कबीर ग्रंथावली

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[ आवरण ]
कबीर ग्रन्थावली ।

[ डॉ० श्यामसुन्दरदास द्वारा सम्पादित कबीर ग्रन्थावली के अनुसार)


भूमिका-लेखक

डॉ० त्रिलोकीनारायण दीक्षित

एम० ए०, एम० एड०, पी-एच० डी०, डी० लिट्०

रीडर, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय

टीकाकार।

डॉ० सावित्री शुक्ल

एम० ए०, एम० एड०, पी-एच० डी०, डी० लिट्

हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय

(केवल साखी विभाग)

डॉ० राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी

बी० ए०, बी० एस-सी०, एम० ए०, साहित्यरत्न,

पी-एच० डी०, डी० लिट्

हिन्दी विभाग राजा बलवन्तसिंह कॉलेज, आगरा

{{c|(पद एवम् रमैणी)}

मूल्य : पन्द्रह रुपये

Kabir Granthavali.pdf

प्रकाशन केन्द्र

न्यू विल्डिग्स, अमीनाबाद, लखनऊ

[  ]

प्रकाशक

प्रकाशन केन्द्र

न्यू बिल्डिग्स, अमीनाबाद, लखनऊ




सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन




प्रियवदा प्रेस, आगरा-२

[  ]पाठकों के प्रति

कवीर की कथा अकथ है। उनका साहित्य अथाह है। प्रस्तुत पुस्तक इसी अथाह की थाह लेने का एक विनम्र प्रयास है। कबीरदास की रचनाओ को लेकर कई ग्रन्थो का सपादन किया गया है । डा० श्यामसुन्दरदास द्वारा सपादित 'कवीर ग्रन्थावली' मे हमको कवीर दास'के काव्य का सर्वाधिक प्रामाणिक स्वरूप प्राप्त होता है । प्रस्तुत पुस्तक को लिखते समय उक्त 'कबीर ग्रन्थावली' को ही आधार माना गया है । कबीरदास और कबीर साहित्य को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाएगा। उनकी ग्रन्थावली पर टीकाएँ, 'सजीवन भाष्य' आदि कई ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। सबमे कबीर के काव्य को समझने-समझाने का प्रयत्न किया गया है। इनमे प्रत्येक का अपना निजी महत्व है। कबीर के काव्य पर लिखी गई अधिकाश टीकामो मे प्राय छन्दो के भावार्थ ही दिए गए हैं। अप्रचलित शब्दो तथा दुल्ह पदावली को या तो छोड दिया गया है अथवा भावार्थ लिखकर विषय को चलता कर दिया गया है। इससे न तो पूरे छन्द की सगति ही बैठती है और न उराका अर्थ ही स्पष्ट होता है । ऐसी स्थिति मे जिज्ञासु पाठक की सतुष्टि नहीं हो पाती है और कबीर का काव्य कठिन, दुरूह, नीरस एव अटपटा कह दिया जाता है । मेरी धारणा है कि कवीर को जीवन और जगत का व्यापक अनुभव था। उनकी आध्यात्मिक अनुभूति अत्यन्त गहरी धी। अनुभूतिजन्य पारलौकिक ज्ञान को देश-काल द्वारा आवद्ध लोकिक भाषा मे व्यक्त करना यदि अनम्भव नही, तो दुष्कर अवश्य है। इमी वारण विश्व-चेतना प्रसूत ज्ञान को जब वैयक्तिक चेतनापरक मन ग्रहण करता है, तो उनमे रहग्यात्मक नागा समावेश स्वभावत हो जाता है । फलत अभिव्यक्ति भी रहस्यात्म हो जानी है. और बौद्धिकता की कसौटी पर कमने पर यह प्राय अपूर्ण ही प्रतीत होती है । कबीर का काव्य वहृत कुट नी प्रकार का है । उगो गाव्य को मानने के लिए हृदय की मात्र आवश्यक है। उनपा पाय बुद्धि-दिमाग की नान होफर ध्यान और अनुभव का विषय है। वीर गा पाना पाने में इस [  ]________________

| ख ] प्रश्न का उत्तर खोजने पर ही उनकी वाणी का अर्थ खुलता है, अन्यथा वह अकथ कथा ही बना रहता है । अर्थ खुल जाने पर अध्येता चमत्कृत हो उठता है। और काव्य के उपकरणों की झंकार अनहद नाद के समान उसके कानो मैं गूजने लगती है । मैने कबीर के काव्य को इसी रूप में देखने दिखाने का प्रयास किया है। यह बात दूसरी है कि मैं अपने पात्र को लघुता के अनुरूप ही उनके साहित्य-सागर का रस प्राप्त कर सका हूँ ।। मैंने प्रत्येक शब्द का अर्थ दिया है, प्रत्येक छद का संदर्भ दिया है और तब भावार्थ लिखा है, जिससे पाठक के सम्मुख अथ सम्बन्धी किसी प्रकार की उलझन न रह जाये । कबीर ज्ञानी भक्त और भक्त योगी थे। इसी मान्यता के आधार पर मैंने उनके द्वारा प्रणीत प्रत्येक छन्द के अर्थ की आद्यन्त सगति स्थापित करने की चेष्टा की है । आशा है सहृदय पाठको को अर्थ समझने मे विशेष कठिनाई नही होगी । भावार्थ के पश्चात अलकारो का निर्देश कर दिया गया है और उसके नीचे कबीर के मन्तव्य एव उनकी चिन्तन-पद्धति को स्पष्ट करते हुए ‘विशेष के अन्तर्गत आवश्यक टिप्पणियाँ दे दी गई हैं। मुझे विश्वास है कि इस टीका को पढ़ने के बाद कबीर का काव्य दुरूह और अटपटा नही लगना चाहिए। वह वाणी के लिए अकथ रहा है और आगे भी रहेगा । मेरी क्या सामर्थ्य है, जो उसको कथनीय बना सकू ? प्रकाशन केन्द्र लखनऊ के स्वामी श्री पद्मधर मानवीय के प्रति मैं विशेष आभारी हूँ जिनकी कृपा के फलस्वरूप इस पुस्तक का प्रकाशन सम्भव हो सका है। इस समय मै केवल कवीर के पदो और उनकी रमैणियो पर ही लिख सका हूँ । उनकी “साखियो' को लेकर फिर कभी विज्ञ पाठको के सम्मुख उपस्थित होऊँगा । कवीर की अकथ कथा को अपनी सामर्थ्य के अनुसार वर्णन करके मैने अत्मि-सतोप का अनुभव किया है । आशा है हमारे सुधी पाठक भी इसको पढ कर सतुष्ट होगे । विनीत | आगरा । कातिक पूर्णिमा संवत् २०२८ राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी [  ]________________

श्रद्धेय बाबू जी अदृश्य चरणों पर। सादर, सविनय, सप्रेम समर्पित [ प्राक्कथन ]________________

प्राक्कथन कबीर साहित्य अपनी विभिन्न विशेषताओं के कारण हिन्दी-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सहजता, सरलता, स्वाभाविकता की दृष्टि में यह अद्वितीय है । कबीर अपने युग के सर्वाधिक चेतनशील प्राणी थे । उनकी वाणी में युग की प्रवृत्तियों की प्रतिध्वनि और समस्याएं मुखरित हैं। उनका साहित्य, उनके समाज सुधारक, धर्म सुधारक, क्रान्तिकारी और अद्भुत समन्वयकारी रूप को प्रस्तुत करता है । कवियो के आलोचक और निन्दक कबीर स्वतः महाकवि, अद्भुत काव्य शक्ति से सुसम्पन्न, सम्वेदनशील महाकवि थे। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जितने बड़े महाकवि थे, उतने बड़े महामानव भो । अन्तस और माननिक परिस्थितियों को प्रभावित करने की उनमे अद्भुत क्षमता थी । वे समाज के उन्नायक सत्य के गायक और उच्चकोटि के आत्मदर्शी थे । उनकी अभिव्यजना शक्ति वडो शक्तिशाली और प्रवल थी। वे सन्तमत के प्रवत्तं के थे और दलित वर्ग के सबसे बड़े हिमायती थे। उनके साहित्य की उपयोगिता इसी बात से अनुमानित हो सकती है कि आज का युग पुरुष, जननायक, महामना, उदारचेता मनस्वी गाँधी भी उनसे प्रभावित था। कबीर-साहित्य, कवीर-दर्शन और कबीर की साखियाँ की विवेचना और टीका अनेक विद्वानों ने की हैं। इस दिशा में यह एक और अभिनव प्रयास है। महाकवि तुलसीदास ने सत्य ही कहा है कि सच जानत प्रभु प्रभुता सोई।। तदपि कहे विनु रहा न कोई ॥' इस टीका या भाष्य मे लेखिका ने कबीर-साहित्य के सम्बन्ध में अपनी अनुभति और प्रतिक्रिया को व्यक्त करने की चेष्टा को है और इस बात का प्रयत्न विया है कि पाठको को कबीर की आत्मा के दर्शन सही रूप में कराये जा सके। | लेखिका ने अनुभव प्राप्त जिन विद्वान लेखको, छालोचको को रचना । उपयोग किया है, उनके प्रति हृदय से कृतज्ञता प्रगट करती है । १५ जुन्नाई, १९६८ सावित्री शुक्ल [ विषय-सूची ] विषय-सूची

 भूमिका
   विषय                              पृष्ठ

कबीर का युग
( १ )गुरूदेव कौ अग ::::...::...:: १-६४
( २ )सुमिरन कौ अग::::...::...:: ६५ ( ३ ) बिरह कौ अंग ५३ ( ४ )ग्यान बिरह कौ अंग १०८ ( ५ )परचा कौ अग ११५ ( ६ )रस कौ अग १३३ ( ७ )लावि कौ अंग १३६ ( ८ ) जर्णा कौ अंग १३७ ( ९ )हैरान कौ अग १२६ ( १० )लै कौ अग १४० ( ११ )निहकर्मी पतिव्रता कौ अंग १४१ ( १२ )चितावणी कौ अग १४६ ( १३ )मन कौ अंग १६६ ( १४ )सूषिम मारग कौ अग १७५ ( १५ )सूषिभ जनम कौ अग १७५ ( १६ )माया कौ अगं १७६ ( १७ )चांणक कौ अंग १८८ ( १८ )करणी बिना कथणीं कौ अंग १६२ ( १९ )कथणी बिना करणी कौ अंग १६६ ( २० )कामी नर कौ अंग १६९ ( २१ )सहज कौ अग २०५ ( २२ )नांच कौ अग २०७ ( २३ )भ्रम विधौसरग कौ अग २१२ ( २४ )भेंप कौ अग २१५ ( २५ )कुसंगति कौ अग २१६ ( २६ )सगति कौ अग २२५ ( २७ )असाध कौ अंग २२८ ( २८ )साध कौ अंग २२९ [ विषय-सूची ] (२९)साध साषीभूत कौ अंग --- --- २३२

(३०)साध महिमां  कौ अंग      --- --- २३८
(३१)सधि कौ अंग          --- --- २४१
(३२)सारग्राही कौ अंग        --- --- २४४
(३३)विचार कौ अंग           --- --- २४५
(३४)उपदेश कौ अंग           --- --- २४८
(३५)वेसास कौ अंग           --- --- २५१
(३६)पीव पिछांणन कौ अंग     --- ---  २५६
(३७)बिकंताई कौ अंग         --- ---  २५७
(३८)सम्रथाई कौ अंग         --- ---  २६०
(३९)कुसबद कौ अंग          --- --- २६३
(४०)सबद कौ अंग           --- --- २६४
(४१)जीवन मृतक कौ अंग     --- --- २६७
(४२)चित कपटी भेष कौ अंग   --- --- २७२
(४३)गुरुसिष हेरा कौ अडू      --- ---  २७३
(४४)हेत प्रोति सनेह कौ अडू    --- --- २७७
(४५)सूरा तन कौ अडू         --- --- २७९
(४६)काल कौ अंग            --- --- २९२
(४७)जीवनी कौ अंग           --- --- ३०२
(४८)अपारिष कौ अंग          --- --- ३०४
(४९)पारिष कौ अंग            --- --- ३०६
(५०)उपजणि कौ अंग         --- --- ३०७
(५१)दया निरबैरता कौ अंग      --- --- ३१०
(५२)सुन्दरि कौ अग           --- --- ३११
(५३)कस्तूरिया मृग कौ अंग     --- --- ३१३
(५४)निधा कौ अंग            --- --- ३२५
(५५)निगुर्णा कौ अंग           --- ---३१८
(५६)वीनती कौ अंग            --- ---३२१
(५७)साषीमभूत कौ अंग         --- ---३२४
(५८)वेली कौ अंग             --- --- ३२५
(५९)अविहड कौ अंग          --- --- ३२७ [  ]वीरगाथा काल के अवसान काल मे हिन्दी काव्य-धारा की दिशा मे अभिनव

परिवर्तन के लक्षण परिसूचित होने लगे।मुसलमानो की तलवार के पानी मे हिन्दू जनता निमग्न होती जा रही थी। मुसलमानो की प्रबल पराक्रम,आतंक और ध्वन्सात्मक प्रतिभा के समक्ष हिन्दू जनता का ठहर पाना दुस्तर हो रहा था। महमूद गज्रनवी के सत्रह हमलो ने ध्वस्स सोमनाथ की छिन्न-भिन्न मूर्ति के समक्ष हिन्दुओ का विश्वास आस्थाऍ और धार्मिक भावनाऍ शतशः खण्डो मे विच्छिन्न होकर घून्न घूसरित हो रही थी। मुसलमानो की बढती हुई शक्ति फहराती हुई इस्लाम की ध्वजा और विनाशकारी गति के समक्ष हिन्दुओ के अस्तित्व पर प्रश्न वाचक चिन्ह अकित हो गया। उत्तर-परिचम से आक्रमणकारियो की बढती हुई फौजो ने हिन्दू-राष्ट्र,हिन्दू जाति,और हिन्दू धर्म के अस्तित्व को धूल धूसरित कर डाला। हिन्दुओ के पास न जन-बल था,न आत्मबल न सधबल वे किस साहस पर और किस आधार पर मुसलमानो की केन्द्रीभूत सता का सामना करते। मुसलमानो के शौर्य और संगठन के समक्ष हिन्दुओ का जन- बल और आत्म-बल क्षोण पडता जा रहा था,उनकी सिथ्ति व परिसिथ्ति न केवल शोचनीय थी वरन् अनिशिबत भी थी।अलाउद्दीन खिलजी के उद्भव,विकास और उत्कपं होते-होते उत्तरी-भारत मुसलमानो के अधिवत्य मे आ चुका था। देवगिरि के शासक रामचन्द्र को पद्दलित करके उसके राज्य को अपनी सीमा मे मिला लिया। वारंगल,होयमिल,महाराष्ट्र,कर्नाटक की राज्य सीमाओ को अलाउद्दीन ने अपनी सीमा मे सम्मिलित कर लिया। दक्षिण मे कृष्ण और तुंगभद्र के मध्यस्य सीमा पर अधिकार सम्प्राप्त करने के लिए विजय नगर और वहमनी राज्यो मे सघर्ष चलता रहता था। सिन्धु प्रदेश यधपि राजपूर्तो के अधिकार मे था,फिर भी मुसलमानो का आतंक पूर्ण छाया से उन्मुक्त नही थी समस्त देश पर मुसलमानों प्रभाव क्रमशः बढता जा रहा था ।हिन्दुओ के हृदय मे भय की भावना बढती जा रही थी और ये मुसलमानो से लोहा लेने की व्यवस्था मे दूर होते जा रहे थे। चारणो के स्वर क्रमश. क्षौण होते जा रहे थे और उनके स्थान पर भारतीय जनता निर्बल के बल राम की शरण मे चली जा रही थी। क्रमश्ः वीरगाथा काल को उतेजना पूर्ण ओज से समर्थित चुनौती के स्वर क्षांण होते गए और उनका स्थान खंजरी और भाला ने लिया।हिन्दुओ की व्यस्पा, [ १० ] (२) विवज्ञता से पूर्ण और असाहाय अवस्था से अभिशप्त थी वे वर्तमान और समक्ष विध्यमान अभिशापों से मुक्ति पाने के लिए 'अशरण-शरण' निर्गुण, निर्विकार, निर्विकल्प ब्रह्म की शरण मे पहुंचने की चेष्टा कर रहे थे।क्रमशः हिन्दुओं का जीवन परिवर्तित होता जा रहा था। उनके मन्दिर मूर्तियो के ध्वंस हो जाने के कारण शून्य और छिन्न-भिन्न अवस्था मे पडे थे। वे किस भावना को लेकर मन्दिरों मे प्रवेश करते? हिन्दुओं की सामाजिक, सास्कृंतिक, धार्मिक, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहुमुखी प्रतिबन्ध लगा दिए गए थे।उनकी रसमयी जीवनधारा नीरस और शुष्क होने लगी थी। उनका राजनीतिक हष्टिकोण, निराशा के तिमिर से अच्छादिक होता जा रहा था। जब बीर ही न रहे तो चारण किसकी गाथा गाते और किसको सुनाते? राजनीतिक वातावरण क्रमश: शान्त होता चला जा रहा था। ऐसे वातावरण मे हिन्दू जनता निर्गुण ब्रह्म की शरण मे जाने का प्रयास करने लगी। निर्गुण ब्रह्म की कल्पना बडी उदात्त, उदार, विशाल थी। मुसलमानो का शासन, मूर्ति-उपासना के बिल्कुल विरुध्द था। इसलिए देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियो को देखते हुए निर्गुण ब्रह्म की उपासना ही इस जटिल समस्या का हल था। कबीरदास संतमत के प्रवर्त्तक थे। उन्होने हिंदू धर्म के मूल सिध्दान्तो को इस्लाम धर्म के आचारभूत सिध्दान्तो के साथ समान स्तर पर रखकर एक नए मत, एक नए पंथ की कल्पना को जिसमे ईश्वर एक अद्वैत, सगुण-निर्गुण से परे, निराकार, निर्विकार, निर्विकल्प और अनादि था। इस प्रकार के ब्रह्म की कल्पना न हिन्दुओ के लिए नई थी और न मुसलमानो के लिए। उपनिषदो मे ऐसे ही ब्रह्म की उपासना का उपदेश दिया गया है। इस्लाम भी इस प्रकार के ब्रह्म की कल्पना से सवर्था परिचित था दोनो ही धर्मों के मिश्रण से एक अभिनव पंथ का स्वरूप प्राप्त हुआ, जो सतमत के नाम से भारतीय धर्म-साधना के इतिहास मे, और हिन्दी-साहित्य के इतिहास मे परिचित और विख्पात हुआ। सच बात यह है कि सतमत के विकसित होने, फूलने-फलने और प्रचारित होने का बहुत कुछ श्रेय इस्लाम धर्म को है। इस मत मे साधना का सच्चा, सरल, शुध्द और कल्याणकारी स्वरूप, भारतिय जनता को दॄष्टिगत हुआ। इस मत के कल्याणकारी सीमा मे वाह्याचार, काया-प्रक्षालन, मूर्ति-पूजा, व्रत, तीर्थ वाग-नमाज सब कुछ हराम है, निषिध्द है, और प्रसन्नता की बात यह है, कि यह मत हिन्दू-मुसलमान दोनो को ही सुमाध्य और सरल प्रतीत हुआ। कर्मकाण्ड की वे दुरुहताएँ, जटिलताएँ और विपमताएँ जो हिन्दू और इस्लाम धर्म मे विध्यमान थी यहां पर मान्यता न प्राप्त कर सकी। संतमत मे दोनो धर्मों के सार तथ्वों को सिध्दान्त के रूप मे ग्रहण कर लिया गया।

      संतमत मे ब्रह्म की कल्पना बडी स्पृहणीय है। वह एक, अद्वैत, निर्गुण, निर्विकार, निर्विक्लप, अनादि, अनन्त, अजन्म,अजात, अमर, अनाम और अभेद [ ११ ]है।   वह मगुया  और नोगुंया से परे है।  वह अनिवांचनीय  है , वह अलख  और निरजन है।  संसार  के कया-कया मे वह परिव्याप्त है।  व्रहा की अनुभूति सद्र्ग्रुरू की कृया से ही होती  है।  संतमत मे माया श्रिगुयात्माक है वह साधना मे वाधक है।   माया दो प्रकार की मानी गई है , एक विधा और दूसरा अविधा।  अविधा माया से ग्रमित प्रायी सासारिक भोग विलासो मे अनुरतृि रहता है।  और विधा सृषटि की सृजनात्मक शक्ति है,ईश्वर प्राप्ति मे सहायक है।  अविधा  माया 'खाड' के समान मधुर हे। 

जगत - सन्त कान्य मे जगत का जो स्वरूप विकसित हुआ है वह क्षया भंगुरता से परिपूयाॉ है। यह जीवन नश्वर है और संसार अस्थिर हैं। संसार के क्या-क्या मे वृहा व्यपत है और संसार उस वृहा मे पूयांतथा परिव्याप्त है। कबीर ने स्वतः कहा है -- खालिक खलक खलक मैं खालिक सव घट राहों समाई | लोक जानि ना भूलो भाई।। स्न्त साहित्य मे इसी जगत की प्रस्थापना हुई है। स्न्त मत के प्रवतंक कबीर थे कबीर का व्यक्तित्व युग प्रवतंक और महान था कबीर जिस युग मे अवतरित हुए थे वह विडम्बनाओ,विपमताओ और विविध प्रकार के पारस्परिक विरोवो का युग था । [  ]


कबीर का युग

कबीर का आविर्भाव काल एक संदिग्ध विषय है। इस सम्बन्ध मे स्पष्ट अन्तक्ष्यि प्रमाण नही उपलब्ध है। कबीर के पदो मे केवल दो स्थानो पर तत्कालीन आविर्भावकाल-शासक सिकन्दर लोदी के अत्याचार का उल्लेख मिलता है।

प्रथम संकेत रागु गौंड के चतुर्थ पद मे हुआ है और द्वितीय रागु भैरव के अठारहवें पद मे । इन पदो मे काजी द्वारा कबीर पर हाथी चलवाने तथा जंजीर मे बाँध कर गंगा मे डुबाने के प्रयत्न का वर्णन है। परन्तु इन दोनो पदो मे सिकन्दर लोदी के नाम का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है। परची आदि ग्रंथो मे सिकन्दर लोदी ने जो-जो अत्याचार किए थे, उनमे उपर्युक्त दोनो घटनाएं सम्मिलित हैं । अतः


१-

भुजा वाधि मिलाकर डारिओ । हसती कोपि मूड महि मारिओ ॥
हसती भागि के चीसा मारै । इआ मूरति के हठ वलिहारै ।।
आहि मेरे ठाकुर तुमरो जोरु । काजी बकिवो हसती तोरु ।।१।।
रे महावत तुमु डारउ काटि । इसहि तुरावहु घालहु साटि ॥
हसती न तोरै घरै घिसानु । बाकै रिदै वसे भगवानु ॥२॥
किमा अपराधु संत है कीन्हा । वाधि पोटि कुचर कउ दीन्हा ।।
कु चरू पोट लै लै नमसकारै । बूझी नहीं काजी अधियारै ॥३॥
तोनि वार पातीमा भरि लीना । मन कठोरु अजहू न पतीना ।।
कहि कबीर हमरा गोविन्दु । चरथे पद महि जनका जिन्दु ।।४।।

(राग गोंड ४)


तथा-

गग गुसाइनि गहरि गम्भीर । जंजीर वाघि करि खरे कबीर ।।
मनु न डिगे तनु काहे कउ डराइ । चरन कमलचित रहियो समाइ ॥१॥
गंगा को लहरि मेरी टुटी जंजीर । मृगछाला पर बैठे कवीर ॥
कहि कबीर कोउ सग न साथ । जल थल राखन है रघुनाथ ॥

(रागु भैरउ १८)


--सन्त कबीर

--डा० रामकुमार वर्मा

[  ]यहाँ पर इन दोनो घटनाओ को सिकन्दर लोदी के अत्याचारो के अन्तर्गत मानने मे अनुमान किया जा सकता है। 'आहि मेरे ठाकुर तुमरा जोरू' और 'गंगा की लहरि मेरी टुटी जंजीर' जैसी पंक्तियो से ज्ञात होता है कि कबीर ने अपने अनुभवो का वर्णन स्वयं ही किया है ।[१] यदि उपर्युक्त दोनो पदो (रागु गौंड ४ तथा भैरउ, १८) को प्रामाणिक मान लिया जाय तो कबीर को सिकन्दर लोदी का समकालीन माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोई भी अन्तक्ष्यि नही उपलब्ध होता है।

कबीर को सिकन्दर लोदी का समकालीन सिद्ध करने वाले कुछ बहिर्साक्ष्य प्रमाण भी हैं। रेवरेन्ड के, बील, फर्कहर, मेकालिफ, बेसकट, स्मिथ, भण्डारकर, ईश्वरी प्रसाद[२], तथा रामकुमार वर्मा[३] आदि विद्वान भी इस मत से सहमत हैं कि कबीर और सिकन्दर लोदी समकालीन हैं। इनके अतिरिक्त प्रियादास जी[४] ने भी कबीर और सिकन्दर को समकालीन माना है। अतः कबीरदास का युग पन्द्रहवी शताब्दी मानना असंगत न होगा। इस समय लोदी वंश के शासक सिकन्दर का राज्य था। लोदी वश से पूर्व भारतवर्ष पर गुलाम, बलबन, खिलजी, तुगलक, तथा सैयद वंश राज्य कर चुके थे। कबीरदास से पूर्व प्रायः तीन सौ वर्षों तक मुसलमान इस देश पर राज्य कर चुके थे । राजनीतिक क्षेत्रो मे मुसलमानो का ही प्रभुत्व रहा । इन तीन सौ वर्ष के मुसलमानी शासन काल मे भारतवर्ष की धार्मिक, सास्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दशा का ह्रास हो गया था । मुसलमानो की विकास शक्ति और धर्म ने देश का दृष्टिकोण ही बदल दिया। मध्य देश मे भी मुसलमानी तलवारो का पानी अनेक हिन्दू राज्यो के सिंहासन डुवो चुका था। हिन्दू राजाओ के पास न बल था, न साहस और न ऐक्य ।

सिकन्दर की शक्ति, अधिकार और महत्वाकाक्षा निःसीम थी। उसके लिए कोई नियम नहीं था। देश का राज्य उसकी इच्छा और मन पर निर्भर था । देश की जनता और विशेष रूप से हिन्दू उसकी कृपा-कोर के आकाक्षी बने रहे । जनता के अधिकारो का कोई अस्तित्व नही था । उसके जीवन की सब से बड़ी सार्थकता थी शासक को आज्ञा पालन करना। सिकन्दर की राजनीति पर भी धार्मिक आदर्शों का प्रभाव था । वहाँ भी हिन्दुओ का कोई विद्रोह होता था वहाँ हिन्दुओ को जो दण्ड [  ]मिलता था वह तो था ही साथ ही उस क्षेत्र के सभी मन्दिर नष्ट करा दिए जाते थे। बात यहीं नहीं समाप्त हो जाती थी वरन् मन्दिरो के स्थान पर मसजिदो का निर्माण करा दिया जाता था।

     सक्षेप मे कबीर के युग की राजनीतिक परिस्थिति,अस्थिरता,विश्वासघात,धार्मिक संकीर्णता तथा अमानुषिक अत्याचारो की कथा है। राजनीतिक विद्रोह अशाति और प्रतिहिंसा की छाप सर्वत्र अकित है। कबीर एक सहृदय व्यक्ति थे। इनके राजनीतिक प्रपंचो ने कबीर को संसार विषयक क्षणभगुरता की भावना को और भी दृढ कर दिया। उन्होने तत्कालीन शूर वीरो को सम्बोधित करके कहा कि तीर तोप से लड़ना शौर्य नही,शूर धर्म का निर्वाह वह व्यक्ति करता है जो माया के बन्धनो से मुक्त होकर आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो। तत्कालीन जनता की भौतिकता भी कबीर को पसन्द नहीं आई। वे तत्वदर्शी थे। जानते थे कि जो कुछ भी भौतिक है वह क्षणिक है और इसीलिए उन्होने भौतिकता और माया से दूर रहने के लिए बार-बार सचेत किया। कबीर ने अपने युग मे जनता की स्वार्थपरता और धनलिप्सा की भी बडी निन्दा की है। इन्होने उदार वृत्ति और सन्तोष धारण करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
     कबीर से पूर्व भारतवर्ष की राजनीतिक दशा पर ऊपर विचार हो चुका है। विगत पुष्ठो को देखने से प्रकट हो जाता है कि १२०० से १३०० ई. तक देश धार्मिक परिस्थिति की दशा कितनी विषम बनी रही। हिन्दू समाज,हिन्दू धार्मिक परिस्थिति सस्कृति पर निरन्तर आक्रमण हो रहे थे। हिन्दू धर्म को नष्ट कर देने के लिए साम,दाम,दड और भेद आदि सभी उपायो से प्रयत्न किया गया। हिन्दुओ की इस गम्भीर,विषम शोचनीय और नित्य ही परिवर्तनशील दशा मे हिन्दुओ का धर्म संकट मे पड चुका था। उनके राम जनता के हृदय और मस्तिष्क से विलग हो चले थे। परिस्थिति इस बात की घोतक थी कि मूर्ति-उपासक कितने निर्बल,अशक्त और सकट मे थे और दूसरी ओर मूर्ति-भजक कितने बलवान और कितने ऐश्वर्यवान हैं। मूर्तिभंजको को सुख और ऐश्वर्य के पालने मे सूनते हुए देख कर हिन्दुओ का मूर्ति-पूजा से विश्वास उठ रहा था। वे उसकी नि:सारता स्प्ष्ट रूपेण नमझ चुके थे। फलत महान् सघर्ष और क्रान्ति के इस युग मे एक ऐसे धार्मिक आंदोलन को आवश्यकता थी जो देश के निवासियो को अन्धकार मे प्रकाश दिखा सके। निराशा मे आशा का सचार कर सके। इस आवश्यकता की पूर्ति वैष्णव आंदोलन ने की। इस आन्दोलन मे परब्रम्हा के लोक रक्षक लोर-पालक स्वरूप भी विष्णु के रुप में प्रतिष्ठा करके,उनकी सरल भक्ति का मार्ग निराश हृदयों को प्रचलित किया गया। [  ]प्रस्तुत वैष्णव आन्दोलन की प्रेरणा और प्रयत्न से निराश हिन्दुओ मे एक बार पुनः धार्मिक जाग्रति उत्पन्न हुई। समय-समय पर इस आन्दोलन के भी उपास्य देवो के स्वरूप मे परिवर्तन होता रहा। फिर भी इसके मूल मे एक भावना बराबर रही और वह भावना थी परब्रम्हा के सर्वव्यापी एवं अन्तर्यामी स्वरूप की।
     रामानन्द ने लोक-रक्षक 'राम' की प्रतिष्ठा की। रामानन्द की इस 'राम' भक्ति के महान् स्त्रोत्र से दो धाराये फूट निकली। प्रथम धारा थी 'राम' के सगुण रूप की, इस धारा मे नाभादास, तुलसीदास आदि प्रतिभावान व्यक्ति हुए और द्वितीय धारा मे 'राम' के निर्गुण रूप की उपासना हुई जिसके प्रचारक नामदेव, कबीर आदि सत हुए। इन सन्तो ने अपने सम्प्रदाय मे योग की क्रियाओ को भी स्थान दिया पर सामान्य जनता ने इनके सरल उपदेशो को ग्रहण किया। इन सन्तो ने उपासना के लिए निर्माण 'ब्रम्ह' का आश्रय ग्रहण किया और इस भावना ने जातीय, सांस्कृति तथा धार्मिक मतभेद के लिए अवशेष अवसर भी समाप्त कर दिये।
     हिन्दू धर्म मे वाम्ह प्रभावो के अतिरिक्त दोष भी व्याप्त हो गये थे। धर्म के पवित्र रूप को वाम्बाडम्बरो ने आच्छादित कर लिया। सदूविश्वावासो का स्थान अन्धविश्सो ने ग्रहण कर लिया। अहिंसा, त्याग और सत्य का स्थान बलिदानो के रूप मे हिंसा तथा ढोंग ने ले लिया। सक्षेप मे कबीर के युग तक हिन्दू धर्म अनेक दोषो से पूर्ण था। साधना के स्थान पर बाम्हाचार की प्रतिष्ठा हो रही थी। कबीर तथा अन्य कवियो ने इन दोषो की कडी़ आलोचना की है। उन्होने अपने व्यग्ड वारगो के द्वारा तत्कालीन जनता की मनोवृत्ति और धर्म के अंधकारपूर्ण पक्ष का चित्रण किया है।
     समाज मे वाम्बाडम्बर बढ रहे थे। जनता की अंध-विश्वासो पर अत्यधिक श्रद्धा थी। भृत-प्रेतो पर विश्वास की भावना का प्रसार जनता मे हो रहा था। सामाजिक परिस्थिति संक्षेप मे कबीर के समय मे भारतीय समाज अनेक प्रकार के दोषो से युक्त था। कबीर ने जिस प्रकार धार्मिक विश्रृंखलाओ को दूर करने का प्रयत्न किया उसी प्रकार सामाजिक रूढियॉ और दोषो को निकाल फेंकने के लिए प्रयत्न किया। समाज मे व्याप्त हिन्दू, मुसलमानो की भेद भावना के विरोध मे कबीर ने बार-बार समता और एकता का उपदेश दिया। कबीर ने तत्कालिन जनता को समझाया कि हिन्दू मुसलमान एक ही कर्ता की दो कृतियॉ हैं, उनमे भेद नही है। इसी प्रकार 'राम' 'रहीम' एक ही ईश्वर के दो नाम हैं। केवल नामो का भेद [  ]                                   
                       ( प )



अनादि शक्ति को द्वैत नही सिद्ध कर सकता है | इस प्रयत्न से कबीर ने दोनो धर्मा-चलम्बियो के ह्रुदयस्थ भेद भाव की संकोरगंता दूर करने का प्रयत्न किया | तत्कालीन जनता मे व्याप्त्त असंतोष तथा प्रतिहिंसा की प्रवृत्ति के विरुद्ध् भी कबीर ने सन्तोप और क्षमा का उपदेश दिया |उन्होने क्षमावान् को परव्रह्म की रूप बताया | तत्कालीन यवनो की हिंसा- प्रधान प्रवृत्ति का विरोध करते हुए कबीर ने जनना को अहिंसा और दया का उपदेश दिया| जब सभी एक ही 'सांई' की सन्तान है तो किस पर दया कि जाय और किस पर निदंयता |विजेता वर्ग के अत्याचारो से उत्पोडत हिन्दू जनता को भी कबीर ने धेयं रखने का उपदेश दिया | उन्होने स्पष्ट शब्दो मे कहा 'धीरे-धीरे मना धीरे सब कुछ होय'| इसी प्रकार कबीर ने अपने समकालीन समाज को उदारता की भी उपयोगिता बताई | कबीर ने जनता के लोभ , क्रोब , मोह ,कपट तृषरगा आदि विषयो पर विचार प्रकट किये है |वास्तव मे कबीर समाज को परिष्कृति और दोषरहित रूप मे देखना चाहते थे|

कबीर से पुर्व और कबीर के युग मे नारी का जो चित्र हमे साहित्य, धर्म तथा इतिहास मे मिलता है वह अत्यन्त विवशता का चित्र है | तत्कालोन जनता की भोग- लिप्सा देख कर कबीरदास ने वारम्बार भोग- विलास नारी से दूर रहने का उपदेश दिया | उन्होने कहा कि पंडिन और मूर्ख

      दोनो 'काम' मे लिप्त है | काम मे लिप्त मनुष्य कभी भी
'हरि नाम' की साधना नही कर सकता है जिस प्रकार सुर्य और अधकार एक 
स्थान पर नही एकत्रित हो सकते है| इस प्रकार मानव को भोग-लिप्पा 
 और कामुकता की वडी आलोचना की | अपनी पतिव्रता स्त्री का परित्याग 
 कर स्त्री से प्रेम करने वालो का सम्बोधित कर कबीर कहते है कि 'दुसरे की 
 स्त्री , चाहे वह सोने ही की क्यो न हो ,उससे दुर रहना चाहिए, नही तो रावगा के 
 समान विनाश अवदयभ्भवि है| इसी प्रकार बडे प्रभावशाली शब्दो मे कबीर ने इस 
 प्रवृत्ति की आलोचना की | कबीर के युग मे नारी भोग- विलास को वस्तु बन गई
         काम क्रोध मद लोभ की जब लग तट मे खान ।
         कहां मूर्ख कहं पडित दोनो एक समान ।
         जहां काम तहं नाम नहि जहां नाम नहिं काम ।
         दोनो कबहूं ना मिले रवि रजनो एक ठाम ।
         परनारो पैनी धूरो बिरला वाचै कोच ।
         ना वहि पेट नचारिये सबं सोन को होय ।
         रावन के दस सिर गए पर के संग । [  ]
                     ( ६ ) 


थी | इसलिए उन्होने नारी कि भोगमय स्वरूप की बडी निन्दा की है | आध्यात्मिक पथ से भ्रष्ट करने के कारगा कबीर ने स्त्री को सर्पिरगी के समान भयंकर व्याघ्र के समान घातक तथा भक्ति एवं मुक्ति से पतित करने वाली कहा है | स्थान - स्थान पर कबीर ने नारी को माया आदि शब्दो से भी सम्बोधित किया है | परन्तू साथ ही कबीर ने नारी के कल्यागाकारी रूप का समर्थन भी किया है| कबीर ने सती स्त्री की प्रशंसा की है कारगा कि उसका ह्रुदय और मन पवित्र रहता है | यह पति के साथ अपनी जीवन लीला समप्त कर देती है| इसी प्रकर कबीर ने पति- ब्रसा नारी का भी बडा समर्थन किया है| कबीर के लिए मैली-कुचैली पतिब्रता भी बन्दनीय है| पतिब्रता नारी को कबीर ने शूर और दोनो के समान उच्च और अभिनन्दनीय माना है| सक्षेप मे कबीर ने नारी के उस स्वरूप की निन्दा की जो मानव को आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने मे रोकता है| यदि वह इस दोष से रहित है ति वह सर्वथा वन्दनीय है|

      मुसलमानो कि आक्रमग ,अकाल ,अनावृष्टि ,लुटेरो तथा विजेता वर्ग के

शोषगा ने कबीर के समय तक देश को नितान्त कंगाल बना दिया था| इसका

              प्रभाव मध्यवर्ग , निम्नवर्ग ,और किसान तथा मजदूरो पर 

श्राथिक परिस्थिति विशेष रुप से पडा | आर्थिक विनाश और अन्नाभव के

              कारगा जनता के लिए जीवन का प्रश्न अत्यन्त विषम 

वन गया| जनता के इन वर्गो के लिए इश्वर के अतिरिक्त और किसी का सहारा नही था| इसलिए कबीर ने तत्कालीन जनता को सन्तोष घरगा करने का उपदेश


    १ - कामिनी सुन्दर सर्पिगी जो छेडै तेहि खाय  |
        जो गुरुचरन न राचिया तिनके निकट न जाय||
    २ - नैनो काजर पाइ कै गाढै बाधे केस  |
       हाथो मेहदी लाइ के बाधिनि खाया देस  ||
    ३  - नारी नसावै तीन गुन जो नर पासे होय |
       भक्ति-मुक्ति निज ध्यान मे पैठि न सक्कै कोय  ||
    ४  - साती न पीसै पीसना जो पीसै सो राड|
       सधू भीख न मांगही जो मांगै सो भांड   ||
    ५  - पतिवरता मैली भली काली कुचित कुरुप |
       पतिवरता के रुप पर वारो कोटी सरुप  ||
    ६  - सूरा के तो सिर नही दाता के धन नाहि |
       पतिवरता के तन नही, सुरति वसै पिउ माहिं  || [  ]दिया ।कारग  कि, सन्तोष गजधन , वाजिधन और रत्नधन आदि सभो धनो से श्रेष्ठ है । कबीर ने मानव-सुलभ

तृष्ग्गा की भी आलोचना की ,क्योकि तृष्ग्गा ही मनुष्य का वास्तविक काल है । तृष्ग्गावान् मानव कही भी शान्ति नहि प्राप्त कर सकता है । शोष्ग्गा के विरुद्ध भी कबीर ने जनता को उपदेश दीया । कबीर ने स्थान-स्थान पर गरीबी की सराहना की है । उन्होने गरीब को "दुतिया के चनद्र के समान" वन्दनीय बताया है । कारगा कि गरीब स्वय सभी कि उत्पीडन को सहन करता है और प्रतिकार मे किसी को कष्ट नही पहुंचाता है । वह स्वयं अपने ठगाने मे सुख का अनुभव करता है । गरीबी सबसे अच्छी है कारगा कि लघुता से ही मनुष्य महत्ता की ओर अग्र्सर होता है । कबीर ने उस धन को अभिशाप माना है जिससे ईश्वर के भजन मे वाधा पडे । इस प्रकार समय की अवश्यकतानुसार कबीर ने सन्तोष और दीनता का महत्व प्रदर्शित करके दीन और भुत्तभोगी जनता को अपनी स्थिति मे ही स्थिर रहने और ईश्वर प्रेम मे रत रहने का उपदेश दीया ।

    साहित्य मे धार्मिक स्थिति के चिवगा की परम्परा सरहपा से आरम्भ होती है । सरहपा के समय मे पाखंड और वाहथाडम्वरो की अधिकता थी । उन्होने व्राहागा , वेद , साहित्य दण्डी ,यज्ञ ,यन्य मन्त्र आदि की आलोचना की है ।
    जिससे ज्ञात होता है कि आठवी शताब्दी मे ही धर्म के क्षेत्र मे वाहयाडम्बर और पाखण्ड समाविप्ट हो गए थे । सरहपा के पश्चात दसवी श्ताब्दी के कवियो मे से तिलोपा काव्य मे तत्कालीन धर्मिक स्थिति का चिश्रगा उपलब्ध होता है। तिलोपा के समय मे धर्म के मूल सिद्धान्तो को त्यागकर जनता तीथं , तप , बहुदेवो-पासना मे लग रहे थे तथा साधक भोगी ही रहे थे । योगीन्दु(१००० ई०) के समय तक ये दोप कुछ और भी बढ गए। इस समय की जनता विभिन्न 'पंधो'और 

(१) गोधन गजधन वाजिधन और रतन धन खान।

        जब आवै संतोष धन सब धन धुरि नपान ॥

(२) की दोस्ना है डाकिनी की जीयन का काल ।

      और और निम दिन चहै जोवन फरै विहान ॥

(३)कबीरा नाप ठगहये और न ठगिए रोच ।

      आप ठंगे सुख ऊपजै और ठगे देख होय ॥

(४)लव ते लधनाई भनी लघुना से नव होये ।

     जख दुतिया को चन्दमा सीख नचै नव कोय । [  ]'सम्प्रदायो' मे भटक रही थी । शिक्षित समुदाय मानवता के धर्म को वीसार कर 'पोथी पत्र' को ही धर्म सभक्त बैठा था । रामसिंह,योरीन्दू के समकालीन थे । इन्होने भी पाखंड के उन बहुत से चित्रो की अभिव्यक्ति अपने काव्य मे की है जो तत्कालीन धर्म और समाज मे व्याप्त थे। उन्होने उन 'मुण्डियो' का वगांन किया है जो मुक्ति की आशा मेसिर मुंडाए हुए घूमघूमकर जगत् को धोखा देने के साथ ही अपनी आत्मा को भी धोखा देते फिरते थे। कवि रामसिंह ने इन व्याप्त दोषो को बहुत निकट से देखा था।

इन उपयुंक्त कवीयो के समान ही नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध कवी गोरखनाथ के काव्य मे भी तत्कालीन धर्म मे व्याप्त दोपो तथा पाखण्डो का अच्छा चित्रगा मिलता है। गोरखनाथ के समय मे ब्राहागा बहुपठित तो थे पर उन्हे सार-ज्ञान नही था,योगी माया मे लिप्त तथा धूतं,साधक निद्रा,मैथन और माया मे लिप्त थे,मन्त्र देने वाले गुरु अहंकारी थे। समय के साथ धर्म मे व्याप्त दोषो मे भी वृद्धि होती गयी। कबीर के समय तक जनता नितात पथभ्रष्ट हो चुकी थी । बड़े-बड़े़ योगी माया मे लिप्त थे। योगी,पंडित,सन्यासी,मौलाना,काजी सब 'मदमाते, हो रहे थे। हिन्दू और मुसलमान दोनो ही सत धर्म के भ्रष्ट होकर भटक रहे थे। पीर औलिया हिंसा मे प्रवृत्त थे । हिन्दु मुसलमान दोनो ही व्रह्न के विपय को लेकर परस्पर एक दुसरे के शत्र बने हुए थे!हिन्दू लोग

पत्थरो की पूजा मे ही कतंव्य पुर्ति समभ्कते थे। साधु लोग बाहाडम्बरो मे प्रवृत्त होकर धन एक्श्रित करते फिरते थे। सोना चांदि के आभूषगा पहनते थे। घोड़ा घोडीयो पर सवारी करके विचरते थे। इस प्रकार साधु -समाज माया का दास हो रहा था साधुओ की भांति मुल्ला भी पथ भ्रष्ट हो चुके थे! पोर कतं व्यच्युत हो गए थे । उनमे विवेक वृद्धि नष्ट हो गई थी। वे अहिंसा मे प्रवृत थे।  इन पीरो और मुल्लाओ का प्रभाव तत्कालीन मुमलभान जनता पर गम्भीर पडा। अपने- अपने धर्मिक नेताओ की भक्ति हिन्दू और मुसलमान सभि आचरगा कर रहे थे। हिन्दुओ मे मेह्नतो के आदर्शो का अनुकरगा हो रहा था। और मुसलमानो मे इन पीरो और मुल्लाओ का अधानुकरगा। धर्म के नाम पर अधमं आचार के नाम पर अनाचार कबीर जैसे उदार हष्टिकोग वाले व्यक्ति के लिए असहुय था। उन्होने दोनो को खुब फटकारा।
१- साधु भया तो भया माला पहिरी चारि।
       बाहर भेप बनाइया भीतर भरी भगरि॥
   भक्त विरक्त लोग मन ठाना,सोना पहीरि लजाबै बाना ।
   धोरी धेरा गीन्ह बटोरा,गाय पाय जस चले करोरा ॥ [  ]      धर्म मे व्याप्त विकारो तथा वाह्याडम्बरो को निन्दा करके कबीर पथ-भ्रष्ट
तथा लक्ष्यान्युत जनता को धर्म के राजमार्ग अथवा उचित मार्ग पर लाना चाह्ते थे।

धर्म और साधना मे कबीर को ऐंचातानो पसन्द नहीं थी। साधना तो अत्यन्त प्रिय विषय है । साधना के क्षेत्र मे दैनिक औचित्य के मध्यस्थ कोई भी विरोधी भावनाएँ नहीं है । कबीर इस सत्य से परिचित थे । इसी कारण कबीर मर्म और साधना के सहज पथ को ग्रहण करने के लिए अपनी समकालीन जनता को उपदेश दिया । कबीर ने जनता को बताया कि समस्त दृबहताओ और दांव-पेवो की क्या निःसारता है और सहज पथ ही सत्य पथ है जिसके द्वारा कोइ भी व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकता है ।'सहज पथ सबके लिए खुला है । उनमे जात-रीति वर्ग कुल आदि का प्रतिवन्ध नहीं है । सम्प्रदाय और मन-मतातरो को भाँति इसमें वाह्याडम्बर को आवश्यकता नहीं है ।

    मर्म के अन्तर्गत बाह्याडम्बरो का कोई अस्तित्व नहीं है, फिर भी हिन्दू और-इस्लाम

दोनो ही धर्मों मे यह दोष समान रूप से वर्तमान है । कबीर ने देखा कि धर्म के वास्तविक रुप को वाह्यडम्बरो ने आच्छादित कर रखा है । अतः उन्होंने मतवाद , शास्त्र,कतेब,तीर्थ,व्रत,नमाज आदि की व्यर्थता जनता के समक्ष वारम्बार रखो । सबसे पहले कबीर ने हिन्दू और मुपलमानो के धार्मिक ग्रन्थो की आलोचना की । उन्होंने बताया कि ये ग्रन्थ सभी को भ्रम में डालने के लिये रचे गए हैं । कबीर ने


     १-- सहज सहज सब को कहै सहज न चीन्है कोइ ।
         जिन्ह सहजैविषया तजी सहज कहीजै सोइ  ॥
         सहज सहज सबको कहै सहज न चीन्है कोइ । 
         पाँचू राखै परसतौ सहज कहीजै सोइ ॥
        सहजै सहजै सब गए सुत बिन कामणिकाम । 
        एक मेक ह्व मिलिरख्या दास कबीरा राम ॥
     २--हिन्दू मुसलमान दो दीन बने वेद कतेब परपच साजो । 
                                  --ज्ञानगुद्डी पृ० १६
        वेद किताब दोय फंद सवारा । ते फंदे पर आप विचारा ॥
                                 --वीजरु पृ० २६६
       चार वेद ब्रह्मा निज ठाना । मुक्ति का मर्म उनतु नहीं जाना ॥
       हबीबी और नबी कै कामा । मिलने अमल स्वं नवै पुराना ॥
                                 --वीजक १०४,१२४ [ १० ]मूर्ति-पूजा के विरोध मे भी बहुत कुछ लिखा है ।१ कबीर तो मन्दिर की नीव को
ही अस्थिर मानते हैं ।२, इसी प्रकार उन्होने मुसलमानो की 'बांग' और मस्जिद की

व्यथँता बताइ ।३ हिन्दुओ की एकादशी और मुसलमानो के तीस रोजा की भी कबीर ने आलोचना की ।४,

      हिन्दू मुसलमानों की 'राम' 'रहीम' सम्बन्धी भेद-भावना को मिटाने के लिए

कबीर ने ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का उपदेश दिया । उन्होने स्पष्ट शब्दो मे कहा 'साहेब मेरा एक है दूजा कहा न जाय ।५, इतना ही नहीं 'साहब' को द्वैत बताने वाले को कबीर दूजा कुल को हाय कहने तक का साहस रखते हैं ।६, कबीर ने बताया कि हिन्दू और मुसलमानो की एक ही राइ है ।'७ दोनो ही एक ही कलाकार की कृतियाँ हैं । उनमे दृष्टिगत भेद मानवकृत है ।

         कबीर ने भेष बनाकर घूमने की प्रकृति की भी तीव्र आलोचना की है । माला,

तिलक,छाप,गेरुआ वस्त्रो आदि की निःसारता पर उनहोने बार-बार,जोर दिया है ।८

     १--पाहन पूजे हरि मिलै तौ मै पूजूँ पहार । 
        ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
     २--नीव विहूणा देहुरा देह विहूणा देव । 
        कबीर तहाँ विलंविया करे अलष की सेव ॥
     ३--काकर पाथर जोरि के मसजिद लई चुनाय । 
        ता धढि मुल्ला वाग देक्या वहिरा हुआ खोदाय ॥
     ४--हिन्दू एकादसि चौबिस रोजा मुसलिम तीस बनाए ।
        ग्यारह मास कहो किन टारौ ये केहि माहि समाये ॥
                                         --बीजक पृ० ३८८
     ५--कबीर वचनावली, पृ० १
     ६--जो साहब दूजा कहै दुजा कुल को होय । २/६
     ७--हिन्दू तुरुक की एक राह है सतगुरु इहै बताई ।
        कहहि कबीर सुनहु हो सन्तो राम न कहेउ खुदाई ॥
                                         --बीजक शब्द १०
     ८--कर सेती माला जपै, हिरदै बहै डडूल । 
        पग तौ पाला मैं गिल्या भाजण लागी सूल ॥
        कर पकरै अंगुरी गिनै मन धावै चहुँ ओर ।
        जाहिं फरायाँ हरि सो भया काठ की ठौर ॥
        मूंड मुडावत दिन गए अजहूँ न मिलिया राम । 
        राम नाम कहु क्या करै जे मन के औरे काम ॥
                                         क० ग्र० पृ० ४५*४६ [ ११ ]                    (११)

कबीर के युग मे हिन्दू और मुसलमान दोनो ही के धर्म मे 'हिंसा' वृत्ति समाविष्ट हो गई थी । कबीर ने काजी सैय्यद, औलिया और पीर आदि को डाँटते हुए पूछा कि 'बकरी मुर्गी का तुम किसकी आज्ञा से हनन करते हो । दिन भर तो रोजा रहते हो और रात मे गाय खाते हो । भला तुम्हारा खुदा किस प्रकार से इस आचरण पर प्रसन्न होगा ।' इसी प्रकार उन्होने हिन्दू योगियो से पूछा कि "कब नारद बन्दूक चलाया ।"

      इस प्रकार कबीर ने तत्कालीन हिन्दू तथा मुसलमानो के धर्म मे व्याप्त दोषो

तथा वाह्माडम्वरो को दूर करने का प्रयत्न किया । उन्होने दोनो विरोधी वर्गो की एकता और प्रेम का मार्ग प्रदर्शित किया और पारस्परिक विरोधी भावनाओ को शान्त करने का प्रयत्न किया ।

     रामानन्द के पश्चात् सन्त कवियो ने अपने उपदेशो का माध्यम हिन्दी भाषा

बनाया । वे इस बात को समभ गये थे कि यदि अधिक से अधिक जनता मे स्वमत का प्रचार करना है, तो हिन्दी का ही आश्रय ग्रहण करना पढ़ेगा । भाषा फलतः उन्होने हिन्दी मे ही अपने विचारो को प्रकट किया । सन्तो ने विव्दत्समाज की स्तुतनिन्दा, अथवा योग्यता-प्रदर्शन की आवश्यकता न समभ कर जनता की भाषा मे ही उपदेश किया । रामानन्द ने सस्कृत के विव्दान होते हुए भी जन-हिताथं हिन्दी मे उपदेश दिये । परन्तु बाद के कवियो ने संस्कृत के विपक्ष और भाषा की सराहना भी की जिनमे से कबीर विशेष उल्लेखनीय हैं । कबीर ने स्पष्ट शब्दो मे संस्कृत को 'कूपजल' कहा और भाषा की वहते हुए नीर से तुलना की । इससे कबीर के भाषा विपयक आदर्श प्रकट होते हैं।

     देश की संघर्षमयी परिस्थिति का कबीर पर प्रभाव पडा । मानव की निम्न

तथा ह्रेय प्रवृत्तियो के विरुध्द कबीर दास ने अपने शात एवं प्रभावशाली स्वर मे क्षमा, दया, विश्वबन्धुत्व,

    एकता तथा समता कर संदेश दिया और अपने युग उपसंहार को सही मार्ग 

पर क्षग्रमर करने का प्रयत्न किया ।

    उम युग को हलचल, अशाति,आडम्बर और विडम्बना का मापदण्ड कबीर 

का स्वर और उनका 'सहज' संदेश है । [ १२ ] कबीर - व्यत्क्तित्व

किसी भी साहित्याकार का व्यत्क्तित्व उसकी रचना मे प्रतिबिम्बित होता है। लेखक के व्यक्तित्व से उसके साहित्य का बडा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। कोइ भी मनुष्य किसी रचना से उसके लेखक के व्यत्क्तित्व का अनुमान लगा सकता है। कबीर (२५ वी शताब्दी ) का साहित्य उनके व्यत्क्तित्व का सबसे अधिक परिचायक है। कबीर के साहित्य को देखने से ज्ञात होता है कि वे सत्य (दोनो, व्यवहार और साधना ) प्रिय थे। उनमे चरित्रबल था जिसके कारण स्पष्टोक्तियाँ उनकी वानियो मे लहरे ले रही हैं। वे मान और उपमान के स्तर से ऊपर उठ चुके थे। उन्हे द्रोह, विद्रोह, अशान्ति, वैमनस्य, प्रतिहिंसा की भावना से घृणा थी। वे शान्ति प्रिय थे। अहिंसा और सरलता के वे समर्थक थे। करनी और कयनी मे वे भेद नही मानते थे। लौकिक जीवन से ऊपर उठने की उनमे साध थी। वे प्रेमी , भक्त , साबक योगी और विश्वासी थे। दुविधा से वे घृणा करते थे। भेष और वस्त्राचार तथा सत्य के नाम पर अनाचार देख कर वे जल उठते थे। समहष्टि और सहज को जीवन मे वे कार्यान्वित करना चाहते थे। उदारता, विश्वबन्धुत्व , दोनता, धैर्य संतोष , सहन-शीलता और क्षमा उनकी चरित्रगत विशेषताएँ थी। सत्य-प्रियता के कारण उन्हे जीवन मे विरोधो के अनेक तूफानो का सामना करना पडा। कबीर स्वतन्त्र विचार के व्यक्ति थे। उसमे प्रतिभा थी, मौलिकता थी। उनकी वाणो मे बल और ह्रदय मे साहस था। अप्रिय सत्य कहने मे भी उन्हें कोइ संकोच नही था। मुरौव्वन और रियायत की भावना उनमे स्थान नही पा सकी थी।

     लेखक के व्यक्त्तित्व के अध्ययन का दूसरा साधन है उपके समकालीन और परिवर्ती लेखको का उसके विषय मे कथन । कबीर सत मत के प्रवर्तक और एक विशेष परम्परा के संस्यापक थे। साहित्य और धर्म के क्षेत्र मे एक नबीन क्रान्ति के जनक थे। आलोचना की एक नवीन शैली के जन्मदाता थे। २५ वो शताब्दि के सर्वश्रेष्ठ कवि और समाज सुधारक थे। समकालीन शासक उनसे अत्यधिक प्रभावित था। (यदि किबदतियो मे जरा भी विश्वास कर लिया जाय) वे एक नवोन समाज के निर्माता थे। निश्चय ही उन्होने अपने युग को जनता को प्रभावित किया होगा और निश्चय ही उनके सिध्दान्तो को पुष्प गंगा मे अबगाहन कर उनके पश्बातु नानक, [ १३ ]                             
                                 (१३)

दादू,मलूक,जगजीवन,शिवनारायण,दरियाव्द,मीरा,सहजोदयावाई,घनीदास,गरीबदास,केशवदास,तुलसी (साहब) चरनदास,सुन्दरदास आदि ने भारतीय जनता मे समय-समय पर प्रकाश फैलाया| आज इस युग का महापुरूष गाँधी भी उनके सिध्दान्तो से अनुप्राणित प्रतीत होता है| कबीर के विपय मे लिखित इन सन्तो की वानियो से कबीर के व्यक्त्तित्व का अनुमान बडी सरलता से लग सकता है| अतिशयोक्तियो को छान कर निकाले हुए तथ्यो से कबीर का व्यक्तित्व प्रकाश मे लाया जा सकता है।

कबीर के पश्चात् धर्म और समाज के विषय मे अभिरुचि रखने वाले सभी कवियो और इतिहासकारो ने कबीर की प्रशंसा की है-- चाहे वे मुसलमान हो या हिन्दू दोनो जातियो मे उनका आदर था, सम्मान था। उनकी वाणी मे प्रभावित करने की शक्ति थी। उनकी वाणी ने समय, वर्ण वर्ग, जाति और समाज के सभी स्तरो को लोग कर एक रूप से जनता को प्रभावित किया।

साम्प्रदायिक कवियो का काव्य अतिशयोक्ति एव अतिरजना से पूर्ण होता है। फिर भी उन अतिरजनो के मुल मे तथ्य बीज-रूप मे वर्त्मान अव्श्य रहता है, इसमे कोई सन्देह नही। वरमदास (स० १४७५) कबीर के प्रधान शिष्या थे ।कबीर के पश्चात यही गही पर आसीन हुए ।इनके शब्दो मे कबीर अजर- अम्रर व्यक्ति है। प्रत्येक युग मे एक भिन्न -भिन्न नाम धारण करके अवतार ग्रहण करते है। सतयुग मे सतसुकृत नाम था, श्रेता मे मुनीन्द्र , द्वापर मे करुणा तथा कलियुग मे कबीर। कबीर सभी युगो मे माया रहित होकर विराजमान रहे है-

            जुगन जुगन लीन्हा श्रवतारा। रहौं निरन्तर प्रगद प्रसारा ॥
            सतयुग सतसुकृत कह टेरा। त्रेता नाम मुनेन्दहि मेरा ॥
            व्दापर मे करुना मय कहाये। कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
            चारो युग मे चारो नाऊँ । माया रहित रहै तिहि ठाऊँ ॥
            जो जाघा पहुँचे नही कोई । सुर नर नागर रहै मुख गोइ ॥
                                     ( ग्रन्थ अवनारण प्र० ३२३२)

धमंदास के अनुसार कबीर एक दिव्य पुरुष के रूप मे दृष्टिगत होते हैं। परन्तु इस उधारण की अन्तिम दो पंक्तियोँ विशेष ध्यान देने योग्य है। इसमे ज्ञान होता है कि कबीर माया मोह के पाप से उन्मुक्त थे। "जो जाया पहुँचे नही कोइ" और "सुर नर नाग रहै मुख गोइ " वहाँ पर कबीर "माया रहित रहै तिहि टाऊ" कबीर ने जीवन पयंन्त माया के बन्धनो से दूर रहने का उपदेश दिया है। उनकी [ १४ ] (१४) वाणियो मे अनेक ऐसे कथन हैं| इस लिए कबोर के विषय मे धरमदास को अंतिम दो पंक्तियाँ मान्ह हैं| नाभादास जी ने भक्तमाल मे लिखा है-

            (१)

कबीर कानि राखी नहीं वर्णश्रम षट दरस की| भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम कर्म गायो| जोग जग्य ब्रतदान भजन बिनु तुच्छ दिखायो|| हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी शब्दी साखी| पक्षपात नहिं बचन,स्रब ही के हित की भाखी|| श्रारूढ दसा है जगत पर मुख देखी नाहिन भनी| कबीर कर्म न राखी नहीं वर्णश्रम ष्ट दरसनी||

                      (३२७ छप्पय)
            (२)

श्रति ही गंभीर मति सरस कबीर हियो| लियौ भक्ति भाव जाति पाँति सब टारियै||

                   (कवित ५१५)
            (३)

बीनै लानौ बानौ, हियै राम मंडरानौ| कहि कैसे कै बखानौं, वह रीति कछु न्यारियै||

            (४)

उतनोई करै जामै तन निरवाह होय| भाय गयी श्रौर बात भक्ति लागी प्यारियै||

                   (कवित ५१३)

इन उध्दरणो से ज्ञात होता है कि (१) कबीर ने चार वर्ण चार आश्रम छ: दशंन किसी की भी "आनि कानि" नही रक्खी| केवल भक्ति को ही हद किया| भक्ति से विमुख धर्मो को अधर्म कहा| सतभक्ति से रहित तप, योग, दान व्रतादि तुच्छ वताए| आयं और अनायं, हिन्दू और मुसलमान को सिध्दान्त की वार्तो का ज्ञान कराया|(२) उनकी मति गम्भीर और अन्त:करण भक्ति से सरस था| वह भजन भाव मे संलग्न रहते थे और जाति पाँति एवं वर्णश्रम मे आस्या नहीं रखते थे| (३) वे कपड़ा वुनने का उधम करते थे| यधपि बाहा रूप से ताना-वाना का कायं करते थे, पर अन्त:करण से ब्रह्म मे ही लीन रहते थे|(४) उधम तो [ १५ ]केवल उतना करते थे जितने से उनकी जीविका चल 'जाय । इसके सिवाय उनका चित पूर्ण पेण ब्रह्म मे ही लगा रहता था । (५) कबीर अपने सिध्दान्त का समर्थन करना जानते थे ।सिकन्दर व्दारा उत्पीड़ित और पाखंडियो व्दारा अपमानित होने पर भी वे अपने सिध्दान्तो से अडिग रहे । उन्हें सिध्दान्तो से विचलित करने के अनेक उपाय हुए पर वे सभी विफल हो गए । भक्तमाल को इन पक्तियो से कबीर के व्यक्तित्व पर अच्छा प्रभाव पड़ता है ।नाभादास के इस कथन मे कहीं भी कोई अतिशयोक्ति नही उपलब्ध होती है । कबीर के सभी स्वाभाविक गुणो का परिचय इन उध्दरगो से प्राप्त होता है ।

अकबर के समय मे श्रवुल फजल अल्लामी ने आइन-ए-अकबरी की रचना
की। इस ग्रंथ मे कबीर के लिए "मुवाहिद" अर्थात "एकता प्रेमी" शब्द का प्रयोग
हुआ है । इस ग्रन्थ मे कबीर के विषय मे लेखक ने दो बार उल्लेख किया है। १२६
पुष्ठ पर उनका परिचय् देते हुए लेखक का कथन है कि "कबीर मुवाहिद यहॉं
विश्राम करते हैं और आज तक उनके कारण और कृत्यो के सम्बन्व मे अनेक
विश्वस्त जनश्रुतियॉ कही जाती हैं।वे हिन्दू और मुसलमान दोनो के व्दारा अपने
उदार सिध्दान्तो और पवित्र जीवन के कारण पूज्य थे।"पृष्ठ १७१ पर लेखक का 
कथन है कि"कोई कहते हैं कि रतनपुर (सुत्रा अवध)मे कबीर की समाधि है जो
य्रह्म क्य का मण्डन करते थे ।आध्यात्मिक हष्टि का व्दार उनके सामने अशतः खुला
था। उन्होने अपने समय के सिध्दान्तो का भी प्रतिकार कर दिया था।"आइन-ए-अकबरी
के इन कथनो से ज्ञात होता है कि कबीर समध्ष्टिवान व्यक्ति थे। वे दोनो ही वर्गो मे 
पूज्य थे और उध्दार सिध्दान्तो के पोपक और प्रचारक थे।
 कबिर के गुरु भाई पीपा और रैदास ने प्राय:एक से ही शब्दो मे कबीर का यशोगान करते हुए कहा है:-
जाकॅ ईद बकरीद नित गठरे बघ करै मानिये सेप सहीद पीरां।
बापि वैसी करी पूत ऐसी घरी नाव नवखंड परसिध कबीरा ॥
                                          -पीपा
 जाकॅ ईद बकरीदि कुल गठरे बघि करहि,
        मानियहि सेल सहीद पीरा ॥
 बापि वैसी करी पूत ऐसी तिहुरे,
        लोक परसिधा कश्रीरा ॥
                        (रैदास) [ १६ ] दोनो का एक ही कथन है कि मानव का भला और बुरा होना उसके कुल
या जाति पर निभंर नही है। कुलीनता और अभिजात्य का गर्व भूठा है। जिसके
कुल मे गोवध होता था,लोग बाह्मआडम्बरो मे लीन थे,उसी कबीर ने ऐसा आचरण 
किया कि तीन लोक नौ खंड मे प्रसिध्द हो गया। इन पंक्तियो से कबीर का 
बिद्रोहात्मक आचरण प्रकट होता है।पीर शहीद,शेख के गुलाम,ईद बकरीद मे
ब्रह्म का रूप देखने वाले परिवार मे उत्पन्न होकर कबीर ने भिन्न आचरण किया।
इसके अतिरिक्त पीपा ने अनेक स्थलो पर कबीर की बड़ी प्रशंसा की है। उनकी
वाणी का एक पद उध्दुत किया जाता है:-
     जो कलिमांभ्त कबीर न होते ।
     तौलै-वेद श्ररु कलिजुग मिलिकरि भगति रसातलि देते॥
     श्रगम निगम की कहि काहै पाउ फला भामोत लगाया।
     राजस तामस स्वावक कथिकथि इनही जगत भुलाया॥
     सागुन कथिकथि मिला पनाया काया रोग बढ़ाया।
     निरगुन नीक पियौ नहीं गुरुमुप तातै हाटै जीव निराया॥
     बहता स्त्रोता दोऊ भूले दुनियां सवै भुलाई।
     कलि विर्ध्दकी छाया बैठा क्यू न कलपना जाई॥
     श्रंध लुकटिया गहि जु श्रंध परत कूप थित थोरै।
     श्रचरन बरन दोऊ से श्रंजन श्रापि सबन की कोरै॥
     लसे पतित कहा कहि रहेते थे कौन प्रतित मन घरते।
     नांनां वानी देवि सुनि स्त्रवन बहौ मारग श्रणसरते॥
     त्रिगुण रहत भगति भगवंत कीतिरि,विरला कोई पात्रै।
     दया होइ जोई कृपानिधान की तौ नाम कबीरा गावै॥
     हरि हरि भगति भगत कवलीन त्रिविधि रहत थित मोहै
     पाखंड रुप भेप सव कंकर ग्यान सुपले सोई॥
     भगाति प्रताप राएय बेकारन निज जन-जन श्राप पठाया।
     नाम कबीर साम साम पर करिया तहां पीपै कछु पाया॥
     भारतवर्ष मे धर्म के नाम पर कौन से अनाचार और दुराचार नहि हुए।
     कबीर के समय तक धर्म का स्वच्छ सहज रुप अत्यन्त विकूत और विस्मृत हो गया [ १७ ]                             ( १७ )

था । ऐसी दशा मे कबीर ने जनता को साधना का जो मार्ग प्रदर्शित किया, वही सब से अधिक कल्याणप्रद था , साथ ही समय की मार्ग पूर्ण करता था । कबीर का व्यक्तित्व इस दृष्टि से बडा महत्वपुर्ण है । तथ्य तो यह है कि पीपा की प्रथम दो पंक्तियां कबीर के समस्त महत्व को प्रकाश मे ला देती हैं ।

