सप्तसरोज/सौत

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सप्तसरोज  (१९३८) 
द्वारा प्रेमचंद

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लेती रही, परन्तु जब उसने देखा कि ये औषधियां कुछ काम नहीं करती तब वह एक महौषधि की फिक्र में लगी जो काया-कल्प से कम नहीं थी। उसने महीनों, बरसों इसी चिन्ता-सागर में गोते लगाते काटे। उसने दिलको बहुत समझाया, परन्तु मन में जो बात समा गई थी वह किसी तरह न निकली। उसे बड़ा भारी आत्मत्याग करना पड़ेगा। शायद पति-प्रेम के सदृश अनमोल रत्न भी उसके साथ निकल जाय, पर क्या ऐसा हो सकता है? पन्द्रह वर्षतक लगातार जिस प्रेम के वृक्ष की उसने सेवा की है क्या वह हवा का,एक झोंका भी न सह सकेगा?

गोदावरी ने अन्तमें अपने प्रवल विचारों के आगे सिर झुका ही दिया। अब सौतका शुभागमन करने के लिये वह तैयार हो गई थी।

पण्डित देवदत्त गोदावरीका यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भित हो गये। उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेम की परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हसकर टाल दी। पर जब गोदावरीने गम्भीर भावसे कहा, तुम इसे हंसी मत समझो मैं अपने हृदय से कहती हूँ कि संतानका मुंह देखने के लिये मैं सौत से छातीपर मूंग दलवाने के लिये भी तैयार हूँ, तब तो उनका सन्देह जाता रहा। इसने ऊचे और पवित्र भावसे भरी हुई गोदावरी को उन्होंने गले से लिपटा लिया। वे बोले मुझसे यह न होगा। मुझे सन्तान की अभिलाषा नहीं। गोदावरी ने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुझे तो है। अगर
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अपनी खातिर से नहीं वो तुम्हें मेरी खातिर से यह काम करना ही पड़ेगा।

पण्डितजी सरल स्वभावके मनुष्य थे। हासी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहने से वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफसे इसी की देर थी। पंडितजी को कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरी की कार्य-कुशलता ने सब काम उनके लिये सुलभ कर दिया। उसने इस काम के लिये अपने पास से केवल रुपये ही नहीं निकाले, किन्तु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिये। लोकनिन्दा का भय इस मार्ग में सबसे बड़ा काटा था। देवदत्त मन में विचार करने लगे कि जब मैं मौर सजाकर चलूँगा तब लोग मुझे क्या कहेंगे? मेरे दफ्तर के मित्र मेरी हँसी उड़ायेंगे और मुस्कुराते हुए कटाक्षों से मेरी ओर देखेंगे। उनके ये कटाक्ष छुरीसे भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूँगा?

गोदावरीने अपने गांवमें जाकर इस कार्य को प्रारम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त भी कर डाला। नयी बहू घर में आ गई। उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानो वह बेटे का ब्याह कर लाई हो। वह खूब गाती-बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गाने के बदले रोना पड़ेगा।

कई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौतपर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कभी न भूलती थी कि मैं वास्तव में उसकी सास नहीं है। उधर
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लेती रही, परन्तु जब उसने देखा कि ये औषधियाँ कुछ काम नहीं करती तब वह एक महौषधिकी फिक्रमे लगी जो काया-कल्प से कम नहीं थी। उसने महीनों, बरसों इसी चिन्ता-सागरमें गोते लगाते काटे। उसने दिल को बहुत समझाया, परन्तु मनमे जो वात समा गई थी वह किसी तरह न निकली। उसे बड़ा भारी आत्मत्याग करना पड़ेगा। शायद पति-प्रेम के सदृश अनमोल रत्न भी उसके साथ निकल जाय, पर क्या ऐसा हो सकता है? पन्द्रह वर्षतक लगातार जिम प्रेमके वृक्ष की उसने सेवा की है क्या वह हवाका एक झोंका भी न सह सकेगा?

