वेद 87
दर्शन 97
रहस्य 111
आनंद 118


PD-icon.svg This work is in the public domain in the United States because it was first published outside the United States (and not published in the U.S. within 30 days), and it was first published before 1989 without complying with U.S. copyright formalities (renewal and/or copyright notice) and it was in the public domain in its home country on the URAA date (January 1, 1996 for most countries).