            मिर्जा मोहसिन फानी ने 'दबिस्ताने मजाहिव ' मे लिखा है कि ---
          "कबीर जुलाहानजादकि श्रज़ मोवव्हिदान मशहूर हिन्द श्र्स्त । 
           मर्दुम बारामानन गुफतन्द दरीशहर जुलाहान जादेम्त ॥ "
             अर्थात् "भारतवर्ष के जुलाहो मे कबीर प्रसिद्ध अव्दैत ब्रह्म का उपासक था । लोग रामानन्द से कहते हैं कि इस प्रकार के एक जुलाहे का लड़का है जो अपने को आपका शिष्य कहता है ।"
       गुरुग्रंथ साहब मे सिद्ध सन्तो के साथ काबीर का भी कई बार उल्लेख हुआ है । उदाहरणार्थ :--
                            ( १ )
             नाम छीवा कबीरु जुलाहा पूरे गुरते गति पाई । 
                                                (पृ०  ५६)
                            ( २ )
             हरि के नाम कबीर उजागर जनम जनम के काटे कागर ।
                                                (पृ० २६४)
                            ( ३ )
             नाम देव कबीर विलोभनु सधन्न रैनु तरै ।
             कहि रबिदास सुनहु से सबहु हरि जी उते समै सरै ॥
                                                (पृ० ५६८)
           इन सभी पक्तियो से कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश पडता है । इसमे कोइ शका की बात नही है कि कबीर ने सवंप्रथम भारतीय समाज मे साधना के सब पथ और वाध्याचार के भेद दिखा कर जनता को नि:सार चातो से दूर रहने के लिये उपदेश दिया था । ज्ञात होना है कि वे दीन दुखियो की निरन्तर सेवा किया करते थे । कितने ही व्यक्तियो को वे अपने घर का सामान उठाकर दे देते और उन्हे संकट से उनमुक्त करते थे । चरणदास को निम्नमलिखित पक्तियां कबीर के चरित्र के उज्ज्वल पक्ष की उद्घाटिका है :--
                दास कबीरा जाति जोलाहा , भये संत हितकारी ।
             फ० ना० फा० ---२ [ १८ ]                             ( १८ )                                                                          
      एक स्थल पर चरणदास ने उन्हे आध्यात्मिक क्षेत्र के सुरमो मे विशिष्ट स्थान प्रदात किया ---
                      कबीर दादू घने पहिर बक्तर बने ।
                      नामदेव सारिखे बहुत कूदे ॥
                      सैनसदना वली भक्त पीपा बड़ो ।
                      राम की श्रोर कूं चले सूघे ॥
       माया से युद्ध करते हुए राम की ओर कूं सूघे चलने वालो मे कबीर का वास्तविक विशिष्ट स्थान है दयाबाई और धरणीदास ने कबीर को श्रेष्ठ भक्त और साधक मान है । उद्धरण के लिए उनकी बानियो के संग्रहो के क्रमश: पृ० २२ तथा पृ० १३, ३३ को देखा जा सकता है । 
       ऐसा अनुभव होता है कि गरीबदास और धनी धमंदास कबीर से विशेष प्रभावित थे । गरीबदास ने कबीर और उनके स्वभाव तथा व्यक्तित्व के विषय मे बडी श्रद्धा और आदर के साथ उल्लेख किया है । बात यह है कि कबीर को गरीबदास अपना गुरु मानते थे और इसलिये उनको दृष्टि मे कबीर का बड़ा ऊंचा स्थान था । गरीबदास की बानी (पृ० १० से १६ तक) मे कबीर के सतजुगणो का उल्लिख हुआ है । गरीबदास के अनुसार कबीर माया से रहित, स्वच्छ हृदय वाले ज्ञानवान शून्य का तत्व समभ्कने वाले गगन मन्डल मे विचरने वाले सुरत सिन्धु के गीत रचने वाले, आनन्द के उद्गम, ज्ञान और भक्ति की साकार मूर्ति मनुष्यो मे हंस, जीवित जगदोश , चार वेद छँ शास्त्र और १८ बोध के प्रकाण्ड पंडित, न्यायप्रिय जगद्गुरु शांति प्रिय , मोह और माया के विनाशक , कर्म की रेख मिटाने वाले, भक्तो के सरदार, अलख को लखने वाले, सुन्नीशाखा पर निवास करने वाले और भंवर गुफा मे रमने वाले थे । गरीबदास की दृष्टि मे कबीर समस्त सन्तो मे श्रेष्ठ हैं ---
                      ऐसा स्रतगुरु हम मिला सुरत सिन्धु के तीर ।
                      सब संतन सिरताज है सतगुरु श्रदल कबीर ॥
       गरीबदास ने कबीर के स्तबन मे प्राय: सौ साखियो की रचना की है और इन साखियो मे कबीर को बडा सम्मान और गौरवपूर्ण स्थान प्रदान किया है । धायद ही किसी ने कबीर के विषय मे इतने विस्तार से लिखा हो । कबीरदास का अपने निरालेपन और फक्क्ड़पन के कारण, स्पष्टवादिता और अप्रिय सत्य कथन के कारण बढा विरोध हुआ । संत कवि मलुकदास भी इन से बहुत प्रभवित थे । इन को धर्मिक विचारधारा और सिध्दान्तो मे कबिर की वाणी लहरें ले रही हैं।उन [ १९ ]                                    
                                 (१६)
  की वाणियो मे कबीर् के प्रति बड़े ही सम्मानसूचक शब्दो का प्रयोग हुआ है ।
  सुमीरन प्रकरण् मे मलूक कबीर का आदर्श जनता के लिय प्रस्तुत करते हैं- उनका कथन है कि " सुमिरन ऐसा कीजिए जैसे दास कबीर ।" यह इस बात का द्योतक है कि कबीर ने साधना बड़ी लगन से की । साधना मे लगन और तत्परता के लिए कबीर मध्ययुगीन सन्तो मे सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं । इसलिए मलूकदास का उन्हें इस दिशा मे आदर्श मानना असंगत नहीं प्रतीत होता । मलूक को कबीर की सिद्धि पर विश्वास सा-था जैसा कि निम्नलिखित प्ंक्तियो से ज्ञात होता है --
    हमारा सतजुरु बिरले जानै ।
  सुई के नारे सुमेर चलावै सो यह रुप बखानै ॥
  कीवौ जानै दास कबीरा कि हरिनावस पूता ।
  की तौ नामदेव और नानक की गोरख ॠवुधता ॥
 इन पक्तियो के कबीर को प्रहलाद और गोरखनाथ आदि साधको के समान पद पर व्यक्त किया गया है। यह भी उनके गौरव का द्योतक है ।

दुखहरनदास मूलक पथी थे । पर कबीर् से वे भी कम प्रभवित नहीं थे । संसार् की विधितओ को शान्त करने वाले मे जहां उन्होने गोरखनाथ , नानक और मलूक के नाम गिनाये हैं , वही उन्होने कबीर के महत्व को भी अंकित किया है । देखिए --

      जस कबीर जस गोरख जस नानक जस व्यास ।
    तास कलीमल जग हरन को प्रगटे मलूकदास ॥
                   ( कूपावती-- एक अप्रकाशित ग्रन्थ से )
  इन पंक्तियो मे मलूक को कबीर के समान व्यक्त करके उन्हे भी महान सिद्ध् किया गया है ।  फिर भला कबीर के महान व्यक्तित्व के लिये क्या कहा जाय । 

कबीर को ध्रव ,प्रहलाद और विभीपण के समान , हनुमान और अंगद के समान दास तथा रामानन्द और ननक के समान भक्त मान्ने वलो मे शिवानारायण सहाब विशेष उल्लेखनिय हैं । उनकी निम्नाकित प्ंक्तिया उल्लेखनीय है :-

 घ्रुव प्रहलाद विभीषण धीरा । पांडव पांचव धरे शरीरा ॥
 हनूमान ,अंगद और आनी । यही विधी प्रीति करै सय जानी ॥
 रामानन्द कबीर गुसाई । नान्क नाम जान एक साई ॥ [ २० ]
                          ( २० )
                          
    एक से एक समान भये , भगत यही संसार ।
    गुरु ऋन्यास सुनायहु , जो मोहि भक्ति पियास ।
                               (गुरुन्यास -- एक अप्रकाशित रचना से )
                               
     आध्यात्मिक पक्ष मे कबीर की महता को स्वीकार करने वाले चरण्दास ने नागरिकता के उज्जवल पक्ष का चित्रण भी किया है । कबीर उपकारी , परोपकारी व्यक्ति थे । उनके जीवन-च्ररित्र से मुक्ति का मार्ग खोजने वाले पंडितो और मुल्लओ को कबीर का यह नया प्रकाश कभी भी स्वीकार नही था । कबीर के सत्यावर्णो , उच्चादर्शो का वर्ग ने बड़ा उपहास किया । देखिये गरीब दास की ये पंक्तियो इस बात को स्प्ष्ट करती हैं :- 
     
            याभी मर्द कबीर है जगत करै उपहास ।
           कैसो वनिजारा भाया , भगत बड़ाई दास ॥
           
       गरीबदास कबीर को धर्म , समाज और आध्यात्मिक क्षेत्र मे एक महान क्रांतिकारी मानते थे । इतना ही नही वे कबीर को ज्ञान के क्षेत्र मे चक्रवर्ती मानते थे :-
         ऐसा निरमल नाम है,निरमल करै सरीर|
         त्रौर ज्ञान मंडलीक है,चकवै ज्ञान कबीर ||                                                                                                                                                                                                                                    
 इसके पश्चात कबीर के विषय मे कहने के लिये क्या कुछ और  रह जाता है ।
 
    धनी धर्मदास ने कबीर को अपने युग का महापुरुष माना है। उनके अनुसार ऎसे महापुरुष बड़ॆ सौभाग्य से मिलते है । उनका संसर्ग आवागमन से मुक्त होने वाला है । (पृ० ४३ ) समान्य रुप से घमंदास ने कबीर को एक महान संत माना है ।
 
 कबीर के विषय मे संतो के उपयुक्त कथनो को पढ़ जाने के पशचात् कबीर के चरित्र और व्यक्तित्व को समस्त विशेषताऍं स्पष्ट हो जाती हैं ।
 
 समस्त सतो का कबीर के व्यक्तित्व के विषय मे मत साम्य है । सभी का मत है कि वे युग के श्रेष्ठ साधक थे और उन्होने उस मधुर ज्योति के दर्शन कर लिये थे कि समस्त संसार आलोकित है । प्राय : सभी संत कवियो ने कबीर को गोरखनाय और रामानन्द के समकक्ष स्थान दिया है । कबीर की लोकप्रियता पर सभी का एक मत है ।
 
कबीर का आविर्भाव काल -- भारतीय जन -जीवन की परम्परा बड़ी महान रही हैं । हमरे देश के महाकवियो ने सहस्त्रो पदो , छन्दो और पृष्ठो  की रचना  के बाद  भी अपेने भी विषय मे एक भी शब्द का उल्लेख नहीं किया । समस्त । [ २१ ]                            (२१)

रचना को कृषरापंरग करके निवृत्त हो जाने वाले कवियो ने अपने सम्बन्ध मे किचित माश्र भी उल्लेख नही किया । कबीर इसी परम्परा के अनुयायी थे । कबीर की कविता मे अन्तस्साक्ष्य बहुत कम प्राप्त होता है अन्तः साक्ष्य के आधार पर वे सिकन्दर लोदी के समकालीन प्रतीत होते है ।

           निम्नलिखित विद्वानो ने कबीर को सिकन्दर लोदी का समकालीन माना है ।
            लेखक का नाम      कबीर क समय      सिकन्दर लोदी का समय
        (१)  बील              जन्म सन् १४९०         यही समय
                              (संवत्  १५४७)
        
        (२)  फरकहार          सन् १४००-१५१७      सन् १४८९-१५१८
                             (सवत १४५७-१५७५)   (सवत् १५४६-१५४७)
        (३)  हंटर             सन् १३०३-१४२०          नही दिया ।
                             (सवत् १३५७-१४७७) 
        (४)  व्रिम्स            नही दिया            सन् १४८८-१५१७
                                                (सवत् १५४५-१५७४)
        (५)  मेकालिख         सन् १३९८-१५१८          सिंहासनासीन 
                            (सवत् १४५५-१५७५)     सन् १४८८
                                                (सवत् १५४५)
        (६)  बेसकट           सन् १४४०-१५२८       सन् १४९६
                            (सवत् १४९०-१५७५)     (सवत् १५५३)
                                                (जीनपुर गमन)
        (७)  स्मिय            सन् १४४०-१५१८      सन् १४८९-१५१७
                             (सवत् १४९७-१५७५)   (सवत् १५४६-१५७४)
        (८)  भडारकर          सन् १३९८-१५१८      सन् १४८८-१५१७
                             (सवत् १४५५-१५७५)   (सवत् १५४५-१५७४)
        (९)  ईश्वरी प्रसाद       ईसा की पंगद्रहवी      सन् १४८९-१५१७ 
                                 पतान्दा          (मंवत् १५४६-१५७४)
             इस प्रकार कबीर का जन्म संबन तेरहयो धनाब्दी के अन्त या चोदहयो शताब्दी के प्रारम्भ से लेकर संवत् १४८२ के मध्य मे होना चाहिए। कबीर की जन्म तिथि के सम्बन्ध मे निम्नलिखित मत है:[ २२ ]                             (२२)

(१) कबीर चरित्र बोध १४५५ विक्रमी जेठ सुदी पूर्णिमा दिन सोमवार । (२) डा.श्याम सुन्दर दास का विश्वास है कि कबीर की जन्म तिथि के सम्बन्ध मे कबीर पंथियो मे प्रचलित यह दोहा सत्य है ।

   चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार इक ठाट ठए ।
   जेठ  सुदी  घरसायत  को, पूरनमासी प्रगट भए ॥
   कबीर रामानन्द के शिष्य थे । डा.मोहन सिंह, डा.राम कुमार वर्मा, डा.श्याम सुन्दर दास इस सम्बन्ध मे भक्त माल से मत साम्य रखते है । रामानन्द का जन्म समय सवत् १३७५ निशि्चत किया गया है ।
   कबीर की मृत्यु-कबीर का निधन कब हुआ यह भी रहस्य बना हुआ है ।धर्मदास के अनुसार उनका महा प्रयाण काल १५६९ भक्तमाल की टीका के अनुसार उनका मृत्यु समय सवत् १५४९ है और जनश्रुति के अनुसार कबीर १५७५ में दिवगत हुए ।
   कबीर की रचनाएँ---कबीर के नाम पर निम्नलिखित एक्सठ रचनाएँ उपलब्ध है:-
   (१)अगाध मंगल ।
   (२)अठपहरा ।
   (३)अनुराग सागर ।
   (४)अमर मूल ।
   (५)अजंनाम कबीर का ।
   (६)अलिफनामा ।
   (७)अक्षर खंड की रमैनी ।
   (८)अक्षर भेद की रमैनी ।
   (९)आरती कबीर कृत ।
   (१०)उग्र गीता ।
   (११)उग्र ज्ञान मूल सिध्दान्त-दाश माश्रा ।
   (१२)कबीर और धंम दास की गोप्ठी ।
   (१३)कबीर की वानी ।
   (१४)कबीर अप्टक ।
   (१५)कबीर गोरख की गोप्ठी ।
   (१६)कबीर की साखी ।
   (१७)कबीर परिचय की साखी ।
   (१८)कर्म काण्ड की रमैनी । [ २३ ]                                  (२३)

(१९) काया पंजी। (२०) चौका पर की रमैनी। (२१) चौतीसा कबीर का । (२२) छप्पय कबीर का । (२३) जन्म वोध । (२४) तीसा ज्न्त्र । (२५) नाम महातम की साखी । (२६) निभंय ज्ञान । (२७) पिय पहचानवे को अग । (२८) पुकार कबीर क़्त । (२९) बलख की फौज । (३०) बारामासी । (३१) वीजक । (३२) ब्रह्म निरुपरण । (३३) भक्ति का अग । (३४) भषो पंड चौतीस । (३५) मुहम्मद वोध । (३६) मगमल वोद । (३७) रमौनी । (३८) राम रक्षा । (३९) राम सार । (४०) रेखता । (४१) विचार माला । (४२) विवेक सागर । (४३) शब्द अलह टुक । (४४) शब्द राग काफी और फगुआ । (४५) शब्द राग गौरी और राग भैरव । (४६) शब्द वंशावली । (४७) शब्दावली । (४८) संत क्बीर वंदी छोर । (४९) सननामा । (५०)मत्संग को अग । [ २४ ](५१) साघो को अंग । (५२) सुरति सम्वाद । (५३) स्वास गुजार । (५४) हिंडोरा वा रेखता । (५५) हस मुक्तावली । (५६) ज्ञान गुदडी । (५७) ज्ञान चोतीसी । (५८) ज्ञान सरोदय । (५९) ज्ञान सागर । (६०) ज्ञान सम्वोध । (६१) ज्ञान स्तोश्र । [ २५ ] कबीर की भावभूमि

विश्व सहित्य के श्रेष्ट कवियो मे,महाकवियो मे प्रतिभा-सम्पन्न सहित्य कारो मे,और उत्कृत क्रन्तिकारी धर्मिक एवं सामाजिक नेताओ में,कव्य जगत मे नाना प्रकार के अभिनव,प्रतिमान संस्थापको मे,तथा मानव-जीवन के सूक्ष्म पर्यलोचोको मे कबीर पंथ के प्रवतंक,प्रबल आलोचक,प्रकाण्ड दार्शनिक ,प्रशिष्ठ स्पष्टवदो,तथा युग प्रवतंम मानव,महामानवकवि महाकवि,और असाधरण जनवदी,विचारक तथा समाज सुधारक कबीर का स्थान विशिस्ट है। कबीर की कविता,रचना,प्रतिपद की आत्मा अप्रस्तुत योजना,भावपक्ष,कला पक्ष,मस्तिष्क पक्ष सभी कुरग अति यथार्थ,अतिवास्तविक, और अति सुपरिचित प्रतित होता है। कबीर के कव्य मे सहजता,सरलता,स्पष्ट्ता,सूलभता और संवेदनात्मकता सहसा,शिक्षित,अशिक्षित,अध्दशिक्षित सभी के ह्रदय और मस्तिष्क को अपनी ओर् आकर्षीत कर लेते है। जीवन और जगत को कबीर ने बहुत निकत,बहुत गहराई,बहुत गम्भिर्त और बहुत गौर से देख थ। आत्मनभुति,आत्म चिन्तन,आत्म-मनन के आधर पर प्रस्तुत किये हुए कबीर आत्म कथन इसीलिये अति प्रभवशलि,अधिक प्रभवशलि,अधिक मन्मन्पर्शि और अधिक सजिव है। कबिर ने जो कुछ देख,उसे वाणी के मध्यम से यथातथ्य रुप में व्यक्त कर दिया। और इसीलिए कबीर ने रुढिवदी पंडितो,प्रदर्शन प्रिय सहित्यकरो,प्रचारको और अधिकसजीव हैं। कबीर ने जो कुछ देखा,उसे वारणी के माध्यम से यथथय रूप मे व्यकत कर दिया। और इसिलिये कबिर ने रूढिवदि पन्दितोन ,प्रदर्शन प्रिय सहित्यकारो,प्रचर्को और कवियों को चुनौती देते हुए कहा "तु कह्ता है कागद देखी, मै कहता हूं आंखो देखी" स्पथ है कि कबिर की कविता रचना, विचारधारा चिन्त्त और प्रकाशन का आधार सत्य है, चिरन्तन सत्य है, शाशवत है। क्योकि कबीर सत्य को जीवन का आधार मानते है । कबीर की दृष्ति मे " सोच बराबर तप नहीं भूठ बराबर पाप। जाके हिरदे सोच है ता हिरदे गुरु आप"।

  कबीर ने इसी सस्य को नीव पर जीवन, जगत और सहित्य को जिन भित्तियो का निर्माण किया वे बडी हो लोककल्यणकरि,आल्हादकारी और समन्वयकारी हैं। कबीर की कविता का हेतु,प्रयोजन,वण्यं विषय अथवा प्रतिपाध मानव है। कव्य की भूमिका मे उत्तर कर कबीर ने मानव-जीवन और समज का चित्रण,विवेचन और विश्लेण किया है वह बहुत हो विधष्टि है। कबीर के [ २६ ]                       ( २६ )                 

सम्पूण कव्य का परायण कर जाने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे आलोचक कवि ने मानव-जीवन को बहुत ही निकट से देखा था। मनुष्य की सामध्यं,अभावो,होनताओ से कबीर भली भांति परिचित थे। उनके वण्यं विषय विश्वास,धैयं, मे औदार्य,दैन्य,शील,विवेक,संतोष विचर जैसी प्रवृत्तियो मानवीय भावो पर सविस्तारविचार प्रकट किए गए हैं। मनुष्य क्य है,कैसा है,उसका वास्तविक रुप कैसा है,इस सम्वन्ध मे कवि ने अपने विचारो को चेतवनी, भेष, कुसंग, माया, मन, कपट, तृष्णा, अह्ं ,लोभ,परनिन्दा,भेदभाव,और असत्य आदिश शीषंको मे व्यक्त किय है। इन विषयो पर अभिव्यक्त भावो और विचारों का अध्ययन और विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि मानव कितना हीन और अपदस्य है। मानव पंच महाविकारो,आशाओ,और तृष्णाओन से प्रपिडित है। मानव सुलभ दुबंलतायॅ,प्रत्येक मानव को दिग्भ्रान्त किय हुए हैं। इस प्रकार कबीर का सम्पूणं काव्य मानवीय प्रवृत्तियो का रोचक लेखा-जोखा है। कबीर की कविता जल-जीवन,मानव-जीवन के धरातल को प्रत्येक स्तर पर संस्पशं करती है। चाहे वह सामाजिक वण्यं विषय हो अथवा आध्यात्मिक,दाशनिक हो अथव रहस्यवाद से सम्बन्धित हो,सभो क्षेत्रो मे कबीर मानव को हीनतओ,क्षुद्र्ता,और निम्न प्रवृतियो से ऊपर उठाकर आध्यात्मिकता,सामाजिकता एवं वृह्त्तार मानवता के उच्च घरातल पर प्रतिष्ठिन और आसीन करने के लिये प्रयत्नशील है। मानवता के इतिहास में मानव समाज के कितने भी हिमायती उत्पन्न हुए हैं उनमे से कबीर का स्थान बडा उच्च और स्मृहणाय है। इसका कारण यह है कि कबीर ने जिन अनुभवो को हृदयगम किया वे सब यथाथं और वास्तविक है। इसीलिये कबीर ने दया,विश्वबन्धुत्व और प्रेम की भावना पर विशेष जोर दिया है। कबीर ने मानववतावदी भावो से अनुप्राणित होकर कहा:-

            दया दिल में राखिये,तू क्यों निरदयी होय।
            साई के सच जीव है, कीडी कुंजर सोय। 
  दया,उदारता और क्षमा के सम्बन्ध मे कबीर ने अनेक युक्तपूणं उक्तियो को जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। कबीर ने दान और क्षमा इन दो उदान्त अलौकिक ग्रुणो के सम्बन्ध मे जाने कितनी साखियो की रचना की जिनमे से दो यहा उध्दत की जाती है।
                          ( १ )
               दान दिये धन ना घटे, नदी न घटे नीर।
               आपनी आंखो देखिये,यो कीत कहे कबीर । [ २७ ]                    
                     (२७)            
                     (९)
             जहाँ दया तहाँ घर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप  ।
             जहाँ क्रोध तहाँ काल, जहाँ क्षमा तहाँ श्राप ।

इन पंक्तियों मे घर्मं का बडा उदान्त, व्यापक और जन कल्याणकारी रूप व्यक्त हुआ है । दया कबीर के समस्त दर्शन सिद्धान्तो और उपदेशो का सार तत्व है । कबीर को कविता की भावभूमि की एक भलक उपयुक्त उद्धरणों से प्राप्त होती है । इसी प्रकार के महान विचार, महान सन्देश, और तत्व एव तथ्य पूर्ण कथन कबीर की कविता की विशेषतायें है । कबीर की कविता मे महान संदेशो की अभिव्यक्ति हुई है । सभ्यता, संस्कृति वैज्ञानिक प्रगति, सामाजिक मान्यताओ और लौकिक जीवन के मानदण्डो मे कितने ही परिवर्तन समुपस्थित हो जांय परन्तु कबीर के संदेश अनभुतिपूरग् क थन कभी भी जूठे नही पडेगे । यह अभिनवता वर्ण्य विषय की यह शास्वतता इसलिए है कि कबिर की अनुभूति जीवन सत्य और प्रत्यक्ष जगत से ग्रहित हुई है । कबीर के यह शब्द कभी फीके नही पडेगे और इनका प्रभाव सीघे मानवीय ह्र्दय पर पडता है ।

कबीर की भव भूमि मानव के समाजिक,धार्मिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित है कबीर समाज के सूक्ष्म पर्यालोहचक थे । उनके लिए समाज और धर्म मानव-जीवन के दो अभिन्न पक्ष है । समाज, धर्म का आधार लेकर ही फूलता फलता और आगे बढता है, और ध्र्म समाज का पुरक है । तात्पर्य यह है कि दोनो अन्योन्यश्रित है । सत्य, सामाजिक और धार्मिक गुण है । विश्वाम्, धैर्य, दया,क्षमा, सन्तोष, दैन्य, शील, विवेक आदि जितने सामाजिक गुण है उतने ही धार्मिक । कबीर ने इसीलिए इन पर बडे विस्तार के साथ विचार प्रगट किया है । सम ह्र्ष्ट और समता मानव के लिये बढे वरदान है ।  और फुसग मानव दया वनस्पति व पशु जगत के लेये भी समत रुप से दुखप्रद है । जनसुलभ अप्रर्स्तुत योजना के दोरा कबीर ने अपने समय के कुमग से अभिशप्त मानत्र समाज को सम्शोधिन करते हूए कहा-
             (१)
     केल तवहि न चेतिय, जब ढिंग जागी बेरि ।
     ज्ञघके चेते क्या, कांटों मीन्हा घेरि ।
             (२)
    बुद्दि घिहूव ज्ञ्पादमी जाने नहीं गचांर ।
    जैसे कपि परवस परचै घर- घर घार । [ २८ ]                                   (२५)

और व्यर्थ ही सतर्स गये रत कठोर ह्र्दय वाले व्यक्तियो को सम्बोश्रिनत करते हुये कबीर ने 'संगति भई तो क्या भया, हिरदा भया कठोर । नौ नेजा पानो चढौ तऊ न भीजौ कोर ।' भेष वाह्राडम्बर, दुविधा, त्र्वसत्य, अन्तोश जैसे 'दुर्गणो' जो सामाजिकता के लिए अभिशाप है, की कबीर ने कटु निन्दा की । कबीर "जस की तस धरि दीनी चदरिया' मे विश्वास करते थे । यह मानव शरीर रुपी चदरिय का उपयोग यत्न पूर्वक ही करना चाहिए और इस चदरिया का यत्न पूर्वक प्रयोग करना ही सनबसे बडा सामाजिक गुण है । कबीर का काव्य मानव जीवन , मानव समाज और व्यक्तकी प्रत्येक दिशा का स्पर्श करता है । तभी तो आलोचको ने कहा कि कबीर मानव जिवन के सुक्ष पर्यावलोचक थे । वास्तनव मे कबीर की कविता मे मानव जीवन के विविध पक्ष, प्रवुन्तियो, भावनाये व्यक्त हुई है । मनुष्य कैसा है और उसे कैसा होना चाहिये यह कबिर की कवीता मे बहुत ही स्पष्ट रुप से , बहुत हि सुक्ष्म रुप से चित्रित हुआ है । कबीर मानव के बडे हिमायती और सवेदनशील थे । उनकी कविता मे समाज की असंगतियो मानव जीवन को कुरूपनताओ, घमगत विषमताओ और चतुर्दिक व्यापक विडम्बनाओ का व्यापक चित्रण हुआ है । कबीर ने अपने काव्य का विषय इन्ही के आधार पर चित्रित किया है और इसीलिए मानव जीवन और परिस्थितियो के चितेरे कबिर का चित्रिपट बहुत व्यापक है । इन समस्त असंगतीयो के मध्य मे कबिर ने समन्वय संस्थापित करने की चेष्टा की । कबीर का समन्वय अदभुत, अनोखा और अद्दितीय है । यह समन्शय न तो विभिन्न वादो मतमतान्तरो और दर्शनो से सग्रहित विचार घारा के सुन्दर सुमनो का समुच्चय है न वह किसी प्रकार का समभौता है और न किसी यथार्थ से पलायन है । यह समन्वय तत्कालीन प्रिस्थ्ततियो और विषमताओ से अनुप्रागित होकर सस्थापित किया गया है । युगों से कुलीन और अन्त्यज, हिन्दु और मुसलमान वर्णें और वर्गों के मध्य मे विषमतायें चली आ रही थी । कबीर ने इनके मव्थ से समन्वय सस्थापित करने की चेष्टा की । कबीर के समन्यत्राद का मुलाधार परम तत्त्र है । यही परमतत्व समस्त मानव समाज का कर्त्ता है । मनुष्य दर्शनो और वर्णें के भ्रमों मे भटकता फिरता है । परन्तु वास्तविकता कुछ दुसरी है ।

           जोगी गोरख गोरख  करे;
              हिन्दू राम नाम उच्चारि ।
           मुसलमान कहे एक खुदाई,
              अलह राम सति सोई । [ २९ ]                            
                                (२६)
       इसी प्रकार साधनात्मक जीवन की विपमताओ की ओर भी कबीर ने  
  समन्वयव्मक से देखा|ब्रह्म कि  सम्बन्ध मे कबीर ने इसी प्रकार जो चित्र
  व्यन्कित् किया वह समन्वयात्मक है|
           वो है तैसा वोही जाने,श्रोहि साहि श्रहिनही श्राने|               
          नैनां बैन श्रगोचरी, श्रबनां करनी खार|
          बोलन के सुख कारने,कहिये सिरजनहार||
       समन्वय की भावना से ही प्रेरित होकर कबीर ने कहा कि-
           ह्म्सा पय को कदि ले,त्र्प्रौर नीर निखार|
           ऐसे गई जो सार को,सो जन उतरे पार|
 कबीर की भाव भूमि मे दाशनिकता का प्रखर रग और प्रभाव परिमलक्षित  होता है|व्यदैवत व्रत,अनश्वर आत्मा व्यतिशय नश्वर ससार क्ष्रिरिगक जीवन् ये सव 
एक एक कर कबीर की कविता मे व्यक्त हुए है|
   कबीर का वण्यं विषय सत्य,वास्तविकता और यथार्थ से परिपोपित है|

उनकी सधानात्मक सामाजिक,घार्मिक और दाशनिक अत्यन्त अत्यन्त यथाथं है और उनका आधार प्रस्तुत अथवा प्रत्यक्ष है|दशनिक,और आध्यात्मिक का विञ्मलेपरग भी कबीर ने बडी रोचक और प्रभावशाली मे किया है|उदाहररग के लिये यहां पर कतिफ्य साखिया उद्रुत की जाती है|

                         (१)
          यह तन काचा कुम्भ है,लिया फिरै या साथि|
          डबका लागा फुटि गया,कछू न श्राया हाथि|
                         (२)
          कस्तुरी कुडलि वसे मृग ढंढे वन माहि|
          ऐसे घट घट राम है,दुनियां देखे नाहि|
                         (३)
          पानी केरा बुद्बुदा त्रस मानस की जाति,
          एक दिन छिप जाहिंगे,तारे ज्यु परिभात|
 कबीर की कविता का व्यष्यं विपय स्प्ण्ट और ह्र्दय्प्राही है ज्ञान,विज्ञान जिन बातो का उल्लेख कबीर ने किया है वे बडी ही सप्ट है और सप्ट होने के कारण
      उनका विपाय हमरे ह्र्दय और मस्निषक को स्व्यम कर सेने ने पूग्गां 

मक्षमन है से|कबीर ने ऋपन काव्य की रचना जनता के निम्न वगंके लिये कि थि| [ ३० ] (३०)

 और इस वर्ग के लिए कबीर ने जिस अभिव्यंजना माध्यम को चुना वह बढ़ा हो सहज है|कतिपय उलट वासियो को छोड कर उनका समस्त काव्य बहुत सरल और सह्ज है|शृंगार नश्वरता,विरह और संयोग जैसे विषयो को कबीर ने बड़ी सरलता के साथ सरल भाषा के माध्यम से जनता के समक्ष उपस्थित किया|
   इस प्रकार उपयुंक्त्त विवेचन से सुस्पष्ट हो जाता है कि कि कबीर की कविता की भावभूमि मे जनकल्याणकारी और लोक रंजनकारी है|कबीर की कविता मे कला पक्ष नगण्य है जो कुछ मह्त्वपूर्ण है वह हैं कबीर की भाव भूमि, कबीर का भावपक्ष,कबीर का वण्य विषय अथवा कबीर का सदेश । और इसमे सन्देह है कि कबीर अपन भावभंग के साथ पाठक अथवा श्रोता को सफलतापूवंक बाहर ले जाते है| भ्राभ्र,मंजीरा अथवा एकतारे पर गाये जाते हुए कबीर के पद हमे आत्म-विभोर कर देते है और यही कवि की सफलता है|कवि का सौभाग्य है या कवि का गौरव है| [ ३१ ]               कबीर की काव्य कला

सन्त कबीर सन्तमत प्रवतकं एवं सस्थापक थे | सन्तमत के अन्तगंत ह्र्दय उदात्त भावना भत्ति एव साधना की चरम अभिव्यत्ति हुई है | उसमे ह्र्दय की स्वाभाविक प्रेरणा की भलक विध्यमान है| सन्तमत बहुजन हिताय, स्वच्छ्न्द एवं नैमर्गिक है| सन्तमत के सम्बन्धित साहित्य मे कृतिमता का अभाव है| काव्य की सरलता एव सहजता ही उसकी विशेषता है| इस साहित्य मे सन्तो के महान व्यक्तित्व, निर्मल ह्र्दय तथा उनकी जनहित की भावना प्रतिविम्बित होती है|मध्ययुगीन साहित्य की विशेषताओ का उल्लेख करते हुए डाँ० रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि 'मध्य युगेर साधक कबीरा हिन्दी भाषाएं जे भाव रसेर ऐश्वर्य विस्तार करियाध्ने ताहर मध्ये असमान्य विशेषत्व आछे| सेई विशेपत्व एइ जो ताहादेर रचनाय उच्च अगरे साधक एव उच्चे अगेर कवि एकग्र मिलित होइयाधोन एमन मिलन सर्वत्रइ दुलंभ | (सुन्दर ग्रन्थावली प्राक्कयन-सम्पादक पुरोहित हरिनारायण शर्मा ) अथति मध्य युग के साधक एव कवियो ने जो भाव एव रस का विस्तार किया है उसमे असामान्य विशेषता अकित है) वह विशषता यह है कि उस रचना मे उच्च श्रेणी के साधक तथा उच्च श्रेणी के कवि का सम्मिलन है इस प्रकार का सम्मिलन स्वांग दुर्लभ है| सन्तमत का काव्य-साहित्य बहुत स्वतंत्रता तथा प्रभावशाली है|सन्तम्त के समस्त कवियो मे कवि कबीर सबसे अधिक प्रतिभाशाली एव मौलिक थे| मौलिकता तथा प्रथिभा मे तो कबीर हिन्दी साहित्य के सूर्य एव चन्द्र' सूरदास तथा तुलसीदास से कही अधिक बढे हुए धनी हैं| कबीर जिस कुल मे उत्पन्न हुए या कबीर का जिस कुल मे पालन-पोषण हुआ वहा न कोई सांस्क्रतीक परम्परा विद्यमान थी न उध्ययन का वातावरण था न वेदशास्त्र की चर्चा |कबीर ने स्वयं कहा है कि "मसि कागद छूया नही कलम गध्यो नहि हाथ" ऐसे वातावरण मे उदभूत होकर , परिपालित होकर कबीर धर्म सुधार, समाज परिष्कार तथा काव्या रचना के क्षेय मे अवतरित होकर, अपनो मृत्यु के अनन्तर ५०० वर्षो तक चर्चा मनन, अध्ययन, आलोचना और अनुसन्धान के विषय बने रहे यह कबीर का अत्तितीय पृतिभा तथा मौलिकता का परिचायक है| कबीर ने काव्य रचना का व्रन नही लिया था, न कविता लिखने की प्रतिज्ञा करके उन्होने कही पर कुछ लिखा है | फिर भी पाँच सौ वर्षो से कवि या महाकवि के रूप मे अध्ययन के विषय बने है|कबीर को,रोनि [ ३२ ] (३२) कालीन कवियो की भांति पिंगल और अलंकारो का ज्ञान नहीं था न इनके आधार पर उन्होने काव्य रचना ही की तथापि उनमे काव्यानुभूति इतनी प्रबल एवं उत्कृष्ट थी कि वे सरलता के साथ महाकवि कहलाने के अधिकारी हैं। सत्य यह है कि कविता मे छ्न्द, अलंकार, शब्दशाक्ति आदि गौणा है, और सन्देश प्रधान है| यही सन्देश कबीर की कविता की विशेषता है। कबीर की कविता मे महान सन्देशो की अभिव्यक्ति हुई है| सभ्यता और संस्कृति चाहे कितनी ही विकसित हो जाय पर कबीर के ये सन्देश कभी न फीके पड़ैगे न समय की गति मे पुराने (या आउट आफ डेट) पड़ैगे। इन सन्देशो मे आनेवाली पीढ़ियो के लिये प्रेरणा, पथ प्रदर्शन तथा संवेदना की भावना सन्निहित है। महाकवि का यहि दायित्व है कि वह अपनी सूक्ष्म दृष्टि के द्वारा आने वाली पीढियो को भावि मनोवृत्ति का आसानी के साथ अनुमान लगा ले और तदनुकूल साहित्य की रचना करे। कबीर मे यह शक्ति विध्यमान थी। अलंकारो से सुसज्जित न होते हुए भी कबीर के सन्देश काव्य-मय है। सच यह है कि काव्य की मर्यादा जीवन की भावात्मक एव कल्पनात्मक विवेचना मे हैं, पिंगल मे नही। इस दृष्टि से कबीर एक अत्यधिक सफल कवि हैं। कबीर भावना की अनुभूति से मुक्त, उत्कृष्ट रहस्यावादी,जीवन का सवेदनशील सस्पर्श करने वाले और मर्यादा के रक्षक कवि थे। कबीर की काव्य कला का मूल्याकन परम्परागत पिटि-पिटाई रप्त , छन्द, अलंकार की कसौटी पर नही होना चाहिये। उन्होने स्वत: कहा है "तुम जिन जानो गीत है, यह निज ब्रह्मा विचार 'तथा' कवि कवी ने कविता मुये। उनकी कविता का लक्ष्य मानव है। पथ-भ्रष्ट, मार्ग-विभ्रात जनता तथा समाज को उचित मर्ग पर लान ही कबीर के पूरी पूरी विवेचना हमारे समक्ष प्रस्तुत करने मे असमर्थ हैं। कवि के रूप मे कबीर जीवन के अत्यन्त निकट हैं। उनके काव्या मे रीतिकालीन अचार्यो जैसी कलबाजी तो नही है पर निश्चय ही उनकी कला उनकी कला उन्की स्पष्टवादिता तथा स्वाभाविकता मे है। स्वाभाविकता कबीर के काव्य की सबसे बडी शोभा और कला की सबसे बडी विशेषता है। कबीर के काव्य का आधार स्वानुभूति या यथार्थ है। उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि "मैं कहता हूँ आंखीन देखी ? तू कहता है कागद की लेखो" कबीर अत्याधिक प्रगति-शील कवि थे। कवि, चिन्तक, दार्शनिक, समाज सुधारक, धर्म सुधारक तथा रहस्य-वादी के रूप मे वे अपने समय से बहुत आगे और सत्काय थे। क्षमना, विद्रोह, विश्व-बन्धुत्व की भावना ने हमारे कवि को बड़ा उदार और जनप्रिय बना दिया था। साराशं यह कि कबीर जन्म से विद्रोही, प्रवृत्ति से समाज-मुधारक कारणो से प्रेरित होकर धर्म-सुधारक, प्रगतिशील दार्शनिक और अवश्यकतानुसार कवि थे। सरल [ ३३ ] ( ३३ )

जीवन,सत्यता एवं स्पष्ट व्य्वहार उनके अन्तरंग एवं बहिरंग का सार तत्व था। उन्के व्यक्तित्व का पूरा-पूरा प्रतिबिम्ब उन्के सहित्य मे विधमान है। कबीर की मुक्तिया आज भी जनता मे वारम्बार उद्धत होती है,उन्की पदावली का प्रसार आज भी आकाशवाणी के द्वारा होता है। यह सब इस बात का धोतक है कि कबीर के काव्य मे कुछ ऐसी विशेषता एवं गुण है जिनकी समानता हिन्दी का कोई अन्य कवि नही कर पाता है। उनमे ऐसा अनूठापन है जिसके कारण वे किसी एक श्रेणी विशेष के कवियो मे परिगणित नही होते। उनमे कुछ ऐसा आकर्पण है जो हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

कबीर की कविता प्रतिपाद्य मानव है। काव्य की भूमिका मे उतर कर कबीर ने मानव की खूबियो और खामियों का सूक्ष्म पर्थालोचन किया है। अपने युग मे और आज भी कबीर एकता के प्रतीक और अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार के शत्रु माने जाते है । कबीर का प्रतिपाद्य स्थूल रूप से दो भागो में विभाजनीय है । इनमें से प्रथम है रचनात्मक तथा द्वितीय आलोचनात्मक है । रचनात्मक विषयों के अन्तर्गत हमारे आलोच्य कवि ने सतगुरु नाम,विश्वास,धैर्य,दया,विचार, औदार्य, क्षमा, संतोष, दैन्य, भक्ति, मुक्ति, ज्ञान, वैराग्य, शील, विवेक, विचार, जैसे अनेक विषयों पर अपने विचारों को क्रियात्मक शैली मे व्यक्त किया है । यहाँ उनकी खण्डनात्मक प्रतिभा या विशेषता के दर्शन नहीं होते है । अपने काव्य मे उन्होने इन विषयो की महता पर ही प्रकाश डाला है और प्रेम, विश्वास एवं भक्ति के उच्चादर्शो के प्रचार एव प्रसार के लिए प्रयत्न किया है । इन विषयो के प्रतिपादन में जीवन को उदात्त भावो की ओर ले जाने का संकेत है । ये प्रसंग उनके काव्य की उच्च भूमिका है । यहाँ मानव की हिनताओ का दिग्दर्शन नहीं कराया गया है । अब प्रतिपाद्य के दूसरे पक्ष पर आइए । वहाँ कवि कबीर की आलोचनात्मक प्रतिभा का व्यापक प्रदर्शन हुआ है । यहाँ कवि के अतिरिक्त वे आलोचक, सुधारक, पथ-प्रदर्शक और समन्वय- कर्ता के रूप में भी द्रष्टिगत हुए हैं । इस पक्ष में विशेष परिगणनीय विषय है चेता- वनी, मेष, कुसग, माया, मन, कपट, कनक-कामिनी, आशा, तृष्णा, अह, लोभ परनिन्दा, भेदभाव, जातिवर्णादि । इन प्रसंगो का अध्ययन करते ही आभासित हो जाता है कि मानव कितना हीन प्राणी है । वह काम-क्रोध मद, लोभ, अहंकार से प्रपीड़ित है । आशा एवं तृप्णा जीवन के लिए बड़े अभिशाप है । ये नित्य मानव को दिग्त्रान्त किये रहते हैं । कबीर के काव्य का यह पक्ष यह स्थापित करता है कि मानव वहा हीन है । सन्तकाव्य में इन्हीं विषयों को लेकर कवियों ने अपने विचारो [ ३४ ] ( ३४ )

को प्रकट किया। देखने मे विषय लघु है पर ये मानव जीवन का व्यापक रूप से स्पर्श करते है ।

कवि कबीर की अभिव्यंजना शैली बडी शक्तिशाली, समर्थ और प्रभावशाली, है । पतिपाद्य के एक-एक अंग को लेकर अशिक्षित, निरक्षर, संस्कारविहीन, पर परम्पराओं के प्रभाव से विहीन इस कवि ने सैकड़ो साखियों की रचना की है । आश्चर्य की बात यह है कि प्रत्येक साखी मे अभिनवता है, यद्यपि प्रतिपाद्य वही है ।

साखियों में समान रुप से विद्यमान है । रमणीयता और अभिनवता जो काव्य की परिभाषा के अंग है कबीर के काव्य में सवंत्र विद्यमान है । कबीर ने ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, योग, हठयोग, जैसे दुरुहतम विषयों को अपनी अभिव्यंजना शैली के माध्यम से बडे सुबोध एवं सरल रूप में व्यक्त कर दिया है । माया, आशा, तृष्णा आदि विषयों का बड़े रोचक ढग से रहस्योंद्घधाटन किया है । चेतावनी को अग "अध्ययन करते जीवन और मृत्यु, सृष्टि और विनाश, ब्रह्म और जीव जैसे विषयों को कबीर ने अपनी अभिव्यंजना शैली के द्वारा इतना सुबोध बना दिया है कि शिक्षित और अशिक्षित समान रूप से उनके उपदेश और सकेतो को ग्रहण कर सकता है । लगभग ५०० वर्षों से जो कवि निम्न और अशिक्षित वर्ग का पथ प्रदर्शक और घर्म सुधारक माना जाता था आज उच्चतम उपाधियों के लिए अनुसंधान का रहस्य बना हुआ है । कबीर की अभिव्यंजना शक्ति की विशेषताएँ है सरलता, सुबोधता, सहजता, अभिनवता और प्रभावित करने की अद्वितीय शक्ति उनकी वाणियों मे साहित्यिक अभिव्यक्ति हुई है । उदाहरणार्थ कतिपय साखियाँ यहाँ उद्- पृत की जाती है-

                        ( १ )
            बुरा जो देखन मैं चला जग में बुरा न कोय ।
            जो दिल खोजा आपना मुझ सा बुरा न कोय ।।
                        ( २ )
          चुन चुन चिडिया महल बनाया लोग कहें घर मेरा है 
            न घर मेरा न घर तेरा चिडिया रैन बसेरा है ।।
                        
                        ( ३ )
             देखन के सबको भले जिसे सीत के कोट ।
           रवि के उदै न दीसही, बाँधे न जल की पोट ।। [ ३५ ](३५)

(४) तन सराय मन पाहरू मनसा उतरी आय। कोउ काहू का है नही,देखा ठोंकि बजाय॥ इन साखियो मे अभिव्यक्ति सत्य सबको प्रभावित करता है।कबीर को 'हाड जरै ज्यो लाकडो,केस जरै ज्यो घास,' 'पानी केरा बुलबुला जस मानुप को जाति। 'तथा' यह तन काचा कुंभ है लिये फिरै था साथ।'टपका लागा फूटिया, कछु नहिं आया हाथ 'आदि साखियो मे अभिव्यंजना शक्ति विशेष रूप से प्रभाव- शाली है कि उनमे सत्य की अभिव्यक्त हुई है।उपनिषदो को दूरूह उक्तियो को कबीर ने बडी सरलतम भाषा मे व्यक्त किया है।-- पानी ही थे हिम भया हिम हवे गया विलाय , जो कुछ था सोई भया अब कुछ कहा न जाय॥ तथा हेरत हेरत हे सखी रहा कबीर हेराय । बूंद समान समुद्र में सोकत हेरा जाय॥ मे तत्व और रहस्य को अभिव्यक्ति हुई है।निम्नलिखित दो साखियो मे कबीर का अभिव्यजना कौशल दर्शनीय है:-- पिय का मारग सुगम है तेरा भजन अचेड़ा। नाच न जानै बापुरी कहॅ आगना टेढ़ा॥ तथा पिय का मारग कठिन है खाँडा हो जैसा । नाचत निकसी बापुरी फिर घूघॅट कैसा ॥ तथा किंचित शब्दो के हेर-फेर से साखियो के प्रतिपाथ मे कितना अन्तर पड गया है।कबीर प्रमुख रूप से अनाचारो के विरूद्ध आवाज़ उठाने वाले दार्शनिक कवि थे।उनकी अभिव्यजना शैली की शक्तिमता"चेतावनो"प्रमुग मे द्र्ष्टिगत होती है। दो एक उध्दरणो से कथन सपष्ट हो जाएगा-- आछे दिन पाछे पाछे गए, गुरु से फिता न हेत। अब पछताया क्या करे जब चिड़िया चुग गइ खेत॥ तथा मनुष ज्न्म दुर्लभ अहें होय न बारम्वार । तरवर से पत्ता झरे ,घहुरि न लागै डार ॥ सारांश यह कि कवि कबीर कि अभिव्यंजना भक्ति उनके,ध्पनिरव के जनु-कूल तथा मनुष्य है।जिस प्रकार उसकी द़ृष्टि मे तीक्षगुना तथा तीव्रता पी टमी [ ३६ ]प्रकार से उनकी अभिव्यंजना प्रतिभा भी प्रखर थी।अन्य सन्तो की वानियो मे कबीर की रचनाएँ मिलाकर रख दीजिए परन्तु विशिष्टता के कारण वे कबीर की रचनाएँ कहलाकर रहेगी।निम्नलिखित साखी से उनके व्यक्तित्व की किंचित थाह और अभिव्यंजना शक्ति का लेश परिचय मिल जायगा।

खुली खेलो संसार में,बांधि न सकै कोय। घाट जगाती क्या करे,सिर पर पोट न होय॥

यहाँ पर जिस पोठ की ओर कबीर का संकेत है वह दुष्कमं की पोठ है और खुली खेलो से तात्पयं है सच्चाई या ईमानदारी का व्यवहार ।कबीर ने उपनिषदो की परम्परा से ब्रह्म का वर्णन बडी सरल शैली मे किया है-

जाके मुँह माथा ही नहीं रूपक रूप । पुहुपवास से पतला ऐसा तत अनूप॥

जाति पांति की निन्दा करते हुए बडे सक्षेप मे कबीर ने तत्व की बात कह दी है-

एक बूंद एकै मलमूतर ,एक चाँम एक गूदा। एक जाँति थे सब उतपना कौन बाहम्न कान सुदा॥

तथा

एकै पवन एक ही पानी एक जोति संसारा। एक ही खाक घड़े सब भाँड,एक ही सिरजन हारा॥ ब्रहा,जीव ,माया आदि के रहस्यो को भी कबीर ने प्रभावशाली एवं स्पष्ट शैली मे व्यक्त कर दिया है।कबीर की अभिव्यंजना शक्ति बेजोड़ थी।

कबीर के काव्य मे बुद्धि तत्व की प्रधानता है। पाश्चात्य काव्य शास्त्रियो के अनुसार काव्य के लिए बौद्धिकता या बुद्धि - तत्व आवश्यक है। जिस रचना मे बुद्धि तत्व विद्यमान माना जाता है वह रचना स्यायो महत्व को प्राप्त करती है। ऊपर कहा जा चुका है कि कबीर के काव्य मे इस तत्व की प्रधानता है। कबीर का बुद्धि तत्व सरस तथा रोचक है उसमे पुष्कता या नीरसता का स्पशं नही होने पाया।निश्चय ही आत्मा,परमात्मा,जीव,जगत आदि नीरस विपय हैं परन्तु कबीर ने इन बौद्धिक समस्याओ का समाधान करने के लिए सरल भाषा,भावमयी अनुभूतियो तथा मधुर कल्पनादि का सहारा लिया है। बात यह है कि कबीर अपने प्रतिपाद्य को जनता के उस स्तर के लिए प्रस्तुत करने जा रह्ं थे जो निरक्षर था, अशिक्षित [ ३७ ] (३७) था। ऐसे वर्ग के लिए बौध्दिक समस्याओ को रोचक एवं सरल ढंग से प्रस्तुत करना ही उचित था। कबीर ने यही किया। उपर्युक्त समस्याओ तथा विषयो को लेकर कबीर ने अनेकानेक ऐसे पदो की रचना की है जो अपनी मौलिकता को खोये बिना रोचकता के रंग मे अनुरंजित हैं। बुद्धितत्व प्रधान होते हुए भी कबीर वादो के पीछे नही लगे। केशवदास के समान न उन्होने अपने को भक्त कवि प्रमाणित करने के लिये विज्ञान गीता की रचना की न देव के समान भक्ति के रग-पुंह मे पगडी रगने की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उनकी दार्शनिक तत्व विवेचना मे ह्रदय का योग है। सत्य यह है कि कबीर की तुलना मे इतनी सरसता, सरलता तथा भाव-पूर्ण शैली मे दार्शनिक एव आध्यात्मिक तत्वो की विवेचना और अभिव्यंजना और कोई कवि कर ही न सका। कबीर ने बुद्धि को तर्कपूर्ण कसौटी पर भावना को कसा। प्राचीन परम्पराओ, बहुदेवोपासना, मूर्ति पूजा, जप, तप, तिलक, माला आदि की उपयोगिता पर कबीर ने तर्कपूर्ण शैली मे विचार किया। कबीर की निम्न लिखित साखियो पर ध्यान दीजिए-

                                 (१)

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी। फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तत कथा गियानी॥

                                 (२)

हेरत हेरत हे सखी रहा कबीर हेराइ। समुन्द समाना बूंद में सो कत हेरा जाइ॥

                                 (३)

झल उठी झोली जली, खपरा फूटिम फूति। जोगी था सो रमि गया आसिणि रही विभूति॥

                                 (४)

जल भर कुम्भ जलै बिच परिया बाहर भीतर सोई। तको नाम कहन को नांहीं दूजा भोखा होई॥

                                 (५)

पंच तत्व का पुतरा जगति, रची में कीव। मैं तोहि पूछो पंडिता, शब्द बड़ा की जीव॥

     कबीर के काव्य में बौद्धिक तत्व किन कोटी का है इन उदाहरणो से स्पष्ट हो जायगा। स्मरण रखना चाहिए इस साहित्य की रचना निम्न् वर्गो के लिए हुई थी जो साहित्यकारो को सुवेदना की परिधि से सदैव ही वंचित रहे हैं। ऐसे ही व्यक्तियो से कबीर कहते हैं कि :[ ३८ ]                                   (३८)
                     मूँड़ मुँडाए हरि मिलै तो कौन न लेय मुड़ाय।
                     बार बार के मूड़ते भेड़ न बैकुन्ठ जाय॥
बुद्धितत्व के सम्बन्ध मे दो उध्दरण देकर दूसरे प्रसंग मे कबीर के काव्य पर विचार करेंगे:-
                                  (१)
                     हरती चढ़िए ज्ञान को, सहज ढुलीचा डारि।
                     स्वान रूप संसार है भूकन दे भक्त मारि॥
                                  (२)
                     पाणी केरा पृतला राखा पवन संवारि।
                     नांनां वाणी बोलिया, ज्योति घरी करतारि॥
बुद्धितत्व के समान कबीर के काव्य मे भावना-तत्व की भी प्रचुरता है। यदि कबीर कोरे बुध्दिवादी होते तो उनकी रचनाओ मे भावना पक्ष का अभाव होता। कबीर के काव्य मे जो रसात्मकता है उसका प्रमुख कारण भावना-तत्व का विद्यमान होना है। श्रृंगार रस की जो निर्मल धारा कबीर मे उपलब्ध होती है वह भी प्रस्तुत कथन की पुष्टि करती है। कबीर की रचनाओ मे उपलब्ध यह श्रृंगार रस और भावना तत्व मानव को वासना के पाप पंक से निकाल कर निर्मलता के सच्चे रूप के दर्शन कराने मे सहायक है। इस भावना मे सत्य की अनुभूति और ज्ञान की गम्भीरता समन्वित है। उदाहरणथं यहाँ कतिपय साखियॉं उध्द़ृत की जाती है। इनमे भावनातत्व की गम्भीरता देखिए:-
                                  (१)
                        नैनों की कोठरी पुतरी पलंग बिछाय।
                    पलकों की चिक डारि कै पिय को लिया रिझाय॥
                                  (२)
                     प्रीतम को पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस।
                     तन में, मन में, नैन में,ताको कहाँ संदेस॥
                                  (३)
                     प्रीति जो लागी घुल गई, पैठि गई मन माँहि।
                     रोम रोम पिउ पिउ करै मुख की सरधा नाहिं॥
                                  (४)
                     प्रेम छिपाया ना छिपै जा घट परगट होय।
                     जो पैं मुख बौलै नहीं तो नैन देत हैं रोय॥ [ ३९ ]                                    (३६)

कबीर की साखियाँं, पदो एवं अन्य रचनाओ से ऐसी ही न जाने कितनी पंक्तियॉं निकाली जा सकती हैं जो भावना - तत्व से ओत - प्रोत है । दुलहिन गावह मगल चार ' इसी कोटि का पद है । सबकी आलोचना करने वाला , सबको डाट फटकार कर दोष निदंशन करने वाला कबीर , फक्कड , अवखड़ , मस्त कबीर इतना रससिक्त होगा, यह आश्चर्य की बात प्रतीत होती है। इतनी बाह्य कठोरता के बावजूद भी कबीर अन्तस बडा कोमल था इसलिए वह कहता है :-

                     (१)

सन घट रमता सांइया सुनी सेज न कोय॥

                     (२)

लागी लगन छूटै नहीं जीभ चौच जरि जाय। मीठा कहा अंगार में जाहि चकोर चबाय॥

                     (३)

कहै कबीर मुख कहा न जाई , ना कागद पर अंक चढ़ाई। मानो मुंगेसम गुड़ खाई, कैसे बचन उचारा हो ॥

संगीत मे राग का जो महत्व और उपयोगिता होती है वही काव्य जगत के अन्तर्गत कल्पना का स्थान है। शब्द जगत मे राग जिस दायित्व की पूर्ति करता है।उसी दायित्व को भाव जगत मे कल्पना का उदभव , विधान एवं विकास होता है। कल्पना - शक्ति एवं प्रकार का सौन्दर्य - वोधात्मक एव चेतनता से सम्पन्न व्यापार है । कल्पना काव्य सौन्दर्य के विकास मे विशेष सहायक होनी है । कवि के सौन्दर्य त्रोव को शक्ति देने का बहुत कुछ श्रेय इसी कल्पना को है । कल्पना के समागत से कविता रुचिर मनोवेगो के हेतु रमणीयता का सजंन करती है। कल्पना का क्षेत्र व्यापक , व्यापार अद्भभुत तथा कार्य महत्वपूर्ण है। सस्कृत के आचर्यों ने कल्पना के स्थान पर पक्ति का प्रतिभा की स्थितप्रतिपादन किया है । आचार्य मम्मट ने अपने ' का व्यप्रकान ' मे व्यक्ति को विशेष सस्कारो के फल्स्त्ररुप कविता वीज रूप नमुरपन्न माना है। [ ४० ]उद्भभावना है । उनकी कल्पनाशक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमे व्यावहारिकता तथा कलात्मकता का सुन्दर सभन्वय है।सन्तो ने भाव या वण्यं विषय को ही काव्य की आत्मा या सब कुछ मानकर वाह्यावरगा एवं कलात्मक उपकरगो को जुटाने का प्रयास नही किया है। उन्होने भावो की अभिव्यक्ति के लिए जिन-जिन उपकरगो को स्वीकार किया है वे सब अत्यन्त स्वाभाविक एवं सहज हैं । कबीर एवं अन्य सन्तो ने कल्पना को काव्य मे इस लिए स्थान दिया कि उनका वण्यंविषय अविकाधिक प्रभावशाली, स्पष्ट तथा चमत्कारपूरगं बन सके !अब यहाँ पर कबीर की कविता से कल्पना के सम्बन्ध मे कुछ उद्भरग देंगे :-

                          (१)
        
            गुरु तुम्हारा शिष कुम्भ है गढ़ि-गढ़ि काढै खोट ।
             श्रन्तर हाथ सहार दे बाहर बाहै चोट  ॥
                           (२)
            मन ताजी चेतन चढ़ै लहौकी करै लगाम ।
            सबद गुरु का ताजाना कोई पहुँचे साधु सुजाना ॥
                           (३)
           हरिहै खांड रेत महि बिखरी हाथी चुनि ना जाय ।
           कहि कबीर  गुरु भली बुझाई किटी होई के खाय॥
                          (४)
            हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास । 
            सबका जरता देखिकर भये कबीर उदास ॥
                         (५)
            पिया ऊँची रे श्रटरिया तोरी देखन चली!
             ऊँची श्रटरिया जरदकिनरिया , लागी नाम कि डोरी ।
             चाँद सुरज सम दियना वरतु है ता भिचु भुल डगरीया।
            श्राठ मर्रातिव द्स दरवाजा नौ में लागी किवरिया ।
            खिरकी वेंठ गोरी चितवन लागी,उपरा झपँं भोपरिया ॥

इन पांच उद्भरगो की तेरह पंत्तियो मे कबीर की कल्पनाशक्ति, उस कल्पानाशति को विमिघसा और शक्तिमता सरलता के साथ मूल्यांकन किया जा साकता है। सतगुरु को अंग माया को अंग , चेनावनो को अंग आदि प्रसंगो मे कवि कल्पनाशक्ति का वैभव दशंतीय है । शब्द, साखी और पदो में समान रुप मे कबीर की। [ ४१ ] (४१) कल्पना शक्ति बिखरी पडी हुई है । उसे 'कीटी होइ कै' खाना और खोजना पडेगा। कबीर की कल्पना का उत्कषं उन पक्तियो मे विशेष रुचिकर है जहां वे संसार का वगांन करते है ।


               सुगवा पिंजरवा छोरि कर भागा ॥
                इस पिंजरे में दस दरवाजा , दसौ दरवाजौ किवरवा लागा ।
              अखियन सेती नीर वहन लाग्यौ 
            अब कस नाही तुं बोलत अभागा 
                कह्त कबीर सुना भाई साधो,उड़गे हसं टुटि गया तागा ।

तथा

            कौन ठगचा नगारिया लूट्ल हो।
            सतगुरु है रंगरेज चुनरि मोरी रगं डारी
            ह सा करो नाम नौकरी
            आई गवनवां की सारी,
            उमिरि अवहि् मोरी बोरी

आदि कल्पना के पारखी दाव्र् विशेष रुप से पठनीय है । इन कबीर की कल्पना शक्ति की विविघिता और स्पष्टता दिखाई पड़ती है । कबीर ने कल्पना के चुनाव मे औचित्य पर भो ध्यान दिया है यह उनकी मनोवैज्ञानिकता का परिचायक है। किसी वस्तु या व्यापार का वएंग या कल्पना करते समय प्रयास एव कलित के साथ उसके साम्य तथा सम्बन्ध को ध्यान मे रखना नितान्त आवश्यक है । प्रस्तुत एवं अप्रस्तुत के साम्य पर ही कल्पना का औचित्य निभँर माना जाता है! कबीर तथा अन्य सन्तो ने इस वात पर विशेष उपान दिया है। वे न हवाई किलो के निर्माण मे विश्वास करते थे,न फाल्तू वानो का प्रतिपादन हो करते थे ! निम्नलिखित उदरगो से इस कथन को पुष्टि होगी ---

                             (१)
       बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजुर।
       पंथी को लाया नहि फज्ञ लागे अति दूर॥ [ ४२ ]                ( ४२ )
                 ( २ )

सौना सज्जन साधु जन,टूटि जुरै सो बार ।

दुर्जन कुम्भ कुंमार का एकै धका दरार ॥

                 ( ३ )

मूरख से क्या बोलिये सठ से कहाँ बसाय ।

पाहन में क्या मारिये चोखा ती र नसाय ॥

                 ( ४ )
लिखा लिखी की है नही देखा देखि की बात ।

दूल्हा दुलहन मिलि गये फिकी पडी बरात ॥

   इन साखियो मे कल्पना औचित्यपूर्ण प्रतीत होती है ।
  आचायँ राम्चन्द्र शुक्ल ने भाव समन्वित कल्पना को सच्ची कवि कल्पना माना है । सच्ची कल्पना वही है जो अन्तस के शुद्ध भावो को जाग्रुत कर दे तथा तत्सम्वन्धित भावो को पूगांतथा व्यंञित कर दे । सन्तो कि कल्पना अनुभुति और भावुकता के आधार पर सजित है, इसलिए वह प्रभावित करने की शक्ति और भाद-व्यंजकता से सम्पन्न है । उनकी कल्पना और वण्यं विषय जन जीदन से ग्रहणा किए गए है ।इसलिए उनमे भाव व्यजक्ता है । कबीर की भाव व्यंजकपूर्ण कतिपय उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं ।
 
                 ( १ ) 
                 

माली श्रावत देखकर कलियन करी पुकार ।

फुले फुले चुन लिए काल्हि हमारी बार ॥

                 ( २ ) 
पानी केरी बुढबुहबुढा श्रस मानुस की जात । 

देखत ही छिप जायगा ज्यों तारा परभात ॥

साहि्व तुमहि दयाल हौ , तुम लगि मेरी दोर ।

जैसे काग जहाज को , सूभे श्रोर न ठौर ॥

इन साखियो मे नश्वरता तथा आत्म समर्पण का भाव व्यजित हो उठता है । यही है कवि की कल्पना की सफलता । कबीर की कल्पना शिक्षित अशिक्षित को प्रभावित करने मे समर्थ है ।

मानव के ह्रुदय एव मस्तिप्क मे ऐसी अनेक बाते जन्म प्रहण करती रहती है । जिनकी अभिव्यक्ति वह सामान्यता व्यवहत भाषा के मध्यम से नही कर सकता है । ऐसी ह्र्दयानुभुति विम्त्रो या संकेतो द्वारा भी नहीं अभिव्यक्त्त हो सकती है । इसी [ ४३ ] ( ४३ )

लिए सूक्ष्म एवं अध्दं स्पष्ट भावो की अभिव्यक्ति के लिए मानव ने प्रतीको की कल्पना की ओर उन्हे जन्म दिया । विद्वानो का कथन है कि मानव सभ्यता के विकास मे प्रतीको का उतना ही योग है जितना हमारे जीवन के विकास मे वायु   या प्रकाश का । प्रतीको का जन्म उद्भव विकास यथाथं वस्थुओ के आधार पर होता है । काल्पनिक वस्तुएं या वे वस्तुए जो निराकार है , उन्हे प्रतीको के माध्यम से नही व्यक्त किया जा सकता है और यदि वे मनाव की विकसित चिंतन शक्ति के आधार पर व्यक्त भी कर डाली गई तो सत्य से दूर , यथार्थ से परे और प्रभावित करने की शक्ति से विहीन होगी । प्रतीको क जन्म  जगत तथा जीवन की अर्थ भूमि से होती है । जीवन के साहचर्य से प्रतीको के अर्थ और प्रतीक का महत्व बढता है । माननीय अनुभवो से निक्ट रहकर प्रतीको मे सजीवता, अर्थ व्यक्तित्व की स्थापना होती है ।
     
      यथार्थ रूप से समक्ष विद्यमान रहने वाले पदार्थों के अतिरिक्त प्रत्यक्ष जगत मे विद्यमान रहने वाले अनेक पदार्थ हैं, जो इन्द्रियगत नही होते हैं फिर भी उनकी कल्पना तक विश्वास, एवं अनुमान द्वारा कर ली जाती है । आत्मा और परमात्मा ऐसे ही विषय है। इनके अगोचर होने के कारण विभिन्न मतवादियो मे भांति-भांति की घारगाएं प्रचलित है। ब्रह्मविद्या के विशेपज्ञ आत्मा को परमात्मा का अश मानते है पर मनोविज्ञान स्वय परमत्मा का अत्मा की सत्ता पर सिध्द करना चहता ह। इनका वरगंन करना हमारी भाषा और सामथ्यं के बाहर है। सन्तो के इन अकथनीय विषयो को काल्पनिक प्रतीको के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। प्रतीक  केवल साहित्य की ही शक्ति नही होते है, वरन् वे जातीय एव सास्कृतिक अनुभव की शक्ति है। हर पीढी आवश्यकतावश नये प्रतीको को गढ लेती है और प्रचीन प्रतीको को नए अर्थ और दृष्टि से देखती है। प्रतीक अपने व्यक्तित्व मे अनेक प्रकार के रहस्यो को समाहित रखता है। उनका कर्तव्य है उन रहस्यो को मधुर ढ्ग से व्यक्त कर देना। प्रतीक भावुकता तथा अनेक प्रकार के ज्ञान के सार तत्व है। प्रतीक रहस्य नही है न रहस्य प्रतीक बन सकते है फिर भी दोनो मे अविच्छिन्न सम्बन्ध नही है। प्रतीको के मध्यम से निरपेक्ष सत्य की। प्रावृति को रहस्यवाद मानना चाहिए। रहस्यवाद प्रत्यक्ष जीवन की अन्त्मूर्त चेतना को प्राप्त करना चाहता है और प्रतीक  उसका आभास मात्र देने का प्रयान करता है । प्रतीक प्रणाली बडी प्रचीन है । दादांनिक विचारो की व्यजना के लिए यदिक ऋपियो ने भी प्रतीको को माध्यम बनाया था । ऋपियो ने उपनिषदो मे ब्रह्म का वरगंन, नूर्य, चन्द्रादि प्रतीको के माध्यम से किया था । गुष्ट्कोपनिषद मे भी एक सत्य पर प्रतीको के माध्यम से विचार स्पष्ट करते हुए कहा गया है 'द्वसुपर्णा‌ सयुजा मरा, या ममनिचदा परिस्वजति' इसी परम्परा मे सन्तो ने भी प्रतीको के माध्यम से अपना रहस्यानुभुति की अभिव्यक्ति [ ४४ ]की है । संत् साहित्य मे दाम्पत्य एव्ं वात्सल्य प्रतीको का प्रचुर प्रयोग हुआ है। कभी-कभी प्रतीकात्मक पदो का अर्थ स्पष्ट करने के लिए सन्तो ने पंडित, पन्ड, मुल्ले