गोदावरीने अन्त में अपने प्रबल विचारों के आगे सिर झुका ही दिया। अब सौत का शुभागमन करने के लिये वह तैयार हो गई थी।

पण्डित देवदत्त गोदावरीका यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भित हो गये। उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेम की परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हसकर टाल दी। पर जय गोदावरी ने गम्भीर भावसे कहा, तुम इसे हसी मत समझो मैं अपने हृदय से कहती हूंँ कि संतान का मुंह देखने के लिये में सौत में छातीपर मूंग दलवाने के लिये भी तैयार हूँ, तब तो उनका सन्देह जाता रहा। इतने ऊचे और पवित्र भाव से भरी हुई गोदावरी को उन्होंने गले से लिपटा लिया। वे बोला मुझसे यह न होगा। मुझे सन्तानकी अभिलाषा नहीं।

गोदावरी ने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुझे तो है। अगर
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अपनी खातिरसे नहीं तो तुम्हे मेरी सातिरसे यह काम करना ही पड़ेगा।

पण्डितजी सरल स्वभावके मनुष्य थे। हामी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहनेसे वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफसे इसीकी देर थी। पण्डितजीको कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरीकी कार्य-कुशलताने सब काम उनके लिये सुलभ कर दिया। उसने इस कामके लिये अपने पाससे केवल रूपये ही नहीं निकाले, किन्तु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिये। लोकनिन्दा का भय इस मार्गमे सबसे बड़ा काँटा था। देवदत्त मनमें विचार करने लगे कि जब मैं मोर सजाकर चलूगा तब लोग मुझे क्या कहेंगे? मेरे दफ्तरके मित्र मेरी हँसी उड़ायेगे और मुस्कुराते हुए कटाक्षोंसे मेरी ओर देखेगे। उनके ये कटाक्ष छुरीसे भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूँगा?

गोदावरीने अपने गांवमे जाकर इस कार्य्यको प्रारम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त भी कर डाला। नयी बहू घरमें आ गई। उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानो वह बेटेका व्याह कर लाई हो। वह खूब गाती-बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गाने के बदले रोना पड़ेगा।

कई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौतपर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह घात कभी न भूलती थी कि मैं वास्तवमें उसकी सास नहीं हूँ। उधर
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गोमतीको भी अपनी स्थितिका पूरा ख्याल रहता था। इसी कारण सासके शासन की तरह कठोर न रहने पर भी गोदावरीका शासन उसे अप्रिय प्रतीत होता था। उसे अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिये भी गोदावरी से कहते संकोच होता था।

कुछ दिनों बाद गोदावरी के स्वभावमें एक विशेष परिवतन दिखाई देने लगा। वह पण्डितजी को घरमे आते-जाते बडी तीव्र दृष्टि से देखने लगी। उसकी स्वाभाविक गम्भीरता अब मानो लोप सी हो गई, जरासी बात भी उसके पेटमें नहीं पचती। जब पडितजी दफ्तर से आते तब गोदावरी उनके पास घण्टों बैठी गोमतीका वृत्तान्त सुनाया करती। इस वृत्तान्त-कथनमें बहुत ऐसी छोटी छोटी बाते भी होती थीं कि जब कथा समाप्त होती तब पडितजीके हृदयसे बोझसा उतर जाता। गोदावरी क्यों इतनी मृदुभाषिणा हो गई थी, इसका कारण समझना मुश्किल है। शायद अब वह गोमतीसे डरती थी। उसके सौन्दर्य से, उसके यौवन से, उसके लज्जायुक्त नेत्रों से शायद वह अपनेको पराभूत समझती। बांधको तोड़कर वह पानीकी धाराको मिट्टीके ढेलोंमे रोकना चाहती है।

एक दिन गोदावरीने गोमतीसे मीठे चावल पकानेको कहा। शायद वह रक्षाबन्धनका दिन था। गोमतीने कहा, शक्कर नहीं है। गोदावरी यह सुनते ही विस्मित हो उठी। शक्कर इतने जल्दी कैसे उठ गई। जिसे छाती फाड़कर कमाना पड़ता है, उसे अखरता है, खानेवाले क्या जाने?

