विकिस्रोत:निर्वाचित पुस्तक सूची

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यह विकिस्रोत पर सभी निर्वाचित हुए पुस्तकों की सूची है।

कपालकुण्डला[सम्पादन]

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कपालकुण्डला.djvu

कपालकुण्डला बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा १८६६ में रचित एक बांग्ला उपन्यास है। यह उपन्यास एक प्रेमकथा पर आधारित है जिसमें कपालकुण्डला नामक एक वनवासी कन्या सप्तग्राम के नवकुमार नामक एक लड़के से प्रेम करने लगती है और फिर उससे विवाह कर लेती है। उपन्यास में दिखाया गया है कि कैसे वह वनवासी कन्या नगरीय जीवन से तालमेल नहीं बिठा पाती है। (पूरा पढ़ें)








अहिल्याबाई होलकर[सम्पादन]

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अहिल्याबाई होलकर.djvu

अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) मराठा मालवा साम्राज्य की होलकर साम्राज्ञी थीं। अहिल्याबाई मल्हारराव होलकर की पुत्रवधू एवं खंडेराव की पत्नी थीं। उनके जीवनीकार और इतिहासकार मालकम ने माना है कि अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए-सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्नक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाए, मंदिरों में शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु विद्वानों की नियुक्तियाँ की। वे आत्मप्रतिष्ठा एवं आत्मप्रचार के मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं। ये उसी परंपरा में थीं जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। इस रचना में अहिल्याबाई के जीवन के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन होता है। (पूरा पढ़ें)







कामायनी[सम्पादन]

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कामायनी.djvu

कामायनी (1936) आधुनिककालीन हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। (पूरा पढ़ें)








शैवसर्वस्व[सम्पादन]

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शैवसर्वस्व.pdf

शैवसर्वस्व प्रताप नारायण मिश्र की कृति है। उन्नीसवीं सदी में इसकी रचना हुई। (शैवसर्वस्व पूरा पढ़ें)









स्कंदगुप्त[सम्पादन]

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स्कंदगुप्त.pdf

स्कंदगुप्त जयशंकर प्रसाद द्वारा १९२८ ई. में लिखा गया नाटक है। गुप्त-काल (२७५ ई०---५४० ई० तक) अतीत भारत के उत्कर्ष का मध्याह्न था। उस समय आर्य्य-साम्राज्य मध्य-एशिया से जावा-सुमात्रा तक फैला हुआ था। समस्त एशिया पर भारतीय संस्कृति का झंडाफहरा रहा था। इसी गुप्तवंश का सबसे उज्ज्वल नक्षत्र था---स्कंदगुप्त। उसके सिंहासन पर बैठने के पहले ही साम्राज्य में भीतरी षड्यंत्र उठ खड़े हुए थे। साथ ही आक्रमणकारी हूणों का आतंक देश में छा गया था और गुप्त-सिंहासन डाँवाडोल हो चला था। ऐसी दुरवस्था में लाखों विपत्तियाँ सहते हुए भी जिस लोकोत्तर उत्साह और पराक्रम से स्कंदगुप्त ने इस स्थिति से आर्य साम्राज्य की रक्षा की थी---पढ़कर नसों में बिजली दौड़ जाती हैं। अन्त में साम्राज्य का एक-छत्र चक्रवर्तित्व मिलने पर भी उसे अपने वैमात्र एवं विरोधी भाई पुरगुप्त के लिये त्याग देना, तथा, स्वयं आजन्म कौमार जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा करना---ऐसे प्रसंग हैं जो उसके महान चरित पर मुग्ध ही नहीं कर देते, बल्कि देर तक सहृदयों को करुणासागर में निमग्न कर देते हैं। ( स्कंदगुप्त पूरा पढ़ें)







गोदान[सम्पादन]

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गोदान.pdf

गोदान, प्रेमचंद का सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसे भारतीय कृषक जीवन का महाकाव्य भी माना जाता है। इसका प्रथम प्रकाशन १९३६ ई० में हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई द्वारा हुआ था। कथा का नायक होरी है जिसकी निराशा, धर्मभीरुता, स्वार्थपरता और बैठकबाजी, बेबसी तत्कालीन किसान जीवन को बखूबी चित्रित करती है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, 'मरजाद' की भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, भारतीय समाज का मेरुदंड किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्र-संपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व नखदर्पण के समान प्रत्यक्ष हो गए हैं। ( गोदान पूरा पढ़ें)