और मौलवियो तक को चुनौती दे डाली है । कबीर का तो विश्वास है कि जो उनके प्रतीको को नही समझता है उससे वार्तालाप करने से कोई लाभ ही नही है :-

      जो कोई समझे सैन में, तासे कहिये बैन ।
      सैन बैन समझै नहीं, तासे कहुनहि कहन ॥
         सन्तबानी सग्रह भाग १, पृष्ट ४५१३०)
    कबीर की कविता मे प्रतीको का बाहुल्य है। कबीर के दास्ग्र भाव के प्रतीको मे दास तथा ब्रह्मा की एकात्मकता का भाव बडा आकर्षक बन पडा है:-
    मै गुलाम मोहि बेचि गुंसाई। तन मन धन मेरा राम जी            के ताई॥
    आनि कबीरा घाट उतारा। सोई गाहक सोई बेंचन हारा॥
    वेवें राम तो राखै कौन। राखै राम तो वेचै हारा॥
    कहै कबीर मैं तन मन पारया। साहिब अपना छिन न बिसराया॥
      इसी प्रकार कबीर के साहित्य मे वात्सल्य प्रतीको का बाहुल्य है :-                                  हरि जननी मैं बालक तेरा, काहे न अवगुन बकसहु मेरा।   सुत अपराध करै दिन केते, जननी के चित रहैन तेते॥    कर गहि केस करै जो घाता, तऊ न तो उतारै माता।

कहै कबीर एक बुद्धि बिचारी, बालक दुखी दुखी महतारी॥ कबीर ने दाम्पत्य प्रतीको की भी रचना की है। इस कोटि के प्रतीक बढे रसमतय और मधुर है। उदाहरणार्थ-

      दुलहिन गावहु मंगलचार, हम धरि आयो हो राजा राम भरतार ।
      तन रति कर मैं मन रति करिहू पंच तत वराता।
      राम देव मोहि व्याहन आये मैं जोवन मदमाती॥
      सरीर सरोवर वेदी करिहू, ब्रम्हा वेद उचार।
      रामदेव संग भावँरि लेहू, धनि धनि भाग हमारा॥
      सुर तेतिस कोटिक आये मुनिवर सहज अठासी।
      कहै कबीर हम व्याहि चलै है, पुरुष एक अविनासी ॥ [ ४५ ]
                          ( ४५ )
   कबीर की रचनाओ मे साकेतिक प्रतीक,'पारिभापिक प्रतीक,संख्यामूलक
 प्रतीक, रुपात्मक प्रतीक तथा प्रतीतात्मक उल्टवासियो के सुन्दर उदाहरण मिलते हैं। प्रतीकात्मक उल्टवासियो की रचना करने मे कबीर बडे कुशल थे। प्रतीकात्मक उल्टवासियो के भी दो भेद है-प्रथम वे जो प्रतीक प्रधान है। दवितीय रुपक प्रधान- रुपक प्रधान मे प्रतीक गौण रह्ता है । उदाहरणार्थ रुपक प्रधान उल्टवासी देखे।
       हरि के पारे बडे पकाये, जनि जारे तिनि खाये।
       ज्ञान अचेत फिरै नर लोई, ताते जनमि-जनमि डहकाये॥
       घौल मंदलिया वैलरवाबी, कउवा ताल वजावै।
       पहिर चोलना गदहा नाचै, भैसा निरति करावै॥
       स्यंध बैठा पान कतरै, मूस गिलौरा लावै।
       उदरी बपुरी मंगल गावै, कछु एक आनन्द सुनावै ॥
       कहै कबीर सुनहु रे सन्तो, गनरी परवत खवा ।
       चकवा वेसि अंगारे निगलै, संमद अकासे धावा ॥
   प्रतीक प्रधान उल्टवासी

         कैसे नगर करौ कुद्वारी, चंचल पुरिप विचक्कन नारी ।
         बैल बियाह गाय भैइ बाँक्भ, बछरा दूहे तीन्यू सांक्भ॥
         मकडी घर भावी छटिहारी, मास पसारि चोल्ह रखवारी।
         मूसा केवट नाम बिलइया, मोडक सोवै साप पहरिया ।
         नित उठि ख्याल सिंघ सू जूक्भे, कहै कबीर कोई बिरला    बृक्भे ॥
       कबीर की प्रतीक योजना के संब्न्ध मे उपयुक्त उव्दगरण अनुमान लडाया जा सकता है। वास्तव मे कबीर साहित्य सुन्दर प्रतीक योजना से भरा पडा है। पग-पग पर कबीर ने सुन्दर प्रतीको के माध्यम से अकथनीय या कठिनाई से वणित होने वाले अनुभव को व्यक्त क्रर दिया है। प्रतीक सच्चे रहस्यवादी को वटी भारी शक्ति होती है। इसी प्रतीक के माध्यम से वह ह्रदय के भार को कम करता है। कबीर इसके अपवादे नही थे। कबीर के प्रतीक (उल्टवासियो के अतिरिक्त) कही दुर्बोध और फठिन नही है। उनके प्रतीक भाव को ग्रहण करने मे सहायक सह्योग देने वाले है। अपढ जनता के लिये कबीर के ये प्रतीक और भी

          १-कबीर ग्रन्थावनी पृ० =४ पद ६=।
          २-वही परयाको अग पद १०
          ३-संत कबीर पृ० २३८ राग भैरव पद ६७ । [ ४६ ]                              (४६)

अधिक वरदान स्वरूप है । कबीर के प्रतीको मे प्रभावसाम्य के काराए सध्यश भावना जाग्रत होती है। वे पाठकों के भावों और विचारो को भी प्रबुध्द करने मे सहायक है कबीर के प्रतीकों की ये विशेषताएं काव्य रचना की क्षमता को प्रमारिग्त करती है ।

        काव्य के दो पक्ष होते है-भाव और विभाव। ये उभन अन्योन्यश्रित है। अप्रस्तुत योजना या विभाव पक्ष काव्य का अभिन्न अंग है काव्य से कलात्मकता एवं रमर्गीयता का सचार करने का समस्त श्रेय और दायित्व अप्रस्तुत योजना पर है। कवि के हेतु अप्रस्तुत योजना की शक्ति प्रकृति का बढा भारी वरदान है। सभी कवियो को यह प्रतिभा समान रूप से नही सम्प्राप्त होती है। उपमा के क्षेत्र मे सभी कालिदास की प्रतिव्दव्दिंता नहीं कर सकते है। इस प्रकार कि प्रतिभा का मूल कारए है वासना और संस्कार। द्ण्डी का अभिमत है कि अद्भुत प्रतिभपूर्व  वासनागुरानुबन्धी अर्थात कवि की प्रतिभा मे पूर्व वासना का गुरए विध्यामान रहता है। वारभट्ट ने प्रतिभा को ही काव्य की उत्पत्ति का कारए मानते हुए कहा है प्रतिभा कारएन्तिस्य। हेमच्न्द्र ने भी कहा है कि-
           प्रतिभैवच     कवीना      काव्यकरए      कारएम।
           व्युत्पत्यभ्यासी तस्या एव संस्कारकारकौ न तु काव्य हेतु॥
    कवि के व्यतित्व मे अप्रत्यक्ष रूप से पूपंवर्ती संस्कारो के रूप मे अद्भुत काव्य-प्रतिभा विध्यामान रहती है। यह प्रतिभा कवियो मे अनेक रूपो से पल्ल्वित होती है। अप्रस्तुत को सम्यक् एवं प्रभावशाली योजना नरक कायं नही है। इसके लिए कवि मे अनेक विशेषताओ का होना परमावश्यक है। यक आवश्यक है कि वह लोकशास्त्र के तत्वो सुश्र्म ज्ञाता हो। कवि मे जितनी अधिक सह्रदयता तथा अन्द-

दृष्टि होगी,वह जितना ही अधिक अनुभवी होगा उतनी ही सुन्दर उसको अप्रस्तुत योजना होगी और वह अप्रस्तुत योजना हृदयग्राही तथा मार्मिक भी होगी। इस सब के लिए यह भी आवश्यक है कि कवि अपने हृदय मे सवेदनशीलता को जाग्रत करे तथा जीवन एवं प्रकृति का सूक्ष्म पर्यालोचक बने। यहा पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि यधपि कबीर शास्त्र के ज्ञाता,काव्य शास्त्र के आचार्य और विव्दान नही थे। परन्तु दण्डो ने जिसे प्रतिभा तथा हेमच्न्द्र ने जिसे संस्कार रूप मे काव्य कौशल कहा है वह कबीर मे प्रचुर रूप मे विध्यमान था। इनके अतिरिक्त कबीर की दुरदर्शिता, रसज्ञता, सहृदयता तथा सवेदनशीलता ने उनके काव्य में अप्रत्यक्ष रूप से विभाग पक्ष को सुन्दर और प्रभावशाली बना दिया था। कबीर के लिए काव्य रचना एक साधन था साध्य नहीं ।उनकी कविता मे हृदय की सत्यता का चित्रए हुआ है।सत्य जीवन और अनुभव की कलात्मक अभिव्यंजना करने के [ ४७ ] ( ४७ ) पीछे कबीर न काव्य के बहिरग की और ध्यान नही दिया। सन्त कबीर के साहित्य मे वह सतकंता एवं सावधानी नही उपलब्ध होती है जो लिखित साहित्य के लिए अपेक्षित है ।कबीर का काव्यादर्श इस बात का पोषक है कि वे कवि-कमं को निन्दनीय मानते है। काव्यसौन्दर्य की अभिवृध्दि के कृक्षिम सावनो,छ्न्द,अलंकारादि कीशोर उनकी हष्टि नही गई । इसीलिए उन्के साहित्य पर अलकारो का मुलम्मा चढाने का प्रयत्न नही किया गया। कबीर के साहित्य मे जो अलंकार उपलब्द है जिनकी योजना कवी प्रतिभा अज्ञान रूप से भावो को प्रभाव पूएं बनाने के लिये किया करती है। अन्य सन्तो के काव्य मे भी उपमा, रूपक तथा अनुपासादि अलकारो की प्रचुरता का यही एक मात्र कारण है। रहस्यहष्टा इन सन्तो के रूपक तथा उपमाये दैनिक जीवन से सम्बन्ध रखती है। उन्हे प्रतीकात्मक मूतंभावो के हेतु कही दूर जाने की आवश्कता नही। कबीर के काव्य मे रूपक,१ उपमा,२ हष्टात,३ अद्गुण ४, स्वाभावीक्ति ५, अतिश्योक्ति ६, सहोक्ति ७,विशेषोक्ति ८, अन्योक्ति,९ लोकोकति ,१० उदान्त ११,विभावना,१२ विरोधभास,१३ व्यक्तिरेक,१४ विचिश्र,१५


१--कबीर पदावली पृ० ५८,५६,६१ तथा कबीर ग्रन्थावली पृ०,८७

  ६३।

२--सन्त्वानी सग्रह भाग १,पृ०,३,६,८,६,११,१३,१५,१७,१०,

  २१,२पू,२६,२६,३० तथा प्राय्ः प्रत्येक पुष्ट ।

३--वही पू० ६,१३,२४,२६,३१। ४--वही पू० ३१। ५--वही पू० २३,२४,२५,२६। ६--प्रहावारणी सग्रह भान १,पू० ५। ७-- " " ह० २६। ८--वही पू० १,३,५,१७। ९--वही पू० १५१। १०--वही पू० ६-१०। ११--वही पू० नाग १ पू० १। १२--कबीर ग्रन्थावली पू० १३६-१८०। १३--वही पू० १३,८६। १४--स० २१० स० भाग १,पू० २। १५--कबीर ग्रन्थावली पू० १४१ [ ४८ ] ( ४५ ) विषम,१ अनन्वय २, असंगति,३ काव्यलिंग,४ श्लेप,५ यमक,६ अनुप्रास ७ आदि के सुन्दर उदाहरण मिलते हैं। कबीर के काव्य मे प्रथुत्त अलंकारो मे सवंत्र औचित्य प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ यहं पर कतिपय साखियाँ उध्दृत की जाती है:--

                          ( १  )
          मनुष जन्म दुर्लभ श्रहै, होय न बारम्बार।
          तरुवर से पत्ता भरै, बहुरि न लागौ डार॥
                         (२)
        पूजा सेवा नेम ब्रत गुडियन का सा खेल।
        जबलगि पिउपरिचय नहीं, तब लगि संसय मेल॥
                    (३)
         विरह कमण्डल कर लिये,बैरागी दोउ नैन।
         मागे दरस मधुकरी छ्के रहै दिन रैन॥
      कबीर की उप्रस्तुत योजना पुण्ंतया गुण व्यापार, फल, रूप साम्य पर आधारित है। यह औचित्य उनकी उलटवासी साहित्य मे भी उपलब्ध होता है। अप्रस्तुत तोजना मे यर्थाथता का होना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव हो सकता जब कि सादृश्य स्वरूप अधिक और भावोत्तेजक हो। यदि अप्रस्तुत विधान स्वरूप अधिक मात्र है, तो वहां सौन्दर्य सृष्टि ही होती है। भावानुकूल साम्य योजना यथार्थ कही जाती है। कबीर के काव्य मे उपलब्ध अप्रस्तुत योजना यथार्थत से उदाहरणार्थ:-
                  ( १)
         यह तन कांचा कुम्भ है लिया फिरै का साथि।
         ढबका लागा फूटि गया कछु न श्राया हाथि।

  १-वही पृ० ६१।
  २-स० बा० सा० भाग १ पृ० १।
  ३-कबीर ग्रन्थावली पृ० ११, ५६।
  ४-वही पृ० ६।
  ५- स० वा० स० भाग १ पृ० १२।
  ६- वही पृ० १-५०।
  ७- वही पृ० १, ७', १४, ३३। [ ४९ ]                          ( ४६ )
                         (  २ )
          पानी केरा बुलबुला श्रस मानुस ई जाति। 
          देखत ही छिप जायगी ज्यों तारे परभाति॥
                         ( ३ )
           हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास। 
           सब जग जरता देखि करि भये कबीर उदास॥
     इन साखियों मे न्श्वरता का भाब अनेक अप्रस्तुत विवानी व्दारा व्यत्ति किया है। इनके पढने  से ससांर की नश्वरता के प्रति भावोनेजन के साथ ही स्वरूप वोध मे भी सहायता मिल्ती है। भावो की सुचारु व्यंजना के लिये ही अप्रस्तुत योजना की जाती है। भाव-व्यजना मे भी कवि की पटुता प्रतिविम्बित होती है। जो कवि जितने सुन्दर भावो की व्यंजना कर सकता है, वह उतना ही अधीक पाठको को प्रभावित एवं आल्हादित कर पाता है। अत: आवश्यक है कि भावो मे ये नर्व नता हो और सुचारुता हो। इस्के लिये प्रबल अनुभूति की अपेक्षा है। संतो और विशप-तया कबीर की अनुभूति बडी गहन थी। अनुभूति की गहनता मे पहुँचकर ही उन्होने रूपको एवं अन्योक्तियो की रचना की है। भावो की सुन्दर व्यंजना के लिये निम्न-लिखित पद पठनिय है।
            सतगुरु है रंगरेज चुनर मेरी रंगि डारी।
            स्याही रंग छुड़ाइ केरे, दियो मंजीठा रंग।
            धोये से छुतै नहीं रे, दिन दिन होत सुरंग॥
            भाव के कुण्ड नेह के जन में प्रेम रंग देई बोर।
            चसकी चास लगाइ केरे, खूब रगी क्भक्भोर ।।
            सतगुरु ने चुनरी रगी रे, सतगुरु चतुर सुज्ञान।
            सब कुछ उन पर वार दू रे, तन मन धन श्रो प्रान॥
            यह कबीर रंगरेज गुरु रे, भुक्भ पर हुए दयाल। 
            सीतल चुनरी श्रोढ़ि के रे , भइहौ  मगन निहाल॥
     इसी प्रकार कबीर के पद 'मन फूला पूला फिरे जगत मे कैसा नाता रे' तथा 'हंसा करो नाम नौकरी' भावा व्यजकना की दृष्टि से उत्तम पद है। कबीर के काव्य मे अप्रस्तुत विधान की ध्य्नात्मिकता बडी प्रभाव्शाली है। ध्व्न्यत्मक अप्रम्नुन योजना मामिक मानो गई है। 'नन फृला फृला फिरे' मे किननी सुन्दर ध्वन्यात्मक है। कबीर के अप्रस्तुत विधान मे व्यग्यो को बहुत  सथान मिला है। ञनृचित न होगा 
             क० सा० फा०--४ [ ५० ]                             (५०)

यदि कहा जाय कि कबीर इस दिशा मे सिद्धहस्त थे | उनके व्यंग बडे मार्मिक और प्रभावशाली होते हैं | उदाहणार्थ यहाँ तीन साखियाँ दी जाती है-

                           (१)
               पण्डित केरी पोथिया ज्यों तीतर का ज्ञान |
              ओरन सगुन बतावही आपन फन्द न जान ||
                           (२)
               पण्डित और मसालयी दोनों सूक्भै नाहिं |
               औरन को करै चॉदन आप अघेरे माहिं ||
                           (३)
               नारी की क्भाईं परत अन्धा होत भुजंग |
               कबीर तिनकी कौन गति नित ही नारी संग ||
          संक्षेप में कबीर अप्रस्तुत योजना सरल प्रभावशाली एवं कृत्रिमता विहिन है |
       संसार की असारता, विषम रीति-नीति, स्वार्थीघता, निम्न प्रवृत्तियो और कटु अनुभवों ने कबीर मे विचित्र तीखापन तथा आलोचनात्मक प्रवृत्ति समुत्पन्न कर दी थी | इसीलिये उनकी साखियो मे अनुभूति की गहनता दिखाई देती है | संसार की गति देखकर उनमे प्रतिकार की ऐसी भावना जाग्रत हो उठी थी कि वे नीति विपयक उक्तियो के द्वारा जनता को जाग्रत् करने के लिए अग्रसर हुए |कबीर के काव्य मे नीति सम्बन्धी अनेक उक्तियाँ मिलती हैं | इनमे एक चतुर व्यक्ति की जैसी दूरदर्शिता एवं एक दूरदर्शी के सहश सुझाव देने को अद्भुत क्षमा थी | उदाहणार्थ यहाँ कतिपय साखियाँ उध्द्रुत की जाती है:-
                         (१)
                देह धरे का दण्ड है, सब काहू को होय |
                ज्ञानी भुगनै ज्ञान से, मूरख भुगतै रोय ||
                         (२)
                जुआ चोरी मुखबिरी, व्याज घूस, पर नार |
                जो चाहे दीदार को एती वस्तु निबार ||
                         (३)
                जग में बैगे  कोठ नहीं, जो मन सीतल होय |
                यह आपा तू डारि दे, दया करै सब कोय || [ ५१ ]                               ( ५१ )
                             
                              ( ४ )
                   मारग चलते जो गिरै, ताको नाई दोस ।
                   कह कबीर बैठा रहै, ता सिर करड़े कोस  ।।
                              ( ५ )
                   जो तो को कोटा बुवै, ताहि बोव तू फूल । 
                   तोहि फूल को फूल हैं, वाको हैं तिरसूज ।।
                              ( ६ )
                   दुर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय ।
                  बिना जीव की स्वांस से,लौह भस्म होइ जाय।।   
                              ( ७ )
                   जो देखे सो कहै नाहिं, कहं सो देखें नांहि ।
                   सुनै सो खमक्भावै नहीं, रसना छग सरबन काही।।
           
          इन साखियो मे गंभीर ज्ञान और अनुभूति की अभिवयंजननाहुई हैं ।
     प्रस्तुत संक्षिप्त वीवेचन से स्पष्ट हो‌ जाता हैं की यद्यपि काव्य रचना कबीर साध्य या लक्ष्य नहीं था फिर भी महान संदेशो को फिर भी अभीव्यक्ति के लिए उन्हें काव्य को माध्यम बनाना पड़ा। घर्म गुरु होने के साथ-साथ कबीर कवि भी थे । डॉ हजारी प्रसाद व्दिविदी के शब्दों में "भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वरणो के डिक्टेटर थे । जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा, उसे उसी रूप में भाषा में कहलवा लिया -- बन गया तो सोधे-सोधे नहीं तो दोहा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार सी नज़र आती हैं। उसमे मानो ऐसी हिम्मत ही नही की इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाईश को नाही कर सके । और पकह कहानी को रूप देकर मनोग्राही बना देने की तो जैसी ताकत कबीर के भाषा में है, यैसी भाषा बहुत कम लेखको में पाई जाती हैं । वारणो के ऐसे बादशाह को साहित्य रमिक काव्यनन्द का अस्वाद कराने वाला समाक्भे, हो उन्हें दोष नही दिया जा सकता है। फिर व्यग करने मे चुटकी लिखने की प्रतिज्ञा नहीं की है तपायि उनकी आष्यात्मिकरस की गगरी से काव्य की कटोरो मे भी कम रम इकट्ठा नही हुवा है।
     हिन्दी माहित्य के हजार वषो के इतिहास मे कबीर जैसा प्यतिम्य सेकर कोई लेखक ही नहीं हुवा। --माठी, फकठाना, समाय और वुए झड फ्टकार कर देने वाले तेज ने कबीर कूओ हिन्दी साहित्य का अदितीय [ ५२ ]                               (५२)                                        

व्यक्ति बना दिया | उनकी वानियो मे सब कुछ को हटाकर उनका सवंजयी व्यक्तित्व विराजता रहता है | उसी ने कबीर की बाणियो मे अनन्य साधारण जीवन रस भर दिया है | "इस व्यक्तित्व के आकर्षण को सह्यय, समालोचक संभाल नही पाया है | ऐसे आकर्षक वक्ता को कवि ने कहा जाय तो क्या कहा जाय?"

                   कबीर साहित्य पर इस्लाम का प्रभाव
             हिन्दी साहित्य पर इस्लाम का प्रभाव अत्याधिक भावुकता के रूप मे पडा | कबीर और मीरा की बैचेनी, वोधा और घनानन्द को विह्ललता, विग्यापति और सुरदास की भावाकुलता मे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हष्टिगत होता है | ज्ञानाश्रयी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि के विचारो मे हिन्दू मुस्लिम समन्वय का भाव अत्यन्त पुष्ट्ता पर पहुंच चुका था | आचार्य रामचन्द शुक्ल ने लिखा है :-
           "जो ब्रह्म हिन्दुओ की विचार पध्दति मे ज्ञान मार्ग का एक निरूपण था, उसी को कबीर ने सूफीयो के ढेरे पर उपासना का ही विषय नही प्रेम का ही विषय बनाया | उसकी प्राप्ति के लिए हठयोगियो की साधना का समर्थन किया | इस प्रकार उन्होने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफीयो के भावात्मक रहस्यवाद हठ-योगियो के साधनात्मक रहस्यवाद और वैण्गवो के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पथ खडा 

किया |"

     इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि कबीर धार्मिक कवि थे, और उनकी द्रुष्टि भारत की प्राचीन परम्परा के अनुसार सासारिकता की और कम और परलोक की ओर अधिक थी | मानव-जीवन को भी उन्होने महत्व दिया वह समाज सुधारक के रूप मे भी उल्लेखनीय हैं | उनकी समाज सुधार से सम्बन्वित कविताओ मे प्रचलित वाहाड्म्ब्रो के प्रति विरोध की ध्वनि थी | किन्तु अपने सिध्दान्त का जो अंश उन्होने सुफियो से लिया वह स इस बात का पोषक है कि वे इस्लामी संस्क्रुति से किसी न किसी सीमा तक प्रभावित थे | प्रेम की बेचैनी और विरह की व्याकुलता का जो चित्रण संत कबीरदास ने किया, उससे हिन्दी साहित्य मे एक नवीन परम्परा की स्थापना हुई | दुसरे शब्दो मे हुम कह सकते हैं कि भारतीय भावुकता का सामञस्व कबीर की कविता मे हुआ | कबीर के द्वारा स्थापित इन मान्यताओ का पालन अन्य सन्तो ने किया |
       कबीर की निम्नलिखित पंक्तियो मे प्रेम की पीडा, और प्रेमी के ह्रुदय की जो व्यग्रता वर्णित है उने देखिये :-
        "अंखियन तो झांई पडी, पथ निहारि निहारि |
         जिह्नवा तो छाला पढे, नाम पुकारि पुकारि ||" [ ५३ ]                              (५३) 
                
               यह भारतीय साहित्य के लिए नवीन बात थो । इसके पीछे सूफियो की विरहानुभूति का ही प्रभाव है ।        
               सूफियो के दर्शन के अनुसार जीव ब्रहा से मृत्यु के पश्चात् मिल सकता है ।

इससे दूसरा सिद्धान्त यह निकला को शीघ्र से शीघ्र मृत्यु को प्राप्त किया जाय, जिससे ब्रहा से मिलन हो । भारत मे इसके पूर्व बोद्ध भी जीवन के दीपक की बुभ्का देने को अपना परम उद्देश्य मानते थे । जैन साधक तो जीवन दीप बुभ्कने के पूर्व शरीर को अधमरा कर देने के समर्थक थे । मृत्यु का भय है, यह बात अभी तक स्पष्ट शब्दा मे किसी ने भी नही कहा था । परन्तु सन्त कबीर को जब ब्रहा वियोग को तीव्र अनुभूति हुई तो उन्होने यह स्पष्ट कर दिया की मृत्यु त्याज नहो काम्य है:-

                    "जिन मरने से जग डरे सो मेरे आनन्द ।                  
                    कब मरिहु कब देखि हे पुररा परमानन्द ॥"              
               भारतीय  जीवन मे इस प्रकार की विचारधारा को प्रश्रय नही दिया जाता था, परन्तु  इस्लाम  या  सूफी  प्रभाव के कारण  इस  प्रकार कि भावना  का विकास हुआ। भक्त  कवियो ने जीवन की उपयोगिता भगवान की सेवा करने मे ही बताई । उनको 

दृष्टि मे सेवा के सामने मोक्ष प्राप्ति भी तुच्छ था परन्तु कबीर पर इसका प्रभाव न पडा वे फारसी के सूफी कवियो से ही अधिक प्रभावित हुए और मृत्यु को काम्य और मोहक बना दिया । यह प्रभाव हम आधुनिक हिन्दी कविता मे भी देखते है ।

      इस प्र्कार सूफी कवियो के प्रेम की विरहानुभूति एवं प्रिय से मिलन की आकाक्षा से प्रभावित हुए, कबीर ने परमात्मा को पति और अपने को 'बहुरिया' माना है । विरह एव्ं मिलन की बेचैनियो का भी मार्मिक चित्रण किया । 
                    सुफी कवियो द्वारा नर-नारी के शारीरिक मिलन से जीव ब्रहा मिलन को जो उपमा दो गयी, उसका भी प्रत्यक्ष प्रमाण हमे भारतीय भक्ति धारा मे दृष्टिगन होता है। क्षृंगारिकता का गहरा पुट इसी कारण आया है । परन्तु यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस धारा का अगमन मुसलमानो के पुर्व भी अलान मे हो चुका था ।

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     १--इन अनोम तम मे मिलकर
             मुभ्कतो पल भर जाने दो
                  चुना  जाने  दो  देव
                      आज मेरा दीपक दुभ जाने दो ।
                                               महादेवी वर्मा [ ५४ ]
                                (  ५४  )
                     अब यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सूफी काव्य का प्रभाव किस वातायन से आया । ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियो के यहाँ प्रेम का आलम्बन निर्गुण व्रह्य था । इसी कारण प्रेम को दीप्त करने का कोई स्पष्ट आधार इन कवियो को न प्राप्त था । अतएव प्रेम भाव की महत्ता का प्रतिपादन करने के लिए कबीर ने  विरह की अनुभूति  पर आश्रित आहो के आधार पर हृदय के फटने, आखो मे  पडने, जीभ मे  छाले पडने के माध्य्म से यह भी स्पष्ट कर दिया कि जो 'शीश उतारे भुइ धरै' वही उसको प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार कबीर द्वारा इस्लाम एव्ं हिन्दू संस्कृतियो का समन्वय हुआ । सूफियो से बहुत पुर्व ही कबीर ने प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा था :-            
                           "ढाई खाखर प्रेम का,
                         पढ़ै सो पंडित होय ।" [ ५५ ]               कबीर साहित्य की महान परम्पराएँ

साहित्या एवं जीवन व्दारा परम्पराओ का जन्म भी होता है और परिपालन भी होता है। कबीर ने हमारे साहित्य की अनेक परम्पराओ को अपनी महत्वापूर्ण बल्याणकारी रचनाओ के व्दारा बल प्रदान किया,और साहित्य की महान परम्पराओ को जीवन प्रदान किया।भूत की घटनाओ और वर्तमान के कठोर नत्याेर को इन्होने भविष्य से श्रंखलाबद्ध् कर दिया।उनके साहित्य में संस्कार गत रुढियों,साहितिय्क मान्यताओ और तत्कालीन परिस्थितियाें का अदभुत् समन्वय एव चित्रण मिलता है। परम्परा भूत और वर्तमान के साेपानाे को पार करतो हुई भविष्य की ओर अग्रसर होती है। दूसरे शब्दो में वह अतोत से भविष्य की ओर प्रगति की मूलधारा है। जो क्रमश:चली आ रही है परन्तु उस सरिता के समान जो कही पर मध्यम गति से बहती रहती है। इसमे सदैव एक तारनम्य रह्ता है,और यही इसकी शत्ति है।

       कबीऱ की परम्परा को समझने के पूर्व उनकी एक दो सामान्य विशेषताओं की ओर ध्यान देना आवश्यक है।कबीर स्वभाव से ही बुध्दिवादी और शान्ति प्रिय सत थे।उनका रूढि़ विरोध क्रान्ति की सीमा तक पहुंच गया था। साथ ही उनके निष्कपट व्यवहार ने उन्हे अत्याधिक लोक प्रिय बना दिया है।कबीर सच्चे सत्यान्वेषक थे। सत्य का अन्वेषक  उन्होने कोरे वाग्जाल पर ही नही किया है वरन् अनुभवो की शिला पर सत्य की खोज के साथ-साथ धर्म  के सामान्य तत्वों पर अधिरक बल दिया। सामान्यतः कबीर साहित्य की मुख्य  परम्पराएँ है:-
        (१)मानवतावाद (२)धार्मिकता (३)जातीयता (४)प्रगतिशीलता (५)शाशवात् (६)सजीवता

मानवतावाद

      कबीर साहित्य की सर्वप्रथम  महान परम्परा मानवतावाद है। भारतीय दर्शन के इतिहास में मानवतावाद के चिन्तन और विशलेषण का सर्वोत्तम नयन उपनिषद् पात्र। यथा ग्रीक दर्शनियों भी आत्म शान और आत्म विश्लेषण पर जोर दिया है।उसी प्रकार  दर्शनिको ने तो गान और आत्म विशलेषण पर बहुत जोर दिया है। आत्म शान प्राप्त कर लेना मनुष्य का सर्वश्रेस्थ कर्तव्य हैा [ ५६ ]समझा जाता था। मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ  विकास था आत्म ज्ञान प्राप्त कर लेना। 

इसके बाद और कोई कर्तव्य शेष नही रह जाता है। आत्म ज्ञान के अनन्तर मनुष्य का परम कर्तव्य समझा जाता है, उस ब्रह्म का साक्षात्कार अथवा प्राप्त करना जो समस्त जगत का हेतु कारण या कर्त्ता है। इस प्रकार आत्म ज्ञान और ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े दर्शनिकाे ने महत्वपूर्ण ग्रंथो की रचना की और अपने विचारो के प्रसार के लिए अथक परिश्रम किया। सम्राटो और शासको के दरबार मे विद्वान एवं ज्ञानी पुरुष ज्ञान प्राप्ति की चर्चा के तदनुसार वातावरण का प्रसार करके मानवतावाद का उपदेश दिया करते थे। उनके चिंतन और चर्चा का विषय होता था “ज्ञान” एव “मानवतावादी विचार।'

इसमे सन्देह नही है कि वह मानवतावादी द्रिस्ति जिसका प्रचार भार- तीय दर्शिनिको ने समय-समय पर किया थ, एक बडे भारी कल्याणकारी वातावरण के प्रचार मे अत्याधिक सहायक हुआ। इस विचार धारा ने एक ऐसे वातावरण को सृष्टि की जहां मानव हृदय से मानव के प्रति सहानुभूति का स्त्रोत प्रस्फुटित हो उठा, और एक दूसरे को समझने मे सहायता पहुँची। मानवतावाद के प्रचार मे उपनिषद् साहित्य एवं तत्कालीन दर्शनिकाे ने बडी सहायता प्रदान की। एस द्रष्टि से उप- निषद् काल मानवतावाद के प्रचार के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है।

मानव की शाश्वत सुख को लालसा उसके अमृततत्व मे ही सन्निहित रहती है मानव के सुख का लश्र्य या उद्देश्य शारीरिक सुख या भौतिक सम्पति की प्राप्ति ही नही होती वरन इसके कुछ और भी है जो मानव को अपनी ओर आ करने की श्रमता रखता है और वह है'सत्य'और उसकी प्राप्ति भौतिक सम्पत्ति और भौतिक सुख के आनन्दा से मानव का चित कभी उचट जाता है,परंतु स्त्य,शिव,सुन्दरम के सान्निध्य और नैक्टूय मे रहकर मानव का मन कभी भी विकृत नही होता है।वास्तव मे मानव जीवन का उन्नति तभी हो सकती है,जब समस्त जीवो पर समान स्नेह हो और जब सासारिक वस्तुओ मे आशत्तिन हो।भारतीय दाशनिको ने बरम्वार "आत्मवत मवंभूतेपू यः पश्यतिसः पडितः"का उपदेश दिया है।हमारी चिन्तन धारा सदैव से इस वात पर जोर देती नही है कि दूसरे को आत्मवत समझना चाहिए दूसरे के कष्टो,व्ययाओ और दुःखो को अपनी अनुभूति वनाना चाहिए।इस उदार दृशिट ने भारनीय जोवन के समस्त कलुषो को धोकर उसे निर्मलता प्रदान करने का प्रयत्न किया।कहना न होगा कि इस दृष्टि भारतोय जीवन ने दिव्यता का संचार किया और उसे उदात्त् बनाने में अपूर्व योग प्रदान किया। [ ५७ ] ( ५७ )

मानवतावाद का अधारभूत या मूल सिद्धान्त है समस्त प्रणियों को ‘आत्म’ से भिन्न न समझना, समस्त जीवो मे दया भाव का समान रूप से प्रसार करना, सबकी दुःख को अनुभूति को आत्मानुभूति बनाना, इसका प्रमुख कारण यह है कि सबका रचयिता एक ही है। एक ही अश के सब अशी हैं,फिर मानव-मानव के बीच यह विरोध कैसा ? न कोई बडा है, न कोई छोटा,न कोई उच्च है, न कोई नीच। एक ही ईशवर ने सबको जन्म दिया है। सब समान है। जाति-पाति का भेद- भाव नही होना चाहिए। केवल कर्म से ही कुछ भी बन सकता है।

   कबीर के शब्दो मे:-
          
          जाति न पूछो साध की पूछो उसका ज्ञान।
          मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान॥
  
     

भारतीय मानवतावाद की पृष्ठ भूमि मे आध्यात्मिकता ही है। विदेशियो के भीषण आक्रमाणो से भी भारतीय योगियो की शान्ति भंग नहीं हुई उनके यम, नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,ध्यान,धारणा और समाधि बिना किसी विघ्न बाधा के चलते रहे। वे बाह्य संसार छोड़कर को ध्यानावस्थित होकर आभ्यान्तरिक साधना में सलग्न रहे। आत्मा की स्वतंत्रता के आगे देश की स्वतन्त्रता का महत्व उनके मन मे न बैठ सका। तथापि उन्होने उसकी ओर ध्यान न दिया।

कबीर के युग मे जब कि उत्तर पशिचम से अनवरत रूप से आक्रमण हो रहे थे, भारतीय धर्म ,साहित्य एव संस्कृति अत्याधिक सकट पूर्ण परिस्ठतियों मे स्वांस ले रही थी, और जबकि निराशा तिमिर भारतीय जनता को विनाश के गर्त का ओर उत्तरोत्तर अग्रसर कर रही थी। उस समय कबीर ने आने मधुर वाणी ने जीवो को समता अौर एकता का सन्देश दिया।

युग प्रवर्तक रामानन्द से प्रेरित और अनुप्राणित होकर सन्त कबीरदास ने मानवतवादी विचारधारा का प्रचार एवं प्रसार करने का प्रयत्न किया। इतना ही नही उन्होने भारतीय चिन्तनधारा मे एक नवीन परिच्छेद प्रारंभ किया जिसके द्वारा समानता की भावना को प्रसार मिला। कबीर्दास ने एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिस पर उनके अनन्तर आविर्भूत अन्य सन्तो ने चलकर समना का उपदेश भारतीय जनता को समय-समय पर सुनाया। इनकी प्रेरणा से हिन्दी के ज्ञानाधयो भक्त कवियो की एक शाखा चल पडी। ये सन्त सभी जातियो के थे, इनकी मूल भावना थी "हरि का भजै सो हरि का होइ।' जाति-पाँति के भेद भाव से इन्हे मोह न था। इन्होने बढे ही स्पष्ट शब्दों मे लगाकर कर कहा कि सुनो एक ही सुख ही भरीए है। सभी एक ही कुम्हार की रचना है। फिर 'को प्राप्त को सूदा' मेघ्नाव को मन का मैल है। [ ५८ ]


कबीर का लक्ष्य बडा ही व्यापक था। इन्होने जीवो के निस्तार के लिये उच्चदर्शो के उपदेश दिए। मानव को कल्याणकारो पथ पर अग्रसर करना ही इनका सबसे बड़ा लक्ष्य था। कबीर के हिर्दय मे व्याथित के हेतु सहानुभूति एवं सम्वेदना की भावना थी। वे संसार को सुखी और प्रसन्न देखना चाह्ते थे। इसी कारण उन्होने मानव की आर्थिक सामाजिक तथा आध्यातिमक सभी दशाओ को सुधारने की चेष्टा की। मानवता को सदैव ही श्रृंखलाओ से उन्मुक्त देखना चाहते थे और भविष्य मे एक स्वस्थ एवं आशापूर्ण द्रुश्टिकोण के आकांक्षी थे। यह मानवता- वादी दृष्टिकोण कबीर के साहित्य मे ओत- प्रोत है। मानव के आध्यात्मिक और लौकिक जीवन को सुखी बनाने के हेतु कबीर ने बारम्बार सन्मार्ग एवं कल्याणकारी पक्ष की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया। उन्होने पारमार्थिक सत्ता की एकता निरूपित करके यह प्रतिपादित किया कि मानव- मानव मे भेद नहीं है। सब प्राणी एक ही कलाकार की कृतियाँ हैं। हिन्दु और मुसलमानो ने अपनी-अपनी मिथ्या कल्पना के आधार पर ब्रह्म के सम्बन्ध मे निस्सार कल्पनाएँ स्थापित कर ली है। माया, भ्रम अथवा अज्ञान के काराण हम सत्य को नही देख पाते है। सत्य ही ब्रह्म है और ब्रह्मा ही सत्य है। उसमें द्वैत नही है। वह पूर्णतया अद्वैत, अगम, अज्ञात, अमर और अनन्त है। संसार का कोई भी कार्य उसकी इच्छा के बिना नही सम्पा- दित होता है। वह सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ है। उस ब्रम्ह को लेकर जो भेद-भाव हिन्दू और मुसलमानो मे चलते है यह निरी मूढ़ता का घोतक है। अज्ञान का विसर्जन करके मूढ़ता का परित्याग करके प्रेम सद्भावना और सह्दयता का प्रसार न केवल व्याक्तिगत जीवन के लिये वरदान है वरन समाज के उत्थान और विकास के लिये भी नितान्त अवशयक और उपयोगी है। सदभावना के प्रसार से मनुष्य के जीवन में अौदार्य,स्नेह,करूणा,प्रेम,त्याग तथा विश्वबन्धुतत्व की भावनाओ का स्वत: विकास हो जाता है,जो मानव के लिये नितांत अवश्यक है। मनुष्य का स्वभाव श्रेय भी है,प्रेय भी है। घीरवान व्यक्ति दोनो को पृथक्-पृथक् दृष्टि से देखते है। साधु श्रेय को घृणा करते है और असाधु प्रेय को।

मानवतावाद कबीर की सबसे बडी विशेश्ता है। कबीर जैसे उदार सन्त कवि संसार मे प्राणी माथ को सुखी देख्ने के आकाक्शी थे।

मानवतवाद से प्रेरित होकर कबीर ने संसार को भाँति-भाँति के कल्याण- कारी भाग प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया। उनके मानवतावाद का केन्द्र बिन्दु है अद्वैत ब्रह्म। ब्र्ह्म अद्वैत है। वही सर्वजगत का नियंता है।

ब्रह्म ही कबीर का प्रतिपाध और साद्या है। [ ५९ ]

                       (५६)
   पावक रूपी साइयां, सब घट रहा समाय |
   चित चकमक लागे नहीं, ता ते बुझि बुझि जाय||

मानवतावाद विषयक व्यपने विचारो के प्रसार के लिए कवीर ने सप्त महा- व्रतो का उपदेश दिया, जिनसे मानव का व्यक्तिगत तथा समाजगन जीवन समुन्नत है| (१) सत्य (२) अहिंसा (३) ब्रह्मचार्य (४) अस्वाद (५) अस्तेय (६) अपरि- ग्रह (७) अभय|

सत्य ही ज्ञान है, ब्रह्म है और संसार की वास्तविक गाति है| कबीर जी सत्य के प्रति बडी श्रध्दा प्रकट की है| सत्य व्यवहार, सत्य कर्म, सत्य वचन, सत्य अनुभूति जीवन को उदात्त बनाने मे सहायक होती है और इस प्रकार मानव समाज सुखी और सम्पन्न बनता है| इसलिए कबीर ने कहा था ----

      साँच बरावर तप नहीं, भूठ बनावर पाप |
      जाके हिरदे, साँच है, ताके हिरदे श्राप ||
    

दूसरा महत्व है 'अहिंसा'|अहिंसा मानवतावाद की प्रथम शक्ति है| जब तक हम हिंसा मे लगे रहेंगे तब तक हम एक दूसरे के प्रति ममता की भावना की स्ठापना कर ही नही सकते हैं|

कबीर की अहिंसा भावना बड़ी व्यापक है| वह तो यहा तक कहते है कि ---

               घट घट है वहू साई रमता, 
               कटुक वचन मत बोल रे ||
         

कबीर ने भय की भावना को भी उत्पन्न कराके अहिंसा व्रत पालन करने का उपदेश दिया है --

                       (१)
      मास मास सब एक हे, मुरगी हिरनी गाय |
      आंख देख जे खात है, तो नर नरकहि  जाय ||
                       (२)
      बकरी पाती खात है ताकी काढी खाल |
      जे नर बकरी खात है, तिनको फाँन इवाल् ||
      

अहिंसा के विषय में लिखते समय कबीर का अर्थ केवल 'चप न करना', 'जीव न मारना' हिंसा ना करना ही नहीं है वरन् उस समुचित क्षेत्र से बाहर आकर कटु वचन तक बोलने को उन्होने मना किया है।

इसी प्रकार कबीर ने ब्रह्मचार्य धारण करने का भी उपदेश दिया।ब्रह्मचार्य जीवन के लिए बहुत आवश्यक है,क्योंकि मनुष्य इन्द्रियों का घेरा होता है|इंद्रायां [ ६० ]

                               (   ६०   )
   की प्रचंड ज्वाला मे जलता हुआ मानव उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जिस प्रकार दीपक
   की लौ पर पतग नष्ट हो जाता है। वासना मे संलग्न मानव कभी भी साधना और 
   परमाथं मे दत-चित नही हो सक्ता है। कबीर ने मन, वचन, कर्म से ब्रह्राचर्य, 
   पालन करने का उपदेश दिया है। सयम जीवन के लिए सबसे बडा वरदान और 
   प्रेरक शक्ति है। कबीर ने इसीलिए मानवतावादी भावना के प्रसार के लिए ब्रह्रा-
   चर्य को उपयोगी माना है। कबीर के इस प्रकार के उपदेश चेतावनी के अंग में
   संग्रहीत हुए हैं। इसके अतिरिक्त "पतिव्रता को अंग" मे भी संयम एवं ब्रह्मचर्य 
   भावना की अभिव्यक्ति हुई। 
          उपर्युक्त इन तीन महाव्रतो पर विचार कर लेने के बाद विचारणीय हैं शेष 
   चार महाव्रत। ये महाव्रत हैं अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह तथा अभय। कबीर ने इनके 
   प्रति इसलिेेेए महत्व स्थापित किया है कि ये गुरा या व्रत औदायं, विनय शीलता
   और व्यापक भावनाओ का सजंन करते हैं। इनके द्वारा मानव-मानव को समभने 
   का प्रयत्न करता है और व्यापक भावनाओ को घारणा करता है। कबीर ने मानव 
   की हर प्रकार की ठुप्रव्रुत्तियो की अालोचना की। उन्होने अपने समय की जनता को 
   बताया कि मनुष्य को एक दूसरे का शोषण नही करना चाहिए। सबको दीनता की 
   भावना ग्रहरा करके सच्चाई और ईमानदारी के साथ जीवन यापन करना चाहिये। 
   कबीर ने स्पष्ट शब्दो मे कहा है कि---
            
              सबते लघुताई भ्रली, लघुता ते सब होय।
              जस दुतिया को चन्द्रमा सीस नवै सब कोय॥
 
          सच यह है कि यदि सभी संतोष और दीनता को ग्रहण कर ले, तो संसार 
   के समस्त अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार तथा सधर्प समाप्त हो जायं और मानव, 
   मानव बनकर जीवन यापन करने लगे। कबीर के मानवतावाद के सन्तोप एवं दीनता 
   अभिन्न अंग हैं। इन उपदेशो ने युग युग से पीडित एवं निराश जनता के ह्रदय में 
   आशा का संचार किया। कबीर ने काव्य रचना मे संजोये हुए सरल भावो द्वारा 
   भटक्ती हुई जनता का पथ प्रदर्शन किया। पथ भ्रष्ट को मार्ग दिखाई पढा और 
   वाताडम्बर से दूर मानव एक दूसरे के दुःख एवं कष्ट की ओर ध्यान देने लगा। 
   धीरे-धीरे जनता इस ओर आकषित हुई।
          कबीर का विचार था कि सद्गुण व नैतिक शक्ति बहुत ही प्रभावोत्सादक 
   होती है। इस काररा मानव मे मानसिक शक्ति बढाकर उत्साह भरने की चेष्टा
   की। उनका विचार था कि मनुष्य मे वह शक्ति है, कि वह अपनी गमस्याओ का 
   समाधान स्वयं कर सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कबीर ने मानवतावाद की [ ६१ ]
                                   (  ६१  )
ओर अधिक से अधिक ध्यान दिया। प्रेम, अहिंसा, सत्य, शान्ति, त्याग क्षमा, दया,
सहनशीलता ही मानवतावाद के गुण हैं| इस पर कबीर ने स्थान-सथान पर प्रकाश
डाला है|
धार्मिकुता
            

कबीरद्साहित्य की द्वितीय महान् परम्परा "धार्मिकता" है। इनके सम्पूर्ण साहित्य की रचना ही धम को हप्टि मे रख कर हुई है। यह अवश्य है कि धर्म के क्षेत्र मे उन्होने एक क्रान्ति उपस्थित कर दी। परन्तु फिर भी जिस कठोरता से रूढियो का विरोध किया उसी दृढता से उन्होने बुदिवादी सिद्धांतो की भी स्यापना की है। वे किसी भी बात को तभी स्वीकार करते थे, जब वह उनकी बुद्धि के अनुभव की कसौटी पर खरी उतरती थी। कबीर सच्चे सत्यान्वेपक थे। उनका धर्म बडा व्यापक है। जिस प्रकार उनका ब्रह्म व्यापक और सब जाति वर्गो का जन्मदाता है, उसी प्रकार उनका धर्म भी व्यापक है। इनका धर्म सावंभौमिक और युगो तक अभि- नव बना रहने वाला धर्म है। देश काल की सीमाए उनके धर्म और उनके उदात्त रूप का स्पर्श नही कर पाती है। कबीर का धर्म-धनी-दीन बालक-वृद्ध्, नर नारी सचके लिए समान रूप से उपयोगी और महत्वपूर्ण है। उनके व्यापक धर्म का आधार मानव की शाश्वत सद्प्रवृत्तियां हैं। यही शाश्वत सद्प्रव्रत्तियां जीवन को उदात्त और समुन्न्त बनाती है। कबीर ने मानव जीवन को उन्न्त और विकास- शील बनाने के लिए उपदेश दिये।

कबीर की वानियो मे वारम्वार इन्ही बातो पर जोर दिया गया है। उन्होने औदार्य, दया, क्षमा, त्याग, सहनशीलता, अहिंसा, घैर्य और सत्य को मानव जीवन और मानव प्रक्रति के अविच्छिन्न अंग माने हैं। उनके काव्य मे इन विषयो पर शतश साखियो की रचना हुई और प्रत्येक नाखी उनकी सत्यानुभूति को दृढ प्रमारिणत करने मे समर्थ है।

कबीर का घार्मिकता वाक्षाचारो वालाउम्व्गे ने प्रयक और परे है। उनकी धार्मिकता मे छुआ छूत,चन्दन-तिलक, वस्त्र माला, जब तप, बाग, नमाज और अजान मे नही मन्निहिन है। वरन उनकी धार्मिकता व्यापक है, युद्ध है, और उदात्त है। उनका सन्देश है, कि मानव की मनव के सहज धर्म पर परिवाचन करना चाहिए। उसे 'नुरत्व की जननी' मानव योनि को दूपिन कर्म रखे करना नित नही करना चाहिए। यही कबीर की धार्मिकता है, वही उनका ध्यान धर्म है। [ ६२ ] ( ६२ )

जातीयता

कबीर साहित्य की तृतीय महान परम्परा जातीयता है | आनी वाणी द्वारा कबीर ने देश की एक महान सांस्कृतिक चेतना मे वाघ दिया था | देश के प्रत्येक क्षेत्र मे महान सांस्कृतिक चेतना के फल स्वरूप जातीयता का विकास हुआ |उनकी भाषा मे समस्त भाषाओ विभापाओ और बोलियो का मधुर मिश्रण है | उन्होने व्याकरण के नियमो की अोर भी ध्यान नही दिया | जिससे स्पष्ट हो जाता है कि जनता के सम्मुख केवल अपने भावों की अभिव्यकति ही करना चाहते थे | काव्य रचना की ओर उनका ध्यान न था | इस्मे सन्देह नही कि उनकी लेखनी मुख से निकले हुए शब्द हिन्दी साहित्य की अमूल्य निघि बन गए हैं |

कबीर की वाणी का प्रभाव जनता पर पङा | क्योंकि उनकी भाषा मे पंजाबी, सिन्धी, गुजराती, ब्रज, अवधी, खडी बोली, आदि के उदाहरण मिलते हैं |

जातीयता का विकास सामन्ती श्रृंखलाओ के छिन्न-भिन्न हो जाने पर ही हुआ | कबीर जनता की मनोवृति से भली भांति परिचित थे | वे यह अच्छी तरह जानते थे कि शासक वर्ग की सभ्यता संस्कार और जातीयता का जनता से कोई विशेष सम्बन्ध नही है, वरन सामन्ती जातीयता मानव के विकास मे वाधक है | जनता की संस्कृति और जातीयता का सम्बन्ध सवंथा दूसरे वग्र से है | परन्तु कबीर ने जातीयता के प्रचार के लिए रूढिवादी साघनो को दूर कर नवीन साधनो को अपनाया है | जातीयता का प्रसार कबीर ने भाषा दवारा किया है |

भाषा को जातीयता का गौरव पूर्ण अंग जीवन प्रगति माना | कबीर के शब्दो मे भाषा का गौरव निम्नलिखित है :-

               'संस्कीरति है कूप जल भाषा बहता नीर'
     जीवन भर वह इसी बात का प्रयत्न करते रहे कि संकुचित क्षेत्र से निकल 

कर विस्तृत क्षेत्र मे जनता जातीयता के अर्थ समझ सके | सन्त कबीर समस्त प्रकार की संकीर्णता के वीरोघी थे | इसीलिये उन्होने एक एेसी वृहतर भावना का प्रति- पादन और स्थापना की जो जनता के निकट और जनता के लिए सवंथा उप- योगी थी |

प्रगतिशीलता

कबीर साहित्य की चतुर्घ महान परम्परा है प्रगतिशीलता | मामान्यतया प्रगतिशीलता का ञयं होता है स्पन्दनशीलता, उतरोतर उन्नति के पथ पर धप्रसर रहना | [ ६३ ]

                    (   ६३   )

कबीर ने समाज, साहित्य, घर्म सभी मे प्रगतिशील विचारो का समावेग कर युग युग से पीडित एव प्रताडित जनता का उद्धार किया | जिन विकृन तत्वो के प्रति उनको प्रतिकृिया जाग्रन हुई, उनमे मुख्य तत्व ये है :-

(१)पुरोहितवाद, (२)वणक्षिम धर्म, (३)मूतिै पूजा, (४)घामिैक अन्ध- विशवास, (५)त्राहाडम्बर, (६)पूजा विघि, (७)पौराणिकता |

हिन्दू धमृ के सामान्य विशवास अपने मूल रूप मे बढे ही सात्विक थे, परन्तु मध्य युग तक आते-आते ये सात्विक विशवास अन्धविशवासो मे परिणित हो गये थे, और उनका प्रचार धर्म के सभी क्षेत्रो मे था | मध्य युगीन जनता के लिये ये विशवास परम्परागत रूढियो के रूप मे बन कर रह गये थे कबीर की वाणी, ने इन्ही विकृत रूपो का खण्डन करने मे प्रवृत्त हुई | आपसी द्वेष की राक्षसी प्रवृति को रोक कर कबीर सत् धर्म की प्रतिष्ठा मे कटिवद्ध हो गये | रक्नपात, भौतिकता, और प्रति- कार भावना के विरूद्ध उपदेश दिये | संध्या, वंदना, पंच महायज्ञ, बलि, श्राद्ध, पोडप-सस्कार विविध प्रकार के व्रत, तीर्थ शौचा-शौच सम्बन्धी आचारो का खडन किया जो कि केवल परम्परागत ही रह गये थे | कबीर साहित्य प्रगतिशीलता का प्रतीक है | प्रत्येक हष्टि से कबीर का साहित्य प्रगतिशीलता के रंग मे अनुरजित है | काव्य के अन्तरंग एव बहिरंग उभय पक्षो मे कवि पूर्णनया प्रगतिशील हैं | क्या भाषा, क्या भाव, क्या रस, क्या छन्द हर दृष्टि से उन्होने प्रयोग किये जो उनके युग को मान्यताओ को पुष्टता प्रदान करते हुए भविष्य के लिए मानदण्ड वन गये |

शाशवतता

सत काव्य मे मानव जीवन की अनेक शाशवत प्रवृतियो की बडी सुन्दरता के साथ चित्रण हुआ | युग-युग से मनुष्य प्रेम, क्षमा, दया, विश्ववन्दुत्व और उदारता मे विशवास करता चला आ रहा है | मनुष्य सदैव से उदात्त वृतियो से युक्त रहा है | होन कायोृ से हटकर हमारा मन स्वत शान्तिमय वानावरगा मे रमना चाहना है | कबीर के काव्य मे मनुष्य को इन्ही जन्म जात और शाशवत प्रवृतियो पर जोर दिया गया है | मानव समाज के सधदंमय वातावरण का परिस्बाग करके क्षाध्या- हिमक वातावरण मे सन्तोप प्राप्त करता है | कबीर ने माद्यम की प्रतिष्टा के लिये बार-बार संदेश दिया है| आष्यात्म का विषय पास्वत और चिरवन है, पसो काररा पयोर साहित्य शाशवत साहित्य है |

फचोर ने साहित्य की रचना किमी स्यापं भाव मे मेरेन होकर नही हो थी | उनको रचनाएं ह्चानः सुगाय और 'वटुमन हिठाय' हुई हो | इसीलिए जो [ ६४ ] ( ६४ )

रचनाओ मे मानव-जीवन के हित की भावना अप्रत्यक्ष रूप से प्रवाहित होती हुइ शताब्दियो से जनता को सही मार्ग पर अग्रसर कर रही है। सजीवता कबीर साहित्य की षष्ठ महान परम्परा सजीवता है। कबीर के प्रति यह आरोप लगाया जाता है कि वे पलायनवादी थे, और उन्होने भारतीय जनता को पलायनवाद का हर प्रकार से पाठ पढाया। जिसके फलस्वरूप भारतीय जनता अकर्मण्य बनती गई है। लेकिन तथ्य इसके विरुध्द है। कबीर ने अपने युग की निराश जनता को अाशा का प्रकाश दिखाया। उन्होने भग्न हृदयो मे उल्लास का सचार किया। जीवन को उन्होने जीने योग्य बनाया और इस प्रकार से उन्होने उदात्त एवं सत्विक जीवन का उपदेश देकर साहित्य के क्षेत्र मे नवीन परम्पराओ को स्थापित किया। कबीर के काव्य मे एक अलौकिक चेतना एवं सजीवता है। जिसकी आधारशिला आध्यात्मिक प्रणय की प्रतिष्ठा, आत्मानुभूतिगत माधुर्य, साधनात्मक रहस्यवाद और प्रतिभा आदि हैं। इन्ही तत्वो ने कबीर के काव्य को मे सजीवता एवं माधुर्य का समावेश करके उसे सक्रिय बना दिया है। [ ६५ ]गुरुदेव को श्रंग

   सतगुरु सवाँन को सगा , सोधी सई न दाती ।
   हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाती ॥ १ ॥

सन्दर्भ - सतगुरु का व्यक्तित्व असाधारन , स्मादरगगोय और अत्यन्त कल्याणकारी है| वह मुक्ति और भक्ति का भण्डार है| वह हरिजो और हरिजन से भी श्रेष्ट है|

भावार्थ- सतगुरु के समान कौन सगा है, कौन अपना है| उसके समान कोई भी शोधक नही है| वह अमोघ, अजस्त्रदाता है| हरिजो अर्थात भगवान को सदृश कौन हितैषी है और हरिजन अर्थात वैष्णवजन के समान कोई जाति नही है, उसके समान कोई फुलोन नही है|

शब्दार्थ-- सवान= समान, बराबर| को=कौन| सगा= स्वक=अपना, अभिन्न|सोधी=शोधी-सशोदन करने वाला, शोधक|सई= समान| दाति= दातृ, दानी| हितु-हितैषी|

   बलिहारी गुरु श्रापर्णै, द्यौं हाडी कै बार|
   जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी घार||२||

सन्दर्भ- सतगुरु मे दिय्व शक्ति है| उन्होने हाडी के सहज इस तुच्छ, होन शरीर को दिव्यता प्रदान को| उनके प्रसाद से यह शरीर सब सार्थक हो गया|

भावार्थ- सतगुरु के श्री चरणो पर मै अपने इस शरीर को अधम पंचत्तवो से विनिमिन शरीर को जो हाडी के नहद नि:मार है-शतज: वार न्यौछावर करता है। सतगुरु को मुख दोषो से अभिराम यामनाओ से प्रस्त अधन प्राणो को दिखाता प्रदान करने मे चिलम्ब न लगा। यही उनकी महत्ता थी।

शब्दार्थ- बलिहारि=न्यौछावर। आपनौ=सरने, मेरे। हाडी- मृतिका पात्र। के= बितनी। के बार= कितनी बार। जिनि= जिन- जिन्हे। नानिप= मानुष्य। नै=ने। वार= विलम्ब।

   सतगुरु की महिमा श्रनेन श्रनेन किया उपगार।
   लोचन अनँत उघडिया अनँत दिग्णवखहार॥३॥ [ ६६ ]६६]                                                     [कबीर की साखी                                                      


सद्ंर्भ - सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वच- नीय है। उन्होने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की। भावार्थ - सतगुरु की महिमा अनन्त है। उनकी महत्ता का वर्णन नही हो सकता है। उन्होने शिष्य के प्रति अनन्त उपकार किऐ हैॱ। उन्ही की असीम कृपा से अनन्त अर्थत्-ज्ञान के चक्षु उद्घाटित होगा। उनकी असीम कृपा से अनंत, निराकार निर्विकार ब्रह्य के दर्शन हो गए। शब्दार्थ- अनंत= अनन्त, असीम । उपगार= उपकार। लोचन= नयन। उघाडिया=उघाड,उदघाटित किया। दिखावगहार= दिखानहार=दिखाने वाला।

  राम नाम कै पटंतरै, देबै कौं कुछ नांहि।
  क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥४॥

स्ंदर्भ -शिष्य के मन मे असीम कृतज्ञता की भाव है। वह सतगुरु के प्रति प्रतिदान की इच्छा रखता है, पर गुरुदेव के प्रति क्या समर्पित किया जाय यह संकल्प विकल्प मन से साकार रहता है। उसकी अभिलाषा अपूर्ण ही रह गई।

भावार्थ- सतगुरु ने 'रामनाम' जैसी दिव्य वस्तु का दान शिष्य को दिय। शिष्य के पास प्रतिदान के लिए कोई भी उपयुक्त पदार्थ नही है। शिष्य के मन मे हौसला, अभिलापा, आकांक्षा अपूर्ण एवं बलवती बनी हुई है कि सतगुरु के महान व्यक्तित्व की अनुकूल कौन-सी वस्तु प्रतिदान मे दी जाय|

शब्दार्थ- पटंतरै--समान, बराबर| देवै- देने योग्य| कौ- को| ले-दे, देकर| सन्तोपिए--प्रसन्न कीजिए| हौसं=हौसला-इच्छा, आकांक्षा| मनमाहि-मन मे|

   सतगुर के सदकै करूँ दिल श्रपणीं का साछ|
   कलियुग हम स्यूँ लडि पडया मुहकम मेरा बाछ||५||

संदर्भ- सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है| उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया|

भावार्थ- अपने ह्रदय की समस्त सत्यता को साक्षी करके, पूर्ण मनोयोग मे मैं सदगुरु के चरणों मे अपने को न्योछावर करता है| कलियुग ने पूर्ण गति के साथ मेरे प्रति आक्रमण किया परन्तु मेरी वाछाएं वलशालिनी थी| अत: मैं सदगुरु की कृपा से भवसागर उतीर्ण हो गया|

शब्दार्थ- सदकी= सिद का- बलि जाऊँ, न्यौछावर जाऊ| दिन=ह्रदय| रयूं= से| पड्या= पडा| मुहपम= प्रबल, वलदाली| वाद्ध= वाद्धा, अभिलाया| [ ६७ ] गुरुदेव को अग] [६७

          सतगुरु लई कमांरग करि, बांहरग लागा तीर ॥
          एक जु बाह्मा प्रीति सूॅ, भीतरि रह्या शरीर ॥६॥
          
       सन्दर्भ- सतगुरु सच्चा सूरमा है। वह शब्दवाण मारने मे अत्यन्त् निपुण
है उसने ऐसा शब्द-वारण मारा कि शिष्य का ममं आहत हो गया और वह तत्व से
पूरगंतया परिचित हो गया ।
       भावार्थ- सतगुरु ने हाथ मे ध्ननुष ग्रहण करके तीर बहाना (दया फेकना)
प्रारम्भ किय। एक तीर जो उसने बडे प्रेम से मेरे प्रति सधान किया,वह मेरे शरीर
मे घर कर गया।
           
       विशेष- प्रस्तुत साखी मे कवि ने सतगुरु को सूरमा के रूप मे व्यक्त किया
है,जो तीर संघान करने मे अत्यन्त कुशल है वह अनवरत रूप से शिष्य के प्रति जो
शब्द-वाण को लक्ष्य करता रहा है। परन्तु एक शब्द-वाण उसने बडे़ हित और प्रेम 
से संघान किया। इस वारग से शिष्य का मर्म आहत हो गया और वह ब्रह्ममय हो गया।
    शब्दार्थ- लई-लो, ग्रहण की। करि=कर--हाथ। वाहण=वहाने अर्थात्-फेकने लगा।
अथार्त-फेकने लगा। बाह्मा=वहाया, फॅफा। सरीर-शरीर।
          सतगुरु सांचा सूरिवां, सवद जु बाह्मा एक।
          लागत ही मैं मिल गया, पडया कलेजै छेक॥७॥
  सन्दर्भ- प्रस्तुत साखो में सतगुरु को एक और विशेषता का उल्लेख किया है।            
वह सच्चा सूरमा है। उसक लक्ष्य अचूक और अत्यन्त प्रभावशाली है। उसका चाण
शब्द-वाण है। शब्द-वाण ने शिष्य के ममं को आहत कर दिया है।
 
   भावार्थ-सतगुरु सच्चा शूरवीर है। उसने मेरे प्रति एक ऐसे शब्द-वाण का अनुसषान
किया, किसके प्रभाव मे मेरा ममं आहन हो गया और मैं मेरा खोया हुआ अपनत्व मुझे
सम्प्रप्त हो गया।
 
   विशेष-- शब्द वाण के लगते ही मेरा खोया हुआ अपनत्व प्राप्त हो गया। तात्पर्य है
कि मैं जो माया के आकर्षक स्वरुप को देखकर आत्म विस्मुर्ण हो गया था, सद्गुरु के
शब्द वाण के लगते ही पुनः आपने खोये हुए पल को प्राप्त हो गया। मै माया से आवृत 
होने के कारण अपने निचितार एय निराकार स्वरुप को विमर गया था पर सतगुरु को ऊपर से प्राप्त हुआ और मै पुनः अपने औदिक रूप मै परिवर्तित हो गया। [ ६८ ]शब्दार्थ - साचा=सच्चा। सूरिर्वा=शूरमा। सवद=शब्द। वाह्या=वहाया, फॅका। लगते। पडयाा=पडा-हुआ। छेक प्रभाव डालना।  
        सतगुरु मारय बाण भरि धरि करिसूधी मूठि।
        श्रॱगि उघाडै लागिया,गई दवा सूँ फूटि़॥ ॥
    संदर्भ- प्रस्तुत साखी मे कवि ने विगत साखो के भाव को अधिक विस्तार के साथ व्यक्त किया है। विगत साखी मे कवि ने सतगुरु के शूरत्व तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का उल्लेख किया है़। यहाँ उसी भाव का विश्नेषण करते हुए कबीर ने शब्द वाण के तीत्र्व एवं व्यापक प्रभाव को अंकित किया है़।
    भावार्थ- सतगुरु ने शक्तिभर शिष्य को लक्ष्य करके वाण मारा। फलता शिष्य के शरीर मे दावाग्नि भी प्ररफुटित हो गई और शिष्य के अगो को उदघाटित करने लगा।
    विशेष- (१) मार्या वाण भरि से तात्पयं यह है कि सतगुरु ने पूर्ण्शक्ति के साथ वाण मारा। (२) घरि--मूठि-ल   साघन करके। (३) अगि- लागिया सातगुरु के शऱीर वाणो ने शिषय के अगो को ‌उदघाटित कर दिया। अर्थात शब्द वारगा ने ममं को आहन कर दिय। (४) गई-फूटि-शब्द 

वाण के फलतः ज्ञान कि अग्नि दावाग्नि से फैल गई औऱ उसने व्यक्तित्व के असर तत्वो की विनष्ट कर दिया।