जब पण्डितजी दफ्तरसे आये तब यह जरा-सी बात बड़ा विस्तृत रूप धारण करके उनके कानोंमें पहुंची। थोडी देरके लिये
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पडितजीके दिलमें भी यह शंका हुई कि गोमतीको कहीं भस्मक रोग तो नहीं हो गया।

ऐसी ही घटना एक बार फिर हुई। पडितजीको बवासीरकी शिकायत थी। लालमिर्च वे बिलकुल न साते थे। गोदावरी जब रसोई बनाती थी तब वह लालमिर्च रसोई-घरमे लाती ही न थी। गोमतीने एक दिन दालमें मसालेके साथ थोडी सी लालमिर्च भी डाल दी। पडितजीने दाल कम खाई। पर गोदावरी गोमतीके पीछे पड़ गई। ऐठकर वह उससे बोली। ऐसी जीभ जल क्यों नहीं जाती।

पडितजी बडे ही सीधे आदमी थे। दफ्तर गये, खाया, पड़ कर सो रहे। वे एक साप्ताहिक पत्र मंगाते थे। उसे कभी-कभी महीनों खोलनेकी नौवत न आती थी। जिस काममे जरा भी कष्ट या परिश्रम होता उससे वे कोसों दूर भागते थे। कभी कभी उनके दफ्तरमें थियेटर के "पास" मुफ्त मिला करते थे। पर पंडितजी उनसे कभी काम नहीं लेते। और ही लोग उनसे मांग ले जाया करते। रामलीला या कोई मेला तो उन्होंने शायद नौकरी करने के बाद फिर कभी देखा ही नहीं। गोदावरी उनकी प्रकृति का परिचय अच्छी तरह पा चुकी थी। पंडितजी भी प्रत्येक विषय में गोदावरीके मतानुमार चलने में अपनीकुशल समझते थे—

पर रुई-सी मुलायम वस्तु भी दबकर कठोर हो जाती है पंडितजी को यह आठों पहर की चहचह प्रसह्य सी प्रतीत होती। कभी-कभी मन में झुझलाने भी लगते। इच्छा शक्ति जो इतने
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दिनोंतक बेकार पडी रहने से निर्बल-सी हो गई थी, अब कुछ सजीव-सी होने लगी थी।

पंडितजी यह मानते थे कि गोदावरीने सौतको घर लाने में बडा भारी त्याग किया है। उसका यह त्याग अलौकिक कहा जा सकता है, परन्तु उसके त्याग का भार जो कुछ है वह मुझपर है गोमतीपर उसका क्या एहसान मेरे कारण उसपर क्यों ऐसी क्रूरता की जाती है। यहा उसे कौनसा सुख है जिसके लिये वह फटकारपर फटकार सहे? पति मिला है वह बूढ़ा और सदा रोगी, घर मिला है वह ऐसा कि अगर आज नौकरी छूट जाय तो कल चूल्हा न जले। इस दशा में गोदावरी का यह स्नेह-रहित बर्ताव उन्हे बहुत अनुचित मालूम होता।

गोदावरीकी दृष्टि इतनी स्थूल न थी कि उसे पण्डितजी के मनके भाव नजर न आवें। उनके मनमे जो विचार उत्पन्न होते वे सब गोदावरीको उनके मुखपर अंकितसे दिखाई पड़ते। यह जानकारी उसके हृदयमें एक ओर गोमतीके प्रति ईर्पाकी प्रचण्ड अग्नि दहका देती, दूसरी ओर पंडित देवदत्त पर निष्ठुरता और स्वार्थ-प्रियता का दोषारोपण कराती। फल यह हुआ कि मनोमालिन्य दिन-दिन बढता ही गया।

गोदावरी ने धीरे-धीरे पंडितजीसे गोमती की बातचीत करनी छोड़ दी, मानो उसके निकट गोमती घरमें थी ही नहीं। न‌ उसके खाने पीने की वह सुध लेती है, न कपडे लत्ते की। एक बार कई दिनों तक उसे जलपान के लिये कुछ भी न मिला। पंडित
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जी तो आलसी जीव थें। वे इन सब अत्याचारों को देखा करते,पर अपने शांतिसागरमें घोर उपद्रव मच जाने के भयसे किसी से कुछ न कहते। तथापि इस पिछले अन्यायने उनकी महती सहन-शक्ति को भी मथ डाला। एक दिन उन्होंने गोदावरीसे डरते-डरते कहा, क्या आजकल जलपान के लिये मिठाई-विठाई नहीं आती?