हिन्द स्वराज[सम्पादन]

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Hind swaraj- MK Gandhi - in Hindi.pdf

हिन्द स्वराज, महात्मा गाँधी की पहली पुस्तक है जिसमें उन्होंने अपने विचारों को सुव्यवस्थित रूप दिया है। दक्षिण अफ्रीकाके भारतीय लोगोंके अधिकारोंकी रक्षाके लिए सतत लड़ते हुए गांधीजी १९०९ में लंदन गये थे। वहां कई क्रांतिकारी स्वराज्यप्रेमी भारतीय नवयुवक उन्हें मिले। उनसे गांधीजीकी जो बातचीत हुई उसीका सार गांधीजीने एक काल्पनिक संवादमें ग्रथित किया है। इस संवादमें गांधीजीके उस समयके महत्त्वके सब विचार आ जाते हैं। किताबके बारेमें गांधीजी ने स्वयं कहा है कि "मेरी यह छोटीसी किताब इतनी निर्दोष है कि बच्चोंके हाथमें भी यह दी जा सकती है। यह किताब द्वेषधर्मकी जगह प्रेमधर्म सिखाती है; हिंसाकी जगह आत्म-बलिदानको स्थापित करती है; और पशुबलके खिलाफ टक्कर लेनेके लिए आत्मबलको खड़ा करती है।" ( हिन्द स्वराज पूरा पढ़ें)






कोड स्वराज[सम्पादन]

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कोड स्वराज.pdf

कोड स्वराज, आधुनिक समय के नागरिक प्रतिरोध के अभियान की एक कहानी है, जो महात्मा गाँधी और उनके सत्याग्रह के अभियानों से प्रेरणा लेती है, जिसने सरकारों का अपने नागरिकों के साथ बातचीत करने का तरीका बदल दिया। ज्ञान की सार्वभौमिक पहुंच, सूचना का लोकतांत्रिककरण और स्वतंत्र ज्ञान की खोज में, मालामुद और पित्रोदा गांधीवादी मूल्यों को, आधुनिक समय पर लागू करने का दावा करते हैं और भारत और दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए एक एजेंडा पेश करते हैं। ( कोड स्वराज पूरा पढ़ें)








दुर्गेशनन्दिनी[सम्पादन]

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दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu

दुर्गेशनन्दिनी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित प्रथम बांग्ला उपन्यास है। सन् १८६५ के मार्च में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ। माना जाता है कि इस उपन्यास के प्रकाशित होने के बाद बांग्ला कथासाहित्य की धारा एक नये युग में प्रवेश कर गयी। १६वीं शताब्दी के उड़ीसा को केन्द्र में रखकर मुगलों और पठानों के आपसी संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास रचित है। फिर भी इसे सम्पूर्ण रूप से एक ऐतिहासिक उपन्यास नहीं माना जाता। (दुर्गेशनन्दिनी का प्रथम भाग पूरा पढ़ें)









प्रताप पीयूष[सम्पादन]

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प्रताप पीयूष.djvu

प्रताप पीयूष प्रतापनारायण मिश्र द्वारा रचित निबंध संग्रह है। "यदि बेद, बाइबिल, कुरानादि की एक प्रति अग्नि तथा जल में डाल दी जाय तो जलने अथवा गलने से कोई बच न जायगी। फिर एक मतवाला किस शेखी पर अपने को अच्छा और दूसरे को बुरा समझता है ? आप को जिस बात में विश्वास हो उसको मानिये, हम आप की आत्मा के इजारदार नहीं हैं जो यह कहें कि यों नहीं यों कर । यदि आप दृढ़ विश्वासी हैं तो हम अपनी बातों से डिगा नहीं सकते ।" (प्रताप पीयूष पूरा पढ़ें)








हीराबाई[सम्पादन]

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हीराबाई.djvu

हीराबाई किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा रचित उपन्यास है। "दिल्ली का ज़ालिम बादशाह अलाउद्दीन ख़िलजी जो अपने बूढे़ और नेक चचा जलालुद्दीन फ़ीरोज़ ख़िलजी को धोखा दे और उसे अपनी आंखों के सामने मरवाकर [सन् १२९५ ईस्वी] आप दिल्ली का बादशाह बन बैठा था, बहुत ही संगदिल, खुदग़रज़, ऐय्याश, नफ़्सपरस्त और ज़ालिम था। उसने तख़्त पर बैठते ही जलालुद्दीन के दो नौजवान लड़कों को क़तल करडाला और गुजरात" (हीराबाई पूरा पढ़ें)