    शब्दार्थ-भरी पुरी शक्ति के साथ। सूघी= सूघे। दवा=दावाग्नि।
       हँसै न बोलै उन्मनी भिद्या,सतगुरु कै हथियारि॥ ॥
       कहै कबीर भीतरि भिद्य,सतगुरु कै हथियारि॥ ॥
    संदर्भ- सतगुरु ने पुरी शक्ति के साथ शब्द-वाण को शिष्य के प्रति मारा अौर फलतः प्रम या जान को अग्नि शिष्य के सम्पूर्ण शऱीर मे प्रस्फुतटित हो गई। प्रस्तुत साखी मे कवि ने शब्द वर्ण के प्रभाव को स्पप्ट एवं अधिक विस्तार के साथ प्रकट किया है। शब्द वर्ण का प्रभाव यह पडा, कि शिष्य उन्मन अवस्या मे प्रविष्ट हो गया और उसका चचल मन पगु या गति-विहीन हो गया।
    भवार्थ- शब्द वार्ण रुपी सतगुरु के हथियार ने शिष्य के अन्तस य मर्म को आहत कर दिया। अब वह् हपं-विपाद की मानव से परै होकर संसार से उन्म या उटामीन हो गया अौर  उसका चचंल मन प्रवान्त हो गया।
   विशय- (१)"हसे न बोले" शिष्य शब्द वार्ण लगते ही शिष्य संसारिक भवनाओ और प्रतिक्रियाओ से ऊपर उठ गया। वह बोतराग य समार की यतर्थ स्यिति को भली प्रकार समान गया और वह संसार से विमुक्त हो उठा, (२) 'उनमनी' से तात्पर्य है उदामिन। (३) 'चचंल' शब्द का प्रयोग संत साहित्य् में  में मन के लिये [ ६९ ]प्रयुक्त हुआ है।  (४) ‘मेल्हया का अर्थ है फेका।  शब्द वाण फेका और शिष्य के मन को गति विहीन कर दिया। (५) ‘भीतरि से तात्पर्य है ‘हृदय’ अन्तस या मर्म। (६) हथियार—श्ब्द वारण। 
    शब्दार्थ— भिघा–भिदा = भेदा = भेद गया। उनमनी = उन्मनी।  
            गूंगा हूवा बावला, बहरा हूश्रा कान। 
            पाऊँ थैं पंगुल भया, सतगुर मारया बाणा॥१०॥
    सन्दर्भ— “सत्गुरु के हथियारि” कुछ ऐसा “भीतरि भिध्या” कि शिष्य का चंचल मन तो पंगु हो ही गया, साथ ही वह उस अवस्था को भी पहुंच गया जिसे “उनमनी” कहा गया है। इतना ही नही इस “हथियारि” का ऐसा अदूभुत एवं अकथनीय प्रभाव पड़ा है कि शिष्य की इंद्रिया भी निश्चेष्ट एवं चेतना विहीन हो गई है।
    भावार्थ— सतगुरु ने ऐसा शब्द वाण मारा है कि शिष्य गूंगा, बावला चधिर एवं पंगू हो गया। 
    विशेष— प्रस्तुत साखी मे कवि ने रहस्यवादी की उस स्थिति का वर्णन किया है, जिस मे उसकी विभिन्न इंद्रिया सर्व् कार्य को बिसर जाती हैं ओर वे निश्चेष्ट हो जाती है।  ज्ञान की ज्योति सम्प्राप्त हो जाने पर, ब्रम्हा की अनुभूति परिपूरित हो जाने पर साधक की इंद्रिया लौकिक अनंद तथा सांसारिक सुखो की ओर से विमुख हो जाती हैं। इस उच्चतम स्थिति पर पहुंचने के अनॱन्त्र्र् उसकी वाकू शक्ति या अभिव्यंजना शक्ति मौन हो गयी, उसकी कर्णोन्द्रिय शब्द ग्रहण की प्रक्रिया को भूल गई और उसे पग पंगुल हो गए।  अब वह बवल-सा प्रतीत होने लगा। उसकी मनःस्थिति कुछ ऐसी हो गई कि वह जीवन और संसार से उदासीन ही नही पूर्णतथा विमुख हो गया। संसार जिसे सुख, जिसे वैभव तथा जिसे महत्व कहता है, वह उसे निःसार प्रतीत होने और उसके इस दृष्टिकोण को देख कर सांसारिक उसे बावला समझने लगा। वही ज्ञानी और तत्व होता है। 
    शब्दार्थ— हुवा = हुवा. पगुन = पगु-गतिविहीन.
             पीछैं लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। 
             आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥११॥
    संदर्भ— लोकनुमोदिन मार्ग पर चलते हुए नगरिकों का सम्मान करना जीवन का लक्ष्य है। परंतु सतगुरु की गहरी कृपा हुई। ----------------------------------------------

। (Not seen properly) [ ७० ]७०] [कबीर की साखो
सावार्थ--शिप्य लोकानुमोदित मागं का अन्य अनुसरण  करता हुआ जा रहा था। परनतु आगै सतगुरु के दर्शन हुए। उन्होने ज्ञान का दीपक हाथ दिया ।
   विशेष-सतगुरु की महान अनुकम्पा इसलिए हो कि उसने अन्धानुकरण और  लोक वेद प्रतिपादित मार्ग को नि:सार बताया और ज्ञान के दीपक के जीवन कि मार्ग को परिप्क्रुत एवं अलौकित किया । 
  शब्दार्थ-पीछैं=अनुकररण । साथि=साथ । मिल्या=मिला । दीया=दिया,प्रदान किया ।
  दीपक दीया तेल भरि, बाती दई श्रघट्ट ।   
  पूरा किया विसाहुएणं बहुरि न श्राँवौ हट्ट ॥१२॥
 सन्दर्भ-सतगुरु की कृपा से न केवल अंधानुकररण से ही उन्मुत्ति प्राप्त हुई और न केवल अज्ञान से अवकाश मिला । वरन ज्ञान का एसा दीपका मिला जो अक्षय और अनन्त हो सतगुरु ने जो ज्ञान का दीपक प्रदान किया,उसमे अक्षय तेल, अघट्ट वाती और अनन्त प्रकाश भी था। 
भावार्थ-सतगुरु ने प्रेमरुपी  तैल से सयुक्त्त दीपक प्रदान किया, जो न घटने वाली वाती सम्पन्न् था । दीपक के प्रकाश मे शिष्य ने संसार रुपी बाजार मे क्रय-विक्र्य पूरणं किया । अब इस संसार रुपी बाजार मे पुनःनही आगमन होगा । 
 विशेष-प्रस्तुत साखी मे ज्ञान के दीपक मे प्रेम का तैल तथा अघट वाती का उल्लेख किया है । विव्रय प्रकाश मे किया जाता है । संसार रुपी हाट मे अज्ञान था। अंधकार्,माया व तब चारो  क्षोर प्रसारित हे।

उस तम या उधकार के कारण रुकुत का प्रय=दिव्र्य सम्भदित नही था। अव अघत वाती तथा अक्षय तेल क्षान् का दीपक प्रात हो गया हे।व व् सुक्रत तथा पुप्य कर लिय गया हे। अंत: जीव: मुक्त होकर् सा&क अंब् पुन जंन्न्म के व्रम मे नही पदेगा।

 शब्दाथै- दीया = दिया= प्रदान किया। अधट्ट =अधट= न कम होने वाली। विसाहुंरण। = विव्रय, खरीदारी। आवौं=आवो=आउं= आना होगा। ह्ट= ह्ट=ह्ट=थाजर।
    ग्यान प्रकारया गुरु मिल्या, सो जिनि वीसरि जाइ।
    जय् गोविन्द क्पा करी, तब गुरु मिलिया आइ॥१३॥

सन्दभ- ज्ञान से सुशोभित एव समल्व्र्त गुरु कि प्राप्ति एव दर्शन बढे भाग्य से होते है। एसे महान व्यकित्त के दर्शन से भी ईश्वर की प्रेरणा और अनुकप का फल है। इस प्रकार का हे। असाधारण,अदभुत्त और अदिव्तीय व्यतित्व अविस्मरणीय है। [ ७१ ]गुरुदेव को अंग] [७१

     भावार्थ--गोविन्द की कृपा से मुभ्के ग्यान के आलोकित या प्रकाजित गुरु मिला। ऐसा सतगुरु अविस्मरखीय है।
     विशेष--कबीर का यदि यह विश्वास है कि " गुरु गोविन्द दोऊ खडे काके लागूं पांय । बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय," " तो वही कबीर यह भी रखते हैं कि " "जब गोविन्द कृपा करी ,तब गुर मिलिया आइ। कबीर को इस बात की प्रसन्नता है कि उसका गुरु ग्यान से पूृृृरां और ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है।
     शब्दार्थ--प्रकास्या=प्रकासा=प्रकाशा=प्रकाशित। गुर=गुरु। मिल्या= मिला। जिनि=जिन। नमत = नही। बीसरि=बीसर= बिपरा=भूला । मिलिया= मिला।
    कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया श्राटै लूरा ।
    जाति पांति कुल सब मिटे,नाँव धरौगे कौंरा॥ २४॥ 
   संदर्भ--ज्ञान के आलोरु से प्रकाशित गुरु मिला। वह गुरु न केवल ज्ञान से सम्पन्न है,वरन् वह गौरव से मुक्त तथा महानात्मा भी है। गुरु के महान व्यक्तित्व से शिष्य अभिभूत हो गया और उसी मे समा गया। ज्ञान से आलोकित गुरु के प्रभाव से शिष्य भी ज्ञान सम्पन्न हो गया और उसका जाति,वरां,कुल की सब भावना विलीन हो गई। शुद्धात्मा के रुप मे विचरख करने लगा।
    भावार्थ-कबीर कहते हैं गौरवमय तथा गम्भीर गुरु मिला। गुरु ने अपने व्यक्तित्व मे मुभ्के एकाकर लिया। मैं उससे मिलकर उमी प्रकार अभिन्न हो गया, यथा आटा एव नमक मिलकर अभिन्न हो जाता है। इस प्रकार सतगुरु के व्यक्तित्व मे एकाकार हो जाने की अनन्तर जाति, कुल और नाम की सरुरी सोनाएं विनष्ट हो गई और मैं विशुद्धात्मा हो गयी। ऐसी शुद्धात्मा का क्या नामरुरख होगा?
    विशेष--आटै-लूंख  से तात्पयं है यवा आटा मे मिलकर नमक एकाकार हो जाता है। उसी प्रकार सतगुरु को महानात्मा ने मिलकर शिष्य को आत्मा एकाकार हो गई। (२)"गुरगरवा" से तात्पयं है कि शान के गौरव मे पूखा और गम्भीर (३) जाति कौख से तात्पयं है सामारिक एव सामाजिक मान्यनाऍ एव प्रतेक्श  एव विनष्ट हो गये। शिष्य शुद्धात्लमा हो गया। (४) नाव  लेखन्मे वासर्थ है कि लव शिष्य लनाम, अजात ,अचखं और अमेद हो गया।
   शब्दार्थ-- लूख=लोन-नमक। गरवा=गम्बा-गम्भिर। नाद=नाम। पौख=पौन। [ ७२ ]जाका गुर भी षंघला, चेला खरा निरंध।

षंधै षंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पडंत ॥

संदर्भ- सतगुरु के ञान से प्रकाशित होकर शिषय विशुधात्मा हो गया । वह इनाम ओर अजात हो गया। परन्तु जिस्का गुरु अन्धा है ओर चेला भी खरा निरंब है। ऐसे गुरु अौर शिस्य दोनो हो अन्धे प्रारिगयो के सद्रुश विनाश के कुए मे गिरते हैं ।

भावार्थ-जिस शिश्य का गुरु अन्धा अौर चेला स्व्त:अन्य है वे दोनो एक दुसरे को ठेलते-ठेलते कुऐ मे जा पडते हेेेैं।

विशेष:प्रस्तुत साखी मे कबिर के अञानी गुरु एवं शिषय की दुर्दश का उललेख किया है। दोनो अग्यान के कारण एक दुस्ररे को ठेलते हुए विनाश के कूप म विनषट हो जाते हैं।

शब्दार्थ-अवला=अंधा-अञान के अन्धकार से ग्रस्त। खरा=पूरगंत्या। निरव=निरा=निरा अन्धा। ठेलिया=ठेनते हूए। दून्यूं=दोनो।कूर=माया का क कूप या विनाश का कूप। पडत=गिरता है।

    नां गुर मिल्या न सिप भया,लालच खेला डाव।
    दून्यूं वूडे धार मै,चढी पाथर की नाव॥
   
  सन्दर्भ- ञानी सतगुरु के न मिलने के कारण बडा अहित हुआ। शिश्य माया,मोह,लालच अौर अन्य सजतीय क्रुपवृप्तियो से पराजित हो गया,जो अग्यानि गुरु प्राप्त हुआ उसने शिश्य को ऎसा मागं प्रदर्शित किया,जिसके कारण गुरु ओर शिश्य अपने अञान के कारण भवसागर मे डूब गए।
  भावार्थ- न सत गुरु मिला,न शिश्य को सत दीषा प्राप्त हुुूूई। लोभ या लालच ने दोनो के प्रति दाव खेलता रह। पथर को नाव मे बैठकर(भवसागर को उतीरंग करने के अभिलाषी) दोनो भवसागर मे डूूब गऎ।


विशेष-पह्ले की साखियो मे कवि ने सतगुरु के प्र्साद से प्राप्त ञानलोक का उल्लेख किया है।अब यहा पर उन्ने जूथे गुरु के दर्शन से जो अहिन होना हे,उसका उल्लेख कर दिया है। अग्यान से अभ्दाथ गुरु के कारण शिश्य तो विनस्ट हो गया।दून्यू मै-से तासप्य है कि दोनो मङ्हर कै गए। घवि नाव=से ताथ्य है माया,लालच या मोह की न हो। [ ७३ ]गुरुदेव को अग ] [७३

शब्दार्थ -मिल्या = मिला । सिष = शिष्य । भया= हुआ । डाव =दांव ।

दून्यु =दोनो। घार= मझघार। पाथर= पत्थर । नाव = नौंका ।

चौसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि । तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविन्द नाहिं ।।१७॥

सन्दर्भ -सतगुरु के प्रसाद से ज्ञान के प्रकाश से शिष्य अालोकित हो गया। जो गुरु स्वत: ज्ञानालोक से अालोकित है वह अलोकित है वह शिष्य के "व्यक्तित्व से भी वासनाओं, के तामसिक अन्धकार को दूर कर सकता है । सतगुरु ने शिष्य के व्यक्तित्व को ब्र्ह्मा के प्रकाश से प्रकाशित कर दिया है । जो ब्रह्मा के प्रकाश से आलोकित नही है, उनके व्यक्तित्व को कौन सुशोभित कर सकता है ।

भावार्थ-जिस घर में गोविन्द का निवास नही है, वह घर चौसठ कलाओ और चन्द्रमा की चौदह राशियों से आलोकित होने पर भी, अन्धकार ग्रस्त ही रहेगा।

-विशेष प्रस्तुत साखी में दो बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है । प्रथम ब्रह्मा के ज्ञान का प्रकाश चौपठ कलाओ और चन्द्र की चौदह कलाओ के समन्वित प्रकाश से भी अधिक है । द्वितीय, यह कि ह्रदय मन्दिर ब्रहा नु भूति के अभाव से शून्य और अन्धकार से ओन-प्रोत रह जायगा । (२) चाौसठ दीवा से तात्पर्य है चौसठ कलाएँ जो अज्ञान के अन्धकार को दूर करती हैं । (३) चौदह चंदा- चन्द्रमा को' १४ कलाएँ जो अन्धकार को नष्ट करती है 1 (४) घर से तात्पर्य है ८ शहूँदृरै ।

शब्दार्थ-चन्दा=चन्द्रमा । चानिणी=प्रकाश । निस अँधियारी कारणों, चौरासी लख चन्द । 3 अति आतुर ऊदै किया, तऊ द्रिष्टि नहि मन्द 1। १८यु। ब

सन्दर्भ---विगन साखी मे कवि ने कहा है कि "तिहि पत्र किनकी चाचिंड्डहँर्द जिहि धरि गोविन्द नाहिं" । उसी भाव को विकसित करते हुए यहाँ कबीर ने कहा है कि अज्ञान निशा को दूर करने के लिए अत्यंत आतुरता के णाव्र व्रड़दृ ८४ ११८१ प्लदृद्र को उदित करने का आयोजन किया जाय तो यह दूर नहीं होगा, यदि दृश्टि मध्या दे-, कारण मलीन है ५ भावार्य-रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए यदि अव्यन के गान ८४ लाख चंद्र को उदित किया जाय तो भी डश्वपऱद्रहर दृष्टि मलिन है|

विशेष -यदि दृष्टि ८३३ है, या मलिन है तो एक् रुझान पर एक चंद्र का प्रकाश भी नहीं दृष्टिगत होगा । ८४८: मीर नेमे के मध्य ८ यिदृड्डेदृरंदृ उपSagnik ganguly ivan (talk) 18:18, 4 July 2015 (UTC) [ ७४ ]पर्दा पड़ा है । इसी प्रकार ब्रह्मानुभूति शक्तति नथिक के बिना दृष्टि निमंल् नही होगी । (२)निस ***कारणौं-रात्रि के अन्धकार के कारण या रात्रि के अन्धकार को दुर करने के लिए । [३] [ ७५ ]गुरुदेव को अंग ] [७५

      विशेप -- माया के आकर्षक स्वरूप पर मानव उसी प्रकार भ्रम के कारण,

था अज्ञान के कारण मडला - मडला कर गिरता है, यथा दीप-शिखा पर पतग आकर्षित होकर प्राण अर्पित कर देते हैं । (२) "एक आध" से तातपर्य विरले । (३) प्रस्तुत साखी मे अप्रत्यक्ष रूप से सतगुरु की सामर्थ्य की प्रशंसा की गई है । वह सर्वथा स्तुत्य और वंदनीय हैं ।

      शब्दार्थ = पडंत = पडते हैं । उबरंत = उबरते हैं ।
             सतगुरु बपुरा क्या करै, जे सिपही मांहै चूक । 
             भाषै त्यूं प्रमोधी ले, ज्यूं  बॅसि वजाई फूँक ॥ २१ ॥ 
      सन्दर्भ-- यदि शिष्य माया मे अनुरक्त है, या दोषपूर्ण हो तो सतगुरु का 

वया दोष । सतगुरु की शिक्षा का कोई भी प्रभाव शिष्य पर नही द्दप्टिगत होगा , यदि वह दोषयुक्त हो । परन्तु निपुण या साधना में सिद्ध सतगुरु दोषो से अभिशप्त शिष्य को भी प्रबुद्ध कर लेता है । तथा कुशल वाद्यकार छिद्रो से युवत बासुरी के माध्यम् से सुंदर एव मनोहर राग प्रस्फुटित करता है ।

      भावार्थ-- सतगुरु बेचारा क्या करे, यदि शिप्य हो दोष या वटी पूर्ण है । 

(कुशल) सतगुरु उसी प्रकार से शिष्य को प्रबुद्ध कर लेता है । यथा कुशल बजाने वाला (बहु छिद्रो वाली) बांसुरी को वजा लेता है ।

      विशेष--प्रस्तुत साखी मे कवि ने युक्ति सगत वात का उल्लेख किया है । 

समर्थ सतगुरु शिष्य को वैसे ही उचित मार्ग पर ले आता है । यथा बासुरी बजाने वाला, बहुछिद्र सम्पन्न होने पर भी बासुरी को बजा लेना है ।

      शब्दार्थ--बपुरा = बेचारा । सिपाही = शिष्य ही । माहे = मे है । परमोधि 

= प्रबोध ।

            संसै खाया सकल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध । 
            जय बेधे गुरु खप्पिरां, तिनि संसा चुणि-चुणि खद्ध || २२॥
      सन्दर्भ-- सतगुरु के शब्दो मे अदभुत शपित एवं अदभुत प्रभाव है । उन

महानात्मा के शब्दवाणी ने शिष्य मे जिन छद्वितीय शगितयो को सपुलग्न कर दिया है, उनका उल्लेख पीघेसा सयो मे हो चुका है । मशय मे समस्त कुमार को नष्ट पर दिया है । पर जो सतगुरु के शब्दवाणी मे लाहत हो पृके है, उन्होंने मशय को भी स्पष्ट करके मृत्यु पर विषय प्रप्त कर ली है । [ ७६ ] ७६] [कबीर की साखी

        भावार्थ--संशय ने समस्त जगत को खा डाला । पर संशय को कोई न 

(खा सका या) नप्ट कर सका । परन्तु जन्हे गुरु के अक्षरो (शब्द वाणी ) ने बेधा (या आहत किया ) है, उन्होने ही संशय को चुन-चुन कर (खा डाला या ) नष्ट कर डाला ।

        विशेष--गीता मे भगवान् कृष्ण का उपदेश है; "संशयात्मा विनश्यति ।"

जो संशय, भ्रम, आशंका से परिपीडित हैं, वे नाश को प्राप्त होते हैं । (२)गुरु की वाणी मे या शब्द वाणी मे वह सामर्थ्य है कि शिष्य के समस्त संशय विनष्ट हो जाते हैं ।

        शब्दार्थ--खद्ध = खाया । जे =जिन्हे । बेध = बेधा है, या आहत किया 

है । चुणि = चुनि । सास = सशय ।

              चेतनि चौकि बैसि करि, सतगुरु दीन्हाँ धीर ।
              निरमै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर ॥२३॥
        सन्दर्भ--सतगुरु ने शिष्य के अनन्त लोचन ही नही उदघाटित किया, वरन् 

उसे धैर्य का वरदान भी दिया । साथ ही सतगुरु ने निःशक होकर ईश्वराराधना करने का भी उपदेश दिया ।

        भावार्थ--चैतन्य चौकी पर आसीन होकर सतगुरु ने धैर्य धारण करने का 

उपदेश दिया । धैर्य के साथ ही सतगुरु ने निर्भर एव निःशक होकर ईश्वर की आराधना का उपदेश दिया ।

        विशेष--'चैतन्य चौकी' पर बैठकर से तात्पर्य है ज्ञान की चौकी या 

ज्ञान के आसन पर बैठकर । (२) चैतनि धीर-ज्ञान के उच्च आसन पर बैठकर सतगुरु ने शिष्य को धैर्य का धारण करने का आशीर्वाद दिया । (३) निरभै होइ निसक भजि "से तात्पर्य है निर्भय और शका रहित होकर आरादन कर । (४) "भजि" से तात्पर्य है जप ।" यहा वह शब्द आदेशात्मक रूप मे प्रयुक्त हुआ है । (५) "केवल" का तात्पर्य है अद्वीत ब्रह्म "केवल" शब्द का प्रयोग सतो ने ब्रह्म अद्वीत अर्थ मे किया है।

        शब्दार्थ--चेतनि = चेतन = चैतन्य । बैसि = बैठि । धीर = धैर्य । निरभै 

= निर्भय । निसंक = निःणक । होइ = होकर । भजि = भज । करि = कर ।

              सतगुरु मिल्यात का भया, जे मानि पाड़ी भोल ।
              पामि विनंठा कप्पडा, क्या करै विचारी चोल ॥२४॥ [ ७७ ]    गुरुदेव की अग ]                                        [ ७७
        संदर्भ-- कबीर ने प्रस्तुत साखी का भाव "सतगुरु को अग" को २१ वीं 

साखी मे व्यक्त करते हुए कहा है "सतगुर बपुरा क्या करे, जै सिपाही माँहै चूक।" इसि भाव को किंचित अधिक विस्तार के साथ व्यत्क करते हुए कवि ने सुन्दर अप्रस्तुत, योजना की अयोजना की हे ।

        भावार्थ--यदि मन ही भूलो से भरा है तो, सतगुरु का मिलना और न 

मिलना समान है । यदि पाम मे विनष्ट या फटा । कपडा है, तो उसके आधार पर तैयार किया हुआ अगोवस्थ्र की क्या उपयोगिता होगी ।

        विशेश--प्रस्तुत साखी मे पुलभ एव सरल अप्रस्तुत योजना के माध्यम मे 

कबीर ने यह कहा है कि यदि शिष्य का मन माया मे ही अनुरक्त है तो सतगुरु बेचारे का क्या दोष । फटे हुए कपडे से शरीर नही ढका जाता है । यदी इतना होने पर भी कोई फटे हुए वस्त्र से चोल या चीली मिले और उससे शरीर आवृत नहीं सकते, क्पडे का क्या दोष ।

        श्ब्दार्थ--त = सो । का = क्या । भवा = हुआ । जो = यदी । पाडी = 

पारी या काछादित । भोल = भ्रम । पासि = पास आधिकार मे । विनठा = विनप्ठ । कप्प्डा = कपडा । चोल = चोली ।

               बूड़े थे परी ऊबरे, गुर की लहऱि चमंकि ।
               मेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरकि॥२४॥
        संदर्भ--गुरुदेव की अग की २० वी साखी मे कबीर ने गुरु को अद्वितीय 

शक्ति का उल्लेख किया है, जिसकी कृपा से एक आध शिष्य का उद्धार होता है । कबीर ने उक्त साखी मे कहा है " कहै कबीर गुर ग्यान थै एक आध उबंरत ।" यहाँ पर कबीर ने पुन: उसी आशय को अभिनय अप्रस्तुत योजना द्वारा नये शब्दों मे व्यत्क किया है ।

        भावार्थ--हम भव सागर मे मग्न थे । पर गुरु की (कृपा के) लहर सनक 

देखकर मेरा उद्धार हो नया । मनपूर की कृपा प्रात्त होते ही मैने जर्जर बेडा का परित्याग कर दिया ९और उस पर मे फडक कर उतर पडा।

        विशेष--गुरु की कृपा अगाध और निःगीम है यदा सागर । सागर की 

उतड्ग लहरो मे प्रजल शकि होनी है । उसी प्रकार सागर के समान गम्भीर, ध्यापक नि:साम सतगुरु का व्यक्तित्व है उन्की कूस लहरो मे अद्भुत शक्ति है । वह शिष्य का उद्धार करने मे मशक है । (२) बूडे थे परि ऊबरे" है भर सागर मे डूबे थे पर उद्धार हो गये । (३) "लहरि" से 'कृपा को मार ।' (४) "चमंकि" चमक या प्रकाश । गुरु की कृपा की ज्योति प्रकरित रूप का प्रकाशित । [ ७८ ] ७५ ] [ कबीर की साखी

हुई और अपने अज्ञान के अन्वकार मे मग्न शिष्य का उद्धार किया । (५) मेरा से तात्पर्य है "बेडा ।" यहाँ बेडा से तात्परर्य है लोक बैदानुमोदित मार्ग, या माया बेडा । 'जरजरा'--से तात्पर्य है जर्जर, क्षोण, विनाशशील मग्न प्राय (७) "फरकि" से तात्पर्य है फडक कर, या र्फाद कर ।

    शब्दार्थ--परी=पर, परन्तु । ऊबरै = उबरे, उद्धार हुआ । मेरा = बेड़ा 

जरजरा = जर्जर । ऊतरि = उतर ।

              गुरु गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार । 
              आपा  मेट जीवत मरै, तौ पावै  करतार ॥२३॥


    संदर्भ--गुरु और गोविन्द एक हैं, अभिन्न हैं । गुरु और गोविन्द से भिन्न 

जो कुछ है वह माया या भ्रम है । प्रेम रस पान करना सरल नही है । अहं के जीवित रहते ब्राह्मनुभूति असम्भव है । प्रेम के मार्ग मे अहं सबसे बड़ा बाधक है । कबीर ने सच कहा है "पीया चाहै प्रेम रस राखा चाहै मान । एक म्यान मे दो खड़ग देखा सुना न कान ।"

    भावार्थ--गुरु और गोविन्द मे अन्तर नहीं है । दोनो एक हैं । उनसे जो 

कुछ भी भिन्न है वह आकार या माया है । यदि जीते-जी (जीवित रहते हुए) अन्त का (मानव) परित्याग कर देते हैं, ब्रह्यानुभूति से सम्भावित है ।

    विशेष--प्रस्तुत साखी में कबीर ने दो भावो की अभिव्यक्ति की है । प्रथम 

यह कि सतगुरु और ब्र्ह्य अभिन्न है । सन्त, साहित्य मे यह भाव अनेक बार बड़े उत्साह के साथ व्यक्त किए जाते हैं । द्वितीय भाव यह है कि अहं ब्रह्यानुभूति = या आत्मानुभूति मे बाधक होती है । प्रेम एव ब्रह्याराधना के मार्ग मे अहं विनाश- करी । कबीर ने बारम्बार कहा है "यहु तौ घर है प्रेम का खाला का घर नांहि । सीस उतारै गहरे भुईं धरै पैठे घर माहि ।

 शब्दार्थ--दूजा = दूसरा, द्वैत । आकर = माया । आपा = अहं ।  करतार 

= ब्रह्य ।

              कबीर सतगुर नाँ मिल्याँ, रही अधूरी सीप ।  
              स्वाँग जती का पहरि करि, घरि घरि मांगै भीक ॥२७॥


    संदर्भ--प्रस्तुत साखी मे अपने युग की दुर्व्यवस्था और कुप्रवृत्तियो के प्रति 

कवि की प्रतिक्रिया अंकित की गई है । संत-साहित्य मे तत्कालनीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति चेतना के दर्शन होते हैं । [ ७९ ]यहाँ पर उन स्वांग भरने वालो की ओर सकेत किया गया है जो यती के भेप को धारण कर भिक्षाजंन मे प्रवृत है। भावार्थ- कबीर दास कहते हैं कि (शिष्य को) सद्गुरू प्राप्त हुआ और दोक्षा या शिक्षा अपूर्ण रही। यती का वेष धारण करके (अधुरी शिक्षा प्राप्त शिष्य) भिक्षाजंन करते फिरते हैं।
विशेष-- अनुभव एवं ज्ञान से शुन्य गुरु जो शिक्षा देता है, बह अपूर्ण या अधूरी शिक्षा ही अपूर्ण ज्ञान, नीतिकरो ने विनाशकारी माना है । (२) कबीर ने वेश स्वाग या तमाशा माना हैं।
शब्दार्थ-- स्वार्ग = तमाशा। जती = यती। पहरि = पहन। घरि = घर। भीष = भीख = भिक्षा। सीष = सीख = शिक्षा।
सतगुरु साँचा सूरवाँ, तातैँ लोहिं लुहार। कसखी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार ॥२८॥
सन्दर्भ--कृत्रिम या असगत गुरु मिलने का प्रतिफल होता है, "अधै अधा ठँलिया, दून्यू कूप पडत" तथा "दून्यू बूड़े धार मैं चढि पाथर की नाव।" सतगुर के सम्पर्क मे आने का क्या प्रभाव होता है। इसका उल्लेख कबीर ने प्रस्तूत "अंग" की साखी ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२, १३ आदि मे अकित किया है। यहाँ पर पुन कबीर ने सतगुरु की वन्दना करते हुए उसे तत्व एवं सार का शोधक माना है।
भावार्थ-- मतगुर सच्चा शुरमा है। यथा लुहार लोहे को दग्ध करके शुद्ध करता है उसी प्रकार साधना की अग्नि में तप्त करके शिष्य को शुद्ध कर लिया है। शिष्य को साधना की कसौटी मे कस कर कर कंचनवत् बना लिया है और सार तत्व को सम्प्राप्त कर लिया है। विशेष- प्रस्तुत नाखो मे साधना की अग्नि मे शिष्य को निर्मल कर लेने का, उल्लेह है। माया के अमार तत्व साधना की कसौटी से ही दूर किए जा सकते हैं।
शब्दार्थ-- साँचा = सच्चा। सूरिव = सूरमा = सूग्मा। तातै = तात = तप्त। कनणो = कमनो = कसौटी मे कसने की प्रक्रिया। तत = तत्व । ५.५.६.२
थापणि पाई चिवि भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हिराणजिवा, मानसरोवर तीर ॥२९॥
सन्दर्भ--प्रस्तुत साधी मे कवि ने "नवगुर की अग" को साधा २३ मया १२ का भाप उग यरियर्शन के नाथ किया गम है। कत-हुम् ने कह एव निब [ ८० ]कता का आशीर्वाद दिया और फलतः कबीर ने बहुमूल्य पदार्थों का वाणिज्य किया । यह वाणिज्य हीरे का था।

   भावार्थ्-गुरु से बीक्षा समाप्त हुई और बैज का वरदान मिला : कबीर

ने मानसरोवर के तट पर हीरा का वाणिज्य किया ।

    विशेष: तो यहाँ साधना की उन तीन अवस्थाओं का कबीर ने उल्लेख किया

है जिसका कवि खत: ने अनुभव किया था । थापणि या स्थापना से अनन्तर धैर्य और तदनन्तर साधक द्वारा हीरा का वाणिज्य । (२) स्थापना या दिक्षा के अनन्तर ही शिष्य को सतगुरु से धैर्य् धारण की साधना-पथ् पर अग्रसर होने का आशीर्वाद मिला । फलत: साधना मे रत रह कर कबीर ने मानसरोवर के तट पर हीरा रूपी हरि का वाणिज्य है (६) थापणि... भई- दीक्षा के अनन्तर थित मिली । शब्दार्थ -- थापणि = स्थापना । थित = स्थिरिता । धोर-धैयं । बणजिया - बाणिज्य किया । तीर-टट ।

         निहचल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस धीर ।
         निपजी मैं सने अज, स नहीं कबीर ॥३८॥
   संदर्भ्-- सतगुरु के अमोध दान के फलतः जीवन में सब कुछ सत्र प्राप्त 

उपलब्द हो गया । दुर्लभ ब्रह्मानुभूति प्राप्त हो गई । भवसतार में भटकती हुई जीवन नौका को लक्ष्य एवं गतव्य प्राप्त हो गया ब्रह्मा की अनुभूति का आनन्द अविभाज्य एव अभिव्यक्ति से परे हैं या असम्प्रेपणोय है ।

    भावार्थ्-- सतगारु द्वारा प्राप्त साहस एव वैयं के फलत: अमर निधिरुप

सार तत्व समाप्त हो गया । परमतत्व के साक्षात्कार से समुत्पन्न आनन्द को बटाने के लिये सभी समुत्सुक है पर कबीर उसे सम्प्रेिषत नही कर पाता है ।

     विशेष--विगत साखी मे कबीर ने हरि के लिए "हीरा" शब्द का प्रयोग

किया है और इस साखी में "निहचल निधि" का प्रगोगब्रह्मा तत्व के अयं मे किया है । लौकिक जीवन मे हीरा या निधि माया का प्रतीक है । मत होता है कि कबीर ने माया की इतनी भत्मंना की है फिर भी माया का प्रतीक है । ब्रह्मा तत्व के लिए क्यो प्रयोग किया है बात यह है कि सामारिक जोवन मे हीरा बहुमूल्य वस्तु मानी गई है । उसी प्रकार ब्रह्म साधनात्मक जीवन मे बहुमूल्य उपलब्धि है हरि रूपी निधि और होगा साधनात्मक जीवन मे उसी प्रकार बहुमुकल्य है यधा लौकिक जीवन के माया के प्रतीक धन या होरा । (२) तन = तक्ष्व-ब्रह्म वत्व । (३) नीपजी... कबीर-ब्रह्मानुमूनि का आनन्द अबिभाजनीव है असम्प्रेणोय है । वह आनन्द स्वत: अजित किया जाता है, उधार में नही प्राप्त होता है । [ ८१ ]

   [ गुरुदेव कौ अग                                            [५२
    शब्दार्थ--निहचल = निश्चल । तत = तत्व । निपजी = उपजी । थणा = 

धना-धनीभूत ।

                 चौपडि मांड़ी चौहटै, अरध उरध बाजार ।
                 कहै कबीरा रामजन, खोलौ संत विचार ॥३२॥
    संदर्भ--कबीर ने प्रस्तुत अग की साखी १२ एव्ं १६ मे वाणिज्य का 

उल्लेख किया है । अब प्रस्तुत साखी एवं आगामी साखी मे चौपड एवं पासा के खेल का उल्लेख किया । आध्यात्मिक जगत मे चौपड का भिन्न अर्थ होना है ।

    भावार्थ--चौराहे पर चौपड सुशोभित है । ऊपर नीचे बाजार लगा हुआ 

कबीर कहते हैं कि सतजन । विवेक पुर्वक इम चौपड के खेल को खेलो ।

    विशेष--अरध  बाजार ऊपर नीचे चक्रो का बाजारा बिछा हुआ ही 

शरीर मे पटचक्र है । मूलाचार प्रथम और सहखार अतिप चक्र है ध्यान रुपी मोहरें या गोटो से साधक खेल रहा है प्रत्येक चक्र पर ध्यान केन्द्रिन करके पुन: आगे बढ़ता है । (२) चौपडि चोहट शरीर रूपी चौरहे पर चौपड बिछी है । खेलौ सत विचार से तात्पर्य है कि सतो ध्यान पूर्वक इस खेल को खोलो ।

    शब्दार्थ--माँडी = मडित । चौहटे = चौराहे । अरध अरध = ऊप्र-नीचे ।
                 पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर ।
                 सतगुर दाव घताइया, खेलै दास कबीर ॥३२॥
    संदर्भ--"चौपडि माँडी चौहटै अरध अरध बाजार।" ऐसे बाजार मे काबीर 

राम जन से उपदेश देते हुए कहते हैं "शेलौ संत विचार"। शरीर रूपी चौपड मे प्रेम का पाना फेकने क रूपक कबीर ने यहाँ पर बडी स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है । विगत साखी मे कबीर ने इस खेल को खेलने के लिए सहजन के विवेक पर विश्वास रखे हैं । यहाँ सतगुरु के निदॅशन के अनुमार दाय चलने का आदेश कबीर ने बताया है ।

    भावार्थ--शरीर को चौपड पर प्रेम का पाना पकड़ कर, सतगुरु के आदेशा-

नुसार कबीर दाव चल रहा है ।

    विशेष--प्रेम का पासा और शरीर का चौपड यही ही अथार्थ और युमि-

सगत अप्रस्तुत योजना । शरीर के चौपड पर प्रेम के पासे का खेल स्वाभाविक और लौचित्यपूर्ण है । प्रेम के इस खेल मे दाव बचाने वाला या निर्देशन देने वाला सतगुरु ही कुशल गुरु के निर्देशन समप्राप्त हो जाने के कारण शिष्य के लिए परामद का कोइ अवसर नहीं है । [ ८२ ]"खेलै दास कबीर" मे आत्मविश्वास द्दढ़ता तथा सतगुरु पर आस्था का भाव प्रतिबिम्बित होता है ।

शब्दार्थ--सारी = चौग्ड । सरीर = शरीर । दाव = दाव, चाल । बताइया = बता रहा है।

सतगुरु हम सूँ रीभ्कि करि, एक कह्या प्रसंग ।
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥३३॥

सन्दर्भ-प्रस्तुत प्रसंग में कबीर ने अनेक बार कहा है कि "सतगुरु मार्या बाण भरि," 'सतगुरु साचा मरिवो, सबद जु बाह्य एक"। "लागत ही मैं मिट गया, पड़या कलेजे छ़ेक" तथा "सतगुरु लई कमांण कहि, बाहण लागा तीर। एक जु बाह्या प्रीति सूं भीतरि रह्या सरीर।" एक शब्द बाण से आहत होने के अनन्तर, अब कबीर का अन्तर प्रेम के बादल से भीग जाने का वर्णन है। यहाँ सतगुरु ने एक प्रसंग कहा है और वहाँ एक कमांन के चलने का उल्लेख है। दोनों का फल एक ही है। परन्तु प्रभाव दोनों का दिव्य, असाधारण और ब्रह्यानुभूति है।

भावार्थ-सतगुरु ने हमसे प्रसन्न होकर एक प्रसंग कहा। फलतः प्रेम का बादल बरसा और सब अंग आर्द्र हो गए।

विशेष-सतगुरु ने शिष्य की योग्यता, सच्चाई और लगन देखकर उसके उपयुक्त प्रेम का एक प्रसंग प्रस्तुत किया। यह प्रेम का प्रसंग ब्रह्यानुभूति का प्रसंग था। प्रेम का यह प्रसंग इतना प्रभावशाली था कि शिष्य के समस्त अंग उसी से आर्द्र हो गये। इसी भाव से प्रेरित होकर कबीर ने अन्यत्र कहा है कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल। लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" यहाँ भी प्रेम का अनुराग के रंग में समस्त अंगों के भीग जाने का वर्णन है।

शब्दार्थ--रीभ्कि = प्रसन्न । बरस्या = बरसा । भीजि = भीगि = भीग ।

                 कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ ।
                 अंतरि भीगी आत्मां, हरी भई बनराइ ॥३४॥
      सन्दर्भ--प्रस्तुत साखी मे कबीर ने पुनः प्रेम के बादल की वर्षा और उसके 

व्यापक प्रभाव का वर्णन किया है ।

      भावार्थ--कबीर कहते है कि प्रेम का बादल हम पर आकर बरसा । फलतः 

अलस और आत्मा उसके प्रभाव से भीग गया और बनराय हरा हो गया ।

      विशेष--अतम माया के आकर्षक आवरण तथा पंच विकारो (काम, क्रोध, 

मद, मोह, लोभ) मे अनुरक था । परन्तु यहा प्रेम के जल या सतगुरु के उपदेश जल [ ८३ ] सुमिरन कौ अंग ] [ ३

मे वह भीगकर विशुद्ध हो गया । (२) आत्मा, असार, अशुभ और अपवित्र तत्वो से परिवेष्ठित थी । प्रेम के जल से धुल कर वह स्वच्छ हो गई । (३) शरीर रूपी यह चनराय प्रेम के जल से सिंचित होकर हरा-भरा हो गया । (४)"अंतरि भीगो आत्मा" तात्पर्य है अतस (या मन) तथा आत्मा दोनो प्रेम के बादल से आर्द्र हो गये ।

     शब्दार्थ--परि = पर । बरष्या = बरसा । अंतरि = अंतर । भई = हुई । 

चनराइ = चनराय ।

           पूरे सूँ परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि ।
           निर्मल कीन्ही आत्मा, ताथै सदा हजूर ॥३५॥
     सन्दर्भ--सतगुरु की कृपा से, उसके आशीर्वाद से पूर्ण ब्रह्म से परिचय 

प्राप्त हो गया और भव सागर के समस्त ताप दूर हो गए । सर्वत्मा से मिल कर यह आत्मा विशुद्ध हो गई ।

     भावार्थ--पूर्ण ब्रह्य से परिचय हुआ और सब दुःख दूर हो गये । आत्मा 

निर्मल हो गई और प्रभु ( या ब्रह्म ) से संलग्न हो गई ।

     विशेष--(१) उपनिषदो मे ब्रह्म को पूर्ण अभिव्यक्त करते हुए कहा गया है 

"पूर्णमदः पूर्णमिदः पूर्णविपूर्ण मुदच्चते । पूर्णस्य् पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।" उपनिषदो के उसी पूर्ण भाव को कबिर ने यहाँ ग्रहण करके उस ईश्वर को "पूरा" कहा है । "एक सद्विप्रा बहुषा बदन्ति ।" उस पूर्ण ब्रह्म से परिचय हो जाने के अनन्तर समस्त दुःख दूर हो गये । निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्य से साक्षात्कार होते ही आत्मा विशुद्ध हो गई । मलीन दारी काम क्रोधादि मे अनुरक्त शरीर मलीन हो गया था, सो अब पवित्र हो गई ।

     शब्दार्थ--सूं = से । परचा= परिचय । मेला = फैका । दूरि = दूर ।

हजूरि = हुजूर = स्वमी ।

                  २. सुमिरन को अंग
        कबिर कहता जात हुँ, सुणवा है सय कोइ ।
        राम कहें भला छोइगा, नहिं तर भला न छोइ ॥२॥
     सन्दर्भ--राम नाम पत्याण का अक्ष्य नोत है । उन्के अभाव मे मानव 

का भला या करवाण नहीं होगा । नाम खगता विकारों के लिए औपधि है । [ ८४ ] ८४] [ कबीर की साखी

      भावार्थ--कबीरदास कहते है कि मैं यह बराबर केहता जा रहा हुँ और 

सब मेरा कथन सुनते जा रहे है | राम कहने से, जपने से ही कल्याण होगा । अन्यथा कल्याण नही होगा|

         विशेष--"कबीर......हूँ" से तात्पर्य है कि कबीर अनुभव तथा द्दढ 

विश्वास को प्रकट कर रहे है | (२) सुंणता है.......कोई = से तात्पर्य है सब मेरे कथन को सुन रहा है । (३) राम.....होई = राम नाम जप ही कल्याण का स्त्रोत है । उनके अभाव मे माया के विकार अपना प्रभाव प्रसारित करते जायेंगे ।

         शब्दार्थ--सुणता = सुनता । तर = तो । भला = कलयाण ।
              कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस ।
              राम नाँव ततसार है, सब काहू उपदेश ॥२॥
         सन्दर्भ--विगत साखी मे कबीर ने कहा है "कबीर केह्ता जात हुँ सुणता 

है सब कोइ।" यहाँ पर कबीर ने उसी भाव को पुन: व्यकत किया है कि जो मैं कह रहा हुँ वह परम्परागत या सनातन सत्य है । वह सत्य ब्रह्मा और महेश द्वारा भी समर्पित है । संसार मे राम नाम ही तत्व सार है ।

         भावार्थ--कबीर कहते है कि मैं यह कह चुका हूँ और यही मेरा सब को उपदेश है कि संसार मे राम नाम ही तत्व और सार वस्तु हैँ । यही ब्रह्या और महेश का भी कयन है ।
         विशेष--प्रस्तुत साखी मे कवि ने परम्परागत चिर समर्थित सत्य की अभि-

व्यक्ति की है । कबीर नाम के महत्व के सम्बन्ध मे परम्परागत सत्य को प्रकट करते हुए उसके महत्व को उपदेश के रूप मे व्यक्त करते हैं | राम नाम समस्त साधना का तत्व और सार है |

         (२) सत दरिया ने भी इसकी प्रस्तुत विशेषता की ओर संकेत करते हुए 

कहा है "राम नाम निजु सार है |" कबीर दास दरिया के शब्दो का समर्थन करते हुए केहते है "नाम सरोवर सार है सोह सुरत लगाय"|

         शब्दार्थ--कथि = कहि | नवि = नाम | तत = तत्व | काहू = को | कहै = 

कहता है |

               तत तिलक तिहुँँ लोक मैं, राम नाँव निज सार |
               जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥३॥
         सन्दर्भ--संसार मे राम नाम समस्त साधना का तत्व है । बारम्बार कबीर 

ने इसी भाव पर बल दिया है । जीवन और व्यक्तित्व नाम के सम्पर्या से और भी अधिक सुशोभित हो गया । [ ८५ ]सुमिरन कौ अंग ] [८५

   भावार्थ - तीनो लोको मे राम नाम सार तत्व है । जब से कबीरदास ने 
  उसे अपने मस्तक पर धारण  किया है , तब से अपार शोभा से युक्त हो गया ।
       विशेष -- प्रस्तुत साखी मे कबीर ने राम नाम की  दो विशेष्ताओ का उल्लेख् 
 किया है । प्रथम , राम नाम तत्व  और सार है । द्वितीय वह तिलक  के रुप मे मस्तक्  
   पर धारण करने से व्यकतित्व की शोभा अभित्रद्व हो जाती है ।
 शब्दार्थ - तिहुं = तीनो । मैं = मे । नाव = नाम । सोभा = शोभा ।
      भगति भजन हरि नांव है , दूजा दुक्ख श्रपार ।
      मनसा बाचा क्रमनां , कच्रीर सुमिरण सार ॥४॥ 
    सन्दर्भ -- संसार दुखः का सजीव और सक्रिय रुप है। यहाँ हरि नाम   
स्मरण के अतिरिक्त और है ही क्या? विगत साखो मे कबीर ने राम नाम को सार ,
 तत्व ,तिलक तथा शोभा का आधार माना है। प्रस्तुत अंग कि द्वितीय साखो मे भी

कबीर ने कहा है " राम नाम ततसार है ।"ऐसे महत्वपूर्ण राम नाम का धयान मनसा, वाचा, कमंणा करना ही दुखः के आगार को विध्वंस करना है ।

    भावार्थ - ईष्वर का भक्ति और नाम स्मरण पर भजन ही सार तत्व

है और सब अपार दुखः का आधार है । काबीर का मत है कि हरि का नाम मनसा, वाचा और कमंरण स्मरण करना सार है ।

     विशेष-(२)भगति ........ है : से तात्पर्य है कि भक्ति और हरि के

नाम का भजन ही सार तत्व है । (२) दूजा ...... अपार भक्ति और हरि नाम स्मरण के अतिरिक्त सब कुछ अपार दुखः क अपार माया है । (३)जिस हरि नाम क इतना महत्व है , जो 'ततसार ' है , जो मुक्ति और भक्ति प्रदान करने वाला है , उसकी साधना मनसा , वाचा कमरण होनी चाहिए। (४)"मनसा वाचा क्रमना' से तातपर्य है समस्त चेतना के साथ, निष्ठा और एकाग्रता के साथ,वारणो-वचन , मन तथा कृयात्मक रुप मे अथवा हर प्रकार से । (५) कबीर ....... मार =स्मरण या हरि का भजन सार तत्व है , समस्त साधना का सारांश है। (६)सुन्दर दाग ने कबीर के प्रस्तुत भाव का समधंअन करते हुए कहा है "नाम लिय तिन नव किया सुन्दर जप तप नेम । तोरच अटल समान य्र्त तुला बेठि द्त हेम।"

   शब्दार्थ - भगति = भक्ति । नाव - नाँम । दुखः = दुख। _____
          कबीर सुमिरण सार है , खोर सकल जंजाल। 
          खादि खति सय सोघिया , दूजा देस्यो काल । (७)॥
       सन्दर्भ - कबीर आ मन है कि नामज्नर हो रनस्त  मापता रा सार है।
   दुखके अतिरिक्त ममस नापनाए ही ग्यान है । दिगनु मानव ने कबीर _ कहा है। [ ८६ ]

“भगति भजन हरि नवि है, दूजा दुक्ख अपार।" उसी भाव को अधिक विस्तार के साथ यहॉ व्य्क्त करते हुए कबीर ने पूर्व भाव पर बल दिया है।

भावार्थ - कबीर कहते है कि नाम स्मरण ही समस्त साधना का सार तत्व है। नाम-जप के अतिरिक्त समस्त साधना जंजाल है। मैने आघोपांत समस्त साधनाओ को शोघा (देखा) लिया, नाम के अतिरित्क सब काल है, विनाशकारी है।
विशेष - (१) सुमिरण सार है-समस्त साधनाओ का सार तत्व।  नाम स्मरण समस्त साधना का सारांश है। सुन्दर दास का भी मत है कि " सकल सिरोमनि नाम है, सब धरमन के माहि । अनन्य भक्ति वह जानिये , सुमिरन भूलै नाहि।" (२)"और सकल जजाल" नाम जप के अतिरिक्त और सब जंजाल है, माया है,चाहाचार है।" (३) आदि ...... सोघिया" से तात्पयॅ है आघोपांत सब कुछ सब साधना का मूल्यांकन किया। (४)" दूजा ….. काल" नाम के अतिरिक्त सब काल या विनाशकारी है।
       

शब्दार्थ- सोघिया= शोघा । दूजा = दुसरा । काल= विनाशकारी ।

     च्य्ंता तौ हरि नाव की,क्षौर न चिंता दास।
     जे कुछ चितवैं राम विन,सोइ काल की पास ॥६॥
सन्दर्भ - विगत साखी की दितीय प्ंत्कि मे कवीर ने राम नाम की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा है "आदि अन्त सब सोधिया , दूजा देखौं काल" प्रस्तुत साखी मे कबीर ने उसी भाव को दुसरे शब्दो मे व्य्क्त करते हुए कहा है " जे कुछ चितवै रामविन, सोई काल की पास।" सच्चे साधक को हरिनाम की चिन्ता रहती है। हरिनाम के अतिरिक्त जो कुछ   अन्य है वह काल या विनाशकारी है।                                                               

भावार्थ - हरिभक्त या हरि के दास को एक मात्र चिन्ता हरिनाम या नाम जप को रहती है। इसके अतिरिक्त उसे और कोई चिन्ता नही रहती है। राम के अतिरिक्त और जो कुछ देखा या छिन्तन किय जाता है वह काल का विनाश का वारग है। विशेष-(१)प्रस्तुन साखी मे कबीर ने हरि के नाम के साधक की निष्ठा तथा लगन की ओर सकेत किया है हरिदास एकग्रता के साथ,निष्ठा के साथ हरि का चिंन्त्न करता है । (२) राम के नाम या राम की सिथ्ती से विहीन जो कुछ है,वह सब विनाश या माया है। (३)'नारद पुरा ण 'में भी इसी प्रकार उल्लेख हुआ है " हरे नमि हरे नमि , हरे नमिव के वल्भू। क्लौ नारत्येव स्त्येव गतिरन्यया।"(४/४९/११५)। [ ८७ ] सुमिरन कौ अंग

              शब्दर्थ-च्यंता=चिन्ता। नॉव =नाम। चित्वे=देखे। पाप=पाश।

              यंच संगी पिव करै,छठा  जु सुमिरै मन। 
              श्राई सूति कबीर की, पाया राम,रतन॥७॥
                 
         प्रसंग - प्रस्तुत परिच्छेद की चतुथं साखी मे  मामारिक प्रणियो को उपदेश देते हुए कबीर ने कहा है 'मनसा वाचा क्रमना, कबीर समिरगा सार।" और प्रस्तुत साखो मे कबीर की पंच गाय्नेन्द्रिया और मन पूरणतया पर ब्रह्म मे अनुरक्त हो गया है प्रस्तुत परिच्छेद मे कबीर ने नाम की महत्ता का अनेक बार महत्व वरणन किया है। " राम नॉम ततसार है," 'राम कहे भल होइगा," 'राम नाव निज सार," कबीर सुमिरण सार है," आदि  महत्व को ह्रदयगम कर लेने के अनन्तर कबीर मुक्ति प्रप्त हुई और उसे राम रतन की प्रप्ति हुई।
         भावार्थ- पच ग्नानीन्द्र्या एव मन राम नाम का स्मरण सतव रूप से कर रहा है। कबीर को समाधि अवस्था मे राम्ररत्न सम्प्राप्त हुआ।
          विशेष-- प्रस्तुत साखी मे कबीर ने अपनी उस निष्ठा और  एकाग्रता का उल्लेख किया है जिसको सामान्य रूप से सपूदा प्रत्येक सावन प्राणी को होता है। रहस्यवादी के लिए जीवन क्ष्ण धन्य होता है जब वह मनसा, वाचा कमणा ब्रह्म और रावना मे प्रव्रुत्त हो जाता है उसकी समस्त इन्द्रियॉ ब्रह्म के प्रति उन्मुख होकर,  ब्रह्माकार बनने की चेष्टा मे अनुरक्त हो जाती है।(२) समाधि की अवस्था मे कबीर को ब्रह्मनुमूति प्राप्त हुई जो साधक की चरम उपलब्दि होता है।
            शब्दथ= पच सगी=पच ग्नानेन्द्रिय । पिव=प्रिय=प्रह। नूति=समाधि। रतन= रत्न।
                
              मेरा मन सुमिरै राम कॅू, मेरा मन रामहिं प्पहि।
                श्र्व मन रामहि है रहा, सीस नवाचौ काहि॥८॥
     संदर्भ- समाधि मे ब्र्हम का दशॅन प्राप्त कर लेने पर आत्मा श्र्हगनार हो जाती है। जब आत्मा परमात्मा मे समाहित हो गई , मन भेद सम्मान होगए और माया जीवन भेद के विनष्ट हो जाने मे उभय एक हो गए तो दान _____करे और कौन _____

भावाथ--राम की सम्रण करते-करते मेरा मन _____हो गया है। _____ मन स्यम राम हो गया तो _____

विशेष-(१)_____ मे _____ उल्लख किया है जब वह [ ८८ ]कबीर को साखी स्तर पर पहुँच कर कबीर ने कहा था कि "तू तू करता तू मय मुझ् मे रही न हूँ। चारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूं ।" संत मलूकदास् ने भी इसी प्रकार की अनुभुति हो जाने पर लिखा था "हम सवहिन के सबहि हमारे जीव ज्न्तु मोहिं लगै पियारे ।" इस स्थिति का उद़्भव तब होता है जब साधक की "पच सगी पिव पिव करै , छठा जु सुमिरे-मंन ।" इसी स्थिति मे कबीर ने कहा था "अब मन रामहि हो रहा , सीस नवावौं काहि ।" (२) "अब मन.... काहि "उस परिस्थिति का सूचक है जब साधक अदेव्त् ब्रह्मा मे समाहित हो जाता है । (३)यहाँ पर सावक की उस अवस्था का वर्णन् है जब वह् आन्न्दातिरेक मे उद्घोषित कर उठ्ता है" शिवोSह्ं । "अह ब्रह्म्मासि ।"

              शब्दार्थ -- य्हौ=हो । रह्ज्ञा=रहा । सीस=शीश । 
                 तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ । 
                  वारी फेरी वलि गई, जित देखौ तित तूँ ।६॥
 स्न्दर्भ --विगत साखी मे कवि ने उस परिस्थिति का वर्ण्न किया है, जब "साधक ब्र्ह्म्माराघना करता-करता या नाम जप मे इतना अधिक अनुरत्रत हो जाता है कि वह ब्रह्म्मामय या ब्रहम्माकार हो जाता है । आत्मा और परमात्मा के मध्य मायाकृत भेद विलीन हो जाता है । प्रस्तुत साखी मे उसी भाव को किंचित अधिक विस्तार और स्प्ष्ट्ता के साथ अंकित किया गया है ।
 भावार्थ--तेरा ध्यान करते-करते मैं 'तू'ही हो गया । मुझमे मेरा पाथंक्य व्यह या व्यतित्व की मिश्र्ता शेष नही रह गाई ।(फलत:) मेरा बारंबार का आवागमन विनष्ट हो गया । अब तो जिधर देखता हूँ उध्रर तू ही तू है ।
  विशेप--क्बीर की एक बड़ी ही प्रसिद्ध साखी है "लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल । लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" प्रस्तुत साखी मैं तू तू करता तूभया का भाव बढ़े ही माघुयं पूर्ण शब्दों मे, सरल शैली मे व्यक्त कर दिया गया है । कबीर को साखियो मे भाव साम्य है, पर शब्दों की भिन्नता । (२) मुझ... हूँ से तात्पर्य है कि मेरा व्यह, मेरी पायंक्य की भावना का लोप हो गया । (३) बारी फेरी... गई से तात्पर्य है कि मेरा आवागमन् समाप्त हो गया ।
       शब्दार्थ-- तू=तुम=राम । हूँ=व्यह । वारी=आवागमन ।फेरी=फिर गया, न्नास हो गया । जित=जिधर । तिन=उधर ।
           कबीर निरभै रामजपि, जय लग दीवै वाति ।
           तेल घट्चा बाती बुकी, (तय) सोचोगा दिन राति ॥१०॥ [ ८९ ]सुमिरन कौ अंग ]
सन्दर्भ्- "गुरुदेव कौ अंग" की तेइमवो साखी मे कवि ने कहा है "चेननि चौकी बैठिकरि, सतगुरु दीन्हाँ घोर । निरभै होइ निस्ंक भजि केवल कहै कबीर। " प्रस्तुत साखी मे कवि ने पुन: निसक और "निरभै" होकर राम का जप करने का उपदेश दिया है। मानव का जब तक जीवन दीपक जल रहा है, तब तक मानव को नाम जप करना चाहिए।
भावार्थ--कबीरदास का कथन है कि जब तक दीपक में बती है तब तक निर्भय होकर राम का जप कर। तेल के निशेष हो जाने पर बत्ती भुझ जायगो और तू पांव पसार कर दिनरात सोयेगा।
विशेष--प्रस्तुत साखी मे कवि ने निर्भय होकर ब्रम्ह नाम जप का उपदेश दिया है। यह उपदेश कवि ने एक बड़ी ही सरल तथा स्वाभविक अप्रस्तुत योजना के माध्यम से व्यक्ति की है। शरीर रुपी मे प्राण रुपी वर्तिका है और मामव्यं रुपी तेल विधमान है इस वसिका और तेल के घट जाने पर मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और वह अनन्त काल तक सोता रहता है ।(२) शरीर से आत्मा के विलग हो जाने पर शरीर निश्चेष्ट हो जाता । जड शरीर के माध्यम से धर्म साधना अस्मभव हो जाता है। इसीलिए कवि ने यहाँ पर जीवन रहते- रहते साधन करने के लिए उपदेश दिया है। (३)"(तब) सोवेगा दिन राति" का ताश्पयं यह है कि मृत्यु को प्राप्त होगा । (४) निरक्षर कबीर की अप्रस्तुत योजना कित्नी यथाथं ओर प्रभावशाली है,यह प्रस्तुत साखी से स्पष्ट हो जायगा ।

शब्दार्थ--निरभै= निभॅय। जपि=जप । लग=तक । दोपै=दीपक मे बाति=बती=वतिका।घटना=घटा । राती=रात

    कबीर सूता क्या करे, जागि न जपै मुरारि ।
    एक दिनां भी सोवरगां,लवे पाँव पसारि ॥१२॥

सन्दर्भ--विगत साखी मे कवि ने कहा कि "तेन घटया वातो वुकी,(नव)सोवेगा दिन राति।" कसंन्य ओर साधना से विमुत प्राणियो को चेतावनी प्रदान करते हुई कवी ने पुनः जाकृत होकर नाम जपने के लिए मानव समाज को अनुप्राप्ती करने की चेष्टा की है।

भावार्थ---- कबीरदास कहते है कि हे प्रारगो नोया हुग तु का कर रहा है । जाग्रत होकर भगवान के नाम का स्मरण क्यो नहीं करता है। अनठोगता एक दिन तो लम्ये पैर पगार कर तुम्मे मोना ही है।
विशेप--(५) प्रस्तुत मागो मे कबीर ने अञान _____ मे प्रसतुत प्रागिदा को सपेत करते हुए कहा है जोयन के _____ [ ९० ]परिस्थितियो से दूर रहकर नाम साधन के लिए उपदेश दिया है।(१)"सूता" से तात्पर्य है अज्ञान

निशा मे कतंव्य की ओर से विमुख या प्रसुप्त ।(३) जागो से तात्पयॆ है सचेत होकर । (४) एक दिन से तात्पर्य है अन्ततोगत्वा । (५)"भी" का तात्पर्य तो ।" (६) "सोवरग" से कवि का आशा है मृत्यु को प्राप्त होना । (७)लबेॱॱॱ पसारि से तात्पयॆ है पैर फैला कर । "लंबे पवि पसारि" का प्रयोग कवि ने कहावत के रूप मे किया है । अशिक्षित कबीर ने प्रस्तुत कहावत का प्रयोग बडे ही यथाथं और स्वाभाविक शौली मे किया है। शच्दार्थ--सूता=सोता=सुप्त । दिना=दिना=दिन । सोवरगा=सोवना= सोना । पसारि= पसार फैलाकर । कबीर सूता क्या करै, काहे न देखै जागि । जाका स्ंग तै वीछुड़या, ताही के संग लागि।।१२॥ सन्दर्भ- कबीर ने प्रस्तुत परिच्छेद की द्शम साखो मे कहा है "कबीर निरभै राम जी, जब लग दीवै वाति। तेल घटया बाति बुभ्ऱी, (तव) सोवेगा दिन राति।" "सोवेगा दिन राति" चेतावनी प्रस्तुत करने के बाद प्रस्तुत साखी मे कवि ने अञान निशा मे प्रस्तुत, माया मे सलग्न मानव को कतंव्य पथ से विमुख प्रारगी से जाग्रत होकर क्तॆव्य पध को देखने का आगृह किया है। भावार्थ-कबीर कह्ते है कि प्ररगी ! तू सोया हुआ क्या कर रहा है। जागृत होकर क्यो नही देखता है। जिसके साह्चयं ए॓ तू विमुत्त हुआ है, उसी के सग पुन: जा लग। विशेप--(१) प्रस्तुत साखी मे कवि ने कतंव्य एवं नाम जप से विमुख निंदा से अभिभुत है प्रारिगयो को ज्ञान के नेत्र उद्घाटित करने के लिएआगृह पूर्ण उपदेश दिया है।(२) 'सुता' से तात्यं है अज्ञान निशा मे, माया से परिबेप्ठित सोया हुआ था। चेतनाविहीन यहा 'सुता' शव्य का प्रयोग चेतना वहीन या निशचे के लिये क्षघिक उपयुतृ प्रतीत होता है। (३)'काहे न जागि' से तात्पयं है कि प्रबुध्द होकर ज्ञान के क्षेत्रो से या सचेत होकर क्यो नहीं विवेक पुरंग कायं मे सलाग्त होता है।(४) जाकाॱॱ बीछुछ्था' से तात्पयॆ है कि जिसके सम्पकं से तू वियुत हुआ है। लात्मा परमात्मा से चिमुत्त हो कर माया के द्वारा पथ-भ्रषट कर दी गई है। हमे भाच की लभिव्यति एक साखी मे कबीर ने कहा है 'पुत पियारी पीना पि' गौहनि लागा घाइ। लोग मिठाइ हाथि दे,अपर गया भुलाई।' माया कवि मिठाइे पाकर आत्मरूपी बालक अपने पिता को बिसर गया। (५)'ताही प मग सागि' से तात्वयं है कि कवी के साथ लगकर एकाकार हो जा। [ ९१ ]सुमिरन कौ अग ]

मे इसी स्थिति का वर्णन करते हुए कबीर ने कहा है 'पानी ही थै हिम मय हिम ॠौ गया विलाय। जो कुछ था सोइ भया अव कुछ कहा न जाय।'

शब्दार्थ - सूना= सोता= सोया= सुप्त । जागि = जागकर । जाका = जिसका । तै = तै । बीछुडया = बिछुडा । ताही = उसी लागि = लाग = लग ।

                      कबीर सूता क्या करै, उठि न रोवै दुक्ख ।
                      जाका बासा गोर मैं, सो क्यू सौवै सुक्ख ॥१३॥

सन्दर्भ - नाम जप से विमुख प्राणी को सचेत करते हुए कवि ने विगन साखी मे कहा है कि ' कबीर सूता क्या करै काहे न देखै जागि' तथा ' कबीर सूना क्या करै जागि न जापै मुरारि । ' परन्तु यहा पर कवि ने कहा है ' उठि न रोवै दुक्ख । ' जिसका कदम कब्र मे रखा है, वह सुख से कैसै सो सकता है।

भावार्थ - कबीर दास कहते है कि हे प्राणी ! तू अज्ञान निशा मे पड़ा हुआ क्यो सो रहा है । तू उठकर अपने प्रिय के वियोग मे जो दु:ख का अनुभव हो रहा है उसके प्रति क्यो नहि खेद प्रकट करता। जिसका निवास स्थान कब्र है, वह सुख पूर्वक कैसे सोता है।

विशेष - विगत साखी मे कबीर ने कहा है ' जाकि मग तै बीछुडया ताही कि संग लागि।' प्रियतम से वियुक्त मानव को अपने दु:खो के प्रति खेद प्रकट करना चाहिए। प्रियतम से वियोग होने का दु:ख सर्वत: महान विपत्ति है। परन्तु मानव उस दु:ख को भूलकर माया के आवरण मे अनुरुक्त रहता है। लोभ की मिठाई के पाते ही वह अपने आप को भूल जाता है। कबीर इस प्रकार मे अज्ञान निशा मे आत्म विस्मृत प्राणियो को सचेत करते हुए कतंव्य पूर्ति की ओर उनमुक्त रहने का उपदेश दिया है। (२) 'जाका ॱॱॱ सुक्ख' से कबीर का तात्पर्य है कि जो मरण्शील है, जिसका निवास स्थान कब्र हैˌ वह सुख पूवॆक कही पर भी हो सकता है।

शब्दार्थ - वासा = निवास स्थान । गोर = कब्र । नै = ने । क्यूं = क्यो ।

                          कबीर सूता क्या करै,ॱ गुण गोविन्द के गाइ ।
                          तेरे सिर परि जम खडा, खरच करे का खाई ॥ १४ ॥

सन्दर्भ - प्रसतुत साखी मे कबीर ने साधन मे विमुक्त प्राणियो को चेतावनी देते हुए य्म का स्मरण दिलाया है जो किसी भी दशा मे किसी प्राणी का नही होता है, और गर्व पर माल का प्रहार करता है।

भावार्थ - कबीर केह्ते है कि हे प्राणी ! तू साधन की निद्रा मे पड़ा क्या कर रहा है। यम तेरे सर पर खड़ा है। तेरे सहारे गर्व करने सा हुआ है। [ ९२ ]

  कबीर की साखी
विशेष- गोविनन्द के गुणो का गान करना जीवन का परम पुण्य है| कबीर ने विगत साखियो मे सततरुप से सचेत होकर साधन मे रत रहने का उपदेश दिया है | कबि कभी कहता है 'जाका वासा गोर मैं सो क्यु' सोवै सुक्ख; आैर कभी वह कहता हैं ' एक दिन'भी सोवणा लबे पाव पसारि ।॔ उसि विचार परम्परा मे वह कवि पुन: यहा पर कह्ता हैं कि ॓तेरे सिर परि जम खडा ख्ररच करे का खाइ|॔ (२) ॓ख्ररच करे का खाइ॔ मे कवि ने महाजन और कजंदार का रूपक प्रस्तुत किया है | (३) इसी प्रकार का भाव कबिर ने एक अन्य साखि में व्यक्त किया है॓” ‘ काल सिहणौं यो खडा जागि पियारे म्यंत ’ तथा ‘काल खडा सिर ऊपरै ज्युं॔ तोरणी आया नींद | (४) सत्य यह है कि ‘ जाका बसा जोर मे, सो क्यु सोवै सुक्ख|’ (५) प्रसत्तुत साखी मे अशिषित कबीर की अप्रस्तुत योजना की यथाघंता तथा सहजता दश्ंनीय है |
शबंदार्थ- गाई = गा= गान कर| परि = पर| जम = यम| खरचा = खर्चा व्यय करे| खाई = खाया है |
 कबीर सुता क्या करैं, सूताँ होइ ऋकाजा |
 व्रझा का प्रासण खिस्या, सुणत काल की गाज ॥२५॥
  सन्दर्भ - काल का नाम सुनते हो जगत नियंता वझा तक विचलित हो उठॆ इतना जानते रहने पर भी मानव व्रझा की आराधना से विमुख होकर भी अज़ान निद्रा मे गाफिल पडा रहता है|
भावार्थ- कबीर कहते है कि हे प्राणी ! तु सोता हुआ क्या कर रहा है |सोते रहते से बडा अहित होता है |काल की गंजना सुनकर व्रझा का आसन विचिलित हो गया |

विशेष - प्रस्तुत साखी मे कवि ने काल की प्रवलता और मानव की निषक्रियता का उल्लेख बडी सहजशौली मे किया है |(२) मानव काल की प्रवलता से परिचित होने पर भी व्रझनाथ की साघन से विमुखा रहता है और अञान निशा मे सुदस रहता है|(३) इसलिए कवि ने पीछ॓ कहा कि 'भगति भजन हरि नांव है,दुजा दु;ख प्र्पार| (४) प्रस्तुत साखि मे कवि ने नाम महिमा के साथ ही साथ काल की प्रयलता तथा म्रत्यु की अनिवार्य स्थिति का उल्लेख किया है | शबंदार्थ -नूता = सुप्त| आकाज = अहित | आसण = आसन | खिस्या =खिसका सरया| मुणत = मुनत, मुनते हि | गाज= गज्ंन |