गोदावरी ने क्रुद्ध होकर जवाब दिया, तुम लाते ही नहीं तो आवे कहां से। मेरे कोई नौकर बैठा है ?

देवदत्तको गोदावरी के ये कठोर वचन तीर से लगे। आजतक गोदावरी ने उनसे ऐसी रोषपूर्ण बाते कभी न की थी।

वे बोले, धीरे बोलो, झुझलाने की तो कोई बात नहीं है। गोदावरी ने आँखे नीची करके कहा, मुझे तो जैसे आता है वैसे बोलती हूँ। दूसरोंकी-सी मधुर बोली कहां से लाऊं?

देवदत्त ने जरा गरम होकर कहा, आजकल मुझे तुम्हारे मिजाज का कुछ रग ही नहीं मालूम होता। बात बात पर तुम उलझती रहती हो।

गोदावरी का चेहरा क्रोधाग्नि से लाल हो गया। वह बैठी थी खड़ी हो गयी। उसके होंठ फड़कने लगे। वह बोली, मेरी कोई बात अब तुमको क्यों अच्छी लगेगी। अब तो मैं सिर से पैर तक दोषों से भरी हुई हूँँ। अब और लोग तुम्हारे मन का काम करेंंगेंं। मुझसे नहीं हो सकता। यह लो सन्दूक की कुंजी। अपने रुपये-पैसे सम्भाल लो, यह रोज रोजकी झंझट मेरे मानकी नहीं। जब तक निभा, निभाया। अब नहीं निभ सकता।

पण्डित देवदत्त मानो मूच्छित-से हो गये। जिस शांति भावका
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उन्हें भय था उसने अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके उनके घरमें प्रवेश किया। वह कुछ भी न बोल सके। इस समय उनके अधिक बोलने से बात बढ़ जानेका भय था। वह बाहर चले आये और सोचने लगे कि मैंने गोदावरीके साथ कौन-सा अनुचित व्यवहार किया है। उनके ध्यानमें न आया कि गोदावरी के हाथ से निकलकर घर का प्रबन्ध कैसे हो सकेगा। इस थोडी सी आमदनीमें वह न जाने किस प्रकार काम चलाती थी? क्या क्या उपाय वह करता थी? अब न जाने नारायण कैसे पार लगावेगे? उसे मनाना पडेगा और हो ही क्या सकता है। गोमती भला क्या कर सकती है, सारा बोझ मेरे ही सिर पड़ेगा। मानेगी तो, पर मुश्किल से ।

परन्तु पंडितजीकी ये शुभकामनाए निष्फल हुई। सन्दूक की वह कुञ्जी विपैली नागिन की तरह वहीं आंगन में ज्यों-की त्यों तीन दिनतक पड़ी रही, किसी को उसके निकट जाने का साहस न हुआ।

चौथे दिन पण्डितजीने मानो जानपर खेलकर उस कुज्जी को उठा लिया। उस समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ मानो किसी ने उनके सिर पर पहाड उठाकर रख दिया। आलसी आदमियों को अपने नियमित मार्ग से तिलभर भी हटना बडा कठिन मालूम होता है।

यद्यपि पडितजी जानते थे कि मैं अपने दफ्तरके कारण इस कार्यको सभालनेमें असमर्थ हूं, तथापि उनसे इतनी ढिठाई न हो सकी कि वह कुञ्जी गोमती को दें। पर यह केवल दिखावा ही भर था। कुञ्जी उन्हीं के पास रहती थी, काम सब गोमती को करना पडता था। इस प्रकार गृहस्थी के शासन का अन्तिम साधन भी
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बाधा, कोई रुकावट न पडी। हां, अनुभव न होने के कारण पडितजी का प्रबन्ध गोदावरी के प्रबन्ध जैसा अच्छा न था। कुछ खर्च ज्यादा पड़ जाता था। पर काम भलीभाति चला जाता था । हां,गोदावरीको गोमती के सभी काम दोषपूर्ण दिखाई देते थे। ईर्ष्या में अग्नि है। परन्तु अग्नि का गुण उसमें नहीं। वह हृदय को फैलाने के बदले और भी संकीर्ण कर देती है। अब घरमें कुछ हानि हो जाने से गोदावरीको दुख के बदले आनन्द होता। बरसातके दिन थे। कई दिनतक सूर्यनारायण के दर्शन न हुए। सन्दूकमें रक्खे हुए कपडोंमें फफूंदी लग गई। तेलके अचार बिगड़ गये। गोदावरी को यह सब देखकर रत्तीभर भी दुख न हुआ। हा, दो चार जली-कटी सुनाने का अवसर उसे अवश्य मिल गया। मालकिन ही बनना आता है कि मालकिन का काम करना भी।