पाँच फूल[सम्पादन]

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पाँच फूल.djvu

पाँच फूल १९२९ में सरस्वती-प्रेस द्वारा प्रकाशित प्रेमचंद के पाँच कहानियों का संग्रह है। ये पाँच कहानियाँ हैं - कप्तान-साहब, स्तीफ़ा, जिहाद, ⁠मंत्र और फ़ातिहा। इन कहानियों में प्रेमचंद ने भारतीय सैनिकों की वीरता और उनके घर की यादें, पिता-पुत्र का प्रेम, भारतीयों का आत्म-सम्मान, हिन्दू-मुस्लिम विवाद, बिछड़े रिश्तों से मुलाक़ात और हृदय परिवर्तन आदि का चित्रण किया है। (पूरा पढ़ें)


नव-निधि[सम्पादन]

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‘’’नव-निधि’’’ १९४८ ई॰ में बनारस के सरस्वती-प्रेस द्वारा प्रकाशित प्रेमचंद के नौ भावपूर्ण कहानियों का एक संग्रह है। ये नौ कहानियाँ हैं –– राजा हरदौल, रानी सारन्धा, मर्यादा की वेदी, पाप का अग्निकुण्ड, जुगुनू की चमक, धोखा, अमावस्या की रात्रि, ममता तथा पछतावा।


बुन्देलखण्ड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुन्देले हैं। इन बुन्देलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है। एक समय ओरछे के राजा जुझारसिंह थे। ये बड़े साहसी और बुद्धिमान् थे। शाहजहाँ उस समय दिल्ली के बादशाह थे। जब शाहजहाँ लोदी ने बलवा किया और वह शाही मुल्क को लूटता पाटता ओरछे की ओर आ निकला, तब राजा जुझारसिंह ने उससे मोरचा लिया। राजा के इस काम से गुणग्राही शाहजहाँ बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने तुरन्त ही राजा को दक्खिन का शासन-भार सौंपा। उस दिन ओरछे में बड़ा आनन्द मनाया गया। शाही दूत खिलअत और सनद लेकर राजा के पास आया। जुझारसिंह को बड़े-बड़े काम करने का अवसर मिला। सफ़र की तैयारियाँ होने लगी, तब राजा ने अपने छोटे भाई हरदौल सिंह को बुलाकर कहा-"भैया, मैं तो जाता हूँ। अब यह राज-पाट तुम्हारे सुपुर्द है। तुम भी इसे जी से प्यार करना। न्याय ही राजा का सबसे बड़ा सहायक है। न्याय की गढ़ी में कोई शत्रु नहीं घुस सकता, चाहे वह रावण की सेना या इन्द्र का बल लेकर आये। पर न्याय वही सच्चा है, जिसे प्रजा भी न्याय समझे। तुम्हारा काम केवल न्याय ही करना न होगा, बल्कि प्रजा को अपने न्याय का विश्वास भी दिलाना होगा। और मैं तुम्हें क्या समझाऊँ, तुम स्वयं समझदार हो।" (पूरा पढ़ें)


रंगभूमि[सम्पादन]

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Premchand.jpg

रंगभूमि १९३६ ई॰ में बनारस के सरस्वती-प्रेस द्वारा प्रकाशित प्रेमचंद का मौलिक सामाजिक उपन्यास है, जिसके लिए उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक पुरस्कार प्रदान किया गया था।


"शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरञ्जन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुकद्दमेबाजी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं। बनारस में पाँड़ेपुर ऐसी ही बस्ती है। वहाँ न शहरी दीपकों की ज्योति पहुँचती है, न शहरी छिड़काव के छींटे, न शहरी जल-स्रोतों का प्रवाह। सड़क के किनारे छोटे-छोटे बनियों और हलवाइयों की दुकानें हैं, और उनके पीछे कई इक्केवाले, गाड़ीवान, ग्वाले और मजदूर रहते हैं। दो-चार घर बिगड़े सफेदपोशों के भी हैं, जिन्हें उनकी हीनावस्था ने शहर से निर्वासित कर दिया है। इन्हीं में एक गरीब और अन्धा चमार रहता है, जिसे लोग सूरदास कहते हैं।"...(पूरा पढ़ें)