 किसी कहि कहि क्रकिये, ना सौइयै प्रसरार |
 रात दिवस के कूकणाै ( मन) क्याहुँ लागै पुकार||९६॥ [ ९३ ]    सन्दर्भ- प्रस्तुत साखो में कवि नाम जप के महत्व को उल्लेख करता है ।
उसका आग्रह पूरणं अभिमत है कि अज्ञान निशा में सोने से कोई लाभ नही है । रात 
दिन नाम-जप करने का प्रतिफल यह हो सकता है कि ब्रह्म तक कभी न कभी तो
प्रार्थना पहूंच ही जायेगी ।
         
   भावार्थ-- केशव का नाम उच्च्ररित करते रहिए । इतना आग्रह है कि 
अज्ञान-निद्रा में मत सोइए । दिन-रात के नाम जप से कभी न कभी तो पुकार सुनी 
ही जायेगी ।
  
   विशेष--(१)सुमिररग कौ अग की अन्य सखियों के वर्ण्य विषय की तुलना में
प्रस्तुत साखो के वर्ण्य-विषय में विशिष्ठता और अभिनवता है ।  कवि ने यहाँ मानव-
समाज से विशेष प्रकार का इसरार(आग्रह)किया है । आग्रह इस वान का है कि 
"ना सोइए" तथा 'रात दिवस कै कूकरगौ (मन) कत्रहूँ लगै पुकार ।' (२) प्रस्तुत
 साखी में कवि के मस्तिष्क की स्थिरता तथा घ्ढता के भाव के साथ ही साथ 
अनन्य विशवास तथा भरोसा का भाव प्रतिविम्बित होना है । कवि को आषवादी 
विचारधारा भी "कत्रहूँ लगै पुकार" से प्रतिभासित होना है ।
      शब्दार्थ -- केसौ= केशव । कूकिये= आनन्द से भरे स्वर में पुकारिए ।
सोइयै= सोइए । असरार = इसरार- आग्रह । कूकरगौ= कूक्ने से । पुकार= अर्ज,
प्रार्थना । कबहूँ= कभी तो ।
      
       जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम ।
       ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये   बेकाम ॥१७॥
       
      सन्दर्भ- राम-नाम का महत्व अकथनी , अवर्णनीय, अनिवर्तनीय, तथा
 दिव्य है । कबीर ने विगत प्रसंगो में लिखा है कि "राम नाम तनमार हैॱॱॱॱ
 राम कहै भला होइगा, नहि तर भला न होइॱॱॱॱॱॱभगति भजन हरि नाम हैॱॱॱॱॱ
 प्रस्तुत साखो में कवि ने कहाँ है कि प्रेम, प्रीति तथा रामनाम के महत्वपूर्ण मत्रं से 
 विहीन मानव का इन समार में आवनरिन होना और पसन्द को प्राप्त होना सब 
 बराबर है ।
  
     भावार्थ-- जिन प्रारिणयो के घट या सरीर में न प्रीति है न प्रेम रस और 
न जिह्वा पर राम नाम है । वे नर इस समार में उत्पन्न होकर भी व्यर्थ हो नष्ट 
हो गए ।
    
     विशेष--(१) प्रस्तुत साखो को प्रदम पंक्ति बडी महत्वपूर्ण है । इस पंक्ति 
में कवि ने दो सारपूरणं त्स्यो की अभिव्यजना को है -(५)" जिन घटी प्रीति न
प्रेम रस" ()" पूर्ण रसना नहि राम ।" कबीर को ध्रष्टि में आनंद के सरीर सायं[ ९४ ]कता तभी है, जब वह प्रेम या प्रीति रस मे ओत-प्रोत हो । वही जीवन धन्य है 

जो व्रहा के रग मे अनुरंजीत हो । इतना भी न हो, तो, जिस जिह्वा रामानाम रस से सिश्रित अवश्य होनी चहिए । परन्तु जिनके व्यक्तित्व मे उभय तत्वो का अभाव हो, उन्का संसार से उत्पन्न होना व्यर्थ है । (२) प्रस्तुत साखी मे कवि ने जीवन की सार्थकता का मुल्याकन स्पष्ट शब्दो मे किया है ।

  शब्दार्थ -- फुनि=फुनि  पुनः । रसना =जिह्वा । उपजि=उत्पन्न हो कर ।
  पये=क्षय को प्राप्त हुए । वेकाम= व्यर्थ ।


सन्धर्भ-अत्यन्त रोचक एवं सुन्दर अप्रस्तुत योजना से सम्पन्न प्रस्तुत साखी 

मे कबीर ने प्रेम तथा के मधुर स्वाद का उल्लेख किया है। जिन्हे यह महत्वपुर्ण अनुभव तथा सौभग्यपुर्ण परिस्थिति क आनन्द नही मिला, उन अभागो का इस संसार मे आना उसी प्रकार अर्थ विहीन है यथा सुने गृह मे अतिथि क आगमन प्नयॊजन रहित होता है ।

भावार्थ-कबीर का कथन है कि जिन प्राणियो ने प्रेम का अास्वादन नही किया और अस्वादन करके उसके आनन्द का अनुभव नही किया है । उन्का इस सन्सार मे जन्म लेना उसी प्रकार है यथा सुने घर मे पाहुन का आगमन निःसार होना है।

विशेष -(१)यथा शून्य मंदिर मे अतिथि के आगमन पर न कोइ स्वागत कर सकता है न उसके विदा के क्षरगो मे ममत्व पुर्ण अश्रु-प्रवाह कर सकता है, न कोइ स्नेह दे सक्ता है, न आशा ही कर सक्ता है , उसी प्रकार है वह प्राणी जिसने यहा से प्रेम नही किया (२) 'ज्यूॱॱॱॱॱॱॱॱ जाव" से तात्पर्य है यथा खाली हाथ आया है उसी प्रकार उप्लब्धि विहीन होकर वह जयेगा । अर्थात उस्का संसार मे उत्पन्न होना व्यर्थ ही है।

 शब्दार्थ-चपिया =चखिया=आस्वदन किया । लीया=लिया। स्वा=स्वाद। पाहुन्खा=पाहुना अतिथि । ज्युं=ज्यों। त्युं=त्यों । जाव=जाय। 
    पहली बुरा कमाइ करि,बाँधी चिप की पोट ।
    कोटि करम पेलै पलक मैं (जय) थाय हरि ओट॥१६॥ [ ९५ ]सुमिरन कौ अग ]
       स्न्दर्भ्--कबीर का कर्मवाद तथा पुनंजनम मे द्र्ढ विश्वास है । कर्म का 
प्रतिफल मानव को उपभोग करना ही पडता है। दुष्कर्मो के दुष्प्रभाव का उन्मूलन
करने के लिऐ हरि की शरण मे जाना ही अपेक्षित हरि की शरण मे भव की एक 
भी बाधा नही रह जाती है। प्रस्तुत साखी मे कवि ने इसी भाव को रोचक शैली मे
व्यक्त किया है।

      भावार्थ्--पहले बुरे कर्मो को अर्जित करके विप की पोटली बांधो। हरि
की शरण मे आते ही कोटिशः दुष्कर्म पल मे क्षीण हो गाए।

      विशेष--(१)कबीर ने प्रस्तुत साखी मे अत्यन्त तर्कपूर्ण ढंग से, अभिनव 
शैली मे कर्म सिध्दान्त का प्रतिपादन किया है। मानव दुष्कर्मो के प्रभाव से विनाश 
कि पथ पर अग्रसर होकर माया का चेरा बन जाता है। परन्तु हरि की शरण मे
जाने पर दुष्कर्मो के प्रभाव से विलमित्रत हो जाते हैं।(२) कबीर ने कर्म के सिध्दान्तो 
का प्रतिपादन करते हुए उसकी औषधि हरिनाम की ओर सकेत किया है। पूर्वज म के
साथ ही यहां कर्म सिध्दातो का प्रतिपादन किया गया है।
     शब्दार्थ--कमाइ=कमाकर। करि=कर। वाधो=संग्रह की। पोट=
पोटली। करम=कर्म। पेलै=फेके, दूर करे। ओट=शरण।
     कोटि कम पेलै पलक मै,जे रचक श्रावै नाउॉ।
     श्रनेक जुग जे पुत्रि करै,नहीं राम विन ठाउॉ॥२०॥
    सन्दर्भ-- नाम का माहात्म्य अत्यन्त दिव्य एव प्रभावशाली है। ब्रह्म के 
नाम का लेश मात्र भी ध्यान करने से समस्त दुष्कर्म विलीन हो जाते हैं। युगो तक
कृन पुण्य राम-नाम के बिना नि सार है।
    भावार्थ--कोटिश; दुष्कर्म क्षणमात्र मे विनष्ट हो जाते है यदि क्षण्मात्र
'राम' नाम का स्मरण होता है। अनेक युगो तक पुण्य करते(मनव) को राम नाम के 
अभाव मे कही ठौर नही है।
    विशेष--(२) प्रस्तुत साखी मे राम-नाम का विस्मरण करने वाले प्रणियो 
के दुर्भाग्य का मूल्यांकन किया गया है।राम नाम के बिना समस्त नमस्त माघन और जप 
तप व्यर्थ ही नही निस्मार भी है। अनेक युग तक पुण्य करने से अनुरस मानव की 
साधना अपूर्ण एव अपरिपक्व है यदि रामनाम की साधना करने नही की है।(:)
रामनाम के साधना के बिना संसार मे कही और नही है।कबीर ने नाम का महत्व
इस काव्य मे अंकित किया है कि इस विशाल संसार मे राम नाम मे विगृत [ ९६ ]३६]                                               














प्राणी के लिए कोइ अवाकाश नहीं है। (३) कोटि क्र्म मे से क्बीर का तात्पर्य य्ह है कि अनेक दुषकर्म क्षण मे नष्ट हो जाते हैं, प्राभावहीन हो जाते है। शब्दाथृ- त्रम=कर्म। दुष्कर्म=पेन=नष कर दें। पलक-क्षण। रंचक=लेश्मात्र भी। नाउं=नाम। जुग=युग।पुन्नि= पुन्न=पुण्य। ठाउं=ठांव स्थान

       जिही ह्र्री जैसा जाँरिग्याँ,तिन कूँ तैसा लाभ।    
       श्रोसों प्यास न भाजई जब लग धसै न श्राभ॥

स्न्दर्भ-- कबीर ने प्र्स्तुत साखी मे कहा है कि माधव कि हरि के प्र्ती जैसी भावाना होती है, उसी प्राकार सिद्धि उसे समप्राप्त होती है। केवल अभिलाशा करने मात्र से उपलबिध नहीं होती है' संतुष्ट होती यथार्थ रूप मे उपलबिध हो जाने पर। भावार्थ- हरि को जिसने जिस रूप में जाना उसको उसी रूप मे लाभ होता है। श्रोम से प्यासे या पिपासा नहीं दूर होती। जब तक पानी नही प्रवेश करता तब तक पियासा कैसे शात होगी।

       विशेष- क्बीर ने प्र्स्तुत साखी की प्र्थ्म  पंक्ति मे यह भाव व्यक्त किया है कि हरि कि साधना जिसने जिस भाव से को तदनुसार उसे  सफलता प्राप्त होती है(2)कबीर की प्रस्तुत पंक्ति पर संसकृति उक्ति याहशी भावना यस्य सिद्धिभंवति ताहशि का पूर्ण प्रभाव है(3)मानव के विश्वास ही वास्तविक रूप से फलदायक होते है। जैसा विश्वास होता है उसी प्रकार की प्राप्ति होती है । (4)"ओ पो प्यास न भाजई" से तैत्पर्य है । माया रूपी ओस के चाटने से भौतिक ताप या लौकिक विषमताएं दूर नही होती है । पयास या अभाव या तृणा तभी दूर होती है जब ब्रह्मभक्ति या सदगुरु के उपदेश रूपी शीतल जल की प्राप्ति होती है।
       शब्दार्थ-जिहि=जिसने । जणिया= जनिय-पहचाना ।  तिन =उन। कूं=को ।श्रोसो =श्रोस से ।भाजई = भगती है,दूर होती है । धसै प्रवेश करे श्राभ-जल।
        राम पियारा छांडि करि, करै श्रान का जाप।
        चेम्वां केरा पृत ज्यूं, कहे कौन सूं बाप। [ ९७ ]सुमिरन कौ अग]

अनुरत्त् मे मानव की स्थिति वेश्या के पुत्र जैसी है। वह किसे अपना पिता कहे ? इसी प्रकार चहू देवोपासना मे अनुरत्त् प्राएगी किसे अपना प्रिय देव कहेगा?

    भावार्थ-- प्रिय राम को छोड कर जो अन्य का जप करता है, वह वेश्या पुत्र के सध्यश है जो अपने पिता को नही जानता है। यह किसे अपना पिता कहे?
    विशेष- (१) प्रस्थुत साखी का पाठ करते ही पाठक के मस्तिष्क पर कबीर क्षत्यधिक स्पष्ट वादिता तथा कक्टूलियो की छाप अंकित हो जाती है। "बेस्वा केरा पूत ज्यूं कहै कौन सूं वाप" पत्ति वास्त्व मे कटुना तथा स्पष्ट वादिता से सम्पन्न होते हुए भी अत्यन्त यथाथं तथा सत्य है। यथा वेश्या का पुत्र सब पिता से अनिभिज्ञ होता है तथा बहु देवोपासना मे अनुरत्त किसे अपने स्वामी, प्रभू और देवता मान सकता है। (२) राम पियारा 'तात्पय है प्रियराम।' लौकिक जीवन मे जो स्वजन-परिजन प्रिय है उनसे भी प्रियतर, प्रियतम राम (३) "छांदि कर" से तात्पयं है उपेक्शा करके। (४) आन" का तात्पयं है अन्य। पर यहां पर उस्का अभिप्राय हो "वहुदेव।" आन क प्रयोग "माया या" माया जनित तत्वो की ओर भी ह।
     शब्दार्थ --- पियारा = प्यारा, प्रिय। आन= अण्य। जाप= जप। चेस्त्रां= चेश्या। केरा= का। ज्यूं- ज्यो सू- से।
                कबीर श्रापएग राम कहि स्पौरां राम कहाई।
                   जिहि मुखि राम न ऊबरै, तिहि मुख फेरि कहाइ॥२३॥
               सन्दर्भ-- राम नाम का महात्म्य तथा गौरव वर्णनातीत है। कबीर ने तो रामनाम के अतिरिक्त अन्य समस्त्र साघना को अपार दुख का द्वार माना है। "भगति भजन हरि नाव है,दूजा दुक्ख अपार|" अत. 'मनसा वाचा कर्मणा कबीर सुमिरण सार |"अत; कबीर स्वत; राम कहने और दूसरे से प्रयत्न्पूवंक राम कह्लाने के पक्ष मे है। 
             भावार्थ -- कबीर कहते है कि स्व्तः राम कहिये और दूसरो से। राम नह- लाइये। जिन के मुख से राम नाम का उच्चारण न हो उस्के मूंह मे पुनः (प्रयत्न पूर्वक) नाम उच्चारण कराइये।
             विशेष- प्रस्तुत साखी मे कबीर ने दूसरी मे राम नाम के प्रति व्यभिचि समुत्पन्न करने के सम्बन्ध मे उपदेश किये है। " जिहि राम न ऊचरै" महाए घमो भाच की परि पुष्टि के लिये पर्याप्त है। जिन मुख ने राम नाम का उच्चारण न हो उनमे प्रयत्न पूर्वक नाम उच्चारण करना चाहिये। [ ९८ ]शब्दार्थ-आपसा=आपन=अपना। कहि = कह। ओरा=औरो=अन्योसे। कहाइ=कहा, कहलाइये। जिहि=जिहु=जिस। मूखि=मुख। ऊचरै=उच्यरै=उचारण हो। फेरि=पुन:। 

जैसे माया मन रमैं, यूं जे राम रमाइ। (तौ) तारा मडंल छाँड़ि करि, जहाँ केसो तहाँ जाइ॥२५।।

सन्दर्भ - यथा मन माया मे रमता है, तथा यदि राम में रम जाय तो मानव लौकिक और सांसारिक सीमाओं का उल्लंघन करके ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाय।

भावार्थ- जिस प्रकार माया मे मन रमता है उसी प्रकार यदि राम में रम जाय, तो लौकिक सीमाओ का अतिक्रमण करके मानव राम में रम जाए।

विशेष- प्रस्तुत साखी मे कवि ने राम नाम और राम के कल्याणकारी व्यक्तित्व का उल्लेख किया है। मनुष्य का मन यदि राम में उसी प्रकार रम जाय यथा माया में रमा हुआ है, तो वह ब्रह्म के साथ एकात्मकता संस्थापित कर सकता है। ‍(२‌) "तारा मण्डल छाँडि करि" से तात्पर्य है लौकिक सीमाएँ। लौकिक सीमाएँ से तात्पर्य है संसार की सीमा। ‍(३) "जहाँ केसो तहां जाइ" से तात्पर्य है जहाँ से आप है वही जायगा। अर्थात् जिस ब्रह्म का उग्र रूप तू है उसी सर्वात्मा में तू समाविष्ट हो जायगा। (४) प्रस्तुत साखी में कवि ने बड़े ही सुन्दर और शैली में उस मानव की आलोचना की है। जो माया में अनुरक्त ब्रह्म से विरक्त है।

शब्दार्थ = रमै = रमे = प्रवृज हो। यूं = इस प्रकार । जे = यदि । रमाइ = रमे । तारा = नक्षत्र । जाइ = जाये।

लुटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम है लूटि। पीछैं ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि।।२५।।

सन्दर्भ - प्रस्तुत साखी में कवि ने राम नाम सुलभता और जीवन की क्षण भंगुरता की ओर संकेत किया है। कवि ने बड़ी स्पष्टता के साथ कहा है जब "यहु तन जैहै छूटि" तब "पीछैं ही पछिताहुगे।"

भावार्थ - राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ले। अन्यथा जब तन से आत्मा विलग हो जायगी तब पीछे पछताना पड़ेगा।

विशेष - ‍(१‌) राम नाम का ही सुलभ है। राम नाम बड़ा ही कल्याणकारी तत्व है। इस प्रकार के कल्याणकारी तत्व की उपेक्षा करने के कारण मानव का बड़ा अहित होता है। फिर भी मानव सचेत नहीं होता है (२) पीछे....छूटि न कवि ने यह बताने की चेष्टा की है कि प्राणान्त हो जाने पर पछताना पड़ेगा। [ ९९ ]सुमिरन कौ अंग ]

प्राणगान्त हो जाने पर पछताने का का कौन सा अवसर है? मृत हो जाने पर संज्ञा विहीन होने पर पछताना शॆप रहेगा? इस शंका का समाधान इस प्रकार हो सकता कि यह जीवन माया मे सलग्न रहकर, पथ भ्रष्ट होकर, लक्ष्य विहीन होजायगा और पंचतत्व को प्राप्त होकर पुनः जन्म-मरण के क्रम मे निवध्द होगा, एक बार सत्यता पूर्वक ब्रह्म का स्मरण करने पर मानव ब्रह्माकार हो जाता है। परन्तु इसके विपरीत माया मे सलग्न रहने के कारण वह दूसरे जन्म मे भी पश्चाताप की अग्नि मे प्रदग्य होता रहता है।

       शब्दार्थ - लूटियौ = लूटिये। पीछै= मृत्य के अनन्तर। दूसरा जन्म धारनण करने पर।
         लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम भंडार।
         काल कंठ तै गहैगा, रुंधै दसू दुवार॥ २६ ॥
      संदर्भ - प्रस्तुत साखी मे कबीर ने काल को प्रबलता, मानव जीवन की क्षण भंगुरता, मानव की विवशता और राम नाम की सुलभता की ओर संकेत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज को चेतावनी प्रदान की हैं।
      भावार्थ - राम नाम का भण्डार विद्यमान है। उसे लूट सके तो लूट ले। अन्यथा काल कण्ठ से पकड लेगा और दसो द्वार रुध देगा।

      विशेष - विगत साखी मे कवि ने चेतावनी देते हुए कहा है पीछे ही पछिता हुगे यह तन जैहै छूटि और इस साखी मे उसी भाव की अधिक प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ 'काल कठ तै गहैगा, रुधै दसू छुवार' के रूप मे प्रस्तुत किया है। (२) कवि ने राम नाम भण्डार का उल्लेख करके राम नाम को प्रचुरता और सुलभता का उल्लेख किया है। राम नाम की सहश सुलभ और प्रभावशाली अन्य तत्व नही है इसीलिए उसने प्रस्तुत परिच्छेद को तेइसवीं साखी मे आदेशात्मक उपदेश दिया है कि 'कबीर आपण राम कहि औरू' राम कहाई। जिंहि मुख राम न आरे, तिहि मुख फेरि कहाइ।' राम नाम से विमुख प्रणियों के लिए कवि ने कहा है 'ते नर उस संसार मे उपजि पये वेकाम।'(३) बाल कट तै गहैगा से नात्पर्म है कि काल कण्ठ से ही पकड कर मृत्यु के मुख मे डाल देगा। (४) रंधै दसू दौवार का तात्पर्य है काल दसो द्वार लयरुद कर देगा। दस द्वार है यहा रन्ध्र, कर्म, नेप, नासिका, मुख, गुदा, शिस्तेन्द्रीय। 
      
      शब्दार्थ - गहैगा= पकडेगा। रुंधै= अवसद करेगा। दसू= देखो। दुवार= द्वार। [ १०० ]कबीर की साखी

लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार । कहौ संतौ क्रदृ पाइये, दुलॉम हरि दीदार ॥ २७ ।। संदभॉ-िपृयतम का प्रदेश वहुत दूर है । वहा का मार्ग अत्यन्त लम्बा

और भांति-भांति की बाधाओ से सम्पन्न है । ऐसी स्थिति से प्रियतम के दुर्लभ दीदार कैसे प्रास होगे ?

भावाथ९---मागं लम्बा है, घर दूर पर है, विकट पथ है और अनेक प्रकार के आघात है । हे संतजन ! फिर हरि के दुर्लंभ दीदार कैसे प्राप्त होगे ।

विशेष--, १ ) प्रस्तुत साखी से कवि ने प्रियतम के प्रदेश की दूरी तथा हरि के दर्शनों की दुलंभता का उल्लेख किया है । अथर्ववेद से उसकी सर्वत्र विदधॄयमानता सम्बन्ध मे कहा गया है । ओइम् । यस्तिष्ठति चरति यच्चवच्चईती यो निलायं चरति: य: प्रतडूम । दौ सनिनवघ यन्मन्त्रवेते राजा तद्देद वरुणस्तुर्ताय: । उस प्रियतम का प्रदेश कवि ने दूर माना है । हव्रह्य सर्वत्र विधयमान होते हुए भी निकट है । वह ज्ञान चक्षु के द्वारा दृष्टिगत होता हे । अन्यथा वह दूर हो है । (२) उसको प्राप्त करने का मार्ग (साधना) वडा लम्बा है । (३) 'विकट पंथ' ' 'मार' से तात्पर्य है साधना का मार्ग अनेक बिधून-व्रडघाऔ से सम्पन्न है । माया, तृष्ण, लोभ, काम आधि साधक को उस मार्ग पर ग तिशील नही होने देते हैं । (४) दुर्लभ हरि दीदार" से तात्पर्य है प्रियतम के दर्शन साधना, संयम तथा शाक्ति के विना सम्भव नहीं है ।

शब्दार्थी-मऱरग-- मार्ग, रास्ता । विकट - कठिन । मार - आघात । दीदार - दर्शन ।

गुण गायें गुण नाम कटै, रटै न राम वियोग । अह निसि हरि ध्यावै नहीं, क्या पायौ दुलभ जोग ।। २८≈ ।।

सन्दभ-प्रसतुत साखी मे कबीर ने राम नाम के महत्व का पुन: उल्लेख किया है । राम नाम का प्रभाव वहा व्यापक और असाधारण है । नाम जप के प्रभाव से मध्या के वचनं विचिन्द्रछान्न हो जाते । फिर भी मानव इस पुण्य कर्तव्य से विमुख है ।

भस्वाथ३- राम नाम का गान करने से माया का पाश विरिछंन हो जाते हैं । फिर भी (मानव) राम के वियोग में नाम जप नहीं करना है । जव रात दिन हरि का ध्यान नही करेगा, तव फिर दुर्लभ अनन्त योग कैसे प्राप्त होगा ।

(बजरा-मि-मप्र-] प्रस्तुत पाजी मे कबि ने 'गृदृध' ८४८३ का प्रयोग दो त्रर्यों में पिया है । प्रथम गुण का अर्थ है हरिनाम के गुण या विशेषता ॲौर द्वितीय रुदृदृनं पर 'गुण' दादृर्द का प्रयोग माया के पानं के हुआ है : (इ) गुण'" ' ' ५१३३" [ १०१ ]सुमिर्न कौ अग

कबीर की साखी

लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार । कही संतो क्रदृ पाइये; दुर्तभ हरि दीदारा। संदब्बेमैं-दृठेऱयतम का प्रदेश वहुत दूर है । वहां का मार्ग अत्यन्त लम्बा

और भांति-भांति की बाधाओं से सम्पन्न है । ऐसी स्थिति से प्रियतम के दुर्लभ दीदार कैसे प्राप्त होगे

भावाथ९-मार्ग लम्बा है, घर दूर पर है, विकट पथ है और अनेक प्रकार के अस्थात है । हे सीजन ! फिर हरि के दुर्लभ दीदार कैसे प्राप्त होगे ।

विशेष प्रस्तुत साखी से कवि ने प्रियतम के प्रदेश की दूरी तथा हरि के दर्शनों की दुलभिता का उल्लेख किया है । अथर्ववेद से उसकी सर्वत्र विद्यमानता सम्बन्ध में कहा गया है । ओइम् । यस्तिष्ठति चरति यच्चवच्चईते यो निलायं चरती: य: प्रतडूम । टी सन्तित्नद्य यन्मन्त्रवेते राजा तद्देद वरुणस्तुर्ताय: । उस प्रियतम का प्रदेश कवि ने दूर माना है है व्रह्य सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी निकट है । वह ज्ञान चक्षु के द्वारा दृष्टिगत होता है । अन्यथा वह दूर ही है । उसको प्राप्त करने का मार्ग (साधना) वडा लम्बा है । 'विकट पंथ' ' 'मार' से तात्पर्य है साधना का मार्ग अनेक बिधून-व्रडघाऔ से सम्पन्न है । माया, तृष्ण, लोभ, काम आधि साधक को उस मार्ग पर गतिशील नही होने देते हैं । दुर्लभ हरि दीदार" से तात्पर्य है प्रियतम के दर्शन साधना, संयम तथा शाक्ति के विना सम्भव नहीं है ।

शब्दार्थी-मऱरग: मार्ग, रास्ता । विकट रटा कठिन । मार इन्द्र आघात । दीदार दर्शन ।

गुण गायें गुण नाम क्रटे, दृटे न राम वियोग । अह निरिनं हरि ध्यावै नही, क्या पाये दुलभ जोग ।। २८ ।।

सा-ल-भए-य-प्रापत साखर्रे में कबीर ने राम नाम के महत्व का पुन: उल्लेख किया है । राम नाम का प्रभाव वहा व्यापक और असाधारण है । नाम जप के प्रभाव से मध्या के वचनं पन्द्रछान्न हो जाते । फिर भी मानव इस पुण्य कर्तव्य से विमुख है ।

भस्वाथ३- राम नाम का गान करने से माया का पाश विरिछंन हो शाहे है। फिर भी (मानव) राम के वियोग में नाम जप नहीं करना है । जव रात दिन हरि का ध्यान नही करेगा, तव फिर दुर्लभ अनन्त योग कैसे प्राप्त होगा ।

(बजरा-मि-मप्र-] प्रस्तुत पाजी में कबि ने 'गृदृध' ८४८३ का प्रयोग दो त्रर्यों में पिया है । प्रथम गुण का अर्थ है हरिनाम के गुण या विशेषता और द्वितीय रुदृदृनं पर 'गुण' दादृर्द का प्रयोग माया के पानं के हुआ है [ १०२ ]ठीक ही कहा है कि ‘ गिरु तो नाही ठाम । (२) "कबीरॱॱॱॱ नाम से तात्पयं है कि हरि नाम स्म्र्र्ग मे बहुत सो कठिनाइयॉ है। काम,क्रोध,मद, मोह, लोभ आदि शत्रु आव्रमर्ग करते है और मन विश्वासघात करता है माया आनी ओर आक्र्शित करती है यही साघन के मार्ग मे कठिनाईयॉ है।

  शब्दार्थ — सुमिरता = स्मरन करने मे। सूली=शूली। ठाम=स्थान। 
     कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। 
     हरि सागर जिनि बीसरै, छीलर देखी अन्ंत ॥ ३०॥

  सन्दर्भ -- प्रस्तुत साखी मे कबीर ने राम नाम से अनुराग उत्पन्न करने जप की साधना मे अनुरक्त रहने तथा सांसारिक स्वादों का परित्याग करके हरि राम से प्रेम करने और उसे जिबभा पर धारण करने का उपदेश दिया है। इसी साखी के उतरार्घ मे कवि ने हरि सागर की उपेक्षा करके लौकिक छीलरो से अनुराग करने वालो को चेतावनी भी दी है। 

  विशेप(१)'कबीर ॱॱॱ लै' के द्वारा कबीर ने वारम्बार उसी भाव की अभीव्यक्ति की है, जिसका उल्लेख काधय में प्रसतुत 'अंग' मे वारम्बार किया है। राम नाम की मह्त्ता का उल्लेख करते हुए कबीर ने अनेक बार कहा 'कबीर आपरग राम कहि, और राम  कहाइ' तथा  ‘ क्बीर ने उनेक बार कहा ' कबीर आप्रग राम कहि ,और राम कहाइ' तथा ' कवोर निरभौ राम जपि , जव लग दोवे वाती।, (२) "जीब्या सो करिजजग्यत से ताप्च्ये है कि जीहा के साथ मोत्री करले। यह जीहा जो भैतरीक और लोवीक रसो और स्वादो मै अनुरुत है, ऊस पर आधेकारी तथा सयम स्थापीत करले। यह जीहा जो रसो के पान करने मे अनुरुत है। उसे हरे रस को पान करने मै अनुरस्त करेल।"; (३) 'हरि सगर से तात्पर्य है की वह रुपी सागर । अघाद, अन्त तथा पार होता है, उसी प्रकार हरी या व्र्हा अन्न्त, अघाद तथा अप्राद है। (४) छ्लर दखी दन्न्त ' तातपर्य  है अनेक पोखरे। पोखरे या छीलर प्रयोग यहा पर लोबीक या । भौतिक प्रलोभ्नो के लीए वीया गया है त्तवर्य है की लोबीक प्रलोबनो के लीए कीया गया है त्तवर्य है की लोफीक प्रालोभ्नो मै व्भर तत्व को नहि भुल ना चाहीए। 
श्दाथ [ १०३ ] सुमिरन कौ अग]                                            [१०३                           सन्दर्भ् -अमृत के सद्र्श मधुर एवं कल्याण्कारी रामनाम के रस को जिधा पर घारण करके मनुष्य के लिए यह उपयोगी है कि वह राम को रिभ्फा ले तथा फूटे हुए नग को कोने से कोना मिला कर जोड लिया जाता है,उसी प्रकार इस मन को उस मन से जोडने का यत्न करना चाहिए।
  भावार्थ -कबीर दाम काहते हैं कि मुख से अमृत तत्त्र पर ब्रह्य का गूग्ग-गान करके उसे अपने प्रति आकर्षित कर ले । तथा फूटे हुए नग को कोने से कोना मिला कर जोडा जाता है,उसि प्रकार मन को ब्रह्य से जोड ले।
  विशेष-(१)कबीर जनता के कवि हैं । उन्होने जनमाधारख मे प्रचलित उक्तियो और अप्रस्तुत्  योजना को लेकर अत्यन्त महत्वपूर्ण त्थ्यो को व्यक्त करने को चेष्टा मे आशतीत सफलता प्राप्त की है फूटा नग ज्यूं , जोडि मन सधे माधि मिलाइ"मे यह प्रयुक्त अप्रस्तुत योजना सहज होनो के साथ हो साथ औचित्यपूर्ण भी है।(२)फूटे हूए नग को जोडने की प्रक्रिया एकाग्रता तथा कौशल को अपेक्षा करती हे । उसी प्रकार ब्रह्य से वियुक्त मन को कौशल एवं एकाग्रता के साथ जोडना आवश्यक है।(३)"राम रिभ्ताइ लै वारम्वार प्रार्थना एवं नाम जप के द्वारा ब्र्ह्य को अपने प्रति आकर्षित एवं प्रसन्न कर ले  । सेवा के द्वारा प्रियतम प्रबल को अपने प्रति रिफ्ता लेना चाहिए।(४)मुखि...गाइ से तात्पयं है मुख ने अमृत तत्व अथार्त ब्रह्य के गुणो का गान कर ले अमृत का अथं वह ब्र्ह्य जो अजर अमर अनादि और अन्त है।
  शब्दार्थ-रिभ्ताई=प्रसन्न । लै=ले मुखि =मख,मुह ।  अमृत=अमर  ।  गाइ=गान कर । मघे=सधि ।
    कबीर चित चमॅकिया,घहॅ ढिसी नागी लाइ ।
    हरि सुमिरण हाथु घडा,वेग लेहु वुक्ताई ॥ ३२ ॥
 सन्दर्भ-वासना तृणा और माया की अग्नि या दाह ने मन की एकाग्रता को विनिष्ट कर दिए है यह दाहु,सताप या पीटा तभि विनष्ट हो  जाती है जब हरिनाम पीतल जल को ग्रहण करके उसे फरने को चेष्टा मे मानव अनुभात्न और दतघित हो ।
 भावार्थ-कबीर कहते है कि मामा(वानना या तृष्णा)वो त्रग्नि हरिरम की दुआ हओ।हमसे द्वार भगवान को पूजा-पिट करना हो ।
विशेष-(६)भग्वन् को प्रसाद् करने के लिये अछि काम करना पडता है । उस के लिए अछि परिवार ने हम को सहायता देती है। [ १०४ ]जीवन मे घटित करने का प्र्यत्न किया है वास्नाओ और माया द्वरा प्रद्ग्व अग्नि 

को नाम सुमिरण के जल के द्वारा ही प्रशन्त किया जा सकता है कबीर ने यह। पर अत्सन्थ सुलभ उकिथत के द्वरा आध्यत्मिक ज्गत के भाव को प्र्भ्ज्शलि बनने की चेपठ की है।(२) कबिर.... लाइ से तत्प्ये है कि अगीन चारो देशओ, सवन्तरा लगी है और उसके प्रभाव से म्रन चम्त्क्रुत हो उठा है सन्सर के स्ंव्त्र माया की अग्नि प्रज्वलिथ है । और मन उस्मे रमा हुआ या अत्त्य्न्थ अनुर्क्थ है ।(३) वेगे लेहु बोकाइ −शिध ही इस अगिन भकत। लो । कबिर ने येह वेगे शब्ध का प्रयोग किय है ।जिवन किसि पल विनिश्त हो स्क्ता है । अत: मानव के लिए यह आव्श्य्क है कि लत्यन्थ श्रेधता के सथ जीवन की विगदे क्रम मे सुधार के करले ।(४) हरि ...घडा से तात्पय्ं है कि हरि नाम रुपि जल का घधा हाथ मे है ।

  शब्धर्थ- चमकिया । = चम्त्र्कुन  चाहु= चारो । दिसि = दिशा । लाइ = 
  ज्वाला अगनि । हाथु = हाथौ मे । वेगे = श्रेध हो । लेहु = लओ । छुम्बक = व्रुश 
         
                  ३  विरह को त्रिपजग [ १०५ ]श्राफ दिसोल" अर्थात आत्मा की अङ्कार्पूरग रात्रि" का प्र्यौग किया है।(२) "अन्तर प्र्जल्पा" से तात्ययम  है अन्तस प्रज्वलित हो गया। विरह पुंज के प्रकट होने पर अन्तस वसनाऒ का सफल बन हुअ होत था, वह विरहागिन के प्रज्वलित हो उठा।

शब्दार्थ - रात्य = रात में। रुनौ = रोई। वचौ = कू= को। प्रजल्या = प्रज्वलित हुआ। प्रगटया = प्रकट हुआ। पुज = धनोभूत।

भंबर कुजा कुरलियाँ, गरजि भ्ररे सन्न ताल। जिनि थैं गोविन्द वीछुटॆ, तिनके कौएगा् हवाल॥२॥

संदर्भ - आकाश कौच पंीं के आंत क्रन्दन से परिपूरित हो उठा। जलद का अन्त्स आंद्र हो उठा और उसके रुदन से जलाशय ऒतन्पोत हो उठा। परन्तु जो प्रारगी गोविन्द से विमुरव हैं, उनके प्रति कौन सवेद्नशील होगा।

भावार्थ - कौंच पक्शी ने आकाश मे आंत क्रन्दन किया जिससे आद्र्ं होकर घनषयाम ने सरोवरो को जल से ऒनन्प्रोन कर दिया। परन्तु जो गोविन्द अर्थातू भगवान से विमुख है, उनकॊ तया दशा होगो। भगवान से वियुक्त उन प्रारिगयो पर कौन कृपा भाव प्रदशित करेंगे।

शब्दार्थ - अम्बर = आकाश। कुंजा = क़ौज। गरजि = गजंन करके। पै = से। वोछुटे = विछुदे = वियुक्त। कौरग = कौन। हवाल = हाल।

चकवी बिछुटी रैरिग की, श्राइ मिलि परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति॥३॥

संदर्भ - चकवी रात्रि के अभिशव्त क्षरांगो मे, अभिशाप वश प्रिय से वियुत्त्क हो गई, परन्तु सूयं की किर रगो के आलोकमय वातावर रगा मे वह अरने प्रिय से पुन मिल गई। परन्तु माया के प्रभाव से परम पिता विमुक्तुपा्गा से फ़भो नहीं मिल पाती है।

भावार्थ - रात्रि को चिछुबो हुई चकवो, प्रनात के क्षर््गो मे प्रियनम से पुना मिल गई। पर्ंतु माया के प्रभाच मे भगवान के सम्पकं मे दृदक प्रारगो को दाररग मे कभी नही, पहुच पाता है।

शब्दार्थ- रैरिग = रैन = रात्रि। परभाति = प्रभात। राति = रात = रात्रि।

घामर मुग्व नां रैन सुग्न, ना सुग्व मुविनै माहि। कबीर बिम्दुटवा राम मूँ, नां मुम्व धूप न छाँद्द॥४॥ [ १०६ ]सन्धर्भ - राम से वियुक्त प्रारणी को कभी किसी दशा या परिस्थिति मे सुख नही प्राप्त् होता हे। भावार्थ- कबीर् कह्ते है कि राम से वियुक्त प्रारणी को न रात मे सुख हे,न दिन मे; न वह स्वपन मे शान्ति प्राप्थ करते हे न जाग्रतावस्था मे। धूप अथवा छाह मे भी वह शाति नही प्राप्त कर पाता हे। तात्पर्य यह हे कि ब्रह्म की शरण ही समस्त सुख हे। वही सुख निघान हे, वहि शान्तिनिकेतन हे। शब्दार्थ- बासर्=बासर्=दिवस। रैन= रात्रि। सुपिनै = स्वपन मे।

विहिन ऊभि पॱथ सिरि, पॱथी बूफ्भे 
एक सवद कहि पीव का, कवर मिलैगे त्राइ॥
सन्दर्भ -- प्रस्थुत साघी मे विरहिणी की व्यग्रता, अधीरता, मानसिक व्यथा को व्यक्त किया गया है।

भावार्थ --- विरहिणी मार्ग पर खड़ी पथिको से पूछ रहि है कि प्रिय का समाचार बताइए। वे कब आकर मिलेगॆ, अनुग्रहित करैँग़े।

शब्दार्थ -- ऊभी = खडी। सिरि = सिरे पर। वूभ्फ = पूॱछे। घाई = दौड कर । कवर = कवरे, अरे कव।

वहुत दिनन की जोवती, बाट तूम्हारी राम। जिव तरसै तुभ्फ मिलन कूँ, माने ना ही् विश्राम ॥

सन्दर्भ -- प्रस्तुत साखी मे आत्मा रूपी विरहिगणी की विरह भावना बढे मार्मिक शब्दों मे व्यक्त हुइ हैं।

भावार्थ -- हे राम ! हे प्रिय ! बहुत काल से अर्थात् से तुम्हारी वाट जोह रही हूँ,तुमहारी प्रतीक्षा मे अनुरवत हूँ। थापित करने के लिए मेरा जी व्यग्र है और मन मे शाति नहीं हैं ।

शब्दार्थ -- जोवती = जोहती = प्रतीक्षा करती। वाट = मार्ग। जीव = जी, प्राण । विश्राम = शान्ति।

विरहिन ऊठै भी पडै, दरसन कारनी राम। मूवाॅ पीछे देहुगे सो दशन किही काम॥७॥

सन्दर्भ -- प्रस्तुत साखि मे विरहिनी की क्रुशावस्था, और विरह मे का चित्रण किएे गये हैं ।

भावार्थ -- हे राम ! विरहिनि तुम्हारे दर्शन के लिए उठते हैं और पुनः गिर पडती हैं । यदि म्रुथ्यु के अनन्तर तुमहारे दर्शन र्भी तो किस काम् के, उस्से क्या मान होगा। [ १०७ ]शब्दार्थ-ऊठै= उठे । भि= फिर । पडै= गिर= गिर पडती है । दरसद=दर्शन। कारनि = कारणी।

मृवा पीछै जिनि मिलै कहै कविरा राम । पाथर घाटा लोह सव (तथ) पारस कौणे काम ॥ ८ ॥

सन्दभॆ- प्रस्तुत साखी का वण्यं-विषय सप्तम साखी के विषय से साम्य रखता है । कवि ब्भ्रम अनुग्रह का अाकाक्षी हैं, परन्तु शरीर रहते ही ।

भावार्थ-कबीर कहते है कि है राम । पचतत्व में मिल जाने के अनन्तर यदि आपने अनुग्रह किया तो उससे लाभ, उससे प्रयोजन? पारस पत्थर की खोज मे, खोदते-खोदते यदि लौहस्त्र यदि पूर्णतया घिस जाय,और अन्त में पारस के पत्थर प्राप्त भी हो तो उसका क्य प्रयोजन ।

शबदार्थ्--मूवा = मृत्यु । जिनि = मत । पाथर = पत्थर घाटा = क्षीण । कौने = किरु ।

अन्देसडा़ न भाजिसी, सन्देसौ कहियाँ । कै हरि षांया, के हरि ही पासि गयाँ ।।६11

सन्दर्भ----प्रातुत साखी से वियॊगिनी आत्मा की दवन्द्वत्म्क् परिस्थिति और अनुभूति का चित्रण हुआ है ।

भावार्थ्--साधना के पथ पर प्रतीक्षित विरहिणी, उस पथ के पथिको द्वारा प्रियतम की सेवा मे संदेश भेजती हुई कहती है कि द्वन्द्व या सवल्पविकल्प की स्थिति दूर नहीं होती है। या तो प्रिय कृपा करके अनुग्रह करें या मैं ही प्रिय की सेवा में प्रस्तुत हूँ ।

शब्दार्थ -अदेसटा = अवेणा =चिन्ना,द्वन्द्व् भाजिसी = नाहीं दूर होगा । संदेसौ = सन्देश । कहियॉ =कहना । फै = या ।

श्राइ न सकौ तुझ पै, सकूॅ न तुझ बुलादड । जियरा यौंही लेहुगे, विरह तपाइ तपाइ ।१०।।

सन्दर्भ प्रस्तुत साखी में कवि या साधक की विरह्र भावना कॊ है । साधक अपनी हीनतावों और

भावार्थ-- आत्मा रूपि विरहिणी प्रियतम की प्रनि निदेश करति हुई कहती है कि हे प्रिय । मैं तृम्हारे पास् अपनी सीमावों, हीनतावों के कारण नहीं अ । क्षमा नहीं अ [ १०८ ]


     शब्दार्थ :-- तुभ्क पै - तुम्हारे पास । तुभ्क = तुम्हे ।  जियरा - जी, प्राण

त्तपाइ - तपा करके ।

           यह तन जालौं मुसि करुं ज्यूं धूवाँ जाइ सरग्गि ।
           मति वै राम दया करैं, बरसि बुभ्कावै श्रग्गि ॥
     सन्दर्भ -- विरहिणी की आकांक्षा का अभिनव स्वरूप । शरीर को विरह की अग्नि मे जलाकर भस्म कर डालने की इच्छा, जिसमे धुवा आकाश की ओर जाय और धुंवे के प्रभाव से प्रिय का ध्यान प्रियतमा की सतप्तावस्या की ओर आकर्षित हो ।
     भावार्थ -- विरहिणी सोचती है कि इस शरीर को इस शरीर को विराहाग्नि मे प्रदग्व जला दूं जिससे धुवाँ आकाश मे जा पहुँचे। सम्भव है कि धुंवे को देखकर चे राम कृपाचारि, अनुग्रह जल बरसकर मेरे विरह जोवित संताप को दूर कर दें।
     शब्दार्थ - जालौ=जला दूं । मसि=स्याही । धूवा=धुवाँ =धूम्र । सरागी=सरग=स्वर्ग=मति=शायद, सम्भव है । अग्नि=आग=अग्नि । 
     यहु तन जालौ मसि करौं,लिखौं राम का नाउँ।
     लेखणि करूँ करंक की,लिखि लिख राम पठाऊँ॥
  संदर्भ - विरहीणि की इच्छाएँ नए-नए रुपों में प्रकट हो रही हैं। यहाँ एक और अभिनव कामना। जिस प्रकार भी-प्रिय का ध्यान आकर्षित हो वह कार्य करना है गंतव्य तक पहुंचना है। लक्ष्य की स्मुप्लब्धि ही व्यय बन गया है।
  भावार्थ - विरहिणी की आत्मा इच्छा करती है कि इस शरीर की जलाकर मसि(स्याही)बना डालूँ और अपनी हडूडियों को लेखनी बना कर राम के पास विरह निवेदन करती हुई पत्र लिखूँ।
   शाब्दार्थ - लेखणि=लेखनी, कलम। करंक=हड्डी।
     कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड न जाइ।
     एक ज पीड परीत की, रही कलेजा छाइ॥१३॥
   प्रसंग -- प्रेम एवं विरह की पीड़ा ने पिंजर या शरीर एवं ममं को अभिभूत कर रखा है।
   भावार्थ -- कबीर दास कहते हैं कि पीड़ा पंजर या शरीर को दुःख देने वाली है परन्तु प्रेम की पीड़ा ममं या कलेजे को अभिभूत कर रखा है।
   शाब्दार्थ -- पीर=पीड=पीड़ा। पिरावनी=पीड़ा देने वाले। पंजर=शरीर। परोती=प्रोति। [ १०९ ]                                       विरह कौ अंग]                                 [१०६
                                           चोट सताँणी विरह की,सब तन जर जर होइ ।
                                          मारणहारा जाँणि है, कै जिहि लागी सोइ ॥१४॥
                                प्रसंग-विरह की चोट एव पीडा से विरही का समस्त शरोर जॆजर हो 
                           रहा है।                                
                                  भावाथॆ-- विरह की चोट ने ममॆ को आहत कर डाला और समस्त शरीर 
                                 जजॆर ( अथवा शिथिल ) हो रहा है । इस पीड़ा का अनुभव नही करेगा जिसने शब्द
                                 रुपी बाण मार कर प्रेम एवं विरह  की पीढ़ा समुत्पन्न की है, या जिसके यह
                                  बाण लगा है ।
                                      शब्दाथॊ--सतांणी = सतानी = सताने वाली । जरजर = जजॆर =विचिल ।
                             मारणहारा = मारने वाला। जांणि है = जानि है = जानेगा । कै = या ।     
                                        कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जुमारया मांहि ।
                                        भीतर भिधा सुमार है, जीव कि जिवै नांहि ॥ १५ ॥
                       
                                प्रसंग -- सदगुरु ने जब से शब्द रुपी बाण मारा है तब से प्रेम की मधुर 
                                 पीड़ा, विरह की चोट सवल हो छठी है ।
                               
                                 भावाथॆ - सतगगुरु ने हाथ मे कमान लेकर शब्द रुपी बाण शक्ति भर 
                              खीचकर मारा है । तब से शब्द रुपी बाण ने ममॆ को आहत कर डाला । अब 
                                   वियोगी जीवन एवं मृत्य के मध्य मे समय व्यतीत कर रहा है ।
                                शब्दाथॆ - सांधि = संधान = लक्ष्य करके । खैचि= खीच कर शक्ति भर ।
                             मांहि= आभ्यान्तर मे । भीतर = अन्तम। भिधा भिदा= भद गदा। सुमार=गभींर चोट।
                      
                                             जब हूँ मारया खैचिकर, तब मैं पाई जांणि                                  
                                            लागी चोट मरम्म की, गई कलेजा छाणि ॥ १६॥
                                      
                                        प्रसंग - शब्द वासा के लगते ही ज्ञान जाग्रत हो गया । अब उस प्रेम अौर
                           विरह को व्यधा ने ममॆ को आहत कर डाला है ।
                           भावाथॆ - सतगुरु ने जब खीच कर शब्द बाण मुझे मारा तो मै ज्ञान से सम्पन्न हो गया ।
                                 शब्द बाण के फल स्वरुप ममॆ अहत् हो गया अौर कलेजा पीड़ा अभीभूत हो गया। 
          
                                          शब्दाथॆ= मै= मुझे। जांणि = जाण=जान। मरम्म= मॆम = अभिभूत।
                                 
                                                    जिहि सरि मारि काल्हि, सो सर मेरे मन समझा।
                                                      तिहि सरि मारि ,सरबिन सचपाँऊ नहीं ॥१७॥ [ ११० ]प्रसंग - सतगुरु द्वारा मारा हुआ शब्द रूपी वाण और उससे समुप्तन्न पीडा मन को मधुर प्रतीत होती है। 


भावार्थ - हे सतगुरु! जिस शर या वाण से आपने मुभ्ते कल मारा था उसी से आज भी पुनः ममं की आहत कीजिए। वह शब्द रूपी वाण मेरे मन में बस गया है। शब्द वाण की चोट सहन किए बिना मुभ्ते सुख नहीं मिलता है।


शब्दार्थ- सरि=सर=शर=वाण। काल्हि=कलि=कल=विगत दिन। बस्या=बसा=बस गया है। तिहि=तिह=उस। सचपाऊं=सुख।


विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।

राम वियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।।१६।।


प्रसंग- विरह के प्रभाव से साधक का तन क्षीरग, मन उन्मन प्रतीत होता है। राम वियोगी संसार से वियुक्त होकर जीवन यापन करता है।


भावार्थ- जबसे विरह रूपी सपं शरीर में निवास करने लगा है तब से कौई मंत्र या औपधि काम नहीं देती है। राम का वियोगी संसार से उदासीन हो कर जीवन यापन करता है, वह जीवन्मुक्त होकर संसार से जीवित रहता है।


शब्दार्थ- भुवगम=भुजंग=सपं। मंत्र= औपधि। विवोगी=वियोगी। बौरा=असंतुलित।


विरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव।

साघू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव॥१६।।


संदर्भ- विरहानुभूति साधुजनों को प्रिय लगता है। विरह जनित आनन्द अव्दितीय है।


भावार्थ- विरह भुजंग से जाग्रत होकर ममं को आहत कर डाला है। साधु जन विरह भुजंग से दूर रहने की चेष्टा नहीं करते हैं। उनका समहन शरीर विरह भुजग के प्रमार का क्षेत्र है।


शब्दार्थ- भुवंगम=भुजग- सर्प। पैसि=पैठि, प्रविष्ट होकर। मोड़ही- मोडते है। भावै-रुचिकर लगे। त्यूँ - त्यो तैसे। खाव- खालो।


सब रॅग नंतर बाव तन,विरह बजावै नित्त।

और न कोई सुरिग सकै, कै सांई कै चित्त॥१०।।


सन्दर्भ- विरह का शरीर पर एक छत्र साम्राज्य है। शरीर रूपी रवाब को विरह रूपी कलाकार बजा रहा है। [ १११ ]विरह कौ अग]

 भावार्थ--विरह शरीर रुपी रवाव को नित्य वजाता है। शिराएं उन वाघय्ंत्र मे तान (या ततु) का काम दे रही है । इस रवाव से प्रस्फुटित राग या तो स्वामी (सत गुरु) सुन पाता है या साधक।
 
शब्दार्थ -- रग = रगे,शिराएं। रवाव= एक विणिष्ट वाघ यंत्र। तन = शरीर । सुरिग= सुनि=सुन।
              
                  विरहा वुरहा जनि कहौ,बिहरा है सुलितान।
                  जिह घटि विरह न संचरै,सो घटि सदा मसान ।।२१॥

सन्दर्भ-विरहा शरीर का सुल्तान है।

भावार्थ -- विरह चुरा है,एेसा मत कहो। विरह शरीर का सुलतान है।

    जिस शरीर मे विरह की गति नही है,वह शरीर स्मशान सहश है।

शब्दार्थ-- वुरहा =चुरा है। जिन-मत-। । सुलितान = सुलतान=सम्राट।

घटि=घट-शरीर। मसान=स्म्शान-मरघट।

         श्रंषरिगयां  म्फांई पड़ी,पंथ निहारि निहारि।
          जीभडियाँ छाला पडया,राम पुकारि पुकारि॥२२॥

सन्दर्भ--प्रिय की प्रतीक्षा करते करते अग-प्रत्यंग,जिथिल और जजंर हो गये है।

भावार्थ-- विरह के प्रभाव से वियोगिनी की आंखो मे प्रतिक्षा करते-करते म्फाई पड गई अौर प्रिय का नाम पुकारते-पुकारते जिह्र मे छाले पड गए।

शब्दार्थ- अपरिगयां-आंखे। भ्फई-मद । निहारि-देखकर । जोभडियां-जिह्रा।पडया=पडा।

               इस तन का दीवा करौ,वाती मेल्यूँ जीव।
               लोही सीचौं तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव ॥२३॥
सन्दर्भ- विरहिरगी चिर काल तक प्रतोक्षा मे अनुरक्त रहना पाहनो है।

शरीर रुपो दोपक ने प्रारगा फी वतिका नुरक्षित रस फर चह प्रिप के दद को ञालोकित करना चाहनो है।

भावार्थ- चिरहिणो कहती है कि इन तन को पोरक चना ढानूं अौर  उनके प्रारगा की पतिवा टालपर रऊ नेन मे निपित करते हुए,प्रिय का मुख देखने मे लिए मै फिर प्रतोक्षित रहेगो।
   
शब्दार्थ- रोखा=दोपक। पगेँ=पमं। बातए=वती। गल्यूं= टाउं

सोहो=स्न=रण। सीणो=मिणिल परं। [ ११२ ]नैनां नीभ्फर लाइया,रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं,कबरु मिलहुगे राम ॥२४॥

सन्दर्भ-- विरह के काररग नेत्रो से अश्र निरतर प्र्वाहित रहते है ओर प्रारग पपीहे के सहश प्रिय का नाम रटते रहत है।

भावार्थ - प्रिय के वियोग मे नेत्रो से आँसू-निर्भर दिनरात प्रवाहित रह्ते है और प्र ग पपीहे के सह्श प्रिय का नाम रटते हैं । हे प्रिय कत्र मिलोगे ।

शब्दार्य - - नीभ्फर = निभ्फंर= भ्फरना । रहट = कुआं जल निकालने का यंत्र । निसजाम= निशयाम । कवरु = अरे कब ।

श्रँपडि़यां प्रेम कसाइयां, लोग जांरगौ दुखडि़याँ । साँईं श्रपरगौ, काररगै , रोइ रोइ रतडि़याँ ॥ २५ ॥

सन्दर्भ - प्रिय के वियोग मे रूदन करते करते नेत्र आरक्त हो गए हैं ।

भावार्थ -- नेत्र प्रेम - विरहाग्नि मे सतप्त होने के कारण लाल हो गए । स्वामी के वियोग के कारण रो - रोकर लाल हो गए हैं और लोग जानते हैँ नेत्र दुख रहे हैं ।

शब्दार्थ - अपडिया = अंखडिग्रा = आँखें । कसाइया = कसी गई है । दुखाइयाँ = दुख रही है । रतडियाँ = लाल हो गई है ।

सोइ श्रांसू सजरणां सोई लोक बिड़ँहि । जे लोइगा लोंहीं चुवै, तौ जारणौ हेत हियाँहि ॥ २६ ॥

संदर्भ -- आँसु आँसु मे भेद है । वही सच्चे आँसू है जो हृदय से प्रस्फुटित होते हैं ।

कबीर हसणां दूरि करि, करि रोवण सै चित्त । बिन रोयां क्यूँ पाइए , प्रेम पीयारा मित्त ॥ २७ ॥

सन्दर्भ -- विरहानुभुति का अनुभव किए बिना प्रिय किसे प्राप्त हुआ है ।

भावार्थ -- कबीर कहते है कि हे प्राणी लोकिक - भौतिक सुखो का परित्याग करके, विरहानुमूति हृदयगत करके प्रिय के विरह मे प्रिय के हेतु रुद्न कर । बिना रुदन किए कहि प्रिय प्राप्त होते हैं ।

शब्दार्थ -- हसराग = हसना । रोवरग= रोवन = रोने। सौ = मे । नित चित्त लगा । रोया = रोये । क्यूँ=क्या । मित्त = मित्र ।

जो रोऊँ वौ बल घटै , हँसौ तोव राम रिसाइ। मनही मांहि विसूरणां, क्यूँ घूँरग काठहि खाइ ॥ २८ ॥ [ ११३ ]सन्दर्भ -- विरह की तीव्रता अन्दर हो अन्दर प्रदग्ध रहे ।

भावार्थ -- यदि प्रिय के विरह मे रोता है तो वल घटता हे वक्ति क्षोण होती है हंसता हूँ लोकिक आनन्दो मे संलग्न होता हूँ तो प्रिय राम से दूर होना है अत: प्रिय का ध्यान मन ही मन , विरहानुभूति अंतस मे होनी चाहिए । प्रकटिन होने के लिए अवकाश नही है। य या धुन अंदर ही अन्दर काष्ठ को खा जाता हे उसी प्रकार विरहाग्नि अदर ही अदर प्रदग्ध रहे ।

शब्दार्थ -- घटै=घटे=अल्प हो । हसौ=हसू । रिमाइ= नाराज हो माहि=मे । विसूरर्णा =स्मरण करना । घुण=घुन ।

हॉसि हॉसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ । जो हाँसेही हरि मिलै, दुतौ नही दुहागनि कोइ ॥ १६ ॥

सन्दर्भ -- प्रिय या व्रहा साघना से साम्प्राप्ति होता है । वह लौकिक ऐश्बर्य से दूर है ।

भावर्थ -- लोकिक आमोद-प्रमोद के मध्य मे प्रिय की प्राप्ति नही होती है प्रिय प्राप्त किया जाना है विरहानुभूति के द्वारा । यदि हंम खेल कर ही प्रिय मिलता तो कौन अभाग्यशाली रहता।

शब्दर्थ -- कत=प्रियतम । जिनि=जिन जिसने । तिनि=तिसने । हासे-हो=हंसने से ही । दुहागनि=दुहागिन=दुर्भाग्य्शलिनी ।

हाँसी खेलौं हरि मिलै, कारण सहै परसान । काम क्रोध त्रिप्णां तजै,तहि मिलै भगवान ॥३०॥

सन्दर्भ -- आमोद-प्रमोद तथा माया मे सलग्त रहकर कही व्रहानुभूति होनी है । कम,क्रोध तथा तृप्णा का परित्याग करने से ही प्रिय के माव तादात्य नहना पिता होता है।

भावार्थ -- यहानुभूति हंमो- विल और माया मे अनुरन रह कर नही होनी हे । कम, क्रोध तथा तृप्णा का महज कर देने ने हो सहानुभूति होनी है।

शब्दार्थ -- हानी==हानि धेन मे । पोगा = स्पैन । पर=प्रवर=तेन । मान=धान, तेज धार ।

पुत पियारो पिता कौ,गौहनि लागा घाड । लोभ मिठाई हाथ दे, आपण गया भुलाए ॥ ३९ ॥

सन्दर्भ -- माया अरमाप्ति को पप कर होनी है । [ ११४ ]१२४] [कबीर की साखी

   भावार्थ-आत्मरुपी पुत्र परमपिता को बहुत प्रिय था । वह परमपिता से अभिन्न था। परनतु मया ने लोभ रुपी मिठाई वालक के हाथ मे पकडा़ दी , तत्र से वह अपने पिता को विसर गया ।
शब्दार्थ - पियारो=पियार=प्यार=प्रिय । कौ=को गोहनि। घाइ-

दौड कर । हाथि=साथ । आपरण=अपना=अपने को अथवा आत्म तत्व को ।

    डारी खाँड पटकि  करि, श्रँतरि रोस उपाइ ।
    रोवत रोवत मिल गया, पिता पियांरे जाइ । । ३२। ।

सन्दर्भ--- अन्ततोगत्वा आत्मारूपी बालक चेतन पर सचेत हो गया । ओर वह पुन:पिता से अभिन्न हो गया ।

  भावार्थ--अन्ततोगत्वा सचेत होकर बालक रूपी अत्मा ने रोषपूर्वक लोभ-मिठाई को पटक(फेक)दिया और रोते- रोते उसे परमपिता की प्राप्ति या अनुभूति हो गई।                                       शब्दार्थ ---खाड= शकर,मिठाई । अतरि= अन्तर अन्तस, हदय। रोम=रोप=असन्तोप । उपाई= उत्पन्न हुआ ।
   नैनां। श्राचरुँ। निस दिन निरपौं तोहि ।
   कब हरि दरसन देहुगे, सो दिन श्रावै मोहि ॥ ३३ ॥

सन्दर्भ-- हे प्रभु ! आपको अपने नैनो में बसा लूं, और प्रतिक्षण आपके दर्शन करता रहूँ।।

  भवार्थ--- हे प्रभु । आपको अपने नेत्रो मे बसा लूं; जिसमे मैं आपको प्रतिक्षण देखा करूं ।हे हरि !वह दिन कब आएगा,जब आएगा ,जब आपके दर्शन प्राप्त होगा।     शब्दार्थ ---अतरि= अन्तर मे ।आचरुं=वमा लूं। निरपौ=देखू

दरसान=दर्शन । देहुगे=दोगे ।

          कबीर देखत दिन गया,निस भी देखत जाइ।
          विरहरिग पिव पावे नहीं, जियरा तलपे माइ ॥३२ ॥
सन्दर्भ-- प्रतीक्षा करते-करते जीवन बीत गया। विरहणो विरह मे उपलित हे।
    भावर्थ--- कबीर कहते हे कि प्रिय की प्रतिक्षा करते-करते दिन भी गनीत  हो गया ओर राथि भी उरतीत हो गई । विरहिरणो प्रिय के वियोग मे गरदन्त टयग्र है । [ ११५ ]                                                विरह कौ अग]                                 [१६५
    शब्दार्थ्-देखते=प्रतीछा करते | जियरा=जी,प्रारग |
    बिरहरगी थी तौ क्य़ू़ँ रही, जली न पिठ के नालि |
    रहु रहु मुगधम गहेलडी, प्रेम न लाजु मारि ||३५||
  सन्दbR-- सच्ची विरहिरगी तो विरहागिन मे स्व्t: प्रदग्ध हो जाती है |

तू प्रेम को क्या लज्जित करता है|

  भावाथ-कबीरदास केह्ते है कि यदि तू विरहिरगी थी प्रिय के साथ 

प्रिय की स्मृति मे क्यो न जल गई | हे मुग्धा ठह्रर ठह्र्र तू प्रेम को लज्जित मत कर |

         शब्दार्थ्--रही=जीवित रही | नालि|
    मुगध=मुग्धा, नायिका जिसमे ल्ज्जाdhiक्य होता है|लाजु=
 लज्जित कर|
      हौ विरहा की लाकडी,समझि समझि धूO धाऊO |
     छुटि पडौ या विरह तै, जे सारी ही जलि जाऊ ||३६||
   सन्दर्भ--सच्ची विरहिरगी प्रिय के वियोग मे दानै-दानै:जलती है|
विरहिरगी ये विरहप्रियता प्रमुख होती है|
भावार्थ--मै विरहरगी गोली लकडी के समान हूँं जो भभक कर नहीं,

धीरे-धीरे जलती है| यदि भभक कर जाऊँ तो विरह से छुटकारा मिल जायगा| जो मुझे न प्रिय हैं, न अभीपिसत है|

   शब्दार्थ--विरहा =विरह=वियोग\ लाकडी=लाकडी=ईधन|समझि-

समझि=धीरे-धीरे|धूँ धाऊँ धूं,ध्ं करके जलना=धीरे-धीरे जलना |पटौ=प पडूं| या=इन|सारी=समस्त|जलि= जल|

    कबीर तन मन यौं जल्या,विरह अगनि सूँ लागि |
    मृतक पीड न जाँरगई, जारगैगी यहू ञानि||३९||
 सन्दर्भ--प्रेम को पीडा, बिरह की व्यया बिरही ही ज्ञान करता है,या

विरहागिन स्वत: अपनी प्रवकता का अनुभव करेगी|

 भावार्थ-कबीरदास केहते है विरहागिन ऐ लगने से यह तन मन धन

प्रकार जला कि उनकी कोई सीमा नही रही|विरह को व्यया को मृतक क्या जाने? बिरहागिन उसकी ताप की प्रबलता को जानती हैं|

 शब्दार्थ--ञरया=जला प्रबग्ध हुआ| अगनि = अगिन] व्य्य| [ ११६ ]विरह जलाई मैं जलौ, जलती जलहरि जाउँ।

मों देख्याO जलहरि जलै, सन्तौ कहाँ बुphaaऊँ ॥३८॥

सन्दर्भ : विरह का प्रभाव,xaitr और स्वरूप व्यापक है, शिश्य ही नहिं, सदगुरु भी विरह के प्रभाव से पीडित है।

भावार्थ : विरह से प्रदग्घ मैं सतगुरु के पास विरहाग्iN प्रशान्त करने के लिए गई। परन्तु मैंने देखा कि सतगुरु स्वतः विरह ज्वर से पीडित है। हे सन्तो! अब बताओ कि इस विरहाग्iN को कहाँ शान्त करुं?