पंडित देवदत्त की प्रकृति में भी अब नया रंग नजर आने लगा। जबतक गोदावरी अपनी कार्यपरायणता से घर का सारा बोझ संभाले थी तबतक उनको कभी किसी चीजकी कमी नहीं खली। यहांतक कि शाक-भाजी के लिये भी उन्हें बाजार नहीं जाना पड़ा। पर अब गोदावरी उन्हें दिनमें कई बार बाजार ऐन वक्तपर जाना पडता। पर गोदावरी उन्हें दिन में कई बार बाजार दौड़ते देखती। गृहस्थीका प्रबन्ध ठीक न रहनेसे बहुधा जरूरी चीजों के लिए उन्हें बाजार ऐन वक्तपर जाना पड़ता। गोदावरी यह कौतुक देखती और सुना-सुनाकर कहती, यही महाराज हैं कि एक तिनका उठानेके लिये भी न उठते थे। अब देखती हूँ,दिनमें दस दफे बाजार में खड़े रहते हैं। अब में इन्हें कभी यह कहते नहीं सुनती कि मेरे लिखने-पढ़ने में हर्ज होगा। [ ३३ ]गोदावरी को इस बात का एक बार परिचर मिल चुका था कि पंडितजी बाजार हाट के काम में कुशल नहीं है। इसलिये जब उसे कपड़े की जरूरत होती तब वह अपने पड़ोस के एक बूढे लालासाहब से मंगवाया करती थी। पण्डितजी को यह बात भूल सी गई थी कि गोदावरी को साड़ियों की भी जरूरत पड़ती है। उनके सिर में तो जितना बोझ कोई हटा दे उतना ही अच्छा था। खुद वे भी वही कपडे़ पहनते थे जो गोदावरी मगाकर उन्हें दे देती थी। पण्डितजी को नये फैशन और नये नमूनों से कोई प्रयोजन न था। पर अब कपड़ों के लिये भी उन्ही को बाजार जाना पड़ता है। एक बार गोमती के पास साड़िया न थीं। पण्डित जी बाजार गये तो एक बहुत अच्छा सा जोड़ा उसके लिये ले आये। बजाज ने मन-माने दाम लिये। उधार सौदा लाने में पण्डितजी जरा भी आगा-पीछा न करते थे। गोमती ने वह जोड़ा गोदावरी को दिखाया। गोदावरी ने देखा और मुह फेरकर रुखाई से बोली, भला तुमने उन्हे कपड़े लाना वो सिखा दिया। मुझे तो सोलह वर्ष बीत गये, उनके हाथ का लाया हुआ कपड़ा स्वप्न में भी पहनना नसीब नहीं हुआ।

ऐसी घटनाए गोदावरी की ईर्ष्याग्नि और भी प्रज्वलित कर देती थीं। जबतक उसे यह विश्वास था कि पण्डितजी स्वभाव से ही रूखे हैं तबतक उसे सन्तोष था। परन्तु अब उनकी ये नयी नयी तरंगे देखकर उसे मालूम हुआ कि जिस प्रीतिको मैं सैकडों-यन्न करके भी न पा सकी उसे इस रमणी ने केवल अपने यौवन-से जीत लिया। उसे अब निश्चय हुआ कि मैं जिसे सच्चा प्रेम समझ रही थी वह वास्तव मे कपटपूर्ण था। वह निरा स्वार्थ या