शब्दार्थ : जलहरि =जलधरि = जलधरi - तालाव। देख्या = देख्या - देखा । बुझाऊं = शान्त करुं ।

परबति परबति मैं फिर्या, नैन गँवाये रोइ। सो buटी पाँऊँ नहीं, जातै जीवनि होइ ॥३९॥

सन्दर्भ : विरह के कारण स्थान स्थान पर भटकता रहा पर विरह को प्रशान्त करने वाला परम तत्व न मिला।

भावार्थ : प्रियतम की खोज मे एक पर्वत से दूसरे पर्वत, दूसरे से तीसरे पर्वत तक अर्थात स्थान स्थान पर भतकता रहा और प्रिय के वियोग मे रो रोकर नैन खो दिए परन्तु वह तत्व न प्राप्त हुआ जिससे जीवन प्राप्त होता।

शब्दार्थ : परवति = पर्वत । फिरया = घूमा, भटका । नैन = नयन - नेक । गंवाये = खोये । जातै = जिससे। जीवनि = जीवन, जीवन शक्ति ।

फाडि पुटोला धज करौं,कामलडी पहिराउँ। जिहि जिहि भेपां हरि मिलै, सोइ- सोइ भेप कराउँ ॥४०॥

सनदर्भ : प्रियतम की प्राप्ति के लिये समस्त बलिदान निःसार है।

भावार्थ : अपने रेशमी वस्त्रो को फाड कर फेक दूं और कमलि धारण वर लूं। जिस जिस भेष से हरि मिल सके वहि वहि भेष धारण कर लूं।

शब्दार्थ : पुटोला = पटोरा, रेशमी वस्त्र। धज = धज्जी, टुकडे- टुकडे । कामलडी = कामली = कामरी =कम्मल । भेपा = भेप मैं।

नैन हमारे जलि गये, छिन - छिन लोहै तुझ। नां तूँ मिलै न मैं खुसी, ऐसी वेदन मुझ ॥४१॥

सन्दर्भ : प्रिय के [ ११७ ]विरहव की अंग भायाय-हे priy ! ये नेtr आपकी प्रthoXaa करते-करते हो [ ११८ ]४ ग्यान विरह कौ pRM g [ ११९ ]ज्ञान विरह कौ अग ] [ ११३

शब्दार्थ - हिरदा = ह्रिदय । दौ - दावाग्नि । बलै = जलै । लखै = देखै । लाई = लागी ।

  भल ऊठी भोली जली, खपरा फूटिम फूटि ।
  ओगी था सो रमि गया, ञासरिण रही विभूति ॥४॥

सन्दर्भ - ज्ञान की अग्नि मे असार तत्व विनष्ट हो गये और योनी ब्रह्मा नन्द मे लीन हो गया ।

भावार्थ - भल अग्नि मे शरीर रुपी भोली जल गयो और खरर फूट गया । योगी ब्रह्म मे रम गया और आगन पर केवल वस्त्र अवशेष रह गई ।

शब्दार्थ - भल- अग्नि । भोली = शरीर । खपरा - खप्पर - खोपड़ी फूटिम = फूटि - फूट गया । जोगी = योगी । आसणि - आमन । विभूति = राख ।

  श्रगनि जु लागी नीर मैं , कँदू जलिया भारि ।
  उतर दषिण के पंडिता , रहे बिचारि बिचारि ॥५॥

संदर्भ - ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया और माया के तत्व विनसष्ट हो गये ।

भावार्थ - ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया का जल और उसके सहायत तत्व विनष्ट हो गये । इस आश्चर्यजनक कृत्य को उतर दक्षिण के पण्डित देखते हो रह गय ।

शब्दर्थ - नीर = जल, माया का जल । कन्दू = कदँम = कोचढ । भारि = सम्पूणँ ।

  दौ लागी सायर जल्या , पंपो बैठे श्राइ ।
  दाधी देह न पालवैं , सतगुर गया लगाय ॥६॥

सन्दर्भ - ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया का मागर जल गया प्रौर आत्मा रुपी पक्षी को मुयित हो गई ।

भावार्थ - ज्ञान को अग्नि के प्रज्यसित हो जाने पर माया का सागर भहमो भूत हो गया ।आत्मा रुपी पक्षी जो माया रुपी सागर के निरट पे , अब निरिचन्त हो गये । ज्ञानागिन से प्रदग्ध देह भौतिक हष्टि मे है । यह अग्नि सतगुरु ने नना दिया ।

शब्दर्थ - दौ = दावाग्नि । मायर = सागर पंपो = रधो । दापी=दघ । पालयै=चड़ेतौ है ।

  गुर दाधा चेला जल्या, चिरटा लागी आगि 
  विणका बपुड़ा ऊचरया , गलि पुरे  फै लागि  ॥७॥ [ १२० ]१२०]                                                         [कबीर की साखो

सन्दर्भ - बिरह को अग्नि मे जल कर शिष्य् का भव सागर से उढार हो गया। भाबर्थ - गुरु ने ज्ञान को अग्नि प्रजवलिह् की और शीष्य विरह (ज्ञान विगह)को अग्नि मे जल गया। तिनके के समान हल्की, पाप के भार से मुक्त आत्मा को उन्मपित हो गया और वह पूरगँ ग्रह से मिल कर एकाकर हो गया। शब्दार्थ्- राधा =दग्ध किया। जल्या= जला। विरहा= विरहग्नि। तिग्ग्का=तिनका। वपुडा= वपुरा=वेचारा। गलि=सहारे। पूरे= पूरग्ँ=प्रहा।

श्रहिडी दौ लाइया,मृग पुकारे ऱोई। जा वन मे क्रीला करी,दाभत है वन रोइ॥५॥ सन्दर्भ- ज्ञानाग्नि के लगते ही इन्द्रिया विषयो से उन्मुक्त हो गयि है। भाभार्थ- सत्गुरु= अहेरी ने ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित की,संसार रूपी वन गया और इस माया के वन मे वितररग करने वाले इन्द्रिय रूपो मृग रो उठे। जिस वन मे मृग व्रिटा करते थे, अब वह वन जल गया। इस लिए मृग दुखि हो गये। शब्दार्थ=अहेरी=शिकारि। दौ= दावाग्नि। मृग= इन्द्रिय। कीला= फीढा, सेन।दान्तन=दग्ध।

पारगी मंहि प्रजली, भई अप्रबल आगि। वहती खलिता रह गई, मंल्ल रहे जल त्यागि॥६॥ सन्दर्भ- माया रूपी जल मे गनाग्नि लगी तो माया के साहयक तरव रुपयनि हो गये और लरमा माया खे पुष्क हो गइ। भाभर्थ- मया के सागर मे गानागनि लगी तो पाया कि महयक तरन विनष्ट हो गये और लारमा रूपी नर्दश्थ गया के जल को धोद कर अलग हो गई। शब्दार्थ- प्रयगि= प्रग्यश्ति हुई। सप्रबल= अत्यन्थ् प्रयल। मसिला=नहो।

समंदर सागी भागि, नदियां जलि कोइला भईं। देन्पि घपिरा जगि मंधी रुपां घदी गई॥ १०॥ सन्दर्भ- मवर्गार के अग्नि को शग्नि गयी, माया ये ग्रह पर नष्ट हो गये और इयार कि महिमआ अनुकूल हो गई। [ १२१ ]

परचा कौ अग]                                                     [१२१
    भावार्थ--भव सागर मे ज्ञान की अग्नि लग गई और फलतः माया की सहायक तत्व विनष्ट हो गये। कबीर ने चेतन होकर देखा कि मछ्ली शब्द रूपी वृक्ष पर आसीन है।
     शब्दार्थ--समदर=स्मुद्र । कोइला=कोयल=कालो । मंछो=मछ्ली ।रूपा=वृक्ष ।
      
                  २ परचा कौ अंग
    
            कबीर तेज अनंत का,मानौ ऊगी सूरज सेणि।
            पति सॅगि जागी सुंदरी,कौतिग दीठा तेणि ॥ १ ॥
     सन्दर्भ--ब्रह्म प्रकाश नारयण है, वह निर्मल आत्म दवारा ही अनुभव किया जा सक्ता है।
     भावार्थ--ब्रह्म का तेज प्रकाश भाव स्वरूप अनन्त है। वह प्रकाश का समूह मानो सूयं की श्रेणियाँ एक स्थान पर उदित हुई हो, आत्मा रूपी सुन्दरी ने जाग्रत होकर उस वैभव को देखा, प्रकाश नारायण के दर्शन किये ।
     शब्दार्थ--अनन्त=ब्रह्म । ऊगी=उगी=विकसित हुई । सूरज=सूर्य । सेणी=श्रेणी । कौतिग=कोतुक=आश्चर्यजनक वस्तु । तेणी=उनके द्वारा ।
           कौतिक दीठा देह बिन,रवि ससि बिना उजास।
           साहिब सेवा माहिं हें,चेपरवांही दास ॥ २ ॥
     सन्दर्भ--प्रबुद्ध आत्मा ने निराकर ब्रह्म के दर्शन किए। ब्रहम सेवा,अपनी द्वारा हि प्राप्त किया जा सक्ता है।
     भावार्थ--प्रबुद्ध आत्मा ने निराकार ब्र्ह्म दर्शन किये। वह ब्रह्म रवि एवं शशि के प्रकाश के अभाव मे भी प्रकाश मान है। वह स्वयम प्रकाश है। प्रभु के दर्शन सेवा मे रत सेवक को ही प्राप्त होते है।
               
     पारब्रम्ह के तेज का,कैसा है उनमान।
     कहिबे कूं सोभा नहिं, देख्या परमान ॥ ३ ॥ [ १२२ ]१२२]                        [ कबीर की साखी 
  भावार्थ-- पर ब्र्ह्म के तेज,स्वरूप किस प्रकार का है? यह अकथनीय है,अवर्णनीय है। वह अव्यिंजना से परे है,केवल अनुभव करने योग्य है।
  शब्दार्थ-- उनमान=अनुमान । कूं=को ।सोम=शोभ=देख्या=देखा, देख्ने से । परवान=प्रमाण । 
         अगम अगोघर गमि नहीं,तहाँ जगमगै जोति।
         जहाँ कबीरा धंदिगी,(तहां)पाप पुन्य नहीं छोति॥४॥
    सन्दर्भ--ब्रह्म प्रकाश स्वरूप है। वह ज्योति का समूह है।
    भावार्थ--निर्गुण निराकार ब्रह्म अगम है, अगोचर जहाँ ब्रह्म की ज्योति जगमगाती वहाँ किसी की गति नही है वह पाप-पुण्य कि सीमाओ से परे है। ऐसे ही ब्रह्म ही समक्ष कबीर की प्रार्थ्ना प्रस्तुत होते है।
    शब्दार्थ--गमि=गति । ज्योति=प्रकाश । छोति-छूत=अपवित्र ।
         हदे छाँडि बेहदि गया,हुआ निरंतर बास।
         कवल ज फूल्या फूल बिन,को निरपै निज दास॥५॥
   सन्दर्भ--साधक ससीम ब्रह्म को त्याग ;निःसीम ब्रह्मोपासना मे अनुरत्क हुआ । 
   भावार्थ--ससीम ब्रह्मोपासना का परित्याग करके (मैं) निराकार निर्गुण ब्रह्मोपासना मे सलग्न हुआ। और उसी मे मेरा चित, स्थायी रूप से रम गया। निर्गुण ब्रह्म रूपी कमल जो स्वयम् है,उसे कौन देख सकता है, उसका कौन अनुभव कर सकता है? ब्रह्म का सेवक ऐसे ब्रह्म का रहस्य जान सकते है।
   शब्दार्थ--हदे=हद=सीमा । वेहदि=निःसीम । फूल्या=फूला । निरपै=देपे
 
        कबीर मन मधफर भया,रहा निरंतर वास।
       कवल ज फूल्या जलह बिन,को को देखै निज दास॥६॥
   संदर्भ--मन मधुकर हो मग्न निरंतर रूप ने अनुवाद हो गया।
   भावार्थ--कबीर कहने हे कि मेरा मन मधुकर निगुंसा ब्रह्म पर घनुगन होकर उसी मे निरन्तर दम गया हॅ। माया रूपी जन के मंहार्द मे परे विरुपिमान निगुन ग्र्हा की दर्शन कोई ग्रहण गाहक ही मुक्ता हे।
    शब्दार्थ--मदफर=मदुकर,ब्रह्मर।निरंतर=गदत।नषद=वन। [ १२३ ]परषा को अंग]
  अंतरि कवल प्रक्रासिया, ब्रहा तहाँ होइ।
  मन भवरा तहां लुबाधिया, जांरौगा जन कोइ॥ ७ ॥
 संदार्भ - हृदय प्रदेश मे व्रह्म क वास है। मन भ्ंवरा वहा लुब्ध हो गया है।
 भावार्थ - हृदय मे कमल प्रकशित हो गया और उसमे ब्रह्म का निवास है। मन रूपी भ्रमर उस पर लुब्ध हो गया। विरला ही साधक इस रहस्य हो जान सकेगा।
 शब्दार्थ - अन्तरि = हृदय के अन्तर्गत। कवल = कमल = हृदय पद्म। प्रकाशिया = प्रकाशित हो गया। भवरा = भ्रमर।
   सायर नाही सीप बिन, स्वांति ब्ँद भी नांहि।
   कबीर मोती नीपजैं सुन्नि सिपर गढ मांहि॥ ८ ॥

सन्दर्भ - शून्य शिखर गढ मे निर्गुण ब्र्ह्म के दर्शन हुए। भावार्थ - कबीर कह्ते है कि न सागर है, न सीप है न स्वाती का बूंद् है। फिर भी शून्य शिखर गढ मे निर्गुण ब्रह़्म रूपी मोती की उप्लब्धि हो रही है। शब्दार्थ - सायर = सागर। स्वाति = स्वाती। नीप जै = उपजै। सुन्नि = शून्य।

  घट मांहैं औघट लह्या, औघट माहैं घाट।
  कहि कबीर परचा भया, गुरू दिखाई बाट॥ ९ ॥

सन्दर्भ - सतगुरु की कृपा से घट मे हो ब्रह़्म के दर्शन हो गए। भावार्थ - कबीर कह्ते है कि सतगुरु की कृपा से, सतगुरु द्वारा प्रतिदिन मार्ग पर चलकर घट मे ही ब्र्ह़्म के दर्शन हुए और ब्रह्म मे ही अपनी स्थिति दृष्टि गत हुई। शब्दार्थ - घत = शरीर। औघट = विचित्र् = ब्र्ह्म। बाट = मार्ग। परचा = परिचय।

 सूर समांणां च्ंद् में दहूं किया घर एक।
 मनफा च्य्ंता तय भया, पछू पूरवला लेख॥ १० ॥

सन्दर्भ - चन्द्रनाटो मे सूर्य नाटो ममाहिन हो गई, तब ब्रह्म के दर्शन हुए। भावार्थ - जब चन्द्र नाटो मे सूर्य नाटो प्रर्यप्ट हो गई और बन गया तब मन की अभिन्नता और पूनर्जन्म का सेग पूर हुआ सूर्यास्त मुनुरि पूर्ण हुई। [ १२४ ]शब्दार्थ-सूर= सूर्य चन्द्र= चन्द्र्मा दहू=दोनो ने ।च्य्न्ता=चिन्ता

           ह्द छाडि बेह्द गया, किया सुन्नि असनान।
           सुन जन मह्ल न पावई, तहा किया विश्राम॥

सन्दर्भ- निर्गुण् निराकार ब्रहा के दर्शन करके शुन्य शिखर गढ मे प्रवेश किया।

भावार्थ- संसार को सीमित दिशाओ का परिव्याम करके निःसीम ब्रहा मे प्रवेश किया। जिस निगुंरग ब्रहा के अतःपुर मे मुनिजन भी प्रवेश नही कर सक्ते है, वहा मैने विश्राम किया।

शब्दार्थ- हद=सीमा सुन्नी=शून्य असनान=अस्नान तहा=वहा विश्राम=आराम।

           देखो कर्म कबीर का, कछु पूरव जनम क खेल।
           जाका महूल न मुनि ल हुं,सो दो बत किया श्रलेख॥

सन्दर्भ-पूर्वजन्म के फल और इस जन्म की साधना के फल। कबीर ब्रहा से मिलकर अभिन्न हो गए।

भावार्थ-कबीर के कर्म,कृत्य,भाग्य और पूर्वजन्म को साधनात्मक चपलव्धि तो देखो, कि जिस ब्रहा के महल मे मुनि जन प्रवेश नही कर पाते है, उस ब्रहा को उसने अभिन्न बना लिया।

शब्दार्थ-कर्म=भाग्य,कृत्य।पूरव=पूर्व।जनम=जन्म।जाका=जिसक दिसत=दिस्त।श्रलेख=अनियंचनीय।

           पिंज़्रर प्रेम प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत।
           संसा खुदा सुख भया, मिल्या पियारा कंव॥

सन्दर्भ-प्रेम के जास्रत होते ही अनन्त योग जाग्रत हो गया और संगय मिट गया, ब्रंहा के साथ अभिन्नता हो गई।

भावार्थ- शरीर मे प्रेम के जादन होते ही अनंत प्रेम,ओर अनन मदय्ररा प्रवाह हो गई।

शब्दार्थ-पिंजर=घरीर।प्रकासिया=प्रकाघिन घुप्रा।जाग्या=जगा शाघ हुवा।जोग=पोग एगत्मवा। अनंत=प्रमोम। संसा=मयप।मूह=नष्ट हुवा।पियारा=प्यारा=प्रेम। [ १२५ ]

    प्यंजर् प्रेम प्रकास्रिया, श्रंतरि भया उजास।
     मुख कस्तूरी महिमहीं,बाँणी फूटी वास॥ 
  सन्दर्भ- प्रेम के प्रकतट होते ही अन्तस उज्ज्वल हो गया और सुन्दर प्रेम से 
  ओत्-प्रोत वाएगी प्रसफूटित् हुई ।
 भावार्थ-जव से प्रेम जाग्रत हुआ अन्तस उज्जवल हो गया और व्रह्रा रुपी कस्तुरी से सुवासित् 
 वाएगी प्रस्फुटित हुई।
शबदार्थ-प्यजर= पिजर=शरीर। अतरि=ह्रदय। उजारु=उज्जवल।
  करूतूरी= कस्तुरी। 
    मन लागा उन मन्न सौं,गगन पहुँचा जाइ।
    देख्या चंद बिहॅऊणीं ,चांदिएं,तहां श्रलख निरंजन राइ॥
संदर्भ- मन ने उनमनी अवस्था मै ब्रह्मानुभूति प्राप्त की।
भावार्थ-संसार से उन्मुक्त होकर मन उन्मनी अवस्था मे पहुंच कर ब्रह्माण्ढ  मै ज पहुंचा। वहॉं पर उसने स्वयम प्रकाश  पुन्ज ब्रह्म के दर्शन किये।  
    मन लागा उन मन सो, उन मन मनहिं विलग।   
    लूरगा बिलगा पारर्गियॉं, पांरगीं लॅऊरग बिलाग॥

संदर्भ्-मन व्रह्मा से मिल्कर एकाकार हो गया। भावार्थ-मन उन्मनो अवस्था मे प्रविप्ट हुआ और उनमन के साथ मिल कर दोनो अभिन्न हो गए। पानी और नमक मिलकर एक हो गये, एकाकार हो गए। [ १२६ ]सन्दर्भ - सुरति और निरति से परिचय होने पर सम्स्त रहस्य स्वत - उदभासित गया।

भावार्थ- सुरति निरति मे प्रविष्ट हो गई, और निरति के साथ मिलकर एकाकार हो गई। सुरति और निरति का परिचय हो जाने के पश्चात् ब्र्ह्म के रहस्य का द्वार स्वात: उद्घाटित हो गया।

शब्दार्थ - स्यम = स्वयं।

सुरति सुमांण निरति मैं,श्रजपा मांहै जाप। लेख समांण श्रुलेख मै, यू श्रापा मांहे श्राप॥ २३ ॥

सन्दर्भ - सुरति निरति मे प्रविष्ट हो गई। भावार्थ - सुरति निरति मे समाहित हो गई और जाप, अजपा जप मे परिवर्तित हो गया। इसी प्रकार साकार निराकर मे विलोन हो गया और आत्मा ईश्वर मे समाहित हो गई।

शब्दार्थ - लेख = साकार। अलेख = निराकर। श्राया था संसार में, देषरग कौं बहु रूप। कहै कबीरा संत हौ, पढ़ि गया नजरि श्र्नूप॥ २४ ॥

सन्दर्भ - संसार मे माया के विविध रूप देखने के लिए आया था। भावार्थ - संसार मे माया के बहुरंग रूप को देखने के लिए आया था, परन्तु हे सन्त-जन अनुपम तत्व जब से हष्टिगत हो गाया, तब से माया की समस्त दशाओ को मैं भूल गया।

शब्दार्थ - देपरग - देखने के लिए।

श्रंक भरे भरि भेटिया, मन में नाहीं धीर। कहै कबीर ते क्यू मिले, जव लग दोइ सरीर॥ २५ ॥

सन्दर्भ - ब्रह्म से एकाकार हो कर अभिन्न हो गया। भावार्थ - प्रेमाधिक्य के कारण प्रिय का बडी व्यग्रता के साथ आलिगन विध, दोनो शरीर एकाकार हो गए। कबीर केहते हैं जब तक प्रेम तत्व को प्रबलता नही होती हे तब तक दोनो एकाकार केसे हो सकते हे?

शब्दार्थ - अंक = गोद।

सचुपाया सुख ऊपना, अरु दिल दरिया पूरि। सकल पाप सड़जैं गये, जब जाई मिल्या हजूरि॥ २६ ॥

सन्दर्भ - हुजूर के दर्शन होते ही सम्रहन पाप और स्वतः हो गए। [ १२७ ]संदर्भ--आत्मा और परमात्मा उभय एकाकार हो गए। भावार्थ--अच्छा ही हुआ जो भय मेरे अन्तस मे समुत्पन्न हो गया, उसके फलस्वरुप मैं सासारिकता से ऊपर होकर ईश्वरोन्मुख हो गया। आत्मा रुपी पाला घुलकर पानी बन गया और व्रह्मा रुपी जल मे मिलकर वह अभिन्न हो गया। शब्दार्थ--जु=जो । पडया=समुत्प्न्न, आकर उपस्थित हो गया। कुलि=किनारे ।

चौहटै च्यंतामंणि चढ़ी,हाडी मारत हाथि। मीरां मुझसॅू मिहर करि,इब मिलौ न काहु साथि।।१६।।

संदर्भ--हे ईश्वर अब मैं तुझसे मिलकर अभिन्न हो गया। भावार्थ--जीवन रूपी चौराहे मे त्रिकुटी नामक स्थान पर जीवन रूपी चौसर के खेत मे पासा फेकते हुए,चिंतामणि हाथ मे लग गई। हे प्रभु !अब तुझे छोड़कर मैं किसी अन्य की अपेक्षा नही रखता हूँ। शब्दार्थ--च्यंतामणि=चिंतामणि। चढ़ी=प्राप्त हुई।

पंषि उडानीं गगन कॅू,प्यंड रह्या परदेश। पांणी पीया चंच बिन,भूलि गया यहु देश।।२०।।

संदर्भ--आत्मा ने निगुंण व्रहा के दर्शन प्राप्त किए। भावार्थ--आत्मा रूपी पक्षो ब्रहाण्ड मे उड़ गई और शरीर इस परदेश मे पड़ा रह गया। वहां पर आत्मा रूपी पक्षी ने चोच के बिना जल पिया।अर्थात् निराकार ब्रह्म के दर्शन किए और इस प्रकार वह अपनी दशा,परिस्थिति को भूल गई। शब्दार्थ--पंषि=पक्षी,आत्मा। प्यड=शरीर। चंच=चोच।

पंषि उडानीं गगन कूं,उड़ी चढ़ी श्रसमान। जिहिं सर मंडल भेदिया,सो सर लागा कान।।२१।।

संदर्भ--आत्मा रूपी पक्षी ब्रहाण्ड मे जाकर ब्रह्माकार हो गई। भावार्थ--आत्मा रूपी पक्षी ब्रहाण्ड मे प्रविष्ट होकर और आगे उड़ती गई जिस बाण ने हृदय मडल को आहत कर दिया था उस बाण के प्रति चित् को भावना और भी प्रगाढ़ हो गई। शब्दार्थ--सर=बाण।

सुरति समांणी निरति मैं,निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया,तब खूले स्यंभ दुवार।।२२।। [ १२८ ]

     भावार्थ-कबीर दास कहते हैं कि जब से प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन् हुए तब 

से ह्र्दय मे शन्ति का साम्राज्य स्थापित हो गाया और समस्त पाप सहज रूप से विनष्ट हो गए ।

     शब्दार्थ-सचुपाया=शांति प्राप्त की। ऊपना=उत्पन्न हुआ।
         धरती गगन पवन नहीं होता, नहीं तोया, नहीं तारा।
         तब हरि हरि के जन होते, कहै कबीर विचार॥२७॥
     सन्दर्भ-हरि और हरिजन शाश्वत है।
     भावार्थ-धरती गगन पवन, सूर्य जल न होते और यह सृष्टि भी न होती

तोभी प्रभु और उनके भक्त इस संसार में अवश्य होते।

     शब्दार्थ-तोया=पानी।
          जा दिन कुतमनां हुता, होता हट न पट।
          हुता कबीरा राम जन, देखै श्रौघट घट॥

     सन्दर्भ-राम और उनके भक्त शाश्वत है।
     भावार्थ- जिस दिन यह संसार न होता हाट और वस्त्र न होते,

सांसारिक व्यापार न होते कबीर कहते हैं कि उस दिन भी राम और राम के भक्त इस संसार में होते।

     शब्दार्थ- कृतम=कृत्रिम
          थिति पाई मन थिर भया, सतगुर करी सहाइ।
          श्रनिन कथा तनि श्राच्ररी, हिरदै त्रिभुवन राइ॥२६॥
     सन्दर्भ-जब से हरि को कथा का ध्यान किया तब से समस्त ताप नष्ट 

हो गए।

     भावार्थ-सदगुरु की कृपा से मन स्थिर हो गया और हरि की यज्ञगाथा

की साधना मे मन अनुरक्त हो गया, तब से हृदय मे भगवान के दर्शन हुए।

     शब्दार्थ-थिति=शांति। अमिन=अनन्य।
           हरि संगति सीतल भया, मिटी मोह की ताप।
           निस बासुरि सुख निध्य लह्या, जब श्रंतरि प्रगट्या श्राप॥३०॥
     सन्दर्भ-प्रभु की शरण मे जाने से समस्त पाप नष्ट हो गए।
     भावार्थ-हरि के शरण मे जाते ही समस्त पाप विनष्ट हो गए। मोह

की ज्वाला शान्त हो गाई जब से ब्रह्मा के दर्शन हुए तब से दिन-रात सुख की निधि प्राप्त हो गई। [ १२९ ]शब्दार्थ्-बासुरि=दिन । निध्य=निधि । तन भीतरि मन मानियां, बाहरि कहा न जाइ । ज्वाला तैं फिर जल भया,बुझी बलंती लाइ ॥३१॥ सन्दर्भ-अब मन अन्तर्मुखी हो गया । भावर्थ-ह्रदय मे ही मन मुग्ध होकर सीमित हो गया । अब यह बाहर कही नही आता है । मोह की ज्वाला शान्त हो गई और अग्नि पीतल हो गई । [ १३० ]

१३०]                                                                                         [कबीर की साखी 
शब्दार्थ - स्याबित = सम्पूरगं । ढंढोलता = खोजते  हुए ।
  जब मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नांहि ।
  सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्यां माहि ॥ ३५ ॥
     
सन्दर्भ-ह्रदय मे ब्रह्मानुभूति होते ही समस्त अंधकार मिट गया।
भावार्थ-जब तक अह्ं था तब तक मैं हरि को नहीं प्राप्त कर पाया। अब तो हरि ही हैं मैं नही हूँ, जब से ह्रदय मे स्वय प्रकाश के दर्शन हुए तब से समस्त ताप और पाप नष्ट हो गए ।
     
    शब्दार्थ-मै=अह्ंभाव।
      जा कारणि मैं ढूंढता,सनमुख मिलिया आइ।
      धन मैली पिव ऊजला,लागि न सकौं पाइ॥ ३६ ॥
 सन्दर्भ-प्रिय के साथ कैसे एकाकार होऊ मैं तो मलीन हूँ।
 भावार्थ-जिसको मैं ढूंढत फिरता था वह सन्मुख मिल गया,परन्तु पाप से पंकिल आत्मा रूपी प्रिय स्त्री प्रिय के चरणो का स्पर्श कैसे करे।

शब्दार्थ-धन=स्त्री,(आत्मा)।मैली=पापो से युक्त।

 जा कारणि मैं जाइ था,सोई पाई ठौर।
 सोई फिरि आपण भया,जासू कहता और॥३७॥
    

सन्दर्भ-आत्मा और परमात्मा मिलकर एकाकार हो गए । भावार्थ-जिसके खोज मे मैं भटक रहा था वह अपने स्थान पर प्राप्त हो गया और जिसे मैं विलग समझता था वही अभिन्न हो गया।

शब्दार्थ-जा कारणि-जिसके लिए।
 कबीर देख्या एक अंग,महिम कही न जाइ।
 तेज पुंज पारस धरणीं,नैनू रहा समाइ॥३८॥
संदर्भ-प्रकाश पुंज परमात्मा नेत्रो मे समाहित हैं।

भावातर्थ-कबीर दास कहते हैं कि मैंने प्रभु के दर्शन एक निष्ठ होकर किए। उनकी महिमा अनिव्ंचीय हैं। वह तेज पुन्ज हैं,पारस है,धनी है,वह नेत्रो मे समाहित हो रहा है।

शब्दार्थ-एक अंग=एक निष्ठ होकर धरणी=स्वामी। [ १३१ ] परचा कऔ} {१३१

    मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं ।
    मुकताहत्त मुकता चुगै, क्षब उड़ि क्षनत न जाहि।।३६।।
       सनदर्भ---मात सरोवर मे क्षात्मा रूपी हस विश्राम कर रहे हैं।
   भावार्थ---मानसरोवार भक्ति के शूद्ध जल से भरा हुआ है।। वहा अात्मा रुपी इंस क्रीड़ा कर रहे है, तथा भक्ति रुपी मोती चुप रहे हैंं अव्र वे उड़कर अनयत्र कही नही जाएंगे।
    शब्दार्थ---सुभर=शुद्ध।
           
    गगन गरजि अंमृत चबै, कदली कवल प्रकास्र।
    तहाँ कभीरा बंदिगी, कै कोेेई निज दास्र।।४०।।
सन्दर्भ---कबीर य्रह्मणड मे स्थिति प्रिय की वन्दगी करता है।
भावर्थ--शूनय शिखर गढ मे अन्ह्दनाद हो रहा है। अमृत की वर्षा हो रही है मौर सहस्त्र दल कमल विकसित हैं। कदली प्रकासित है। वहां पर कबीर, ईश्बराधना मे अनुरक्त है।
   शब्दार्थ --गगन = ब्रह्माण्ड ।
 
    नींव विहूॅलां देहुरा, देह विहुॅलां देव।
    कबीर तहाँ भिलंबिया, करे अलप की सेव।।४१।।

सनदर्भ--कबीर अलख की सेवा मे अनुरक्त है। भावार्थ--नीव से रहित देवालय मे निराकार देवता विधमान है एेसे स्थान पर कबीर अलख की सेवा करने मे अनुरक्त है।

   शब्दार्थ--देहुरा=देवालय। विहूरंला=रहित=विलंविया=विश्राम किया।
     
     देवल मांहे देहुरी, तिल जहे बिसतार । 
     माहै पाती मांहि जल, माहै पूजलहारं ।।४२।।
   सन्दर्भ---निगुला उपासना अन्तस मे हो रहा है ।
   भावार्थ--शरीर रूपी देवालय मे हो तिल समान सूहन विधवान हैं हृदय मे ही पुजा के पष हैं, हृदय में ही जल है, हृदय मे पुजा करने वाला है।
  शब्दार्थ--देव=देवालय। [ १३२ ]      
१३२]                                [कबीर की साखी      
     कबीर कवल प्रकासिया, ऊग्या निर्मल सूर।
     निस्र श्रंधियाऱी मिटि गई, बागे श्रनहद नूर।।४३।।
 सन्दर्भ- ज्ञान के उदय होते ही ह्रदय कमल विकसित हो गया।    
 भावार्थ- जब से निर्मल सूर्य रूपी ब्रहा का प्रकाश प्राप्त हुआ तब से
ह्दय कमल प्रकाशित हो गया। समस्त वासनाओ का अन्धकार मिट गया और अनहद नाद की तुरही बजने लगी ।
  शब्दार्थ-- ऊग्या = उदित हुआ ।
     श्रनह्द बाजै नीभ्रर भरै, उपजै ब्रहा गियान ।
     श्राबगति श्रंतरि प्रगटै,लागै प्रेम घियान॥४४।।
सन्दर्भ- प्रेम पूर्वक ध्यान लगाने से ब्रहा प्रकट होता है।

भावार्थ - प्रेम पूर्वक ध्यान लगाने से अविगत ब्रहा की अनुभुति होती है। अनहदनाद प्रतिश्रुति होता है और अनहद का झरना बहने लगता है।

  शब्दार्थ-नीझर = निभंर । गियान = ग्यान । आवगति= अनिवनीय। 
    श्राकासे मुखि ओंधा कुवाँ, पाताले पनिहारि।
    ताका पांरगी को हंसा पीवै, बिरला श्रादि बिचारि।।४५।।

सन्दर्भ--शून्य शिखर गढ़ का सुभग जल हंमात्मा ही पान करती है। भावार्थ--आकाश मे निम्न मुख हुआ है नीचे आत्मरूपी जल जल को प्राप्त करने के केलिए आकांक्शी है। इस कुएँ का जल कोई निकली शुद्धता ही ही गहण करती है।

    शब्दार्थ-- आकासे= आकाश मे व्रहा रन्घ में। औघा=निम्नाभिमुख। पनिहारि= पनिहारी।
    सिवसकती दिया कौण जु जोवै,पछिम दिसा उठै धूरि।
    जल मै स्यंघ जु घर करै,मछली चढ़ै खजूरि।।४६।।

सन्दर्भ--अनहद शब्द के सहारे आत्मा,व्रहा मे लीन हो जाती है। भावाथ्र्त--शिव और शक्ति को किस दिशा मे देखा जा सकता है वह तो सवं न्यापी है। जो दिशा विशेष में देखने की चेष्टा करेगा उसके पीछे घूल उडने लगेगी। श्रात्मारूपी मछली अनहदनाद के सहारे व्रहा मे लीन होगी,शिव और शक्ति की अनुभूति करना उतना ही कठिन है जितना मछली का खजूर पर चड़ना अथवा सिह का जल मे प्रवेश करना। [ १३३ ]रस को अगं] [१२३

शब्दार्थ= सकती= शक्ति। स्यंघ=सिंह ।मछली= आत्मा।
   श्रंमृत बरिसै हीरा निपजेै,घटां पढ़ौ टकसाल ।
   कबीर जुलाहा भया पारपू,क्षनभै उतन्या पार ॥४७।।

सन्दर्भ -ब्रह्मा निन्द होते ही दिव्य अनुभुति प्राप्त हो गई। भावर्थ --ब्रह्मा निन्द रूपी अमर्त की वर्षा हो रही है और प्रभु दणंन रुपी हीरा उत्पन्न हो रहा हे । अनहद शब्द प्रति हो श्रद रह हे ।कबिर जुलाहा निंभय होकर इस संसार सागर से पार उतर गया। शब्दार्थ--वरिसेै= वरसत हे घटा पढै टकसाल= अनहद नाद प्रतिश्रत हो रहा हे।

  ममिता मेरा क्या करे,प्रेम उघाड़ी पौलि ।
  दरसन भया दयाल का,सूल भई सुख सौड़ि॥४८।।

सन्दर्भ -ब्रह्मानुभति प्राप्त हौ जाने के बाद माया मोह के बन्बन विछित्र हो गये। भावीर्थ- माया मेेरा क्या कर लेगी अब तो प्रेम का दार उन्मुक्त हो गया अब तो दयालु ब्रह्म के दशंन हो गये,अब दुख भो सुख प्रतीत होने लगे। शब्दार्थ--ममिता=ममता । उपाडो=खोल दिया। पौलिव्दार।

             ६.रस कौ श्रंग
 कबिर हरि रस यौ पिया,खाकी रही न थाकि।
 पाका फलस कुॅभार का,बहुरि न चढ़ई चाकि।।१।।

संदर्भ--जोवात्मा प्रभु-भक्ति को रंग मे रंगकर [ १३४ ]१३४] [कबीर की साखी

        राम रसाइन प्रेम रस, पीवत श्रधिक रसाल।
        कबीर पीवगा दुलभ है, मांगै सीस कलाल॥२॥
 संदर्भ-ब्रहम्मानन्द के प्रेम का रस पाने मे जितना सुमधुर होता है उसकी प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। उसके लिए सवंस्ब त्याग करना पड़ता है।
 भावार्थ- प्रभु भक्ति का प्रेम रस पीने में बड़ा मधुर होता है और पीते-पीते और अधिक मधुर होता जाता है किन्तु कबीर कहते हैं कि इसकी प्राप्ति की शतं बड़ी कठिन है क्योंकि गुरू रूपी मदिरा विक्रेता कठिन से कठिन स्थिति का सामना करने के लिए साधक को उपदेश देता है।
 शब्दार्थ-कलाल=मदिरा पिलाने वाला।
        कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे श्राइ।
        सिर सौपै सोई पिबै नहीं तो पिया न जाइ॥३॥

संदर्भ- प्रभु प्राप्ति के लिए सवंस्व त्याग करना पड़ता है प्रत्येक कष्ट लना पड़ता है। भावार्थ-कबीर दास जी कहते हैं कि प्रभु भक्ति रूपी मदिरा को बेचने वाले सतगुरू की दुकान पर मदिरा पीने वाले बहुत से साधक बैठे हैं। किन्तु उस मदिरा का पानी वही पी सकता है जो अपने को साधना की कठिन से कठिन परिस्थितियों मे डाल दे अन्यथा उस मदिरा को नहीं पिया जा सकता है।

    विशेष-साग रूपक।
    शब्दार्थ-भाठी= भट्ठी जिसमे मदिरा तैयार की जाती है। बहुतक = बहुत से।
       हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूॅ न जाइ खुमार।
       मैभंता  घूमत  रहै, नांही  तन  की  सार॥४॥
संदर्भ-हरि-रस का पान करने वाला क्षपने शरीर की सुधि-वुधि भूल जाता है।
भावार्थ- हरि-भक्ति रसामृत का पान किया उसी व्यक्ति को समक्भना चाहिए जिसके ऊपर उसका स्थायो नशा बना रहे। और वह उस नशे मे मदमस्त हाथी के समान मतवाला होकर इधर-उधर घूमता रहे उसे अपने शरीर तक की भी सुधि-घुधि  न रहे।
   शब्दार्थ-मैमता=मस्त। [ १३५ ]रस का अंग]

मैमंता तिरा नांचरै, सालै चिता सनेह। बारि जु धांध्या प्रेम कै, डऻरि रह्या सिरि पेह॥ संदर्भ - परमऻत्मऻ प्रेमी को अपने शरीर क ध्यान नहीं रहता है।

भावार्थ -- जिस प्रकार मदमस्त हऻथी एक तिनका भी ग्रहन नहीं करतऻ है उसी प्रकार साधक भी खान पान की सुधि भुलऻकर पॽम की अग्नी मे अपने वरोर को तपाता है और जिस प्रकार मदमस्त हाथी दरवाजे पर बंधा हुआ अपने सिर पर मिट्टी डालता रहता है उसी प्रकार साधक भी अपने शरीर का ध्यान न रखकर अहं को भावना का त्याग कर सिर पर मिट्टी आदि धारण कर लेतऻ है।

शब्दार्थ - मैमंता = मगमस्त हाथी। तिण = तृण

मैमंता अविघत रता, अकल्प आसऻ जीति । राम आमलि माता रहै, जीवत मुकति अतीति॥

संदर्भ -- मद मस्त साधक अपने जीवन काल मे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। भावार्थ -- मदमस्त साधक अपनी अकल्पनीय आशाओ पर विजय प्राप्त करके परमात्मा के प्रेम मे तल्लीन रहता है। वह राम के प्रेमामृत मे इस तरह सरोवार रहता है कि जीवित अवस्था मै ही उसे जीवन से मुक्ति मिल जाती है।

शब्दार्थ -- अकलप = अकल्पनीय

जिहि सिर घड़ न डूबता, अब मैगल मलिम्लिन्हाड। देवल बूड़ऻ क्लस सूॅ, पंपि तिसाई जाई॥

संदर्भ -- भचित वे बढने पर आत्मऻ की प्यरा भी सत्त बढती चलती हे। भावार्थ -- जिस भक्ति के तालाब मे मन रूपी घढ़े डूबने पर भी पानी नही था। उसी मे अब भक्ति के बढ जाने से मग मस्त साधक मलमल कर स्नान करता है। अब उसमे इतना अधिक जल हो गया है मम्पण संसार उन भक्ति सागर मे डूब गया है किन्तु आत्मारूपी पक़ पीते पीते नही वधाता।

शब्दार्थ -- मैगल = मदमस्त हाथी, मन । देवन = संसऻर ।

सबै रसऻंइण मे किया, हरिसा और न कोइ। तिल एक घट मे सघर, तो सब कन्चन होई॥

संदर्भ -- प्रख रम वी समता करने वाला संसार का अन्य कोई भी रस नही है [ १३६ ]भावार्थ-- क्वोश्दास जो कहत हैॱ कि मैने संसार के सभी रसो का रसा ह्वाद्न करके देख लिया है किंतु हरि इसके समान और कोई रस नही है। यदि इस हरि रस कऻ एकतिल मात्र अंश भी शरीर मे व्यऻप्त हो जाय तो सम्पूर्ण शरीर पाप मुक्त होकर कंचऩ के समान शुध्द हो जाय।

शब्दार्थ--रसाहण= रसास्वादान ।


७. लांबिकौ अंग

कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर।
तन मन जोबन भरि पिया,प्यास न मिटी शरीर॥१॥


संदर्भ- ज्ञान एवं भक्ति के व्दारा भी शरीर की तृष्णा शांत नही होती।

भावार्थ- ज्ञान एवं भक्ति क उज्जवल एवं निर्मल नीर शरीर रुपी कमंडल मे भर लिया। शरीर एवं मन की पूण शक्ति लगाकर जीवन के सुन्दरतम समय यौवनकाल मे इसका पान कीया किन्तु फिर भी इसकी प्यास शांत नही हुई।

शब्दार्थ--कया= काया= शरीर।

मन उलट्या, दरिया मिल्या, लागा मलिमलि न्हांन।

थाहत थान न आवई, तूँ पूरा रहिमान॥ २ ॥

संदर्भ- जीवात्मा को प्रभु-प्रेम-सागर की थाह नही मिल पाती।

भावार्थ- मन सांसारिक झंझटो से हटकर प्रभु प्रेम रुपी समुद्र से जाकर मिल गया अौर वहाँ मलमल कर स्नान करने लगा। हे प्रभु! आप अत्यन्त दयालु है बहुत प्रयत्न करने पर भी आपकी वास्तविक थाह नही मिलती है।

शब्दार्थ--रहिमान=दयालु।

हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराइ।

बॄँद समानी समद मैॱ, सोकत हेरी जाइ॥ ३ ॥

संदर्भ- आत्मा का जब प्रमात्मा से एकीकरण हो जाता है तो उसको ढॄंड पाना कठिन होता है।

भावार्थ- कबीर की आत्मा परमऻत्मा को खोजते खोजते उसी मे लीन हो गई। आत्मा अौर प्रमात्मा क मेल हो गया। जो बॄँद समुर्द मे जाकर मिल जाती है [ १३७ ]जरर्ग्ग को अग } है उसका पता नही लगाया जा सकता है उसी प्रकार जिस आत्मा का परमात्मा मे समावेश हो गया उसको भी नही खोजा सकता है।

   शब्दार्थ - हेरत-हेरत = खोजते-खोजते। हिराइ = खो जाना। हेरो = पता लगाना।
     हेरत हेरत हे सखी, रहया कबीर हिराइ।
    समन्द समाना बूँद में, सो कत हेरया जाई॥४॥
 सन्दर्भ -- ह्र्र्रदय स्थित ईश्वर को देखना मुशकिल है।
 भावार्य -- कबीर की आत्मा सासारिक आत्माओ से कहती है कि हे सखी! परमात्मा को खोजते-खोजते मैं स्वयं खो गई। समुद्र (परमात्मा) बूंद (आत्मा) के अन्तःकरण मे ही व्याप्त है उसको केसे खोजा जा सकता है।
    शब्दार्थ -- समद = समुद्र।
      ८. जरर्ग्ग कौ त्रंग

भारी कहाैं त यहु डराैं, इलका कहूॅ ताै भूठ । मैं का जांरगाै राम कू, नैनूँ कपहूॅ न दीठ ॥१॥ सन्दर्भ -- ब्रह्म के स्वरुप का वरगंन नहीं किया जा सकता है। भावार्य -- यदि उस परमात्मा को भारी कहा जाय तो बहुत ढर सगता है पयॊकि वह निराफ़ार है फ़िर भारी कैसे हो सकता है? और यदि हल्का कहूँ तो यह भी असत्य हो है। क्पोंफ़ि मेंने अपने भोतिक नेबो से परमात्मा को देखा ही नहीं है फिर उनके अस्तित्व के विषय मे फह केमे सकता है।

     शब्दार्थ -- दीठ = देखा।
         दीठा है तो कस कहू, कधा न को पतिचाइ।
        डरि जैसा है तैसा रहो, तू छरिपि हरिषि गुण गाइ ॥२॥ [ १३८ ]भवार्थ - यदि उस परमात्मा के दशंन भी हो गये हो तो  भी उस अवर्ण्नीय् का वर्णन कैसे किया जा सकता है और यदि किसी प्रकार वर्णन कर भी दिया जाय तो कहने पर विश्वास कौन मान सकता है । परमात्मा जिस प्रकार का है उसे उसी प्रकार का रहने दो हे मन । तू प्रसन्न्तापूर्वक उस परमात्मा के गुणॊ का स्मरण कर।

शब्दार्थ - पतियाह = विश्वास करता है।

          ऐसा अद्भुतअ जिनि कथौ,अद्भुतअराखी रऻखि लुकाई।
          बेद कुरानौ गमि नही,वह्या न को पतियऻइ॥ ३ ॥

सन्दर्भ - ईश्वर के रूप का वर्णन वेद और कुरान ऐसे धर्मिक ग्रथ भी नहीं कर पाते हैं फिर और कौन कर सकता है? भवार्थ - जो ब्रह्मा इतना रह्स्य है रे मन। उसके वर्णन क प्रयास तू न कर। उस रहस्य को रहस्य ही बना रहने दे। वेद और कुरानादि धर्मिक ग्रन्थ जिसके गुणों का वर्णन नहीं कर सके उसका वर्णन कैसे किया जा सकता है और करने पर भी उसका विश्वास कौन करेगा? शब्दार्थ - जिनि = मत। गमि = पहुँच।

          करता की गति श्र्गम है, तू चलि श्र्पणौ उनमान।
          धीरैं धीरैं पाव दे, पहुचैंगे परवान॥ ४ ॥

सन्दर्भ - ईश्वर का दर्शन एक दिन में नहीं होगऻ प्रयास करने पर कभी न होई जायेगा। भवार्थ - सम्पूण विश्व के कर्ता पपरमऻत्मा की गति अगम्य है हे जीव? तू अपनी शक्ति के अनुसार ही उसको खोजने के लिये चल। धीरे धीरे चलते रहने पर भी किसी न किसी दिन तो उसके दर्शन हो हि जएंगे। शब्दार्थ - उनमान = मार्ग। पखान, ब्रह्म प्राप्ति।

         पहुचैंगे तब कहैंगे,श्रमङैंगे उस ठांइ।
         श्रजहूॅ बेरा समन्द मैं, बोलि बिगुचैं कांइ॥ ५ ॥ 

सन्दर्भ - बिना परमत्मा ज्ञान के उसके विषय में कुछ भी कहना व्यर्थ है। भवार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि उस परमात्मा के विषय में तभी कहा जा सकता हैं जब हम तक पहुँच जाएंगे। अभी तो मैं भंमॠधऻर में पड़ा हूँ। साधना के माँग में बीच में ही पड़ा हूँ इसलिए इस समय ईश्वर के विषय में कुछ कह कर अन्य मनुष्यों को धोखा क्यों दे। शबार्थ - अमडैंगे = कहेंगे। बिगूचैं = धोखा दें। [ १३९ ] ६ हैरन कौ त्र्प्रड्ग

                पंडित सेती कहि रहे, कह्यां न मानै कोइ ।
                श्रो श्रगऻध एका कहै, भारी  श्रचिरज होइ ॥१॥

सन्द्र्भ - ईश्वर के विषय मे जो कुछ भी कहा जाय उसी पर लोगो को अश्चय् होता है।

भावार्थ - मै यदि पण्डितो से उस परमात्मा के अदभुत स्वरुप क वय्ग्न करता हूँ तो ये उसका विदवास ही नही करते। और यदि मैं उनसे यह कह्ता है कि थ्रह्म असीम, अगाध, और एक है तो सभी पण्डित आश्चय्ं करते हैं।

शब्दार्थ - सेति = से।

                     घसै अपरऻडी पयाड में, तागति लषै न कोइ।
                     कहै कबीरा संत हौ, घडी श्रच्ंभा मोहि॥२॥

सन्दर्भ - ब्रह्म का निवास ह्रदय मे होने पर भी उसको कोई प्राप्त, नहीं कर पाता है।

भावार्थ - निराकार बह्म इसी शरीर मे निवास करता है किन्तु फिर भी इस बात पर कोई ध्यन नही देता हे उनकी गति को कोई देख नहीं पाता है। कबीर दास जी कहते हैं कि भुफे बडा आश्चयं इस बात पर होता है कि लोग साधना के ध्वारा उसे प्राप्त पयो नही फर पाते है।

शब्दार्थ - अप्ंडी = पय्ं = शरीर। [ १४० ]१०़़, लै को त्र्प्रग्ड्

 जिहि बन सीह न संचरै, प्ंषि उडै नहीं जाइ।
 रैनि दिवस का गमि नहिं,तह़ीं कबीर रह्या ल्यो लाइ॥ १॥

सन्दर्भ-अगम्य प्रभु की प्राप्ति के लिए द्त्तचित होकर साधना मे लीन होना चाहिए। भावार्थ- जिस बन मे सिह् नही पहुच् सकता पक्षी भी जहा उड़ नही सकते जहा रात्रि ओर दिवस का भी पता नही। सूयृ और चन्द्र्मा का अस्तित्व नही। उस न्थान तक पहुचने के लिए कबीरदास साधना कर रहे ह़ै सुरति ठीकुली लेज ल्यो,मन् नित डोलनहार। क्ँवल कुँवा म़ै़ प्रेम रस, पीवै बारम्चार ॥ २ ॥ सन्दर्भ- साधक का मन बार-बार ईश्वर का स्मरण करता है। भावार्थ- सहस्त्र दल रूपी कुए़ मे प्रेम का अम्रत मय रस भरा हुआ है। साधक सुरति-स्म्रुति की ढीकुली और लगन की रस्सी से मनके डोल मे इस रस को भरकर बारम्वार पीता है। विशेष- रुपक अलन्कार। शब्दार्थ- लेज = रस्सी । कमल क़ुंवा = सहस्त्रदल कमल।

गंग जमुना उर श्र्प्ंतरै, सहज सुनि ल्यौ घाट। तहां कबीरै मठ् रच्या, मुनि जन जोवै बाट॥ ३॥

सन्दर्भ - जिस स्थान तक पहुंचने के लिए। मुनि लोग प्रतीक्षा किया करते हैं वही पर कबीर दास ने अपने मन को साधना मे लगा दिया है।

भावार्थ- उडा और पिगला नाडिया ह्रुद्य मे गंगा और यमुना के समान प्रवाहित हो रही है शून्य् मे ध्यान रूपी घाट है। उसी शून्य् स्थान मे कबीर दास ने अपने मन को लगा दिया है। मुनि लोग उस स्थान के लिए प्रतीक्षा ही करते रहते हैं। शब्दार्थ - गंग यमुन =इडा पिगला। ल्यौ= ध्यान। [ १४१ ]

           ११. निहक्मी पतिव्रता कौ ध्पंग
        
         कबीर प्रीतड़ी तौ तुमसौं, बहु गुए याले कन्त ।
        जे हॅसि बोलौ और सौं, तौ नील रॅगाऊ दन्त ॥१॥
     सन्दर्भ--साषक केवल परमात्मा से प्रेम करता है ।
     भावार्थ--हे अनन्त गुए वाले प्रियतम। कबीर का एकमात्र तुम से
 ही प्रेम है। यदि मैं तुमे छोडकर अन्य किसी से हंस बोलकर प्रेम करुं तो वह मुंह पर 
 स्याही लगाकर मुंह को कलकित करने के समान है।
   शब्दार्थ--प्रीतड़ी = प्रेम। गुरिगया ले = गुरगवानू 
   
              नैनां श्रन्तर श्रावतूँ, ज्यूँहौ नैन भैपेउ।
              नाँ हौं देखौं और कूँ, नांतुभ देखन देउँ ॥२॥
      सन्दर्भ--प्रेम की अनन्यावस्था को दिखाया गाया है। मक्त प्रेम मे
  विभोर होकर अपने प्रियतम को ही देखना चाहता है।
      भावार्थ--हे प्रियतम । तुम नेनो के अन्दर आजाओ और मैं तुरन्त नेनो
  को मूंदलूं। जिससे न तो मैं ही तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य को देख सकूं और
  न तुम को ही अपने अतिरिक्त किसी अन्य को देखने दूं। तुम् मुजे देखो और मैं तुमे देखूं।
     सब्दार्थ--अंतरि=अन्दर। भंपेड=मूंदलूंगा।
             मेरा तुम में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
             तेरा तुमको सौपता, क्या लागै मेरा ॥३॥
      सन्दर्भ--संसार की सभी वस्तुऍ परमातमा की है। [ १४२ ]सन्दर्भ-भक्त के लिये भगवान को छोडकर अन्य कोई नहो होता है।

भावार्थ-कबीदास जो कहते हैं कि जिस प्रकार एक पतिब्रता स्त्री सौभाग्य सूचक सिन्दूर की रेखा हीलगाती है पति को आकर्षित करने के लिए आंखो मे काजल भी लगाती उसी प्रकार मेरे नेत्रो मे तो केवल राम को हि तस्वीर वसी हुई है किसी अन्य को उसमे स्थान नही मिल सकता है। शब्दर्थ-स्य्ंदूर=सिंदूर।नैमू-नेत्रो मे।


कबीरा सीप समद की,रटै पियास पियास। समदहि तिणा का बरी गिर्णा,स्वाँति बूँद की श्रास॥

सन्दर्भ-जिसका जिसमे प्रेम होता है उसके लिए उससे बढकर और कोई पदाथं नही होता है।

भावार्थ-कबीरदास जी कह्ते हैं कि समुद्र मे पडी हुई सीपी उसके जल से त्रुप्त न होकर प्यास रठती रहती है। वह तो स्वाति नक्षत्र के बूंद को आशाएं विशाल समुद्र को स्मान नगण्य समझ्ती है।

विशेष--अन्योक्ति अलंकार। शब्दार्थ-समदहिं=समुद्र्हि=समुद्र को।

कबीर सुख कौं जाइ था,श्राया दुख। जाइ सुख घरि श्रापणै,ह्म जाएगौं श्ररु दुख॥ सन्दर्भ- साघक परमातमा की प्राप्ति के लिए सासारिक सुखो को तिला-जलि दे देता है।

भावार्थ-कबीरदास् जी कहते है कि इस विषय विकार से भरे हुए संसार के सुखो मे लिप्त होने जा ही रहा था कि अचानक मेरा साक्षात्कार परमात्मा के विरहरुपी दुख से हो गया। तब मैंने सांसारिक दुखों को तिमाजलि देकर ईश्वर की श्राप्ति के लिए विरह(दुख) को ही सहने का लक्ष्य बनाया है॥

दो जग तौ हम श्रागिया,यहु ड्रर नाहीं मुझ। भिस्त न मेरे चाहिए, बांझ पियारे तुझ॥

संदर्भ-ईश्वर के अभाव मे भक्त स्वग्ं भी नही चाहता है।

भावार्थ- कबीरदास जी कह्ते हैं कि यदि मुझे नरक मे भी जाना पढे और वहां पर मुझे परमात्मा के दर्श्न न होता रहे तो मुझे कोई भय नही है। किन्तु ऐप्रितम! तेरे बिना यदि मुझे स्वर्ग मे भी जाना पडे, तो वह भी मेरे लिए स्याज्य है,व्य्घं है। [ १४३ ]मिह्कर्मी पतिवर्ता कौ अग]

   शब्दार्थ-दो जग=दो  जख-वर्क |मिस्त=वहिश्त-स्वर्ग |वाउभ=है|
      जे ग्यो एकै न जोगियाँ,तो जाओयाओ सब जाँए|
      जे ओ एक न जोगियाँ,तो सब ही जाँए अजाए||८||
   सन्दर्भ--परमात्मा के ज्ञान के अतिरिक्त और सव ज्ञान व्यर्थ है /
   भावार्थ--जिसने एक परमात्मा को जान लिया उसने संसार के सम्पुर्न ग्यन को प्राप्थ कर लिया/ और जिसने उस एक पर्मात्मा को नही जाना उसका सन्सार की अन्य वस्थुयो का ग्यन अग्यन के ही समान है /
   शब्दार्थ--जैङ्य = ज्ञान  /
          
  कबीर एक न जङिया,तौ बहुजाँगयो क्या होइ /
  एकै तए सब होत है,सबतै एक न होइ /८/

सन्दर्भ--सच्चा ग्यन ब्रम्ह्ग्यन है/ उस्से अन्य ग्यन प्रप्त होते है/ भावार्थ--कबिर्दास जि कह्ते है जिस्ने एक पर्मात्म को नहि जनसव ग्यन क्या होगा /वह व्यर्थ है /उस एक परमात्मा के ग्यन से तो और सभि ग्यन प्रप्त हो जाते है कि और सब ग्से माहात्मा क ग्यन नही होता है/

शब्दार्थ-एक=पर्मात्मा/बहु=अन्य समस्थ ग्यान/
   जब लगि भ्गति सकांता,तब लगि निर्फल सेव/
 कहै कबी वै क्यूँ मिलै,निहकांमी निज देव/१०/
     सन्दर्व-भ्स्
       हित काम्नारहित होनि छहिये/
     भावार्थ-जब तक भयित मे कामना मिली होति है किसि ध्वर्थ के लिये ईश्वर का स्मरण किया जाता है जत तक इश्वर निष्काम है उसे तो निष्काम भषिन से ही प्राप्त किया जा सकता है  साम भक्ति ए मिल  है?
      शव्धर्थ-सकीम्ता=कामनामय / निर्फल=निश्फल /निह्कामी=निप्कामी/ 
   आसा एक जु राम की,दूजी आस निराम/
  पांगी मांई घर फरै, ते भी मरै पियास/११ [ १४४ ]        सन्दर्भ -जीन को सांसारिक आशाओ के प्राप्त होने पर भी शान्ति प्राप्ति
नही होती है|
       भावार्थ-जिसको एक परमात्मा की आशा है उसके लिए अन्य आशाएँ

व्यर्थ है निराशामात्र है क्योंकि उसी एक से सबकी प्राप्ति होती है । सांसारिक कामनाओ का अन्त तो निराशाएँ होता है । जो व्यक्ति ईश्वर की आशा को छोड़ कर अन्य की आशा करते हैं वह तो उन लोगो के समान है । जो पानी मे रहकर भी प्यासे मरते हैं ।

       शब्दार्थ -पारगी= जल ।
         
          जें मन लागै एक सूँ, तौ निरबाल्या जाइ ।
          तूरा दुइ मुखि बाजरगाँ, न्याइ तमाचे खाइ ।
       सन्दर्भ्---जीव को अकेले परमात्मा के प्रेम मे मन को लगा देना चाहिए |
       भावार्थ-यदि जीव का मन परमात्मा पर ही .आसक्त हो जाय तो उसका
 निर्वाह हो जायगा और यदिवह ईश्वर के अतिरिक्त अन्य का ध्यान करता है तो उसे

सांसारिक दुख उसी प्रकार सहन करने पडे गे जिस प्रकार तुरही को दोमुखों से वजने के काररग अकाररग ही हाथ के प्रहार सहन करने पडते हैं ।

       शब्दार्थ्---निरवाल्या= निर्वाह हो जाएगा ।तूरा= तुरही । न्याइ= उचित | बाजरंगा= बजाने से ।
          
         कबीर कलिजुग श्राइकरि, कीये बहुतज  मीत ।
         जिन दिल बँघी एक सूँ, ते सुखु सोवें नचीँत |
       सन्दर्भ-जीव यदि परमात्मा को मित्र वना ले तो वह निश्चिंत हो

सकता है ।

       भावार्थ -- कबिरदास् जी कहते हैं कि इस कलियुग मे आकर मनुष्य अनेको

मित्रों को बनाता है किन्तु वे सभी दुख देने वाले होते है परन्तु यदि एक परमात्मा को मित्र बना लिया जाय तो जीव जीवन पय्ंत निश्चिन्त होकर सो सकता है ।

       शब्दार्थ-बहुतज = बहुत से| नचींत = निश्चिन्त [ १४५ ]

निहकमीं पतिव्रता कौ अंग [१४५]

भावार्थ - कबीर दास जी कहते है कि मै राम का कुत्ता हूँ और मेरा नाम मुतिया है मेरे गले में राम नाम की रस्सी पडी हुई है उस रस्सी को पक्ड कर मेरे स्वामी राम जिधर मुझे घुमाते हैं मैं उधर ही घूम जाता हूँ।

विशेष - रूपक अंलकार।

शब्दार्थ - कूता = कुत्ता । जेवङी = जेवरी= रस्सी । तो तो करै त बाहुङ़ों, दुरि दुरि करै तो जाउ। ज्यूऍ हरि राखै त्यूँ रहौं, जो देवै सो खाउँ।

सन्दर्भ- भक्त अपने सारे क्रिया कलाप ईश्वर को इच्छा पर हो करता है।

भावार्थ- यदि ईश्वर मुक्त कुन को तू-तू करके बुलाते हैं तो मैं तुरन्त ही उनके समोप पहुँच् जाता हूँ और यदि दुरदुरा देते हैं तो मैं दूर चला जाता हूँ। इस प्रकार मैं राम की इच्छा पर ही रहता हूँ। वह जो कुछ खाने को दे देते हैं वही खा लेता हूँ, शबदार्थ- वाहुङो= नजदीक ।

मन प्रतीत का प्रेम रस, नाँ इस तन मैं ढ़ग । क्या जाएऔ उस्र पीव सू, कैसै रहसी रंग ॥१५॥

सन्दर्भ- जीवात्मा को चिन्ता है कि वह प्रभु-मिलन के आचार-व्यवहार तक से भी परिचत नहीं है फिर मिलन कैसे होगी ।

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि मेरा मन न तो ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखता है और न प्रेम रस से हो परिपूर्ण है और शरीर भी उसके मिलन के लिए उपयुक्त नहीं हैं फिर समझ में नहीं आता कि राम-रंग के खेलों में उस ईश्वर के साथ फैने प्रवृति होगी ।

उस संम्रथ का दाश हौं, कदे न होइ अकाज । पतिव्रता नॉगी रहे, तौ उस ही पुरिम कौ लाज ॥१७॥

संदर्भ- भक्ति पर यदि आपत्ति श्रावेगो तो ईश्वर के लिए ल्ज्जा का विषय हैं।

भावार्थ - मैं उस समयं पुरुष परमात्मा का सेवक हूँ जो मयं पमिनाम है । इस कारण मेरा किसी भी प्रकार वनयं नही हो सकता है जिस प्रकार पनिश्ता स्त्री के नग्न रहने पर उसके पति यो हो नश्य आनो है उसी प्रकार मेरे ध्यान होने मे भी परमात्मा के लिए हो मरण का विषय है । [ १४६ ] कबीर के साकी

   शब्दार्थ-सम्त्र्य =साम्थ्यन्वान ब्रह्म। कदे =कभी भी ।
   धरि परमेसुर पाहुणां, सुणौं सनेही दास ।
 षटरस भोजन भगति करि ज्यूँ कदेन छाँडै पास ॥१८॥ [ १४७ ]संदर्भ - सासारिक वैभव थोडे दिनो का ही होता है। मरणोपरात उस्का चिन्ह भी नही रह जाता है। अतः ईश्वर का नाम स्मरण कर जीवन को सार्थक करना चाहिए।

भावार्थ- जिन लोगो के दरवाज़ो पर सदैव वैभव सूचक नगाखे बजा करते थे और मदमस्त हाथी घूमा करते थे। वे वैभवशाली लोग भी ईश्वर के एक नाम के बिना अपने जीवन को ससार में व्यर्थ ही खो बैठे।

शब्दार्थ - मैगल- मदमस्त हाथी।

ढोल दमामा दुड़ बड़ी, सहनाई संग् मेरि।
श्रौसर चल्या बजाइ करि, है कोइ राखै फेरि॥३॥

स्ंदर्भ-- कोई भी सासारिक आकर्ष्ण मृत्यू को रोकने मे समर्थ नहीं है। भावार्थ-- प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार ढोल, नगाड़ा डुगडुगी, शह्नाई तथा मेटी को बजाते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उनका वैभव और ऐश्वर्य मृत्यु को रोकने मे समर्थ नहीं हो पाता है।

शब्दार्थ--दुडबडी= डुग्डुगी।
सातों शब्द जु बाजते, घरि घरि होते राग।

ते मन्दिर खाली पड़े, बैसण लागे लाग॥४॥ संदर्भ-- मृत्यु सम्पूर्ण वैभवो को नष्ट कर देती है। भावार्थ--जिनके दरवाजे पर सप्तस्वरों का राग बजता या अर्थात् जहाँ वैभव का प्रत्येक उपकरण उपस्थित था आज वे वैभवपूर्ण महल भी खालि पडे है उन पर आज पौए बैठे हैं। उनका समस्त वैभव नष्ट हो गया है। शब्दार्थ--सातो सबद= सप्त स्वर। बैसण= बैठने लगे।

कबीर थोडा जीवडाॅॅ, माढे बहूत मॅगण। सयही ऊभा मेल्हि गया, राब रंक सुलितान॥२॥

संदर्भ--मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के लिये नानापिर प्रयास करना है लौर वे सुख के साधन पूर्ण भी नहीं हो पावे कि उसका बिनाय हो जाता है। भावार्थ-- कबीर दास जी कहते है कि यह [ १४८ ]शब्दार्थ--माडे बहुत मन्डाण= वडे ठाट- वाट बान्ध दिए। उभा = खड़ा। मेल्हि = नष्ट हो गया ।

          इक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पडै चिछोह।
          राजा राणा छ्त्रपति,सावधान किन होइ ॥

सन्दर्भ्--सन्सार से वियोग अवशयन्भावि है इसलिए पहले हि व्यक्ति को सावधान हो जाना चाहिए। भावार्थ --एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब कि मनुष्य क सभि से वियोग हो जायेगा। अतएव हे राजाओं। हे छ्त्र को धारण करने वालो। आप लोग आज ही सावधान क्यों नही हो जाते। ताकि बाद मे पच्चाताप न करना पडे। शब्दार्थ-- किन = वयो नहि

         कबिर पटण कारिवाँ, पंच चोर दस द्वार ।
         जय रोगों गढ़ भेलिसी, सुमिरि लै करतार॥

सन्दर्भ-- साग रुपक के द्वार शरीर पर यमराज के आक्रमण को स्पष्ट किया गया है। भावार्थ-- कबीरदास जी का कहना है कि यह शरीर रजी साथंवाह है जो आत्मा रूपी धन को लेकर चल रहा है। इसके साथ पाच चोर ( काम, क्रोध, लोभ,मोह) उस धन को चुराने के लिए चल रहे है। दस छिद्रों के होने के कारण इस शरीर रूपी कारवां को दशा और भी शोचनीय हो रही है यमराज इस दुगं को नष्ट करने के लिए इस पर आक्रमण अवश्य करेगा अत: ईश्वर का स्मरण करना चाहीए तभी रक्षा हो सकती है। शब्दार्थ-- पाटण - नगर, शरिर। कारिवां= साथवाह । पंच चोर =

काम क्रोध, मद, लोभ , मोह। दसद्वार = दस छिद्र।
           कबीर कहा गरबियों, इस जीवन की आस।
           टेसू फूले दिवस चारि, खंखर भये पलास॥

संदर्भ-- क्षण भंगुर जीवन में अभिमान नही करना चाहिए॥ भावार्थ-- कबीरदास जी कहते है कि इस नशवर शरीर और जीवन की आशा मे मनुष्य को घमण्ड नही करना चाहिए। जिस प्रकार पलाश के वृक्ष मे चार दिन के लिए अर्थाथ थोडे समय के लिए टेसू (पलश के फुल) आ जाते हैं॥। [ १४९ ]भरा हो जाता है और फिर वह ठूँठ का ठूँठ हो रह जाता है । ठोक उसो प्रकार यह जीवन भी थोड़े दिनो, तक आभा बिखेर कर नष्ट हो जाता है। शब्दार्थ - खंखर= नष्ट हो जाते है ।

कबीर कहा गरिबियौ, देही देखि सुरंग।

बिछड़ियँ मिलिबौ नही ज्यूँ कांचली भुवंग।॥६॥ संदर्भ - शरीर को छोडने के बाद आत्मा उसमे प्रविष्ट नही होती इसलिए जीव को गवं नही करना चाहिए। भावार्थ - सुरग = सुन्दर । वोछडिया = वियुक्त होने पर । कबीर कहा गरबियों ,ऊचे देखि श्र्वास । काल्हि परयू मै लेटेएगा, ऊपरी जामे घास।।

संदर्भ- सासारिक ऐश्वर्य पर गवं नहो करना चाहिए ।

भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओ को देखकर उस पर गवं नही करना चाहिए । जोव यह नही जानता कि णोघ्र हो उसे कन में लेटना पढ़ेगा और कब के ऊपर घाम उग आएगो तेरा सारा चैभत्र नष्ट हो जायेगा । शब्दार्थ- प्रवास = घर म्वै=भू । भावार्थ- उबोरदास जो कहते है कि नमें ने


कबीर कहा गरबियाँ , फाल गहे फर फेस । नो जाएगे कहा मारिसी , कै घरि कै परदेस।।१२॥ [ १५० ]


            संदर्भ-मृथ्यु एक न एक दिन सभी को नष्ट कर देती है अत: मनुष्य की गवं नही करना चाहिए | 
       भावार्थ-कबीर कह्ते हैं कि हे जीव तेरे बालो को मृत्यु अपने हाथो मे पकड़े हुए है फिर भी तू व्यथं मे गवं क्यो करता है । यह भी पता नहीं कि वह मृत्यु तुमे घर मे या परदेश मे कहाँ मारेगी ।
               यह ऐसा संसार है, जैसा सैबल फूल ।
               दिन दस के व्यौहारकौ मूठै रंगि न भूलि ॥१३॥
    संदर्भ-सेमर की फूल की भांति इस नश्वर संसार पर गवं करना उचित नही है ।
    भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि यह संसार उसी प्रकार है जिस प्रकार सेमर की फूल । सेमर का फूल ऊपर से ही आकर्षक होता है भीतर उसमे कोई तत्व नही होता है । इस थोड़े दिन के जीवन मे इसके मूठे दिखावे मे मनुष्य को अपनी वास्तविकता को नही भूल जाना चाहिए ।
    शब्दार्थ-सैंवल=सेमर का पुश्प । मूठै रगि=मूठे आकर्षण । विशेष=उपमा अलंकार।
               जांमण मरण विचारि करि, कूड़े कांम निबारी ।
               जिनि पंथूं तुम चालणं, सोई पंथ सॅवारि ॥१४॥
    संदर्भ-वासना प्रेरित कुमार्ग को छोड़कर मनुष्य को सुमार्ग को अपनाना चाहिए ।
    भावार्थ-कबीरदास जी कह्ते है कि हे मनुष्य । तू जीवन मरण (आवा-गमन) को गम्भीरतापूर्वक विचार कर वासना जन्य कुकर्मो का परित्याग कर दे । जिस भू-भवित के मार्ग पर तुमे अंततः चलना है तू उसे अभी से अपना ले । 
   शब्दार्थ-जामण=जन्म । घूडे-वुरे । चाल=चलना हे संवारि=संभाल ले ।
               विन रखवाले वाहिरा, चिडियैं खाया खेत ।
               आधा प्रधा ऊवरै, चेति सकै तो चेति ॥१५॥
    संदर्भ-जीव को सावधानी से मोक्ष-प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए ।
     भावार्थ-हे मनुष्य । सतगुरु रुपी रक्षक के अभाव मे तेरे मोक्ष रूपी खेत को कुछ तो काम व्रोघादि रूपी पाँच चोरो ने उडा लिया ओर कुछ वासना रूपी [ १५१ ]चिडियो ने खा लिया । अब भी यदि मंगल चाहता है तो सावधान होकर प्रभु-भक्ति मे प्रव्रति होकर उसको थोडा बहुत बचा ले ।

शब्दार्थ-रखवाले = रक्षक , गुरु । चिडीयै = वामना या माया के पक्षो । आधा प्रधा = थोडा बहुत ।

हाड जलै ज्यु लाकडि ; केस जलै ज्यू घास । सब तन जलवा देखि करि , भया कबीर उदास ॥ १६॥ शब्दर्थ - शरीर कि क्षण भगुरता देखकर कबीर को विरवीन हो गयी है ।

भवार्थ - कबीर दास जी केहते है कि मरणोप्रन्त इस शरीर की हडिडया लकडि की भाति और केश घास की तरह चिता के उपर जलते है । इस प्रकार समस्त शरीर को जलता हुआ देखकर कबीर दास जी य्ह समझकर कि इस जीवन मे कुछ नहि है इससे विरक्त हो गये।

कबीर मन्दिर ढ्हि पड्या , सैट भई सैबार । कोइ चेजारा चिरग् गया , मिल्या न दूजी वार ॥१५॥

संदभृ -शरीर के नश्ट होने पर इसका बनाने वाला कारीगर इसकी मरम्म्त नही करता वह बेकार ही हो जाता है ।

भावार्थ - कबीर दास जी केहते है कि सैकडो बार काम क्रोवादि रुपी चोरो ने इस शरीर रुपी मकान मे सेन्ध लगाइ है । इसको चुनकर बनाने वाला कारीगर एक बार तो बना गया किन्तु दुबारा बनाने के लिये वह नही मिला । स शब्दार्थ - चेजारा = चुनने वाला , राज ।

कबीर देखत छहि पडया , ईट भई सैवार । फरि चिजारा सौ प्रितिदी , ज्यू ढ्हि न दूजी बार ॥१७॥

सन्धर्भ - इश्वर से प्रेम करने पर मानव शरीर आयागमन मेइन मुक होकर घमरता लको प्राप्त कर्ता है ।

भावार्थ - कबीर दास जी केहते है कि [ १५२ ] १५२] [कबीर की साखी

   शब्दार्थ-प्रीतिड़ो = प्रेम 
 कबीर मन्दिर लाष का, जड़िया हीरैं लालि॥
 दिवस चारि का पेषरणां, विनस जाइगा काल्हि॥१६
  सन्दर्भ- शरीर की साज सज्जा चन्द दिनो की है उसके बाद यह नष्ट हो जायेगा।
  भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि शरीर रूपी मन्दिर लाख का बना हुआ है इसमे हीरे और  लाल जड़ै हुए हैं यह देखने में बहुत आकर्षक है किन्तु इसका यह आकर्षण शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा और यह(पाण्डवो के) लाक्षा गृह के कि समान जलकर नष्ट हो जयेगा।
  शब्दार्थ- लाष=लाक्षा, लांख।
कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह।
दिवस चारि का पेषरणां अन्ति षहे की षहे॥२८॥
 सन्दर्भ- रूपक के द्वारा शरीर की क्षण भंगुरता के प्रति सकेत है।
 भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर धूल को इकट्ठा करके पुडिया के समान बाँध दिया गया है। इसकी साज-सज्जा कुछ ही दिनो की है और अन्त मे यह जिस मिट्टी से बना है उसी मिट्टी के रूप मे परिवर्तित हो जएगा।
 शब्दार्थ- सकेलि=एकत्रित कर। पुडी= पुडिया षेह=धूल।
 
कबीर जे धन्धै तौ धूलि, बिन धधै धूलै नहीं।
तैं नर बिनहे मूलि,जिनि,धंधै मै ध्याया नहीं॥२१॥
 सन्दर्भ- प्रभु प्रप्ति संसार में रहकर ही सम्भव है।
 भावार्थ- कबीर का कहना है कि मनुष्य इस संसार मे सत्कर्मो में प्रवृत्त रहते हैं उनकी आत्मा स्वच्छ हो जाती है क्योंकि बिना कर्मों के आत्मा स्वच्छ नही हो सकती। वे मनुष्य तो जाते ही नष्ट हो गये जो इस संसार मे कर्मों मे प्रवृत्त होते हुए इश्वर का स्मरण नही करते।
 शब्दार्थ- धधै=कर्म। धूलि=घूलना। विनठे= नष्ट हो गये।
कबीर सुपनै रैनि कै, उघड़ि आए नैन।
जीव पडया बहु लुटि मैं, जागै तौ लैं रंग नदैरगा॥२२॥ [ १५३ ]सन्दभ- अज्ञान के कारए ही जीव माया के श्रम मे पडा रह्ता हे किन्तु ज्ञान् रुपी जागृति होने पर माया के बन्धन से मुक्त हो जाता हे।

भावार्थ - कबीरदास जी केह्ते है कि जीवात्मा के अज्ञान रुपी रात्रि मे सोते-सोते सह्सा नेत्र खुल गये। सुप्तवास्था मे वह नाना प्रकार के लेन देन मे पडा हुआ था और जागत ही (ज्ञाण प्रात्प होते ही)यह् सन्सार के लेन देन से मुक्त हो ग्या।

             कबीर सुपनै रैनिकै,पारस जीय मे छेक।
            जे सोऊ तौ दोइ जए॥ , जे जागू तौ एक॥ २३॥

सन्द्बर्भ् - ब्रह्म और जीव क भेद माया के कारण ही होता है । ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह भेद समाप्त जो जाता है।

भावार्थ - कबीर दास जी कहते है कि अज्ञान ऱूपी ऱात्रि मे माय के स्वप्न् देखने के कारण पारस्त्ररूप ब्रह्म और जीव मे अन्तर स्थापित हो गया। यही कारण है कि अज्ञान की सुपुप्तावस्थायें मुझमे और परमात्मा मे भेद हो जाता है और ज्ञाण की जाग्रता वस्या मे कोई भेद नही रहना एकरूपता स्थापित हो जाती है । शब्दार्थ = छेक = भेद

         कबीर इस स्ंसार में, घणें मनिष मत हीण ।
        रांम नांम जांण नहीं, श्र्र्राया टापा दीन ॥ २४ ॥

सन्दर्भ - ढोगियो और तिलकघारियो के प्रति व्यग्य है ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि इस स्ंसार मे अनेको मनुष्य बुद्धि-हीन है वह राम नाम वास्तविक तत्व को न जान कर तिलरू आदि लगाकर ही ईश्व्रर भक्त बनना चाहते है । स्ंसार को धोका देना चाहते हैं ।" श्ब्दार्थ - घणॉ = अत्यधिक । टापा = फासा देना, धोखा देना ।

          कहा कियौ हम आइ करि, कझा कहेगे जाइ ।
          इत के भय न उतके, चाले मूल ग्ंवाइ ॥२५॥

सन्दर्भ - जीव इस स्ंसार में आकर परलोक सुधारने के कंभ कम करता है ।

भावार्थ - कबीर दास जी कहते है कि हमने इस स्ंसार मे आकर आत्मा को मुक्ति के लिये कौन-कौन किएं हैं जिनको भि मरने के बाद ईश्व्र्रर के [ १५४ ] १५४ ] [ कबीर की साखी

बतलायेंगे । हमने न तो ऐसे कर्म किये है जिनसे इस लोक का जीवन सुधरता और न ऐसे सत्कर्म किए है कि परलोक का मार्ग ही सुधरता । अत: हम तो कहीं के न हुए जो पवित्रआत्ना परमात्मा से प्राप्त हुई थी वह भी गज बैठे ।

                आया अस आया भया, ले चरता संसार ।
                 पड़्या भुलांवा गाफिला, गये कुबधी हारि ॥२६॥

सन्दर्भ्--- जो व्यक्ति संसार से आकर माया के आकर्षण में ही पडे रहते है उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है ।

भावार्थ्-- इस संसार में आकर जो व्यक्ति नाना प्रकार के सांसारिक् आकर्षणों में आकर पड़ जाते है वह संसार में आकर भी न आने के समान मृत तुल्य है । वह भ्रम में पडा हुआ बेहोश है और दुष्ट दुद्धि पराजित हो चुके हैं ।

शब्दार्थ्--., आया-: न आने के समान । भुलांवा= भ्रम मे । कुबुधी= बुरी बुद्धि ।


             कबीर हरि की भगति लि, धिग जीव् संसार ।
             धूवा केरा धौलहर्, जात न लागे बार ॥२७॥

सन्दर्भ- प्रभु भक्ति के बिना जीवन भारण व्यर्थ है ।

भावार्थ- कबीरदास भी कहते है कि ईश्वर भक्ति के बिना इस संसार से जीवित रहना घूर" स्पद है । मनुष्य को प्रभु भक्ति करनी ही चाहिए क्योंकि यह शरीर धुएँ के महल के समान हैं जिसके बिगड़ने में यक भी देर नही लगती है । विशोप--(१) उपमा अलंकार

      (२) धुआ कैसे घौलहर देखि तू न भूलिरे है ।

विनय पत्रिका में तुलसी ने भी इसका प्रयोग किया है ।

शब्दार्थ---घ्रिग = घिषकार । घौलहार = महल । जात = नष्ट होते ।

              जिहि धरि की चोरी करी, गये राम गुण भूलि ।
              ते बिधना पल रचे, रहे अरध मुखि टिकी ॥२९॥

सन्दर्भ- प्रभु भक्ति के विना जीवन व्यर्थ होता है ।

भावार्थ-जिन मनुजायों ने इस संसार में आकर वहा के प्रति भी विश्वम- घात किया है उनके गुणी को भूल जाते है । उन्हीं को विधाता बगुले का जन्म दे देता है जो उज्जवल अपना मुख नीचा किये खडे रहते है [ [ १५५ ]चितावणी कौ अंग ] [१५५

                  माटी मलणि कुंभार की घरणी सहै सिरि लात ।
                  इहि श्रौसरि चेत्या नहीं, चूका श्रव की घात ॥२९॥
   सन्दर्भ -जो मनुष्य इस संसार में आकर आवागमन के चक्र से छूटने के लिए प्रयास नही करता वह फिर मुक्त नहीं हो पाता है।
   भावार्थ-जिस प्रकार कुम्हार की मिट्टी को मलते समय अनेको लातें खानी पड़ती हैं ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी नाना प्रकार की यातनाये' भोगनी पडती हैं इस लिए हे जीव यदि तू इस जन्म में सावधान नहीं हुआ तो पुनः इस प्रकार का स्वर्णिम अवसर मिलना मुश्किल है।
                    इहि श्रौसरि चेत्या नहीं,पसु ज्यूं पाली देह ।
                    राम नाम जाएयां नहीं, श्रंति पड़ी मुख पेह ॥३०॥
 
       सन्दर्भ - मनुष्य योनि में जो अपने को मुक्त न कर सका उसका जीवन ही नष्ट हो जाता है।
       भावार्थ - इस मनुष्य योनि में जिस व्यक्ति को चेत नही आया, परलोक को सुधारने की चेष्टा नहीं की और पशुओ के समान देह को ही पालता रहा अर्थात् पाशविक प्रवृत्तियो में ही लगा रहा। जीवन भर राम के महत्व को न पहिचान पाने के कारण अन्त समय में तुझे नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाना पढ़ेगा।

         शब्दार्थ- पेह = मिट्टी,धूल ।
             
                रांम नांम जांएयौं नहीं, लागी मोटी ,पोडि ।
                काया हांडी काठकी, ना ऊँ चढै चहोड़ि ॥ ३१ ॥
        संदर्भ - मनुष्य जीवन बार-बार नही मिलता अत: प्रभु-भक्ति इसी जीवन में कर लेनी चाहिए।
        भावार्थ - जीवन भर राम नाम के महत्व को नहीं जाना । सासारिक प्रपंचो की मोटी तह जमा हो गई जिस प्रकार काठ को हौटी एक ही चार पढाई जा सुनती है पुचारा वह चटाने योग्य नहीं रह जानी है उसी प्रकर वह गगेर भी दुबारा प्राप्त नहीं हो सकता है।
                  शब्दार्थ - पोडि = दोप । चहोड़ि = पृन पृगरी बार । 
                 राम नाम जांरयाँ नहीं, पाच यिनठी मृल । 
                 परठ डंडा ही हारिया परति पढ़ी गुग्व धूलि ॥३२॥ [ १५६ ] १५६]                                                 [कबीर की साखी    
    सन्दर्भ-मनुष्य को अपनी शक्ति संसार के व्यर्थ कार्यों में नष्ट न कर प्रभु भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए।
    भावार्थ- हे जीवात्मा! तूने राम नाम के तत्व को नहीं जाना और इस प्रकार जड़ से ही बात को बिगाड़ दिया । व्यर्थ के सासारिक धन्धो मे तू यहाँ पर ईश्वर को ही हार गया अब मरने के अवसर पर तेरे मुख मे धूलि के अतिरिक्त और क्या हो सक्ता है?
     शब्दार्थ - विनेटी = नष्ट कर दो । 
          राम नाम जाएयां नहीं, पाल्यो कटक कुटुम्ब ।  
          धन्धा ही में मरि गया, बाहर हुई न बम्ब ॥३३॥
       
       सन्दर्भ- सासारिक झझटो मे जीवन का अन्त हो जाता है किन्तु अहंकार के कारण राम नाम का स्मरण नही हो पाता है । 
       भावार्थ- हे जीवात्मा! तुमने राम नाम का स्मरण नही किया । सेना के समान छपने कुटुम्ब के पालन मे ही जूझता रहा। इस प्रकार सासारिक झझटो मे उलझते हुए जीवन का अन्त हो गया किन्तु अहंकार से मुक्ति फिर भी न मिली ।  
       शब्दार्थ- कटक=सेना । बंब=नगाड़ा,यहाँ अहं से तात्पयं है ।
           मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बांरम्बार । 
           तरवर थैं फल झड़ि पडूया, बहुरि न लागै डार॥३४॥
      सन्दर्भ-मनुष्य का जन्म बार-बार नहि प्राप्त होता है।
      भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव जन्म बडी कठिनाई से प्राप्त होता है और यह शरीर बारम्बार नही प्राप्त होता हे। जिस प्रकार एक बार वृक्ष से फल गिर जाने के बाद उसी शाखा में फिर से नही लग सकता उसी प्रकार मनुष्य देह भी दुबारा नही मिल पाती हे ।
       शब्दार्थ - मनिषा = मानव का।
             कबीर हरि की भगति करि, तजि विषिया रस चोज।
             बार- बार नहि पाइये, मनिषा जन्म की मौज॥ ३५॥
       सन्दर्भ -मानव जन्म के बार-बार न मिल पाने के कारण जीव को ईशवर स्मरण से समय व्यतीत करना चाहिए। भावार्थ- कबीर का कहना है कि मानव जन्म-प्राप्ति का सौभाग्य बारम्बार प्राप्त नही होता अत: हे जीवात्मा। विषय वासना युक्त माया पुर्ण क्षणिक [ १५७ ]चितावणी कौ अग]                                                               [१५७

आनन्द और सुखो का परित्याग कर प्रभु भक्ति मैं प्रवृत्त होगा बडी वास्तविक आनन्द है।

     शब्दार्थ-रस चोज=आनन्दोल्लस ।
       कबीर यहु तन जात है, सकै तौ ठाहर लाइ ।
       कै सेवा करि साधकी, कै गुरु गोविन्द के गाइ॥३६॥
     सन्दर्भ-जीव को प्रभु भक्ति और सरसगति करनी चाहिए।
    भावर्थ-कबीर दास जी कहते हैं कि यह शरीर नश्वर हैं शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाला है अत:यदि तू इसे उचित कार्य मे लगा सके तो लगा ले। या तो तू साधुओ की सेवा मे अपने मन और शरीर को लगा दे या फिर परमात्मा के गुणानुवाद कर ताकि तेरा परलोक सुधर जाय।
     विशेष-तुलसी ने भी लिखा है कि--
          "बिनु सत्संग विवेक न होई।
           राम कृपा बिन सुलभ न सोई॥"
                                -मानस
     शब्दार्थ -ठाहर लाइ=उचित कार्य मे लगाना।
         कबीर यह तन जात है, सकै तौ लेहु वहोडि।
         नागे हाथूँ ते गये, जिनकै लाख करोड़ि ॥३७_॥
  सन्दर्भ-परलोक क ध्यान रखना जीवात्मा का परम लक्ष्य है।
  भावार्थ-कबीर दास जी कहते है कि यह शरीर व्यर्थ मे ही नष्ट होता जा रहा है अब भी यदि इसका उध्दार करना चाहो तो अच्छे कर्मों मे प्रवृत करो संसार मे माया के पीछे बावला बना क्यों फिरता है जिनके पास लाखो और करोड़ो की सम्पदा पो वह भी मृत्यु के समय खाली हाथ ही यहाँ से चले गये।
      विशेष-१)ह्ष्टान्त अलंकार।
           २)तुलना कीजिए।
         इकट्ठे गर जहाँ जर सभी मुल्कों के माली थे।
         सिकन्दर जय चलाँ दुनिया से दोनों हाथ खाली थे।
      शब्दार्थ-वहोडि=चहोरि=पुन्ः। नामे=प लो।
        यह बनु काचा कुभं है, चोट चहूँ टिमि साह।
        एक राम के नांव श्रिन,जदि तदि प्रसै जाइ॥३८॥ [ १५८ ]१५८ ]                                                           [कबीर की साखी
    संदर्भ- ईश्वर के नाम-स्मरण के बिना इस शरीर को नानाविधि यातनाएँ 

भोगनी पढती है।

    भावार्थ - जिस प्रकार कुम्भकार का क्च्चा घडा कुम्भकार की थपकी की चोट खाता रहता है उसी प्रकार यह शरीर भी सासारिक यातनाओ को सह रहा है|

केवल राम नाम के अवलम्ब के बिना यह जब तब संसार मे जन्म लेकर नाना प्रकार के कष्ट पाता है|

    विशेष- रूपक अलंकार  | 
    शब्दार्थ- जदितदि = जब तब | 

              यह तन काचा कुंभ है, लियां फिरै था साथि |
              ढ़बका लागा फूटि गया, कछू न श्राया हाथि ॥३९॥
    संदर्भ- शरीर का भविष्य अनिश्चित है| 
    भावार्थ - कुम्भकार का क्च्चा घड़ा जिसे हाथ में लिए रहता है कोमल होने के कारण तनिक सी चोट लगने के कारण फूट जाता है और अस्तित्वहीन होने के कारण फिर हाथ मे कुछ नही रहता उसी प्रकार इस शरीर का भविष्य भी अनिश्चित होता है यह भी किसी समय नष्ट हो सकता है और नष्ट होने पर कुछ भी हाथ मे नहीं आता है । 
    शव्दार्थ - ढ़बका= हल्की सी चोट।
          
         काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बघै बियाघि । 
         राम कबीरो रुचि गई, याही श्रौषदि साधि॥४०॥
    संदर्भ- सासारिक तापो को औषधि एक मात्र प्रभु भक्ति ही है|
    भावार्थ - हे जीवात्मा तू अपनी शरीर रुपी केचुली को वासना से मत कलंकित कर । काल रुपी शिकारी दिन प्रति दीन तुझे मार रहा है। कबीर दस जी ने तो अपनी रुचि ईश्वर भक्ति की ओर मोड दी है। हे प्राणो ! तू भी उसी औषधि का सेवन कर।
   शब्दार्थ- काँची = केचुला |बियाघि = बहेलिया, शिकारी।
       कबीर अपने जीव तैं, ऐ दोइ वातैं धोइ।
       लोभ बडाई कारणौं, अछता मूल न खोई॥४१॥
   संदर्भ- लोभ और दप से ही प्रभु भक्ति मे बाधा पड़ती है। [ १५९ ]चितावणी कौं अग ]                                                                 [१५९

      भावार्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि हे जीव । तू अपने मन से दो बातो को बिल्कुल निकाल दे एक तो लोभ और दूसरे आत्म-प्रशंसा से उत्पन्न अहंकार ।इन्ही दो वस्तुओ के कारण अपने अमूल्य धन परमात्मा को मत खो ।
     शब्दार्थ - जीवतैं =मन से । अछता=पास का ।
       खंभा एक गईद दोइ, क्यूं करि बंघिसि बारि ।
       मानि करै तौ पीव नहीं, पीव तौ मानि निवारि ॥४२॥
     सन्दर्भ- प्रभु-भक्ति और अह्ं की भावना दोनो साथ-साथ नहीं रह सकते हैं।
     भावार्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि हे जीव! तेरे पास हृदय रुपी खम्भा तो एक है और उस खम्भे मे बांधने के लिए दो हाथो प्रभु-भक्ति और अहं है। वे दोनो एक ही खंभे से कैसे बांधे जा सकते हैं। यदि तू अहं की सम्मान की रक्षा करना चाहेगा तो प्रभु प्राप्ति नही पावेगी और यदि प्रियतम परमात्मा को प्राप्त करना चाहेगा तो अह्ं का परित्याग करना पड़ेगा ।
     शब्दार्थ - गईद = गयंद = हाथो ।
        दीन गेंवाया दुनीं सौ, दुनी न चाली साथि ।
        पाँइ कुहाड़ा मारिया, गाफिल श्रपणौ हाथि ॥४३॥
     सन्दर्भ - संसार के आकर्षण मरते समय नही काम देते हैं उन समय तो प्रभु-भक्ति ही काम देती हैं।
     भावार्थ - जीवात्मा ने सासारिक माया आकर्षणो मे लिप्त रह कर प्रभु को भुला दिया किन्तु मरने पर वह सासारिक प्रलोभन एक भी जीव के साथ नही जाते हैं। इस प्रकार जीवात्मा ने गाफिल होकर एवयं अपने पैरों मे कुल्हाडी मार ली है अपनी उन्नति का मागं अवच्ध कर लिया है।
     शब्दार्थ - दीन = घम । दुनी = दुनिया।
         यहु तन तौं नय धन भया, करम भए कुहाडि ।
         प्राप प्राप के काटि है , कहै कबीर विचारि ॥४४॥
     सन्दर्भ - कर्मों का पन जीव को भोगना नहीं पडता हैं ।
     भावार्थ -यह सम्पूर्ण शरीर बन के समान है और उनको काटने के लिए जीव के कर्मों की कुल्हाडी प्ररगुन है । कबीर दास जी विचार कर कहते है कि जीव [ १६० ]                                  कबीर की साखी

अपने कर्मों को कुल्हाड़ी से अपने शरीर को काट रहा है ।जीवन को नष्ट कर रहा है ।

      विशेष -१ तुलना कीजिए
              कोउ न कड़ु सुख दुख कर दाता ।
              निज फुत कर्म भोग सुनु भ्राता ॥
                                     -मानस
       
       ॥२॥ रुपक अलंकर ।
       शब्दार्थ - कुहाड़ि = कुल्हाड़ा  ।
         
            कुल खोयां कुल ऊबरै ,कुल राख्यां कुल जाइ ।
            राम निकुल कुल मेंटि लै ,सब कुल रझा समाइ ॥
      सन्दर्भ - माया जन्य आकर्षणो को भुलाकर ही ब्रझा-प्राप्ति संभव है ।
      भावार्थ -सांसरिक वैभवो का त्याग करके ही सारे तत्व ब्रझ की प्राप्ति
 संभव है और यदि सांसारिक वैभवों की रक्षा का प्रयास किया गया तो ईश्वर -प्राप्ति असम्भव है इसलिए हे जीव । तू सांसारिक आकर्षणों से विरक्त होकर ब्रझ से मिल ले क्योंकि सारा संसार उसी में समाया हुआ है ।
         विशेष - कुल के दो होने से यमक अलंकार ।
          शब्दार्थ - कुल = सांसारिक वैभव । कुल = सारतत्व प्रभु ।निकुल =कुल रहित होकर ,

सांसारिक प्रलोभनो से विरक्त होकर । कुल = समस्त आनद के साधन ।

                   दुनिया के धोखै मुवा ,चलै जु कुल की कांणि ।
                   तब कुल किसका लाजस्री , जब ले धर्या मसांणि ॥
         सन्दर्भ - जीव ने यदि प्रभु -भक्ति ,साधु सेवा आदि सुकृत्य किये होते तो उसका नाश न होता ।
       भावार्थ - जो व्यक्ति कुल की मर्यादा आदि के प्रपंचों को लेकर चला वह सांसारिक भ्रमो का शिकार होकर मर गया । मृत्यु हो जाने पर जब शव को लेजाकर श्मशान की अपधिश्र भूमि मे रख दिया जाता है तब किसक कुल लज्जित होता है ?अर्थात किसी क नही ।
        शब्दार्थ -काणि= मर्यादा ,गौरव । लाजसो =लज्जा  करता है ।मसाणि = श्मशान । [ १६१ ]चितादवरगी कौ अंग]                                             [१६१
      
         दुनीयाँ भाँडा दुख का, भरी मुहांमुह् भूप।
         श्रदया श्रलह् राम की, कुरहै ऊणीं कूप ॥ ४७ ॥
  सन्दर्भ -- सब कुछ राम की कृपा से ही प्राप्त होता है ।
  भावार्थ-- यह संसार और कुछ नही केवल दुखो का पात्र (स्थान) है जो

नीचे से ऊपर तक अभावो से पूणं रुपेरग भरा हुआ है । श्रेप्ठ राम और अल्लाह की कृपा के बिना बड़े-बड़े कोषागारो के रहते हुए भी जीवात्मा को अभावो का शिकार होना पडता है।

  शब्दार्थ--भांडा = वतंन । अदया = कृपा बिना । अलह =अल्लाह ।
         जिहि जेवरगी जग वॅधिया, तू जिनि वघैं कबीर । 
          हैसी श्राटा लूण ज्यू, सोना सेवा शरीर ॥४८॥
  सन्दर्भ -- माया के बंधन मे पड़ने  से जीव को मुक्ति नही होती है। उसे

आवागमन, के चक्र मे पडकर सासारिक यातनाएं सहनी पडती हैं ।

  भावार्थ -- कबीरदास जी अपने को सम्बोधित करते  हुए कहते हैं कि जिस 

माया की रस्सी से सारा संसार बंधा हुआ है उससे तू अपने को मत बांध अर्थात् तू माया के प्रलोभन मे न पडा । जिस प्रकार आटे की लोई को हाथो के मुक्के सहेने पडते हैं उसी प्रकार तू भी कंचन के समान शुध्द शरीर का होकर भी माया के यश मे होकर सासारिक यातना के प्रबल आघातो को बारम्बार सहेगा।

  शब्दार्थ -- जेवडी=रस्मी, माया बंधन । लूरंग=आटे की लोई।
             कह्ते सुनत जग जात है, विपै न सूभ्कै काल।
              कबीर प्यालै प्रेम कै, भरि भरि पिवै रसाल॥४६॥
  संदर्भ -- माया के परिणाम को जान सुनकर के भी जीव उसके आव पंरग 

मे मुक्त नही हो पाता है ।

  भावार्थ --इस संसार के सभी प्राणो माया से मुक्त होने का उपदेश देते 

और सुनते हुए भी एक- एक कर उमी यिपय वामना के मागं पर चलते जाते है उसमे उन्हे अपना विनाश दिखाई ही नही देता किन्तु कनीर ऐसे साधु व्यत्कि प्रभु- प्रेप रए के व्यामो को भर -भर कर पी रहे हैं और अमित आनन्द की प्राप्ति कर रहे है।

  शब्दार्थ--- यिपै= विषय वासना ।
        कबीर द्दद के जीव सु , हित फरि मुग्यां  न पोलि।
        जे लागे चेह्द सुँ, विन सुँ अंतर ग्योलि ॥१०॥
  ग * सा * दा* -११ [ १६२ ]१६२ ]                          [ कबीर की साखी

संदर्भ - प्रभु भक्तो से ही अन्तःकरण की बात कहनी चाहिए ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते है , कि संसार के माया मे लिप्त प्राणियो से प्रेम पूवंक वार्तालाप नहीं करना चाहिए । इसके अतिरिक्त जो असोम परमात्मा की प्राप्ति में सन्नध्द हैं ऐसे प्रभु-भक्तो से अपने अन्त:करण की बात भी कह देनी चाहिए ।

शब्दार्थ - हद के जीव सूं = सांसारिक मनुष्य से बेहद = असोम , निस्सोम ।

  कबीर केवल राम की , तूँ जिनि छाड़ै श्रोट ।
  घण अहरणि विधि लोई ज्यूँ , घणीं सहैं सिर चोट ॥५२॥

सन्दर्भ - प्रभु = आश्रय से विमुक्त प्राणियो को नानाविध यातनाएँ सहनी पड़ती हैं ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि हे जोवात्मा । तू राम का परमात्मा का आश्रय कभी मत छोड और यदि तू ब्रझ को विस्मृत कर देगा तो जिस प्रकार धन और छेनी के बीच लोहे को अनेकों चोटें सहनी पड़ती हैं उसी प्रकार तुम्हे भी जाना प्रकार की सासारिक यातनाए सहनी पड़ेगी ।

शब्दार्थ - अहरणि = छेनी ।

  कबीर केवल राम कहि , सुध गरीबी भ्कालि ।
  कूड़ बड़ाई कूड़सी , भारी पड़सी काल्हि ॥५२॥

संदर्भ - राम नाम को भुलाकर भूठे बडप्पन मे डूब जाने से जीव को बड़े कष्ट सहन करने पडते हैं ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव । तू राम नाम का स्मरण करते हुए अपनी गरीबी मे ही प्रसन्न रह । भवसागर मे डुबने वाले मिथ्या सासारिक वैभवो मे यदि तू पड गया तो भविष्य मे तेरे ऊपर भारी विपित आयेगी और निश्चित रुप से तेरा पतन होगा ।

शब्दार्थ - भ्काल्हि = भ्केलने । कूड = व्ययं के , मिथ्या ।

  काया मंजन क्या करै , कपड़ धोइम धोइ ।
  उजल हुआ न छूटिये , सुख नींदड़ीं न सोइ ॥५३॥

सन्दर्भ - शरीर और कपडो की शुध्दता से ही आत्मा पवित्र नहीं होती । मन की शुध्दि ही वास्तविक शुध्दि है । [ १६३ ]चितावरणी कौ अंग ]

      भावार्थ-- कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव ! तू कपडो को धो-धोकर शरीर को स्वच्छ कर रहा है किंतु ऐसी सफाई से क्या लाभ ? वास्तविक पवित्रता आतरिक पवित्रता हैं। इस बाझ स्वच्छता से संसार से मुक्ति नहीं होगी इसलिए सुख की निद्रा मे मत पड़ा रह ।
     शब्दार्थ - मंजन= स्नान । छुटिए=मुक्त होना।
      ऊजल कपड़ा पहरि करि ,पान सुपारी खाँहि ।
      एकै हरि का नांव बिन , बाँघे जमपुरि जाँहि ॥५४॥
   सन्दर्भ -ईश्वर के नाम स्मरण के बिना  जीव को यमपुर की यातनाये भुगतनी पडती हैं।
   भावार्थ- जो व्यक्ति श्वेत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पान सुपारी खाकर अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं वे एक ईश्वर के नाम-स्मरण के बिना यमपुर के चधनो मे जकड दिए जाते हैं ।
      तेरा संगी को नहीं,सब स्त्रारथ वॅधी लोइ ।
      मन परतीति न ऊपजै , जीव विसास न होइ॥५५॥
   संदर्भ -बिना ईश्वर की प्रतीति के जीवात्मा को मुक्ति नही मिलती।
   भावार्थ -हे जीव । जिनको तू अपना संगी साथी मानता हे वे कोई तुम्हारे साथी नहीं हैं।

वे सब तो स्वयमं मे बंधे हुए हैं । जब तक मन मे ईश्वर की प्रतीति नहीं होता है तब तक जीवात्मा को मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती हैं ।

    शब्दार्थ -बंधो =बंधे हुए । लोई=लोग।
      माँइ बिड़ाणी वाप बिड़, हम भी मॅभ्कि बिड़ोह् ।
      दरिया केरी नाव ज्यॅ , स्र'जोगे मिलियाँह ॥५६॥
    संदर्भ -इस संसार मे सभी प्राणी अचानक मिल जाते है और फिर यिमुक्त हो जाते हैं ।
    शब्दार्थ -इस संसार मे सभी मचन्ध मिण्घा हैं । माता-पिता , मद नष्ट होने वाले हैं 

हम भी इस संसार मे एक दिन नष्ट हो जायॅगे । यह संसार नदी की नाव के समान है जिसमे

नव संचन्दी और मित्र लचानक संयोग मिल भी जाते है और विमुक्त भी हो जाते हैं ।
    शब्दार्थ -विद्दाणी = नष्ट द्दोने यानो है । [ १६४ ]१६४]                                               
                                            [कबीर की साखी 
               इत प्रधर , उत घर , बण जण श्राये हाट ।
               करम किरांणां बेचि करि , उठि ज लोग श्राट ॥५७॥
      सन्दर्भ--इस संसार मे आकर लोग कर्मो का फल भोग कर फिर मृत्यु को प्रप्त हो जाते हैं ।
      भावार्थ -जीवात्मा का घर तो ब्रझ के पास ही है यह संसार तो उसके लिए परदेश हैं ।

लोग इस संसार मे कर्मों का व्यापार करने के लिए आते हैं और कर्मों का किराना -कर्म फल प्राप्त करके बेचकर सब उसी मागं का अवलम्बन करते हैं ।

     शब्दार्थ-प्रघर= पर घर , संसार । बर=ब्रझ।
        
             नाँन्हाँ  काती चित दे महँगे मोलि बिकाइ ।
             गाहक राजा राम है और न नेड़ा श्राइ ॥५८॥
      सन्दर्भ--कर्मो के अनुसार फल देना परमात्मा का ही काम हैं ।
      भावार्थ--हे जीवात्मा! तू खूब मन लगाकर सतकर्मो का पतला सूत कात जिससे तुझे अच्छी                                                                                                                                              

कीमत प्राप्त होगी । उस कर्म रूपी सूत को लेने वाले केवल राम ही हैं अन्य लोग तो पास आने का साहस भी नही करेंगे ।

     शब्दार्थ--नान्हां =पतला। सूत=घागा कामं से तारपयं हैं । नेड़ा=समीप ।
      डागल ऊपरि दौलणाँ, सुख निदणीं न सोइ ।
      पूनै पाये ध्धौंहड़े श्रौछी ठौर न कोइ॥५६॥
    सन्दर्भ -जीवन को प्रभु भक्ति मे ही लगाना चाहिए ,व्यर्थ मे नही खोना चाहिए ।
    भावार्थ--हे मनुष्य ! तुमको ऊबड़ खाबड़ भूमि पर दौडना है कठिन साधना करनी हैं ।

सुख निद्रा मे अचेत हो कर मत खो । यह मानव शरीर अनेकानेक सुकर्मों के परिणाम स्वरुप प्राप्त हुआ है प्रभु-भक्ति के बिना इसे व्यर्थ मत खो ।

   शब्दार्थ-डागल =ऊबड़ खाबड़ भूमि । खौंहढ़े = देवालय (यहा मानव शरीर से तात्पयं हैं ।)
     मैं मैं पड़ी थलाइ द्दे , सकै जौ निकस्री भाजि।
     कब लग रास्त्रौं द्दे सखी, रूई पलेटी आगि॥६०॥
  सन्दर्भ--अह्ंकार किसी न किसी दिन प्रकट होकर जीव को नष्ट कर देता हैं । [ १६५ ]चितावणी कौ अंग ]                                                [१६५

भावार्थ-अह्ंकार बहुत ही भयानक वस्तु है|इसका शीघ्र ही विनाश् कर देना चाहिए अन्यथा यह व्यक्ति को ही नष्ट कर देगा|जिस प्रकार रूईमे लिपटो हुई अग्नि कव तक सुरक्षित रह सकती है वह थोडे ही समय मे रूई को भस्मकर् चाहर प्रकट हो जाती है उसी प्रकार अह्ंकार भी कत्र तक छिपा हुआ रहेगा एक न एक दिन वह प्रकट होवेगा ही|

 शब्दार्थ-मै मै=अह|वलाई=वला|
   मैं मैं मेरी जिनि करै,मेरी मूल बिनास|
   मेरी पग का षैषडा़,मेरी गल की पास||६१||

सन्दर्भ-अहंकार मनुष्य का विनाश का मूल कारण है| भावार्थ-हे जीव तू अह्ंकार का परित्याग कर दे क्योकि अह्ंकार आत्मा के विनाश का कारण है|अहं भाव ही जीव के पैरो का बन्धन है और गले मे पढें हुए फासी के फन्दे के समान है|

   शब्दार्थ-षैषडा=बधन |पास=पाश,फासी का फन्दा|
    कबीर नाव जरजरी,कूडे खेवणहार|
    हलके हलके तिरि गए,बूडे तिनि सिर भार||६२||
  सन्दर्भ-जो पापो के वो भक्त से लदे नही होते है है वे ही स्ंसार सागर 

को पार कर पाते है|

  भावार्थ-कबीर दास जो कहते है कि जीवन रूपी नाच अत्यन्त जज्ंर है

जोर उसका खेने वाला नाविक अत्यन्त कूडा है,बेकार है|ऐमी अवस्था मे जो व्यक्ति हलके है जिनके ऊपर पापो का वोफा कम है वे तो स्ंसार सागर से पार उतर गए और जिनके सर पर पापो का वोफा लदा हुआ था ये उसी भव सागर मे दूब गए|

  शब्दार्थ-कूडे=रदी,बेकार|हलके हलके=पुदारमा वाले| [ १६६ ]
           १३. मन कौ त्र्प्रग्ङ 
     मन कै मते न चालिए, छाँडिं जीव की बाँणिं|
     ताकू केरे सूत ज्यूँ,उलटि श्रपूठा श्रांणिं॥१॥
  सन्दर्भ-जीव ब्रह्म का ही अंग है उसे संसार से हटाकर ब्रह्म मे ही लगा 

देना चाहिए|

 भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि हे जीव!तू मन इच्छानुसार न

चल|मन विषय वासना मे लिप्त रहने की आदत छुडा दे|जिस प्रकार तकुआ का सूत उससे निकाल कर फिर उसी से लपेट दिया जाता है उसी प्रकार तू अपने मन को संसार से विरक्त करके ब्रह्मा से लगा दे|

   शब्दार्थ-बांणि=आदत,स्वभाव|अपूठा=क्च्चा|
    चिंता चिति निबारिये,फिरि बूक्थिये न कोई|
    इंद्री पसर मिटाइये,सहजि मिलैगा सोइ||२||
 संदर्भ-सासारिक चिन्ताओ को छोड देने से परमात्मा स्वयं ही प्राप्त हो 

जाता है|

 भावार्थ-अपने मन से संसार की नाना प्रकार की चिन्ताओ को त्याग देने 

पर फिर किसी की भी परवाह नही रहती है|इन्द्रियों से उत्पन्न विषय वासना रूपी सुख के फैलाव को समाप्त कर देने पर वह परमात्मा बडी ही सरलता से प्राप्त हो जाता है|

 शब्दार्थ-चिन्ता=सासारिक चन्ताएं|सहजि=आसनी से|
 आसा का ईंघण करूँ,मनसा करूँ विभूति|
 जोगी फेरी फिल करौ,यौ बिननाँ वै सूति||३||
 सन्दर्भ-सत्कर्मो के द्वरा ही ब्रह्मा को प्राप्त किया जा सकता है|
 भावार्थ-आशा का परित्याग कर उसको ईंधन के रूप मे प्रयोग कर मन 

के अह्ंकार को जला कर भस्म कर दूं और योगो बनकर संसार से विरक्त होकर परमात्मा की खोज मे इधर-उधर चक्कर काटता रहूं|इस प्रकार अच्छे कर्मो रूपी सूत को कात करके ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव हो सकती है|

   विशेष-रूपक अलंकार| [ १६७ ]

मन कौ अंग] [१६७


कबीर सेरी सांकडी, चंचल मनवां चोर | गुंण गावै लैलीन होइ, कछू एक मन मै श्रोर||४|| सन्दर्भ-मन मे नाना प्रकार की इच्छाएं भरी रहती है इसलीए प्रभु प्राप्ति नही हो पाती है|

 भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि परमात्मा के समीप पहुँचने का मार्ग 

बहुत संकरा है|मन चंचल है और चोर के समान लोभी वृत्ति का है|ऊपर से तो यह भगवान के गुणनुवाद गाता है किन्तु आन्तरिक मन मे अनेकानेक इच्छाएं सन्दर्भ-मन और इसी कारण प्रभु-प्राप्ति मे बाधा पडती है|

   शब्दार्थ-सेरी=मागं। लैलीन=तल्लीन|
   कबीर मारूँ मन कूँ,टूक टूक है जाइ|
   विप की क्यारी वोह करि,लुणत कहा पछिताइ||५||
  सन्दर्भ-बुरे कर्मों का परिणाम बुरा ही होता है किन्तु परिणाम भोगने में

कष्ट होता है|

  भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि इस चंचल वृत्ति वाले मन को इतना 

मारूँगा कि वह टुकडे-टुकडे हो जायगा|पहले तो विषय वामना की क्यारी बोता है फिर उसके परिणाम को भोगने के समय क्यो पछिताता है|कर्मो का फल तो भोगना ही पडेगा|

 शब्दर्थ-लुणत=काटते समय|
  इस मन कौ विसमल करौ,दीठा करौ ध्दीठ|
  जे सिर राखौ श्रापणां,तौ पर सिरिज श्रंगीठ||६||
सन्दर्भ-साधना मे णीश समपंरग करना पडता है|
भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि अपने चंचल मन को अधमरा कर 
नासरिक विपयो से विरक्त कर निराकार अहष्ट प्रभु के दर्शन यदि अपने 
मिर की रक्षा करनी है तो उसके ऊपर अगारे के समान कठिन से कठिन यातनात्रो को भी सहन करना पढेगा|
     शब्दार्थ--विगमित्र=घायल|

मन जाणै सघ घात, जाणत ही श्रौगुण फरै। फाहे की कुसक्षात, कर दीपक फुवै फुवै ॥७॥ सन्दर्भ-मन कर भी करना है । [ १६८ ]१६८]. [कबिर की साखी

भावार्थ--मन सब बातो को जानते हुए भी नाना प्रकार की बुराइयो को करता है।यदि हाथ मे दीपक लेकर चलने वाला भी कुएं मे गिर पड़े तो उस दीपक से क्या लाभ? उसी प्रकार जान वूफ कर भी यदि मन बुराई करता है तो उसे जानने से क्या लाभ? 
शब्दार्थ--जागत-जानना। कूवे=कुएं में।
  हिरदा भीतरी श्रारसी,मुख देषगां न जाइ।
  मुख तौ तौपरि देखिये,जे मन की दुविधा जाइ।।५।।

सन्दर्भ-सासारिक व्दन्व्दो से छुटकारा तभी मिल सकता है जब हृदय को अंदर व्रहा का दपंग हो। भावारथ--हृदय् के भीतर ही आत्मा का दपंण है किन्तु उसमे परमात्मा का मुख दिखाई नहीं पड़ता है यदि मन सांसारिक विषयो से अपनी चचलता का परित्याग कर दे तो व्रह्म के दशृन हो सकते है।

शब्दार्थ-आरसी=दपंण,शीशा।
  मन दीयाँ मन पाइए,मन बिना मन नहीं होई ।
  मन उनमन उस श्रंड ज्यूॅ,श्रनल श्रकासां जौजौइ।।६।।

सन्दर्भ--प्रभु को अपने मन लगाने से ही प्राप्त हो सकता है।

 भावाथृ - परमात्मा सा प्रेम उसमे मन लगाने से ही प्राप्त हो सकता है ।

यह सत्य है कि जब तक भक्त का ईश्वर की ओर नही भुकता किन्तु जब तक मन को इस ससार के लोगो मे लगाए रहोगे तब तक परमात्मा को प्राप्ति असम्भव ही है। संसार से उदासी न हुआ मन उस सृष्टि के समान है जैसे आकाश मे व्रहा की ज्योति प्रकाशित होती है। शब्दार्थ--मन=प्रेम का हृदय। अकासी= शून्य प्रदेश ।

  मन गोरस्व मन गोविन्द,मन ही श्रौघड़ होइ।
  जे मन रेखा जतनकरि,तौ श्रापैं करता सोइ।।१०।।

संदर्भ--मन को वश मे करने पर ही उच्चतम स्थान मिलता है। भावार्थ--मन हो गोरखनाथ है मन ही पर व्रहा है और मन ही औघड़ नाथ है। मन ही पदों पर पहुंचाने वाला है। यदि मन प्रयत्न-पूवंक वश मे रखा जाये तो यही इन चराचर लोक का कर्ता,नियामक व्रहा वन सकता है। [ १६९ ]मन क़ौ अंग] [१६६

  शब्दार्थ -औघडं=एक प्रकार के साधु |एकज दोसत हम किया,जिस गलि लाल कबाइ। सब जग धोबी घोइ मरै,तौ भी रंग न जाय॥११।।
  सन्दर्भ -प्रेम का रंग किसी के छुडाए नहीं छुटाता है।

भावार्थ् - मैने एक ऐसा मित्र बनाया है कि जिसके गले मे लाल कपडा चंघा हुआ है अर्थात् जो प्रेम के रंग से ओत-प्रोत है|यह प्रेम का रंग इतना पक्का है कि संसार के सब घोवो मिल करके भी यदि इसके रंग को धोकर छुडाना चाहें तो नहीं छुडा सकते है|

  शब्दार्थ--कावाइ =कपडा  |
    पाँणी हीं तैं पातला,धूंवाँ हीं तैं भ्कींण|
    पवनाँ वेगि उतावला ,सोदोसत कबिरै कीन्ह ||१२||
 संदर्भ--कबीरदास ने निराकार ब्रह्म से मित्रता जोडी है |उसी के गुणो का वखान है|
भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि जो पानी से भी पतला घुएं से भी हल्का,और पवन के वेग से भी अधिक वेग वाला है ऐसे परमात्मा से मित्रता की है|
  शब्दर्थ-उतावला=तीव्र|
     कबीर तुरी पलांणियाँ,चाबक लीया हाथि|
     दिवस थकाँ साँई मिलौं,पीछे पडिहै राति||१३||
  संदर्भ-इसी जीवन मे परमात्मा के दर्शन करने के लिए मनरूपी घोडे को कसने के लिए समय का चाचुक लेना पडेगा|
  भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि मैने अपने मन रूपी घोडे को कस करके,पलाद करके सयम के चाचुक को अपने हाथ मे ले लिया है अर्थात् मन पर पूर्ण रूपेण नियन्त्रण कर लिया है|मै यह चाहता हूँ कि जीवन रूपी दिन का अंत होने के समय तक ही अर्थात् इसी जीवन मे ही परमात्मा के दर्शन कर लू क्योकिं फिर तो मृत्यु रूपी रात्रि आ जायेगी और जीव को अचेत कर देगी|
  शब्दार्थ-तुरी=घोडी|पलाडियाँ=कसकर चढने के लिए तैयार कर लिया है| [ १७० ]________________

१७० ] [ कबीर की साखी मनव तौ अधर बस्या, बहुतक झीणां होय । आलोकत सचु पाईया, कबहुँ न न्यारा सोइ ॥१४॥ सन्दर्भ–ब्रह्म की प्राप्ति ज्ञान के प्रकाश से ही सम्भव है। भावार्थ-मन अत्यन्त क्षीण होकर अधर मे निराधार ब्रह्म में रम गया है। प्रकाशमय ब्रह्म की आभा पाकर मन सुख का अनुभव कर रहा है और अब वह कभी भी ब्रह्म से अलग नहीं हो सकता है। शव्दार्थ = निराधार । सच, सत्य ब्रह्म । मन न मरया मन करि, सके न पच प्रहारि।। सील साच सरधा नहीं, इन्द्री अजहुँ उधारि ।।१५।। सौंदर्भ-विना इन्द्रियो पर अधिकार किए भवसागर से पार पान कठिन है। भावार्थ:-हे जीव ! तूने न तो मन को वश में किया है और न काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह को ही प्रहार कर नष्ट किया है। शील, सत्य, और श्रद्धा आदि सद् गुणो का भी लोप हो गया है। कबीरदास जी कहते हैं कि यदि मन इन्द्रियो पर आज भी अपनापूर्ण अधिकार कर ले तो उसका भवसागर से उद्धार हो सकता है, अन्यथा नहीं। शव्दाथ-मन करि = संकल्प कर । पंच= काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह ।। कबीर मन बिकरै पड़ या, गया स्वाद के साथि ।। गलका खाया वरजता, अब यू आवै हाथि ॥१६॥ | सौंदर्भ-मन इन्द्रियो के वश में हो गया है अब वह काबू में नहीं आ सकता। भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि मन विषय-वासना के विकारो मे पड़ा हुआ है वह नानाप्रकार के स्वादो के उपभोग में पड़ा हुआ है । जो वस्तु गले तक पहुंच गई है उसके लिए अब मना करने से क्या लाभ हो सकता है । इसी प्रकार जो मन इन्द्रियों के वश में हो गया है वह अब किसी भी प्रकार हाथ में नहीं आ सकता है ।। शब्दार्थ-विकरै = विकारो मे । वरजता = वजित किया जाता हुआ । कवीर मन गाफिल भया, सुमरिण लागै नाहि ।। घणीं सहेगा सासनां, जम की दरगह माहि ॥१७॥ [ १७१ ]________________

मन को अग ] [ १७१ सदभ–मनको साँसारिक विषय भोगो के बदले नरक मे यातनाएं भोगनी पड़ेगी ।। | भावार्थ-—कबीरदास जी कहते हैं कि नाना प्रकार की विषय-वासनाओ के पीछे दौडते-दौडते मन इतना गाफिल हो गया है कि ईश्वर के नाम-स्मरण में उसका मन ही नहीं लगता है। किन्तु उसे अपने इन पाप कर्मों का भोग यमलोक मे जाकर यातना सहकर सहना पड़ेगा। शब्दार्थ-घणी = अत्यधिक । साँसना = यातनाएं । दरगह = दरबार ।। कोटि कर्म पल मैं करै, बहु मन विषिया स्वादि । सतगुर सबद न मानई, जनम गंवाया बादि ॥१८॥ सदभ-मन विषय वासना मे पड़ कर अपना सर्वस्व ही गंवा बैठा है । भावार्थ-यह मन विषयों के स्वाद में इतना रमण करने लगा है कि पल भर मे ही करोडो दुष्कर्म कर डालता है। और सतगुरु द्वारा दिये गए उपदेशो को अवहेलना करके व्यर्थ मे ही जीवन को नष्ट कर डाला है । शब्दार्थ-सबद = शब्द । बादि = व्यर्थ ।। मैमंता मन मारि रे, घडहीं माई घेरि ।। जबहीं चालै पीठि दे, अंकुस दे दे फेरि ॥१६॥ सौंदर्भ-मन को सयम रूपी अंकुश से मार देना चाहिए । भावार्थ:-हे जीव । तू अपने मदमस्त मन को अपने हृदय के भीतर ही घेर कर मार दे । और जव भी यह परमात्मा से विमुख होकर इधर-उधर भागने का प्रयत्न करे उसी समय ईश्वर-स्मरण और संयम का अकुश लेकर इसको उचित मार्ग पर लगा देना चाहिए।

शव्दार्थमैमन्ता = मदमस्त हाथी । घटही मा है= हृदय के अन्तर से ।।

विशेष—अनुप्रास और रूपक अलंकार।

मैमंता मन मारि रे, नाँन्हाँ करि करि पीसि।
तव सुख पावै सुदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥२०॥

सन्दर्भ-मन को वश में करने से ही ब्रह्म ज्योति का प्रकाश मिलेगा।

भावार्थ-मदमस्त हाथी रूपी मन को संयम के द्वारा इतना कस कर मारो कि सूक्ष्मता को प्राप्त हो जाय। कर्मों को बारीक आटे की तह पीसना चाहिए। तभी आत्मा रूपी सुन्दरी को सुख प्राप्त होगा और सिर से ब्रह्म ज्योति का प्रकाश छिटकता रहेगा। [ १७२ ]१७२ ] [ कबीर की साखी

शब्दार्थ-पुन्दरी = आत्मा । कागद केरो नॉव री, पाणी केरी गंग । कहैं कबीर कैसे तिरुँ, पंच कुसंगी संग ।। २१ ।।

संदर्भ-संसार-सरिता को पार करने के लिए संयम की नौका चाहिए । भावार्थ-मनुष्य का शरीर कागज की नाव के समान है और यह संसार रुपी सरिता माया जल से परिपूर्ण है । कबीरदास जी कहते हैं कि इस अगाध सरिता को इस कागज की क्षणिक नौका से कैसे पार किया जा सकता है फिर साथ में पाँच इन्द्रियों के रूप में पंच चोर भी है जो अवसर देखते ही अच्छे कर्मों की चोरी भी कर लेते है । शब्दार्थ-गग=गगा, सरिता । पंच= पंचेन्द्रियो। कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता कल्हि। डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया, निर्बाण चालि ।।२२।। संदर्भ-मन ब्रहा की ओर उन्मुख होकर भी माया भिभून हो जाता है । भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि जो मेरा निर्मल मन कल (भूतकाल)था वह आज कहाँ चला गया मन की वह निर्मलता कहाँ चली गयी जिस प्रकार टीले पर हुई वर्षा क्षण भर के लिए टीले पर रुककर नीचे की ओर बह जाती है उसी प्रकार मन के ऊपर संतो के सदुपदेशो का प्रभाव क्षण भर के लिए तो हुआ किंतु दूसरे ही क्षण वह उपदेश मन से निकल गए और मन फिर विषयासक्त हो गया ।

विशेष-दृष्टात अलंकार । शब्दार्थ…डूंगरि = टीला । निर्बाण चालि = नीचे को ओर चल कर ।

मृतक कू धीजौं नहीं, मेरा मन बीहै । बाजै बाव बिकार की, भी मूवा जीवै ।। २३ ।। संदर्भ-मन मरे हुए आदमी की भाँति मरी हुई अवस्था में भी जीवित रहता है । भावार्थ-साधक को अपने मन पर पूर्णरूपेण विश्वास नहीं है वह कहता है कि जिस प्रकार मनुष्य मर जाता है उसी प्रकार मैंने अपने मन को विषयो की ओर से मृतक तुल्य बना दिया है किन्तु फिर भी यदि इसके पास विकारों की दुंदभी फिर से बजने लगे तो जीवित व्यक्ति के समान पुन: पाप कर्म करने लगता है। शब्दार्थ-बाव=दुंदभी । विकार= सासारिक विषय । मूवा=मृतक। काटी कूटी मछली छीकै धरी चहोड़ि । कोई एक अपिर मन बस्या; दह में पडी वहोडि ।। २४ ।। [ १७३ ]मन की अग ] [ १७३

संदर्भ--मन सयमित होने पर भी वासना के अवशेष से विकार ग्रस्त हो जाता है।

   भावार्थ-मन रूपी मछली को क्राट कूटकर किसी प्रकार विषय वासना

से रहित कर अपने वश से करके शुन्य रूपी छोके में रखा था किंतु इतने पर भी उसमें वासना का कोई अक्षर अवशिष्ट रह गया था इसलिए वह मन रूपी मछली साधना के छोके से पुन: वासना के जल से आकर गिर पडी । मन फिर विषयों में आसक्त हो गया । शब्दार्थ--मछली = मन । दह = तालाब, ससार पक ।

कबीर मन प'पी भया; बहुतक चढ़या अकास । उहाँ ही ते गिरि पडूया; मन माया के पास ।। २५।।

संदर्भ-मन रूपी पक्षी माया के प्रभाव से नीचे गिर पडता है। भावार्थ-ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कबीरदास कहते है कि मेरा मन पक्षी की भांति आकाश तक शून्य तक विचरण करने गया था किन्तु माया के प्रभाव से जब वह वहाँ से गिरा तो बीच में कहीं रुका हो नहीं ठीक नीचे आकर माया कि पास ही गिरा ।

विशेष-रुपक अलंकार ।

 भगति दुबारा संख्या, राई दसवें भाइ ।
 मन तो मैंगल हँ रहयो; क्रयूं' करि सके समाइ । । २६ ।।

संदर्भ--भक्ति के सकीर्ण मार्ग से मन रुपी हाथी कैसे जा सकता है ? भावार्थ---भक्ति के मार्ग का दरवाजा इतना सकीर्ण है कि वह राई के दशमाश के बराबर है और उसने प्रवेश करने वाला मन मदमस्त हाथी के समान हैं फिर वह उस भक्ति के मार्ग में प्रवेश कैसे पा सकता है ?

शब्दार्थ- मैंगल = मद मस्त हायो ।

  करता था तौ क्यू रहया, अब करि क्यू पछताय ।
  बोवै पेड़ बबूल का, अंब कहाँ ते खाय॥२७॥

संदर्भ-कर्मों के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है । भावार्थ-हे जीव। कर्म करते समय तुझे इस बात का दोष क्यों नही हुआ कि पुरे कर्म नहीं करने चाहिए इनका परिणाम दुरा होगा और यदि अव बुरे कर्म किए ही है तो फिर पछताने से क्या लाभ ? उसके परिणाम तो भोगने ही पृहैंएँ है

यदि तूने कुकर्म रूपी बबूल के वृक्ष लगाए हैं तो खाने के लिए मीठे आम कहाँ से: प्राप्त हो सकते है । [ १७४ ]१७४] [कबीर की साखी विशेष- तुलना कीजिये----

      कोउ न काहु सुख दुख कर दाता।
      निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता॥
                        मानस-अरण्यकाण्ड

शब्दार्थ- अंब-आम।

       काया देवल मन धजा, बिषै लहरि फहराइ।
       मग चाल्यां देवल चलै, ताका सर्बस जाइ॥२८॥
     सन्दर्भ- मन के अनुसार कार्य करने पर सर्वस्व नष्ट हो जाता हे। 
      भावार्थ--शरीर रुपी मन्दिर है और उसके ऊपर फहराने वाली ध्वजा मन है। और ध्वजा विषय वासना की चंचल वायु लहरो से फहराने लगती है यदि शरिर रुपी मंदिर मन रुपीध्वजा के कहने से चलायमान हो जाता है तो समझ लेना चाहिए कि उसका सर्वस्व नष्ट हो जायगा।
  शब्दार्थ- देवल= देवालया, मन्दिर। धजा= ध्वजा।
  विशेष- सागरुपक।
       मनह मनोर्थ छाँड़ि दे, तेरा किया न होइ । 
       पाँणी मैं घीव निकसै, तौ रुखा खाइ न कोइ॥२९॥
   सन्दर्भ- यदि मन की इच्छाएँ पुरी हो जाया करे तो फिर कभी किस बात की?
   भावार्थ- मन की इच्छाओ क परित्याग कर देना चाहिए । क्यो कि जो कुछ मन चाहता है वह सब कुछ पूरा हो जाना सम्भव नही है। यदि जल को मथने भोजन क्यो करे ? किन्तु वास्तविकता यह है कि पानी मे घी निकलता नही । मन की इच्छाएँ पूरी होती नही । 
    शब्दार्थ- मनोर्थ= मनोरथ । 
         काया कसू कमाँण ज्यू पेच तत्त करि बाँणा।
         मारौं तौं मन मृग कौ नही तौ मिथ्या जाँण॥३०॥
    सन्दर्भ- उपदेश को क्रियान्वित भी करना चाहिए।
    भावार्थ- इस शरीर को इतना अधिक साधना मे प्रेरित कर दूँ कि यह धनुष के समान हो जाय फिर उस पर पंच तत्व का वाण चलाकर मनरुपी मृग को मार डालूं तब तो मुझे ठीक समझना अन्यथा मेरी उपदेशो की मिथ्या ही समझना। [ १७५ ]                 सूषिम मारग कौ अग

विशेष- महात्मा तुलसीदास ने पंचतत्वो की सरुया इस प्रकार गिनाई है-

          'छति जल पावक गगन समीरा।
          पच रचित अति अधम सरीर॥
                              मानस- किष्किन्वा काण्ड।


               -------------------
         १४   सूषिम मारग कौ त्र्प्रंग
             कौण देस कहाँ श्राइया , कहु कयूॅ जांएयां जाइे ।
              उहु मार्ग पावैं नहीं , भूलि पड़े इस मांहि॥१॥
सन्दर्भ - जीव ससार मे भ्रमित होता हुआ भटकता रहता है ।
भावार्थ - आत्मा किसी प्रदेश का निवासी है और कहा आकर बस गया 
       है कहो इस तत्व को कौसे जाना जा सकता है ॽ जीव को व्रह्म के पास जाने
का मागं नही मिल पाता इसलिए वह भ्रम मे पडा हुआ इस संसार मॆ भटक रहा है ।
   शब्दार्थ- उहु मागं=वह मागं , व्रह्म प्राप्ति का मागं।
    उतीथै कोइ न श्रावई, जाकूँ बॉफौं धाइ ।
    इेतथैं सबै पठाइये , भार लदाइ लदाइ ॥२॥

सन्दर्भ- व्रह्म के पास जीव जाकिर लौट नही पाता है । भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि व्रह्म के पास पाहुंच कर कोई वहा से लौटता नही है जिससे मै जाकर पूछ सकू कि व्रह्म के पास जाने का कौन सा मागं है ॽ क्या तरीका हैॽ इस संसार से ही कुकमो॔ का वोफा लाद लाद कर सभी पाएी जाती हैं ।

      शब्दर्थ--उती थैं= उधर से। इतीथै= इधर से।
     सबकू बूफत मैं फिरौं,रहण कहाँ थैं होइ।
  सन्दर्भ-- जीव के अपनी स्थिति अगज्ञात रहती है। [ १७६ ]१४६]                                                         [ कबीर की साखी
   भावार्थ-कबीर दास जी कहते है कि मैंने प्रत्येक व्यत्कि से पुछा किन्तु कीसी ने यह नही बताया कि इस संसार मे रहने का वास्तविक ढंग क्या है ? किन्तु कोई उचित उत्तर दे नही पाया । व्रह्म से किसी ने प्रेम तो किया नही फिर रहने की वास्तविक स्थिति किसी को कैसे ज्ञात हो सकती है ।
                    चलौ चलौ सब कोइ कहै,मोहिं त्र्प्रंदेसा और ।
                    साहिब सूँ परचा नहीं,ए जाहिंगे किस ठौर ॥४॥
   सन्दर्भ--व्रह्म से बिना परिचय हुए यदि जीव वहा तक जाए भी तो रहे कहा ?
   भावार्थ--इस संसार के सभी प्रणी व्रह्म के पास जाने की बात तो करते है किन्तु इस बात मे सदेह है कि क्या वे वास्तव मे वहा तक पहुँच भी सकेगे क्योकि व्रह्म से उनका परिचय तो है नही फीर ये सब कहा जाकर रहेगे ?
   शब्दार्थ--पर्चा=परिचय ।
                     त्र्प्राइवे कौं जागा नहीं, रहिवे कौं नहीं ठौर ।
                     कहै कबीरा सन्त हौ,श्रबिगत की गति श्रौर ॥ २ ॥
   सन्दर्भ--निगुंए ब्रह्म् की गति अगम्य हे । साधना मे बाहाडम्बरो की आवश्यकता नही है ।
   भावार्थ--कबीर दास जी कहते है की व्रह्म के पास तक आने के लिए ज्ञान नेत्र खुले नही और इस संसार की विषय वासना मे भी सवंदा रह्ने के लिए स्थान नही है । हे सन्तो ! व्रह्म प्राप्ति का मागं सामन्य रूप से आने वाला नहीं है, अगम्य है ।
   शब्दार्थ--जागा नही -ज्ञान नेत्र नही खुले ।
                    कबीर मारिग कटिन है,कोई सकई जाय ।
                     गये ते बहूड नहीं,कुसल कहै को श्राय ॥६॥
   सन्दर्भ--व्रह्म के पास पहुंच कर कोइ लौटना नहीं फिर वहा के समाचार कैसे मालूम हो ?
   भावार्थ--कबीर दास जी कह्ते है कि परमात्मा के पास तक पहुंचने का मागं अत्यधिक कठिन है वहा कोई आसानी से पहुँच नही सकता है । और जो वहा कठिन साधना करके पहुँच भी गये तो वे आवागमन से मुदत्क् होकर वहा से वापस आए ही नहीं फिर वहाँ के कुशल समाचार कौन आकर कहे ।
   शब्दार्थ--वहुरे=लौटे। [ १७७ ]सुषिम मारग कौ अग]                                                      [१७७
               जन कबीर का सिषर घर, बाट सलैली सैल ।
               पाँत्र न टिकै पपीलिका, लोगनि लादे बैल ॥ ७ ॥
     सन्दर्भ--भक्त कबीर के घर तक पुण्यात्मा और सज्ज्नो के परै तो जम नही पाते, फिर पापियो का तो प्रशन ही नही उठता ।
     भावार्थ--भक्त कबीर का तो वास्तविक घर ब्रह्मारंघ् रूपी शिखर पर स्थिति है और वहा का मार्ग नाना प्रकार की वाधाओ के कीचड से परिपूणं है । वहा पर चीटी जैसा छोटा जीव भी अपने पैर रखकर नही जा सकता फिर और मनुष्य तो नाना प्रकार के सासारिक कुफमौ का वोभ्क लादे हुए कैसे वहाँ पहुँच सकते है ।
     शब्दार्थ--सिपर=शून्य शिखर । सलैली सैल=कीचड आदि से दुगंम पवंतीय मागं । पपोलिका=पिपीलिका=चीटी ।
              जहाँ न चीटी चढि सकै, राई ना ठह्रराइ ।
              मन पवन का गमि नही,तहां पहुँचे जाइ ॥ 
     सन्दर्भ--जिस व्रह्म के पास तक चीटी,वायु और मन की गति भि नही है वहाँ तक कबीर पहुँच गए है ।
     भावार्थ--कबीर दास जी कह्ते है कि जिस शून्य स्थल पर चीटी तक नही चढ सकती और राई भी नही ठह्र्र सकती मन और पवन की जहा तक गति नही है उस सूक्ष्म और सकीएं स्थान तक मैं पहुंच चुका हुँ ।
              कबीर मारग श्रगम है, सब मुनिजन बैठे थाकि । 
              वहाँ कबीरा चलिगया,गहि सतगुर की सांषि ॥६॥
     सन्दर्भ--सतगुरु के उपदेश को ग्रहण करके ही साधक व्रह्म तक पहुँत्र सकता है ।
     भावार्थ--कबीर दास जी कहते है कि ब्रह्मा-प्राप्ति तक का मागं अत्यन्त कठिन है,साधक मुनि भी वहाँ की दुगंमता के कारण थक कर बैठ गये है जाने की आशा छोड बैठे है । ऐसे दुगंम स्थान पर भी कबीर दास जी सतगुरु के उपदेशो को ग्रहए करके पहुँच गये हैं ।
     शब्दर्थ--साषि=सीख,उपदेश ।
            सुर नर था मुनि जनां, जहाँ न कोइ जाइ ।
             मोटे भाग कबीर के,तहा रहे घर छाइ   ॥१॥३०१॥
     
              सुर नर था के मुनि जनां,जहाँ न कोइ जाइ ।
              मोटे भाग कबीर के,तहाँ रहे घर छाइ ॥१०॥३०२॥
        क० सा० फा०--१२ [ १७८ ]१७६ ]                                                  [ कबीर की साखी
   सन्दर्भ-- साधक की साधना की चरमावस्था व्रह्म प्राप्ति है |
   भावार्थ-- जिस स्थान तक पहुँचने के लिए देवता , मनुष्य और मुनि सभी थक जाते हैं और थकावट के कारण वहा तक पहुंच नही पाते हैं। वहा पर सौभाग्यवश कबीर दास पहुंच भी गए हैं और उनका स्थायी निवास भी हो गया है ।
   शब्दार्थ -- मोटे भाग = बडे भाग्य।


                     १५  सूषिम जनम कौ आंग त्र्प्रङ्ग
             कबीर सूषिम सुरति का , जीव न जाणैं जाल।
             कहै कबीरा दूरि करि, आतम अदिष्टि काल ॥१॥
      सन्दर्भ - माया के आवरण को हटा देने पर हो आत्मा को आत्म तत्व का ज्ञान हो सकता है ।
      भावार्थ - कबीरदास जी कहते है कि सूक्ष्म व्रह्म के स्मरण के रहस्य को जीव कुछ नही जानता क्योकि माया के आचरण के कारण उसको उसका ज्ञान नहीं हो पाता है। कबीर कहते है कि उस माया के आवरण को हटा देने पर ही आत्मा का आत्म तत्व का ज्ञान होगा।
      शब्दार्थ-सूपिम = सूक्ष्म । जाल = रहस्य ।
      प्राण पड कौं तजि चलै,मूवा कहै सब कोइ।
      जीव छतां जांमैं मरै , सूषिम लखै न कोइ ॥२॥३४॥
      सन्दर्म--जीवन्मुक्त प्राणी जीवित अवस्था में ही व्रह्म के दशंन कर

लेता है ।

        भावार्थ--जिस समय प्राण इस भौतिक शरीर को छोड़कर चल देते हैं

उप समय संसार के सभी व्यक्ति, उसको मरा हुआ कहते है । जीवात्मा जीवित रहते हुए भी अपने अस्तित्व को व्रह्म में लीन कर जीवन्मुक हो सकता है किन्तु उस व्रह्म कौ कोई देख नही पाता है।

शब्दार्थ- पछ-शरीर । छता = रहते हुए । [ १७९ ] १६ माया कौ त्र्प्रङ्ग जग हट वाडा स्वाद ठग, माया वेसों लाइ । राम चरन नीकों ग्र्ही, जिनि जाई उनम ठ्गाई॥१॥ सन्दर्भ- इस स्ंसार मे जीव वीषय - वासाना और माया के द्वारा ठग लिया जाता है।

भावार्थ- यह स्ंसार एक बडा बाजार है जिसमे इद्रियो के स्वाद रूपी ठग हैं और माया रूपी वेश्या भी जोवको ठ्गने का प्रयास करनी है। ऐसी अवस्था मे है जीव। यदि तू इ ईश्वर के चरणो का सहारा लेगा तब तो ठीक है नही तो इस संसार ही वाजार से विषय - वासना और माया के द्वारा बिना ठगे बच नहीं सकते हो। श्ब्दार्थ - वेसा= वेश्या

      विशेष= रूपक अलकार
      क्बीर माया पापणीं, फंध ले बैठी हाटि।
      सब जग तौ फंधै पड्या, गया क्बीरा काटि॥२॥

सन्दर्भ - माया के फदे से भक्त ही बच पाता है। भावार्थ - कबीर दास जी कह्ते है कि माया अत्यन्त पाविनों है वह अनने हाथ फंदा लेकर सारे संसार के प्राणियो को फंपाने के लिए बेठी है। सारा स्ंसार तो उस माया के फद मे पड गया है अर्थात् सब पर माया का प्राभाव पड चुका है किन्तु कबीर ऐसे भक्त ही उस माया के फन्दे को काटकर उसमे बहर हो जाते हैं उसकी पकड मे नहीं आते हैं।

 श्ब्दार्थ - कनघ=फन्दा।
          कबीर माया पापणी, लालौ, लाया, लोग।
         पूरी किन्हूँ न भोगई, इनका ईहै विजोग॥३॥
सन्दर्भ- माया रूपी वेश्या के फन्दे मे फंसकर सभी को कष्ट भोगना पडता है।

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि माया अत्यन्त पाविनो है य्ह स्ंसार के समस्त प्रणियो मे अपने पाने के लालसा को जागृत कर देती है किन्तु वह गृह-त्रत्रु नहीं है जिसका एक ही उपभोग कर सके वह तो वेश्या है उपुका पूणं [ १८० ]उपभोग कोइ व्यत्रित नही कर पाता है। थोडे समय के लिए माया सबको आकर्षित कर लेती है फिर उससे सबका वियोग हो जाता है। यही ससार का दुःख है ।

विशेष- रूपक अलकार

शब्दार्थ- लालै लाया=अपनी प्राप्ति की आशा जागृत करना ।


कबीर माया पापरगी, हरि सूँ करै हराम ।

मुखि कडियाली कुमति की, कहरगा न देई राम ॥ ४ ॥


संदर्भ-माया ही प्रमु-भक्ति मे बाधक है ।

भावार्थ-कबीर दास जो कहते हैं कि पापी माया अत्यंत दुष्टा है यह जीव को व्रहा से मिलने नहीं देती है । यह जीव के मुख से कडवी बातो को कहवाती रहती है और राम नाम(ब़ह्म) का उच्चारण नही होने देती ।


शब्दार्थ-कडियाली=कडवी

जाँरगौं जे हरि कौं भजौं, मो मनि मोटी श्रास ।

हरि विचि घाले श्रन्तरा, माया बडी विसास ॥ ५ ॥


सन्दर्भ-माया जीव और ईश्वर के बीच अन्तर डाल देती है ।

भावार्थ-प्रत्यक्ष मे ऐसा लगता है कि मैं परमात्मा का बहुत भजन करता हूँ किन्तु मेरे मन मे सासारिक आशाएं अत्यन्त तीव्रता से भरी हुई है। किन्तु यह माया अत्यत विश्वासघातिनी है यह तो जीव और व्रह्म के बीच अन्तर डाल देती है ।


शब्दार्थ--मोटी आस=विषयो की तीव्र तृणगा । घाले=डालना । विसास=विश्वासघातिनी ।


कबीर माया मोहनी, मोहे जांरग सुजांरग ।

भागां ही छूटै नहीं, भरि भरि मारै बांरग ॥ ६ ॥


सन्दर्भ-माया के प्रभाव से कोई व्यक्ति भाग कर भी नही बच सकता है ।

भावार्थ्-कबीरदास जी कहते हैं कि माया आकर्पक है कि बडे-बडे ज्ञानी एवं चतुर व्यक्ति भी इसके सम्मोइन से बच नही पाते हैं और यदि कोई इनके प्रभाव से भागकर भी बचना चाहे तो यह इतना तान-तान कर मोहक बारग चलाती है कि व्यक्ति के ऊपर बारगो का प्रभाव पड ही जाता है। लोग माया जाल मे फस ही जाते हैं ।


शब्दार्थ-जारग=ज्ञानी । सुजांरग=सुजान=चतुर । [ १८१ ]कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खार्ंग । सतगुरू की कृपा भई, नहीं तौ करती माँड ॥ सन्दर्भ-- सतगुरु की कृपा से मनुष्य माया के प्रभाव से बच पाता हे ॥ भावार्थ्-- कबीरदास जो कहते हैं कि माया खांड के समान मोठी और मोहक है । सबको अपनी ओर आकर्षित करने वालो है ॥ सतगुरु की कृपा हो गई इसलिए मैं इसकी चपेट से बच गया हूँ अन्यया तो यह मुझे बर्बाद करके ही दम लेती । शब्दार्थ -- मांड = अत्यन्त बीच, निकृष्ट् । कबीर माया मोहनी, सच जग घाल्या घांरिग । कोई एक जन ऊव्ररौ, जिन तोडी कुल की कारिंग ॥ सन्दर्भ -- जो व्यक्ति माया को ओर आकर्षित नही होता, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है । भावार्थ -कबीरदास जो कहते हैं कि माया इतनी जादुगरनी है कि सम्पूरंग संसार को अपने फदे मे डालकर तेतो को घानो के समान पोस डालती है ॥ कोई बिरला व्यक्ति ही इसके प्रभाव से बच सकता है जो सांसारिक मान-मर्यादाओ को छोडकर परम्पराओ का परीत्याग कर देते है । शब्दार्थ -- घाल्या- मारा । कुल की कांरिग =कुल की मर्यादा, जीवात्मा की परम्पराओ को तोडना । कबीर माया मोहीनी, मांगि मीलै न हाथि । मनह उतारी भूठ करि, तब लागो डोलै साथि ॥ सन्दर्भ - माया मोहक होते हुए भी ईश्वर भक्तो के पीछे दौड्ती है । इसके परित्याग मे ही म्ंगल है भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि माया ऐसी मोहक है कि जो इसको हाथ फैलाकर मांगते हैं उनको यह नहीं प्राप्त होती है कीन्तु जिन भ्क्तो और साघको ने इसको मिघ्या समझ कर अपने मन से निकाल दिया है उनके पीछे यह डोलती रहती है । शब्दार्थ - प्रनह - मन से । माया दासी सन्त की ,ऊँभी देइ श्रसीस । बिंलसी त्र्रु लातौं छाडी, सुमिरि सुमिरि जगदीस ॥ सदर्भ् - माया सन्तो की तो सेवा करती है और अन्य व्यक्तियो को दुख देती है । [ १८२ ]१८२ ] [ कबीर की साखी


     भावार्थ-माया सन्तो की सेवा करने बाली दासी है जो खडी हुई उनकी

आज्ञा का पालन करती रहती है । सन्त लोग ईश्वर का स्मरण करते हुए इसका उपभोग भी करते हैं और इसका तिरस्कार कर लाती से मार-मार कर ठुकराते भी हैं किन्तु अन्य लोगो को यह दुख ही देती है । शब्दार्थ-ऊँभी = खडी हुई ।

           माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर ।
          श्रासा त्रिचरगां नाँ मुई, यों कहि गया कबीर ।। ११ ।।
    संदर्भ्-माया, मन, आशा और तृष्णा की अमरता की ओर संकेत है ।
  भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि इस संसार के आवागमन के चक्र के

कारण शरीर तो बार-बार मरता है किन्तु माया के आकर्षण और मन की विषयों के पीछे की दौड़ समाप्त न हुई, और कभी सांसारिक आशाओं कामनाओं और तृष्णा का ही अन्त हुआ ।

        शब्दार्थ-मुई = मरी ।
        श्रासा जीवै जग मरै, लोग मरे मरि जाइ ।
          सोइ मूवे घन संचते, सो ऊबरे जे खाइ ।।१२।।
        सन्दर्भ--कबीर दास जी धन संचय पर वल नही देते हैं 1
    भावार्थ = इस संसार मे लोग एक-एक करके मरते जाते हैं और इस प्रक्रार

सारा संसार ही मरताजा रहा है किन्तु फिर भी आशा जीवित ही बनी है । लोगो के मरने पर भी आशा उनका साथ नहीं छोड़ती है । वे ही व्यक्ति मरते हैं जो धन का संचय किया करते है और जो लोग इस धन को खा पी कर साफ कर देते हैं वे इस भव-सागर से पार उत्तर जाते हैं ।

        शब्दार्थ्-मुवे = मरते है ।
           कचीर सो धन संचिए, जो ञागैं कू होइ ।
          सीस चढाये पोटली, ले जात न देख्या कोइ 11१३।।
 संदर्भ-घन संग्रह अच्छी बात नही है ।
 भावार्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि सूकृत्यो और पुण्यो का ऐसा धन

संग्रह करना चाहिए आगे के लिए परलोक में काम दे । यद्यपि इस संसार में लोग धन की गठरी लादे हुए फिरते रहते है किंन्तु कोई भी व्यक्ति नहीं देखा गया जो उस धन को परलोक ले गया हो । यह सारा का सारा धयहींन वहीं पर पडा रह पाता है । [ १८३ ]त्रिया त्रिष्णाँ पापणीं, तासू प्रीति न जोड़ि। पैंड़ी चढ़ि पाछाँ पड़ै, लागै मोटी खोड़ि॥१४॥ सन्दर्भ--तृष्णा से विलग रहने का सकेत है। भावार्थ-कबीर दास जी जीव को सम्बोधित करते हुए करते हैं कि तृष्णा रूपी स्त्री बड़ी ही पापिनी और वेश्या के समान है अतः तू इससे प्रेम का व्य्वहार न कर। पहले तो यह पीछे पड़कर जीव को आकर्षित करती है किन्तु इसके संसर्ग से जीव को अनेक दोषो का शिकार बनना पडता है। शब्दार्थ- खोडि = अपराध, पाप त्रिष्णां सांची नां बुझै, दिन-दिन बढ़ती जाय। जवासा के रूप ज्यूं, घणा मेहाँ कुमिलाइ॥१५॥ सन्दर्भ--सासारिक तृष्णा का विनाश प्रभु-भक्ति से हो संभव है। भावार्थ--सासारिक तृष्णा को जितना ही अधिक शान्त करने का प्रयास किया जाता है वह दिन प्रति दिन उतना ही अधिक बदली जाती है। जिस प्रकार जवासा जितनी ही अधिक वर्षा होती है उतना ही अधिक मुरझाता जाता है उसी प्रकार यह सासारिक तृष्णा भी प्रभु-भक्ति रूपी से हो मुरझा कर शान्त हो सकती है अन्य किसी विधि से नहीं। विशेष-(१) विभावना अलकार। (२) जवासा बरसात मे मुरझा जाता है-- "श्रर्क जवास पात बिनु मयऊ।" मानस--किष्किन्धा काण्ड शब्दार्थ-- वधती = बढ़ती। घण = घना, अधिक। कबीर जग की को कहै, यौ जल बूढै दास। पारव्रहा पति छाँड़ि करि, करैं मान की श्रास॥१६॥ सन्दर्भ--ब्रह्म से विमुख भक्त भी संसार सागर मे डूब जाते हैं। भवार्थ--काबीर दास जी कहते हैं कि संसार के साधारण व्यक्तियों की वात कौन कहे भगवान के भक्त भी इस ससार-सागर में डूबते उतराते हैं किन्तु भक्त उसी व्यवस्था मे डूबते हैं जब वे पर ब्रह्म ऐसे स्वामी को छोड़कर सासारिक मान सम्मान की आशा में इधर उधर भटकते रहते हैं। शब्दार्थ--भौजलि = भव जल = ससार सागर। माया तजी तौ का भया, मानि तजी नहीं जाइ। मनि बड़ै मुनियर मिले, मानि सबनि कौ खाइ॥१७॥ [ १८४ ]संदर्भ-माया के साथ अहं का त्याग भी आवश्यक है। भावार्थ-हे जीव ! यदि तूने माया का त्याग कर दिया तो उसी के त्याग से क्या होता है अभी सम्मान पाने की भावना का त्याग तो नही है। यह मान सम्मान की भावना बडे-बडे मुनियो को भी पथ भ्रष्ट कर देती है। अत: सम्मान को भी परित्याग आवश्यक है। रामहिं थोडा जाँरिग करि,दुनियाँ क्षागैं दीन। जीवाँ कौ राजा कहैं,माया के क्ष्र्राधीन॥ सन्दर्भ-वास्तविक स्वामी तो पर ब्र्ह्ना है। भावार्थ-मनुष्य ब्र्ह्म के अस्तित्व को अल्प समझ करके संसार को ही अधिक महत्वशाली समझता रहता है और उसी मे उलझता रहता है। मनुष्य उस व्य्कति को ही अपना स्वामी समझ लेते है जो माया के आधीन होकर वैभवशाली दिखाई पडता है।

    रज बीरज की कली, तापरि साज्या रूप
    राँम नाँम बिन बूढि है, कनक काँमिरगी कूप॥१६॥

सन्दर्भ-मनुष्य का शरीर स्त्री के रज और पुरुष के वीयं के सम्मिश्ररण से बनी हुई कली के समान उस पर भी जीव साज सज्जा का आडम्बर करता है किन्तु थदि वह राम नाम का आश्रय न ग्रहरग करेगा तो धन और स्त्री रूपी कुऍ मे डूब जायगा।

    विशेष-तुलसी ने भी कहा है-
     "एक कंचन एक कामिनी दुर्गम घाटी दोइ॥"
                                  दोहावली
   माया तरवर त्रिविधका , साखा दुख सन्ताप।
   सीतलता सुपिनै नहीं, फन फीकौ तनि ताप॥२०॥
  सन्दर्भ--माया रूपी वृक्ष और उसकी छाया जीव को दुख ही प्रदान करते है । भावार्थ -माया रूपी वृक्ष सात्विक,राजस और तामस इन तीन गुणो से मिलकर बना है और इसकी शाखायें दुख और सन्ताप की है किन्तु इस वृक्ष के नीचे बैठकर जीव को स्वप्न मे भी शीतलता का अनुभव

नही हो सकता है और इसके फल भी अत्यन्त फीके हैं और शरीर को ताप देने वाले हैं।

  शब्दार्थ-त्रिविध=सत,रज,तम। [ १८५ ]

माया कौ अंग]


कबीर माया डाकण, सब किस ही कौं खाइ।

दांत उपाडौ पापगी, जे सन्तौ नेडी जाई॥२१॥

सन्दर्भ-- सन्तो के पास माया जाती है तो उसको नष्ट क्ररने का प्रयास किया जाता है।

भावार्थ-- कबीर दास जी कहते है कि यह माया भत्यन्त पिशाचिनी है यह सभी को खाती रेहती है किन्तु यदी यह सन्तो--साधु स्वभाव वाले व्यक्तियो--के पास जाकर फटकी तो मैं इसके दांत ही उखाड डालूगा फिर यह खायेगी कैसे?

शब्दार्थ-- डाकगी = पिशाचिनी। उपाडौ = उखाडू। नेडी = नजदीक

नलनी सायर घर किया, दौं लागी चहुतेगि ।

जलही माहैं जलि मुई, पूरव जनम लिषेगि ॥२२॥

सन्दर्भ-- पूर्व जन्म के दुष्कृत्यो के कारण आत्मा को नाना प्रकार के कष्ठ सहने पडते है।

भावार्थ-- आत्मा रुपी कमलिनी ने इस संसार सागर मे अपना घर बनाया किन्तु यही अनेकानेक दुखो की दावाग्नि उस कमलिनी को जलाने लगी। और इस प्रकार यह आत्मा रुपी कमलिनी माया रुपी जाल मे ही जलकर नष्ट हो गयी। यह सब पूर्व-जन्म के कर्मो का फल था।

कबीर गुंगा की बादली, तीतर चानीं छाँहि।

बाहरि रहे ते ऊबरे, भीगे मन्दिर मांहि॥२३॥

सन्दर्भ-- माया के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति हो आवागमन से मुक्त हो हो पाते हैं।

भावार्थ--कबीर दास जी कहते है सास्विक, राजस और तामास इन तीनो के सम्मिश्रगा से बनी हुई माया को छाया रग तीतर के पखो के समान बहुरगी होता है। जो इस माया की छाया से बाहर रहते हैं वे तो मुक्त हो जाते हैं और जो माया के प्रभाव मे ही आ जाते हैं तो वे माया के प्रभाव से भीगते ही रहते है।

विशेष--(१) विरोवाभास अलकार।

शब्दार्थ--तीतरवानी = तीतरवर्गि।

कबीर माया मोह की, भई श्र्ँघारी लोइ।

जे सूते ते मुसि लिये, रहे बसत कूँ रोइ॥२४॥

सन्दर्भ--माया मोह मे पडे हुए व्यक्ति मुक्ति नही प्राप्त कर पाते हैं। [ १८६ ]

भावार्थ-- कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार मे जीव की आंखो पर माया ओर मोह का अन्धकार छाया हुआ है अतः उसे उचित मागं नही दिखाई पडता है। जो व्यक्ति इस माया और मोह के अन्धकार मे सावधान न रहकर अज्ञान मे सोते ही रहते हैं वे ठग लिए जाते हैं ओर बाद मे मुक्ति रुपी अपनी वस्तु के लिए रोते ही रह जाते हैं।

शब्दिर्थ-- लोई=नेत्र। मसि=ठगलिए। वसत= वस्तु, सारतत्व।

संफल ही तै सब लहै, माया इहि संसार। ते क्यूँ छूटैं बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥२५॥ सन्दभ--ब्रम्हा के द्वरा माया के बन्धन मे बांधा जीव कैसे मुक्त हो सकता है?

भावार्थ-- इस संसार के समस्त प्राणी माया की श्रृखालाओ मे जकड़े हुए हैं किन्तु जब उनके सृजनकर्ता ब्रह्म ने ही उन्को माया मे बांध दिया है तो फिर वे मुक्त ही कैसे हो सक्ते हैं?

शब्दार्थ-- संकल= साक्त, श्रृखला। बापुड़े= बुपरे= बेचारे।

बाड़ि चंढ़ति बेलि ज्यूँ, उलभ्ती श्रासा कंध। तूटै पणि छूटै नहीं, भई ज बाचा बंध॥२६॥

सन्दर्भ-- माया रूपी बेलि को तोड़ा जा सकता है किन्तु छुडाया नही जा सकता है।

भावार्थ-- यह माया संसार रूपी बाडी पर बेलि के समान है और आशा के फंदो मे इसे उलभ्ता दिया गया है। अर्थात् यह माया जीव को आशा और तृष्णा के फंदो मे उलभ्ता देति है। यह टूट सकती है किन्तु किसी प्रकार से छुडाई नही जा सकती है। मानो हानि या लाभ कुछ भी होने पर यह जीवात्मा को पकडे रहने की प्रतिज्ञा कर चुकी है।

शब्दार्थ-- फंध= फंदा। बाचाबन्ध= वचन बद्ध।

सब श्रासण श्रासा तणाँ, निवर्ति कै को नाहिं। निर्बति कै निबहै नही, परवति परपंद्मभांहि॥ २७॥

सनदर्भ-- संसार से तटस्थ होकर, प्रवृति मागं का परित्याग करके ही निवृति वैराग्य ( इश्वर से राग) उत्पन्न हो सकता है।

भावार्थ-- संसार के समस्त प्राणी आशावान हैं सभी पर आशा का प्रभाव है। कोई निवृति मार्गी नहीं है। जो प्रवृति भागं का अनुरागी है भला वह आशा से परे होकर निवृति मार्गी कैसे हो सकता है? [ १८७ ]माया कौ अंग ] [ १ ८७

सह्ब्दार्थ-- तरग्रा=नीचे । निवर्ति = निवृति । परवर्ती = प्रवृति ।

कबीर इस सन्सार का, भूक्ता माया मोह । जिहि घरि जिता वंथावणा, तिहिं घरि विता अँदोह ।।२८।।

सन्दर्भ-- सुख के साथ दुख भी मिला होता है ।

भावार्थ--कबीरदास जी कहते है कि इस संसार का माया मोह सभी झूठा प्रपंच है । जिस घर मे जितनी ही अधिक प्रसन्नता आनन्द-मगल दिखाई देता है, वहाँ उतना ही अधिक दुख भी होता है ।

शाब्दार्थ---वंधावणा = वघन । अन्दोह = दुख ।

माया हम सौं थी कह्गा, तू मति दे रे पूठि । और हमारा हम बलू, गया कबीरा रूठि ।।२९।।

सन्दर्भ---आत्मवल वाले व्यक्ति ही माया से सबंध विच्छेद कर पाते है । भावार्थ---माया ने हमसे (जीवात्मा से) यो कहा कि तू मुझ को मत छोड है किन्तु यह हमारा ही आत्मबल है कि मैं (कबीरदास) माया से अप्रसन्न हो गया और उस माया से रूठ गया, अप्रसन्न हो गया ।

शब्दबर्भ--पूठि=पीठ देना ।

चुगली नीर बिटाजिया, सायर चढ़या कलंक । और पखेरू पी गये, हँस न बोये चंच ।।३।।

सन्दर्भ-- भक्तजन विषय भीगी से आसक्त नही होते हैं ।

भावार्थ-माया रूपी बगुली ने आत्मा के जल को दूषित कर दिया, इससे संसार रूपी सागर भी कलकित हो गया अन्यपक्षी, ससारिक मनुष्य तो इस विषय वासना के पानी को पी गए किन्तु मुशमैंत्माओं (हसो) ने इस जल को छुमा तक नहीं है ।

शब्दार्थ--बिटा लिया: समाप्त कर दिया । सायर = सागर । ह स=मुक्तादमा ।

कबीर माया जिनि मिलै, सौ परिया दे बाँह । नारद से मुनियर मिले, किसी भरोसौ त्यांह ।। ३१ ।।

संदर्भ--माया का कोई भरोसा नहीं है उसके फन्दे से नहीं पडना चाहिए ।

भावार्थ-- कबीरदास जो कहते हैं कि अगर माया सैकडो प्रलोभन देकर के तुझे फ्साना चाहे तो भी उसके फन्दे से नहीं पडना चाहिए । जव इस माया ने [ १८८ ]९८८ ] [ कबीर की साखी

नारद ऐसे प्रभु भत्तों तक को अपने जाल मे फाम्स लिया है तो फिर इसका भरोसा कैसे किया जा सकता है ।

शब्दार्थ-गिले = नष्ट कर दिये ।

माया की मल्ल जग जाल्या, कनक काँमिर्णएँ लागि । कहू, धौं, किहि विधि राखिए, रूई पलेटी आगि ॥३२॥

संदर्भ---कनक और का मिनी के प्रभाव मे पडा मनुष्य अधिक समय तक नहीं टिक सकता । भावार्थ-कनक और कामिनी-धन और रुत्री के लोभ से फँसकर सारा संसार मसा के जल से फँस गया और उसी की लपट मे जलने लगा भस्म हो गया । माया तो रूई मे लपेटी हुई आग कि समान् है जिस प्रकार रूई में लपेटी हुई साग थोडे समय से ही रूई को जलाने लगती है उसी प्रकार माया भी संसार को जलने लगती है । विशेष-निदर्शन, अलंकार । शब्दार्थ्झ--भ्फल=अग्नि । प्लति=लपेटी हुई 1


१६.चांगक कौ त्रंग

जिव बिलंव्या जीव सौ, अलख न लखिया जाइ । गोविन्द मिले न झल बुझे, रहि बुझाइ बुझाइ ।। है 11 सन्दर्मा--शाया जन्य दुखी की ज्जाला प्रभु दर्शनों से ही शात हो सकती है । भावार्थ-एक जीव दूसरे जीव का सहारा ले रहा है अलक्ष (नरत्कार) परमात्मा कौ कोई नहीं देखता 1 जब तक प्रभू मिलन नहीं होगा तव तक सांसारिक त्तापौ कि अजित का बुझना शान्त होना असम्भव है भले ही इसके बुझाने के अनेको प्रयत्न किये जार्य । शउदाथ९---विलंव्या=: सहारा लिया । अलप उ-:: निराकार यहा । झच८-न्द्र अग्नि 1 इहि हैंउदार के कारएँर्दे, जा; जदृन्हर्या निस जाम । स्वामी पणों जु सिरि चड़यी, सस्था न एकौ काम 11 २ 1। [ १८९ ]

चांरगक कौ अग] [१७६

   सन्दर्भ -- के काररग जोव किसी लोक को भली भांति सभाल नही पाता है ।
   भावार्थ- सांसारिक जीव अपनी उदरपूर्ति के लिए रातदिन संसार मे भटक-भटक कर याचना किया करते है किन्तु उनके अदर जो स्वामीपन की भावना क अहंकार होता है उसके कारण उनका एक भी काम नही बान पाता है न यह लोक सुख कर हो पाता हे और परलोक मे ही मुक्ति का मांग बन पाता है।
   शाब्दार्थ -स्वामी परगौ = स्वामीपना , सर=सिद्भ हुआ,बना ।
    स्वामी हुरॅगाँ सोहरा, दोद्धा हुरॅगाँ दास ।
    गाडर श्राँरगी ऊन कूँ, बाँधी चरै कपास ॥३॥
  सन्दर्भ- ईश्वर भक्त बनना अत्यन्त कठिन है ।
  भावार्थ- इस संसार मे स्वामी बनना तो सरल है कोई भी व्यक्ति अपने अहंकार को प्रदर्शित कर कुछ व्यक्तिअयो पर अपना स्वामित्व प्रदर्शित कर सकता है किन्तु परमात्मा का भक्त बनना अत्यन्त कठिन है। जिस प्रकार भेड को ऊन प्राप्ति के लिए पाला जाता है किन्तु वह घर आकर कपास को भी चर लेती है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भक्त मे यदि अह की भवना आ जाती हैइ तो उसका परलोक और यह लोक दोनो नष्ट हो जाते हैं।
   शाब्दार्थ-सोहरा=साल। दोद्धा=दुलंभ। गाडर भेड।
    स्वामी हुवासीत का, पैत्राकार पचास।
    राम नाम काँठै रहया, करै सिषाँ की श्रास ॥४॥
   सन्दर्भ--सांसारिक व्यक्ति दम्भ मे ही लिप्त रहते हैं।
   भावार्थ--हे जीवात्मा । तू करग भर सपत्ति क स्वमी होकर भी दभ मे आकर पचासो सेवक बना रखे हैं ह्रिदय से तूने कभी राम का नाम लिया ही नहीम केवल जी से ही राम का उच्चारण करता रहा और अबतू शिष्य बनाने जकी आशा करता है।
   शाब्दार्थ-सीत=दाना,करग । पैकाकार=सेवक । काठै=कठ ।
     कबीर तष्टा टोकरगीं, लीयौ फिरै सुभाइ ।
     राम नाम चीन्हैं नही,पीतलि टी कै चाइ ॥५॥
   सन्दर्भ--जीव उदर पूर्ति के लिए ही भ्रमण करता रहता है राम का नाम नही लेता है । उसी के प्रति सकेत है ।
   भावार्थ-- कबीरदास जी कहते हैं कि तू अपने स्वभाव के अनुसार तसला और टोकनो लिए हुए इधर-उधर घूमकर खाने पीने का प्रबन्ध करता रहता है । तू [ १९० ]१६०]                                               [कबीर को साखी 

ऱाम नाम के अमूल्य रत्न को पहचानता नही और पीतल के पात्र खाने के लिए घूमता रहता है उसी मे मस्त है यह ठीक नही है ।

   शब्दार्थ--तष्टा=तसला । टोकणी=टोकनी । सुभाइ=स्वभाव । चाइ=

चाव, इच्छा ।

         कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ ।
         राज दुवारां यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥६॥
    संदर्भ--पाखंड करने और ईश्वर की भक्ति करने मे बहुत बड़ा अतर है।
    भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के स्वामी और सन्यासी

सभी लोभी हैं वे बाहर से देखने मे तो विरक्त लगते है और अंतःकरण मे लोभ व्याप्त रहता है जिस प्रकार पीतल पर खटाई लगा देने से क्षण भर के लिए उसमे चमक आ जाती है उसी प्रकार ऐसे पाखंडी सन्यासी भी क्षण भर के लिए विरक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार हरियाली के लोभ मे पड़ी हुई गाय बार-बार रोकने पर भी ही खेत की ओर दौडती चली जाती है उसी प्रकार वे सन्यासी भी लोभासक्त होकर धनवानो के दरवाजे पर जाया करते हैं ।

    शब्दार्थ-हरिहाई=जो ह्टाने पर भी नही हटती है ।
        कलि का स्वांमी लोभिया,मनसा धरी बधाइ ।
        दैं हि पईसा व्याज कौं, लेखां करतां जाइ॥७॥
 संदर्भ-कलियुग के सन्यासी लोभी वृत्ति के होते हैं।
 भावार्थ-कलियुग के स्वामी सन्यासी अत्यन्त लोभी होते है वे अपनी

इच्छाओ-अभिलापाओ को अत्यन्त बढा चढ़ाकर रकते हैं। वे व्याज पर रुपया उधार देते हैं और वढ़ी-वडी वहियो(वहीखाता) मे उसका हिसाब रकते हैं तब भला बताइए कि उनमे और एक ससारी प्राणी मे क्या अन्तर है?

     शाब्दार्थ-मनसा=इच्छाएं,अभिलाषाएं।
         कबीर कलि खोटी भइ,मुनियर मिलै न कोइ।
         लालच लोभी मसकरा,तिनकू श्रादर होइ॥८॥
 संदर्भ--कलियुग मे लोभी और मनचले लोग ही सम्मान के पात्र

होते हैं।

 भावार्थ--कबीरदास जी कहते हैं कि यह कलियुग अत्यन्त खोटा है इसमें 

कोई श्रष्ठ मुनि नहीं मिल पाता है इसमे तो उन्ही व्यक्तियो का सम्मान हो पाता है जो लालची,लोभी और मनचले होते हैं ।

   शब्दार्थ-मुनियर=मुनिवर=श्रेष्ठमुनि। मसकरा=मसखरा, मनचला। [ १९१ ] चाणक कौं अग ]                                            [१६१
                                             
        चारिऊँ वेद पढ़ाइ करि,हरि सूँ न लाया हेत ।
        वालि कबीरा ले गया,पणिडत ढूँढै खेत ॥६॥
     संदर्भ--पुराण पथियो की निन्दा और व्यंग्य है ।
     भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि चारो वेदो को पढ़ करके भी पंडित 
परमात्मा से प्रेम नही कर पाते हैं । भक्ति की भावना उनमे नही आ पाती है ।
भक्ति रुपी खेती की वास्तविक फसल वाली को तो मैंने ग्रहण कर लिया है अब
पडित लोग व्यर्थ मे उसमे अन्न खोजने की-तत्व खोजने की चेष्टा कर रहे हैं ।
     शब्दार्थ-वालि=वाली ।
       व्राहाण गुरु जगत का, साधू का गुरु नाहि ।
       उरभ्फि-पुरभ्फि करि मरि रह या,चारिउँ वेदां माहिं ॥१०॥
     सन्दर्भ-वेदो की निन्दा की गई है ।
     भावार्थ-व्राहाण तो सारे संसार का गुरु है किन्तु वह साधुओ का गुरु नहीं
हो सकता है कयोकि वह तो चारो वेदो को ही उलट-पुलट कर व्रहा तत्व को खोजता
रहता है और साधू प्रेम के दावरा ईश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं ।
     शब्दार्थ-उरभ्फि पुरभ्फि=उलभ्फ-पुलभ्फकर ।
       साषित सण का जेवड़ा,भीगां सूँ कठठाइ ।
       दोइ श्राषिर गुरु बाहिरा,बांध्या जमपुर जाइ॥११॥
     सन्दर्भ-इस साखी मे कबीर का शाक्तो के प्रति विरोध व्यक्त हुआ है ।
     भावार्थ-कबिरदास जी कहते हैं कि शाक्त सम्प्रदाय को मानने वाले
व्यक्ति सन की रस्सी के समान होते हैं जो जितना ही अधिक भीगती है उतना ही
अधिक कड़ी होती जाती है उसी प्रकार शाक्त भी सासारिक विषय-वासनाओ मे
लिपटते जाते हैं । वह राम नाम के दो अक्षरो और गुरु से विलग होने के कारण
सीधा बंधा हुआ यमपुर को चला जाता है ।
     शब्दार्थ--साषित=शाक्त । कठठाइ=कडा होता है ।
       पाड़ोसी सूँ रूसणां,तिल-तिल सुख की हांणि ।
       पंडित भये सरावगी, पाँणी पीवै छाँणी॥१२॥
     सन्दर्भ-पडोसी से दवेष करने से सुख कभी नही प्राप्त हो सकता है ।
     भावार्थ-कबीर दास जी कहते है कि अपने पडोसी से रुठ जाने पर प्रत्येक
क्षण के सुख की हानि होती रह्ती है किन्तु इसका विचार जैन सम्प्रदाय वाले नही
करते हैं वे पानी तो छान-छान कर पीते हैं किन्तु पडोसियो से रुठ रहते हैं । [ १९२ ]शब्दार्थ-रुसणां=रूठना । सरावगी=जैन साधु ।
  पंडित सेती कहि रहूया,भीतरि भेध नाहिं ।
  श्रोरूँ कौ परमोधतां,गया मुहरकां मांहिं ॥१३॥
स्रन्दर्भ-- पं डत दूमरो को तो उपदेश देते हैं किन्तु स्वयं उस पर आचरण नहीं करते हैं।  
 भावार्थ--कबीरदास जी पंडित को कह रहे हैं कि तू ऊपर से ढोग दिखाकर ज्ञानी और भक्त्ति बन रहा है किन्तु भक्त्ति अन्त:कण मे व्याप्त नही होती है और दूसरों को तो ज्ञान और भक्त्ति का प्रवोघ, उपदेश देता रेहता है किन्तु स्वय घोर पाप करता रहता है ।
 शब्दार्थ-पर वोधतां= उपदेश करता रहा । मुहरका= च्रधस्थान ।
   चतुरई सूबै पढी, सोई पंजर मांहि ।
   फिरि प्रमोधै श्रांन कौ, श्रापण समभौं नाहिं ॥१४॥
स्रन्दर्भ-- तोते के उदाहरण के द्वारा कबीरदास जी समझाते हैं कि जीव को राम नाम का महत्व समझना चाहिए ।
 भावार्थ--सम्पूणं चतुराई सीख लेने के कारण तोते को लोग पिंजडे मे बन्द कर देते हैं किन्तु स्वयं पिंजडे मे बन्द होकर भी वह और लोगो को उपदेश देता है कि राम का उच्चारण करो यध्यपि वह स्वयं राम के महत्व को समझ नही पाता है ।
 शब्दार्थ-पंजर= पिंजडा । प्रमोधे= उपदेश देना ।
   रासि पराई राषताँ,खाया घर का खेत ।
   श्रौरों कौं प्रमोधताँ,मुख मैं पडिया रेत ॥१५॥
स्रन्दर्भ--ऐसे पंडितो के प्रति संकेत हैं जो दूसरो को तो उपदेश देते रहते हैं किन्तु स्वयं विषय-वासना ग्रस्त रहते हैं ।
 भावार्थ--कुछ किसान अपने खेतो के अनाज की रक्षा न करके थोडा अन्न पाने के लिए दूसरो के खेत की रक्षा करते हैं उसी प्रकार ढोगी पंडित दूसरो को ही उपदेश देते रहते है स्वयं तो विषय-वासना मे पडकर अपना जीवन नष्ट करते रहते हैं ।
 शब्दार्थ-रासि= अन्न का ढेर ।
   तारा मंडल वैसि करि,चंद बडाई खाइ ।
   उदै भया जब सूर का,स्यूँ तारां छिपि जाइ ॥१६॥ [ १९३ ]चारण कौ अग ]
    सन्दर्भ-जीवको जव ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब उसकी सम्पूर्ण इच्छाऍ नष्ट हो जाती है ।
    भावार्थ-तराओ के मध्य मे आकाश मन्डल मे विराजमान होकर चन्द्रमा एश्वयम् प्राप्त करता है किन्तु सूर्य के उदय होने पर वह तारो के साथ अस्त हो जाता है ठीक उसी प्रकार जीव अज्ञानान्वकार मे पडा रह्ता है ज्ञान के उदय होने पर सम्पूर्ण इच्छाए नष्ट हो जाती है ।       
    शव्दार्थ- स्यू=साथ 
    देषण के सबको भले, जिसे सीत के कोट ।
    रवि कै उदै न दीसही, वॅधै न जल की पोट ॥
  सन्दर्भ-जीव क अज्ञान ज्ञान रुपी सूर्य के उदय हो जाने से भाग जाता है ।
  भावार्थ-जिस प्रकार शीत काल मे बर्फ के किले देखने मे अच्छे लगते है उसी प्रकार वाहा वेशभूषा से युक्त पन्डित  भी देखने मे सबको अच्छे लगते है किन्तु जिस प्रकार सूर्य उदय होने पर उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है और उस जल की पोट्ली भी नही बान्धी जा सकती उसी प्रकार वास्तविक ज्ञान प्राप्त होने पर अज्ञानी पन्डित और सन्यासियो का समाप्त हो जाता है ।
  शब्दार्थ-देषण=देखने मे ।दीसही=दिखाई देते है ।पोट=गठरी 
       तीरथ करि करि जग मुवा, डुघै पाणी न्हाइ ।                                                                
       रामहि राम जपतडा, काल घसीटया जाइ॥
  सन्दर्भ-मुक्ति उपासना के वाहाड्म्बरो से नही मिलती उसके लिए ह्दय से प्रभु-भक्ति की आवश्यकता होती है ।
  भावार्थ-कबीरदास जी कह्ते है कि अनेकानेक प्रकार के तीर्थो के दर्शन करके और गन्दले पानी मे स्नान करके लोग मर जाते है ।मुह से राम नाम का उच्चारण करते हुए भी मृत्यु उन्हे घसीट ले जाती है क्योकि राम नाम उच्चारण ही होता है हृदय से उसका जप नही होता है ।
  शब्दार्थ-डूघे=गन्दा । जपतडा=जपता हुआ ।
      कासी काठे घ्रर करै, पीवै निर्मल नीर ।
      मुक्ति नही हरि नाव बिन हो कहै दास कबीर ॥
   सन्दर्भ-ईश्वर के नाम स्मरण के बिना मूक्ति नही प्राप्त हो सकती है ।
   क० सा० फा०[ १९४ ]भावार्थ-शंकर की पूरी काशी मे निवास करते हुए और गंगाजी का निर्मल जल पीते हुए लोग मुक्ति की आशा करते है किन्तु कबीर दास जी इस प्रकार कहते है, बिना हरि नाम के स्मरण के जीव को मुक्ति मिलना असंभव है।

शब्दार्थ- कासी काठैं= काशी मे निवास करते हुए।

कबीर इस संसार कौं; समझाऊॅ कै बार। पूँछ ज पकड़ै भेद की, उतर या चाहै पार॥२०॥

सन्दर्भ- माया का आश्रय ग्रहण कर कही जीव संसार-सागर को पार उतर सकता है?

भावार्थ- कबीर दास जी कह्ते है इस संसार के जीवों को कितनी बार समझाऊँ की माया का आश्रय ग्रहण कर भवसागर को पार उतरने की चाह रखना बिलकुल व्यर्थ है।

शब्दार्थ- भेद= माय

कबीर मन फूल्या फिरै, करता हू मैं ध्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखे भ्रंम॥२१॥

सन्दर्भ- वाह्याचरण से कही मुक्ति मिलती है?

भावार्थ- कबीर दास जी केहते है कि लोग अपने मन मे बहुत प्रसन्न रहते है कि मैं धर्म कर रहा हूँ यद्यपि वे वाह्याचरण को ही धर्म के अंतर्गत मानते है और उसीसे मुक्ति की कामना करते हैं। वह भ्रम का निवारण कर इस बात पर विचार नहीं करता कि अपने सिर पर करोड़ो कुकर्मों का भार लेकर चल रहा हैं फिर मुक्ति मिले तो कैसे?

शब्दार्थ- ध्रम=धर्म। क्रम=कर्म। चेति=चेत कर, सावधान होकर। भ्रंम=भ्रम।

मोर तोर की जेवड़ी, बलि बन्ध्या संसार। कांसि कडूँवा सुत कलित, दाभन बरम्बार॥२२॥

संदर्भ- अपने और पराए की भावना के कारण जीव को संसार से मुक्ति नहीं मिलती।

भावार्थ- मेरे तेरे की भावना रूपी रस्सी में बलि के बक्ड़े के समान सारा संसार बंधा हुआ है। पुत्र एवं स्त्री रूपी काय एवं कंठुआ के कारण जीवात्मा को आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती हैं। वह बार बार आवागमन चक्र मे पड़ कर संसार नापो मे दग्ध होता रहता हैं। [ १९५ ] करनीं बिना कथणी कौ अङ्ग ]

 शब्दार्थ--मोर तोर= अपना पराया । जेवडी=रस्सी । कांसि=कास कंडूवा= बाली के अन्दर बिगडा हुआ दाना । दाभतणा= जलना। 

        १= करणीं बिना कथणीं कौ श्रंग
   कथणीं कथी तौ क्या मया, जे करणीं नां ठहराइ ।
   कालबूत के कोट ज्यूऑ , देषत ही ढहि जाइ ॥१॥
सन्दर्भ -- कथनो के अनुसार ही करणी का होना आवश्यक है ?
भावार्थ -- यदि केवल कहते, हो कहते मनुष्य ने अपना जीवन व्यतीत कर दिया और उसी अनुसार काय न किया तो उससे क्या लाभ । जिस प्रकार काल्वूत के वने हुए कगूरे साधारण प्रयास से ही देखते ही देखते नष्ट हो जाते हें उसी प्रकार मनुष्य के उस मौखिक कथन का भी कोइ अस्तित्व नही रहता है वे साधारण परिक्षा मे भी ख्ररे उतरते ।
    शब्दार्थ -- कथणी=क्थन ,कहना । करणी= कर्म ।
      जैसी मुख तैं नीकसै,तैसी चालै चाल ।
      पारब्रह्म नेड'अ रहै, पल में करै निहाल ॥२॥
   सन्दर्भ -- यदि कथनी के समान आचरणा भी हो जाय तो क्षणा भर मे मुक्ति मिल जाय ।
   भावार्थ -- जिस प्रकार की बातें  मनुष्य के मुख से दूसरे के लिये निकलती हैं यदि उस पर वह स्वय भी आचरणा करे तो परब्रह्म उसके समीप ही रहता है और क्षणा भर मे उसको मुक्ति प्रदान करके निहाल कर देता है ।
   शब्दार्थ --नेड'अ=समीप । निहाल=प्रसन्न ।
  जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै नाहिं ।
  मानिष नहीं ते स्वान गति, बांव्या जमपुर जाहिं ॥३॥
  सन्दर्भ-- केवल दूसरो को ही उपदेश देने वाला और स्वयं उस पर आचरणा न करने वाला व्यक्ति कुत्ते के समान होता है । 
  भावार्थ-- जो व्यक्ति अपने मुख से दूसरो के उपदेश हेतु निकाली हुई बात पर स्वयं नही चलते हैं आचरणा नहीं करते हैं वे व्यक्ति मनुष्य नही हैं बल्कि कुत्ते के समान हैं वे पापाचरणा के कारणा बाघकर यमलोक ले जाये जाते हैं । [ १९६ ]

शब्दार्थ-स्वनं=श्वन=कुत्ता। पद गाएँ मन हरषियॉ,साषी कहयाँ श्रनन्द। स्रोतत नांव न जांणियाँं,गल में पड'अ फंध॥४॥

 सन्दर्भ--व्रह्मा के प्र्रगं रहस्य को समभ्रे बिना जीव को मुक्ति नही मिल पती है ।
  
 भावार्थ--मनुष्यो को इश्वर भक्ति के पद गाने से मन मे

प्रस्न्नता होती है और साखियो को केहने से आनन्द मिलता है ऐसा लगता है कि उन्होने ईश्वर की समम्पूणं भक्ति कर ली है। किन्तु बिना उस परम तत्व के रहस्य को जाने और ध्यान किए उनकी मुक्ति नही हो पाती है और वे अन्त तक काल-पाश मे ही पाड'अ रहते हैं।

शब्दार्थ-तत=तत्व। फंध=फन्दा।

   करता दीसै कीरतन,ऊँचा करि करि तूंड।
   जांरगैं बूभै कुछ नहीं,यौं ही श्राँधाँ रुड॥५॥३७३॥
सन्दर्भ- से ही राम नाम की रट लगाने से कुछ नही होता,जब त्त्क ह्रदय से उस की भक्ति नही होती है।
भावार्थ-जो व्यक्ति राम नाम का घ्कीतंन,बिना उसके महत्व को सम्झते हुए मुंह उठा-उठा कर ऊंचे स्वर से करते हैं वह वस्तविक्ता तो कुछ नही,जानते घुम्ते हैं अंधे रुंड के समान बिना सिर के शरीर के नीचे के भाग के समान इधर उधर डोलते हैं।


            मैं जांन्युं पढ'अ भलौ,पढबा थैं भली जोग।
            रांम नांम सूं प्रीति करि,भलभल नींदौ लोग॥१॥
 सन्दर्भ-जीव को प्रभु-भक्ति मे ही प्रवुत होना चहिये। [ १९७ ]करणी विना कथणी कौ अंग]                                                 [१६७

है किन्तु यदि इनका ज्ञान न हो तब भी राम नाम का स्मरणा करना अच्छा है भले ही लोग निन्दा करते रहे ।

   शब्दार्थ - पढ़िबौ = पढना । थैं = से । भल भल = भले हो ।
                कबीर पढ़िबा दूरि करि, पुसतक देइ बहाइ ।
               बांवन श्राषिर सोधि करि, ररै ममैं चित लाइ ॥२॥
           सदर्भ- प्रभु-भक्ति ही जीव का कम्य है ।
           भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि पढना बन्द करके पुस्तको को वहा दे । और वर्णमाला के ५२ क्षक्ष्ररो का भली प्रकार से शोध करके उसमे से केवल दो क्षक्षर 'र' और 'म' अपने चित को लागा दे । उसी से मुक्ति प्राप्त होती है।
          शब्दार्थ - आषिर = कक्षर। ररै ममै = 'र' और 'म' ।
         कबीर पढ़िवा दूरि करि, श्राथि पढ़्या संसार ।
         पीड़ न उपजी प्रीति सूँ ,तौ क्यूं करि करै पुकार ॥३॥
     संदर्भ -- शास्त्रादि के पाठ से ही मुक्ति सम्भव नही होती है । मुक्ति तो प्रभु - प्रेम से ही प्राप्त होती है ।
        भावार्थ -- कबीरदास जी कहते हैं कि वेद शास्त्रो का अध्ययन करना छोड़ दे क्योकि उसके पढने के बाद भी ससार का अन्त हो जाता है। यदि ह्रदय मे प्रभु - प्रेम की पीड़ा न उत्पन्न हुई तो केवल राम नाम का उच्चरणा मात्र करने से क्या लाभ ?

शब्दार्थ -- आदि = अत ।

पोथी पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥४॥३७७॥

संदर्भ-राम नाम का महत्व समझ लेना ही वास्तविक पण्डित होना है।

भावार्थ-संसार के समस्त धर्म ग्रन्थों को पढ़-पढ़ करके सारा संसार मर गया किन्तु उनमें से कोई भी वास्तविक पंडित नहीं हो सका। किन्तु जिसने प्रियतम का (प्रभु का) एक शब्द 'राम' पढ़ लिया वह वास्तव में पंडित हो गया।

शब्दार्थ-मुवा=मरा। [ १९८ ] २०. कामी नर कौ श्र्ंग

     कांमणि काली निगणीं,तीन्यूँ लोक म्ँफारि ॥ २ ॥
 राम सनेही उब्ररे, विषई खाये फारि॥ २ ॥

स्न्दर्भ-ईश्वर भ्क्तो के ऊपर नारी का प्रभाव नही पडता है । भावार्थ-कामिनी (स्त्री) काली नागिन के समान विष से भरी हुई है । वह तीनो लोको के म्ध्य घूम-घूम कर लोगो को डंसती रह्ती है उसकी प्रभाव से केवल राम भक्त ही वच पाते है विषय वासना मे डूबे हुए व्य्क्तियो को तो वह ड्स हो लेती है।

    श्ब्दार्थ-कामणि = कमिनी। नाग्णी । मभारि = मध्य मे ।

कांमणि मींनीं षांणि की, जे छेडौं तौ खाइ । जे हरि चरणां राचिया, तिनके निकट न जाइ ॥ २॥ सन्दर्भ- नारी का प्र्भाव ईश्वर के भक्तो पर नही पड्ता है। भावार्थ-- कबीर दास जी कह्ते है कि स्त्री मधुमवखी के समान है जिस प्र्कार मधुमवखी को जो छेडता है उसी को खा जाती है उसी प्रकार स्त्री को भी जो कोइ छेड्ता है वह उसी का परलोक बिगाड देती है। किन्तु जिन्होने अपने मन को भगवान के चरणो मे लगा रखा है उनके निकट जाने का साहस यह मधुमवखी रूपी स्त्री नहीं कर पाती है। शब्दार्थ-मीनी = मवखी।षारणि=शहद। परनारी राता फिरै,चोरी बिढता खाँहिं। दिवसि चारि सरसा रहै , श्रंति समूला जाँहिं ॥ ३॥ सनदर्भ--पर स्त्री मे अनुरक्त एव्ं चोरी का धन खाने वाले का लोक और परलोक दोनो नष्ट हो जाते हैं। भावार्थ - जो व्य्क्ति दूसरो की स्त्री मे अनुरक्त रह्ता है और चोरी की कमाई खाता है वह थोडे दिनो के लिए भलेही फला फूला दिखाई दे समृध्द्वान् हो जाय किन्तु अन्त मे जड सहित नष्ट हो जाता है। शब्दार्थ - राता = अनुरक्त । बिढता = समृध्द। सरस । =फूल्ना फलना। पर नारी पर-सुंदरी, बिरला वंचे कोइ। खातां मींठी खांड सी, श्रति कालि विप होइ॥४॥ [ १९९ ]कामी नर कौ अंग ] [१६६

   सन्दर्भ-पर नारी-ससगं परिणाम मे दुखदायक होता है
   भावार्थ-दूसरे की पत्नी और सुन्दर स्त्री से कोई बिरले व्यक्ति हो वच पाते है स्त्री के संसगं से प्राप्त सुख खाड के समान मधुर लगता है किन्तु अन्त मे यह विष के समान भयानक प्रभाव होता है।
   विशेष-तुलसी ने भि लिखा है कि-
          'नारी नयन सर जाहि न लागा।"
           +       +          +
          "सो नर तुम्ह समान रधुराया/"
                                 -मानस
   शव्दार्थ-विरला=कोई।
       पर नारी कै राचणौं,पौगुण है गुणा नांहि।
       षार समंद मै मछला,केता बाहि जांहिं॥
    सन्दर्भ-लोग वासना का परित्याग न कर पाने के कारणा पर स्त्री गामी हो जाते है जव कि इससे हानि होती है।
    भावार्थ-पर स्त्री के प्रेम मे अवगुणा ही अवगुणा है अवगुण है गुण एक भि नही इस स्त्री के आकषंण रूपी समुद्र मे न जाने कितनी आत्मा रूपी मछलियां वह जाती हैं।
    शब्दार्थ-राचणों=प्रेम मे/षार=खारी नमकीत।
        पर नारी को राचणौं,जिसी ल्हसणा की षाँनी।
        षूणौ बैसि रषाइए,परगट होइ दित्रानि॥६॥
    सन्दर्भ-पर स्त्री प्रेम को छिपाया नही जा सकता है।
    भावार्थ-पर स्त्री से प्रेम करना लहसुन के खाने के समान है। जिस प्रकार लहसुन खाने के बाद सुगंध से उसका पता अवश्य चल जाता है उसी प्रकार पर स्त्री से किए गए प्रेम का भी पता चल जाता है वह छिपता नही। अत्यन्त सतकंता पूवंक कोने मे बैटकर भी यह छिपाया नही जा सकता है।
    शव्बार्थ-षानि=खाना। षूणौं=कोने म। बैसि=बैटकर। रषाइए=रखवाली कीजिए।
     नर नारी सब नरक है,जब लगि देह सकाम।
     कहै कबीर ते रांम के,जे सुमिरै निहकांम॥७॥
  सन्दर्भ-सासारिक कामनाओ कि इच्छा न करके भगवान का भजन ही सच्चा भजन है। [ २०० ]२००)                (कबीर की साखी

भावार्थ- जब तक शरीर कामनामय रहता है तब तक सभी स्त्री पुरुष नरक के कीड़े के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो व्यक्ति निष्कम रुप से ईश्वर की भक्ति करते हैं वे ही वास्तव मे ईश्वर प्रेमी हैं।

शब्दार्थ- सकाम= कामनामय । निहकाम= निष्काम ।

नारी सेती नेह, बुधि बिवेक सबही हरैं । कांइ गमावै देह, कारिज कोई नां सरैं ॥१॥

संदर्भ- स्त्री के प्रेम मे विवेक नष्ट हो जाता है।

भावार्थ- स्त्री के प्रति प्रेम व्यक्ति की बुद्धि, विवेक सब का हरण कर लेता है। हे जीव । तू क्यो अपनी शारीरिक शक्तियो का अपहरण कर रहा है? इससे तो तेरा कोई भी काय्रं सफल नहीं होगा ।

शब्दार्थ- काह= क्यो ? सरै= पूरा होना।

नाना भोजन स्वाद सुख, नारी सेती रगं। वेगि छाडि पछिताइगा, ह्वै है मूरति भंग॥२॥

सन्दर्भ- इन्द्रिय सुखो मे अनुरक्त शरीर की शक्ति कम होने पर मनुष्य पश्चाताप करता है।

भावार्थ- हे मनुष्य । तू नाना प्रकार के स्वादिप्ट् भोजनो और स्त्री के साथ विलास करने के सुख को शीघ्र ही छोड़ दे ऊन्यथा जब तेरा रुप सौन्दयं नष्ट हो जायगा तब तुझे पश्चाताप करना पढेगा।

शब्दर्थ- मूरति= रुप सौन्द्रयं ।

नारि नसावै तीन सुख, जा नर पासैं होइ। भगति,मुकति , निज ग्यान में पैसि न सकई कोय॥३॥

सन्दर्भ- कामी मनुष्य का सम्बन्ध भक्ति मुक्ति और आत्म ज्ञान से नहीं होता है।

भावार्थ- स्त्री का संपक्ं मनुष्य को भक्ति मुक्ति और आत्म ज्ञान इन तीनो सुखो से वंचित कर देता है। कामी मनुष्यो का इन तीनो से कोई भी सम्बन्ध नही रहता है।

शब्दार्थ - पैसि= प्रवेश।

एक कनक श्ररु कांमनीं, विपकल कीए उपाइ। देखै ही थैं विप चढ़ै, खाँयें सू मरि जाइ॥४॥

सन्दर्भ- वन और स्त्री के उपभोग से प्रणी मृत्यु को ही प्राप्त हो जाता है। [ २०१ ]कामी नर कौ अग ]

                                                          [२०१
           भावार्थ-एक तो सोना अर्थात् घन दूसरे स्त्री को प्रप्त कर लेना विष फल का प्राप्त करना है।इन दोनो के देखने मात्र से ही विष के समान प्रभाव हो जाता है और यदि इनका उपभोग किया जाय तो निश्चय ही मृत्यु आती है।
   शब्दार्थ-उपाइ=उत्पन्न करके।
         
         एक कनक श्ररू कामिनी,दोऊ श्रगनि की म्फाल ।
         देखैं ही तन प्रजलै,परस्यों ह्यौ पैमाल ॥ १२ ॥
  
  सन्दर्भ -स्त्री और धन का देखना भी भयकर होता है।
  भावार्थ-एक सोना अर्थात् धन और दूसरे स्त्री दोनो अग्नि की जल्ती हुई लपटो के समान है। इनको देखने मात्र से ही शरीर प्रज्वलित होने लगता है फिर स्पशं करने पर तो कहना ही क्या?तब तो मनुष्य नष्ट ही हो जाता है।
 शब्दार्थ-फाल्= लपट । पैमाल = नष्ट होना।
     
            कबीर भग की प्रितड़ी,केते गए गडंत।
            केते श्रजहूँ जाइसी,नरकि हसंत हसंत॥१३॥







सन्दर्भ- एक दूसरे के परिणाम देखकर भी मनुष्य वासना से अलग नहीं होता है। भावार्थ-कबीर दास जी कह्ते हैं कि स्त्री के सहवास के सुख के प्रेमी न जाने कितने

व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होने के वाद कब्र मे गाड दिये गए किन्तु फिर भी ससार के अवशिष्ट प्राणी आज भी हंसते हंसते उमी नरक को (पतन माग्ं) को जा रहे हैं।
          शब्दार्थ-भग=स्त्री सम्भोग।
             
              जोरू जूठणि जगत की,भले बुरे के बीच ।
              उत्यम ते श्रलगे रहैं,निकटि रहें तें नीच ॥१४॥

सन्दर्भ-स्त्री से दूर रहने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ और इसके संसग्ं मे रहने वाला नीच होता है। भावार्थ- स्त्री सांसारिक विषय वासनाओ की बची हुई जूठन है। यह मनुष्य के भले और बुरे का अतर बताती है। जो इससे अलग रहते हैं वे उत्त्म कोटि के व्यक्ति होते हैं और जो इसके निकट रहते हैं वे नीच प्रकृति के होते हैं। शब्दार्थ- जोरु=पत्नी,नारो । उत्यम=उत्त्म=श्रेष्ठ ।

                  नारी कॅउड नरक का,बिरला थंमे वाग ।
                  कोइ साधू जन उबरै,सब जग मूवा लाग ॥१५॥ [ २०२ ]  सन्दर्भ-स्त्री के सम्पकं से ईश्वर भक्त ही बच पाते हैं ।
 भावार्थ-जिस प्रकार नरक कुंड अपवित्र होता है उसी प्रकार स्त्री भी अपवित्र होती है अपनी इन्द्रियरुपी लगाम को विरले व्यक्ति ही रोक पाते है। संपूणं संसार स्त्री मोह मे पडकर मरकर विनप्ट हो गया केवल कुछ साधु व्यक्ति ही इसके प्रलोभन से बचकर भव सागर पार कर पाते हैं ।
 शब्दार्थ-थभै=थामना रोक पाना । वाग=लगाम ।
 विशेष-रुपक अलकार ।
     सुंदरी थैं सूली भली, विरला बंचै कोइ ।
     लोह निहाला श्रगनि मैं,जलि बलि कोइला होय ॥ १६ ॥
 सन्दर्भ-नारी दृढ चरित्र वले को व्यक्ति को भी पथ भ्रष्ट कर देती है ।
 भावार्थ-सुन्दरी स्त्री से शूली फिर भी अच्छी होती है क्योकि स्त्री के

घातक प्रभाव से विरला व्यक्ति ही बच पाता है । श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लोहे को भी अग्नि जलाकर कोयला बना देती है उसी प्रकार स्त्री भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पुरुष को भी नष्ट भ्रष्ट कर देती है ।

 शब्दार्थ-निहाला=डालना ।
   त्र्प्रंधा नर चेतै नहीं, कटै न संसै सूल ।
   त्र्प्रोर गुनह हरि बकससी, काँमी डाल न मूल ॥ १७ ॥
 सन्दर्भ-कामी व्यक्ति के अवगुणो को ईश्वर क्षमा नही करता है ।
 भावर्थ-कामान्ध व्यक्ति को कभी चेत नहीं आता वह सदैव असावधान

ही रहता है जसके सशय का निवारण भी नही हो पाता है । अन्य गुनाहो को दोषो को तो ईश्वर क्षमा कर देता है किन्तु कामी व्यक्ति तो कहीं का भी नही रहता है न तो उसके हाथ मे यह लोक रहता है और न परलोक ।

 शब्दार्थ-अन्धा=कामान्ध । गुनह=गुनाह, दोप ।
   भगति बिगाड़ी काँमियाँ, इंद्री केरै स्वादि ।
   हीरा खोया हाथ थै, जनम गॉवाया वादि ॥ १८ ॥
 सन्दर्भ-मानव जन्म का उदेश्य एक मात्र प्रभु भक्ति ही है ।
 भावार्थ-कामी पुरुषो ने इन्द्रियो के स्वाद के लिये भक्ति मांग को नष्ट

कर दीया उन्होने हीरा ऐसे अनमोल भक्ति मागं को अपने हाथ से खो दिया और सांसारिक विषयों मे पढ़ कर अपने जन्म को व्यथं ही खो किया ।

 शब्दार्थ-कांमियां=कामी पुरुष । वादी=व्यथं ।
 विशेप-रुपक अलकार । [ २०३ ]कामी नर कौ अग]
                                                                                                                                                  कामीं धमीं न भावई,बिषई कौ ले सोधि।
        कुबोधि न जाई जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोधि॥९६॥
        सन्दर्भ-स्व्य प्रभू के समभ्फाने  पर भी कामी पुरुषो को समभ्फ नही आ पाती है।
             भावार्थ-कामी पुरुष को प्रभु भत्ति   रुपी अमृत- अच्छा नही लगता है वह तो इन्द्रियो के विषयो को खोजा करता है यदि साक्षात प्रभु ही आकर ऐसे जीव को उपदेश देने लगे तो भी उसकी कुबुध्दि नष्ट नही होती है।
                                                                           
              शब्दार्थ-अमो=अमृत । स्यभ=शभु ईश्वर ।
            विषै  बिलंबी छात्माँ,ताका मजकरण खाया सोधि ।
            ग्यांन श्र्ंकुर न ऊगई,   भावै निज प्रमोध   ॥ २० ॥
        संदर्भ- उपदेशो का प्रभाव कामी पुरुषो पर नही पडता है ।
        भावार्थ- विषय भोगो मे लिप्त जीवात्मा   के शरीर के म्ज्जा के प्रत्येक करण-करण को विषय की प्रवृत्ति खोज खोजकर खा लेती है। इस प्रकार के व्यक्ति के अंत: करण  मे ज्ञान का अकुर अंक्रुरित नही होता है उसे चाहे जितने उपदेश दिये जाय । उसे तो  अपने आपका उपदेश ही अच्छा लगता है ।
       शब्दार्थ--विलबी =लगी हुई । मजकण= मज्जा का कण ।
           विषै कर्म की कंचुली,पहरि हुश्रा नर नाग ।
    सिर फोढै सूभ्फै नहीं,को श्रागिला श्रभाग॥ २१॥

सन्दर्भ-- विषय वासना मे लगा हुआ व्यक्ति आत्म तत्व को न्ही पह्चान पाता है।

    भावार्थ-- विषय वासना रूपो कर्मो की कैचुल को पह्न कर  मनुष्य सपं तुल्य हो जाता है। जिस प्रकार सपं केचुली से ढका होने पर सिर पटक पटककर देखने पर भी आत्म स्वरुप को नही देख पता है उसी प्रकार विषयी पुरुश भरसक प्रयास करने पर भी आत्मा स्वरूप को नही जान  पाते है।
           शब्दार्थ-सिर फोडै =भरसक प्रयत्न करने पर भी।
           विशेष-हष्टान्त अलकार।
                कामीं कदे न हरि भजै, जपै न केसौ जाप।
                राम कक्षां थैं जलि मरै, को पूरिबला पाप ॥२२॥
     सन्दर्भ -कामी पुरुष को प्रभु भजन अच्छा नही लगता है।
    भावार्थ- कामी पुरुष कभी भी ईश्वर का भजन नहीं करता है और न वह केशव नाम का सकीतंन ही करता है यह उपके पूवं जन्म के पापो का ही परिरणाम [ २०४ ]है कि यदि उसके समक्ष कोई दूसरा भी व्यक्ति राम का नाम ले लेता है तो वह 

क्रोघाभिभूत हो जाता है ।

    शब्दार्थ - करे = कभी । केसौ=केशव,प्रभु ।
       
       कामी लज्या नां करै, मन मांहै श्रहिलाद ।
       नींद न मांगै सांथरा, भूष न मांगै स्वाद ॥२३॥
    
    सन्दर्भ - कामी पुरुष निजंज्जता के कारण भले बुरे पर ध्यान नहीं 

देता है ।

     भावार्थ- कामी पुरुष लज्जा नही करता है अपितु उसके मन मे अपने

कुकर्मों के प्रति भी प्रसन्नता ही होती है। जिस प्रकार नींद मे मस्त आदमी शैया की चिन्ता न कर कही भी सो जाता है और भूखा व्यक्ति स्वाद नही देखता कुछ भी खाकर भूख शान्त करने लगता है उसी प्रकार कामी पुरुष भले बुरे का ध्यान नहौ रखता है।

     शब्दार्थ - अहिलाद =आहूलाद,प्रसन्नता। साथरा= शय्या।
          नारि पराई श्रापणीं,भुगत्या नरकहिं जाइ।
          श्रागि श्रागि सबरौ कहैं,तामैं हाथ न बाहि॥२४॥
     सन्दर्भ-कबीर मनुष्यों को नारी से अलग रहने का उपदेश देते हैं।
     
     भावार्थ- जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री का उपभोग अपनी स्त्री के समान करते

हैं वे सीधे नरक को ही जाते हैं। हे मनुष्य ! जिस स्त्री को सारा संसार अग्नि-अग्नि कहकर छातक बतलाता है उसमे तू अपना हाथ न डाल। उससे तू अलग ही रहने की चेष्टा कर।

     शब्दर्थ- भुगत्या=भोग करने पर। वादि= डाल।
          कबीर कहता जात हौ, चेतै नहीं गॅवार॥
          बैरागी गिरही कहा, कामी वार न पार॥२५॥
    सन्दर्भ - काम वासना की ओर उन्मुख हुए व्यक्ति का कही, स्थान नहीं

होता है।

    भावार्थ-कबीर दास जी कहते हैं कि मैं कहता हुआ जाता हूँ कि सासारिक

प्राणियों को चेत नही आता है। चाहे वैरागी हो और चाहे गृहस्थ कामी पुरुष कही वार-पार नही होता है। उसे कही भी स्थान नही प्राप्त होता है।

    शब्दर्थ- गिरही=गृहस्य
    ग्यानी तौ नींडर भया, मानै नांही संक।
    इन्द्री केरे यसि पध्चा, भूऍचै विपै निसंक॥२६॥ [ २०५ ]सह्ज कौ अग]
    
  सन्दर्भ-ज्ञानी पुरूष के लिए भी विषय यासना का परित्याग आवश्यक है।
   भावार्थ- ज्ञानी व्यक्ति निडर हो जात हे उसे किसी प्रकार की शंका नहीं रह्ती है और वह निशंक होकर इंद्रियो के भोगो को भोगता रह्ता है किन्तु वह ज्ञानी ही कैसा? जो इन्द्रियो के भोगो को भोगे। उसे तो उससे अलग ही रहना चाहिए। 
      शब्दार्थ--शंक=शंका।
    
ग्यानी मूल गॅवाइया,श्रापणा भया करता।
    ताथैं संसारी भला, मन में रहै डरता॥२७॥४०४॥
    सन्दर्भ- अपने आचरण के प्र्ति सचेष्ट रहने वाला व्यक्ति ही श्रेष्ठ है।
    भावार्थ- ज्ञानी व्यक्ति अपने को संसार का कर्त्ता मानकर मूल संपत्ति भी गँवा देता है आत्म तत्व को पह्चान नही पाता है। उससे अच्छे तो वे सांसारिक मनुष्य है जो
   अपने मन मे ईश्वर से डरते रहते है कि कही प्रभु उस पर क्रध्द न हो जाय और इस डर 
   से वह कुकर्म नही करता है।
       शब्दार्थ=ताथैं =उससे
                   

'२१ सहज कौ श्रप्रग्ड

     सह्ज सह्ज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं कोइ।
     जिन सह्जैं विषिया तजी, सह्ज कहीजै सोइ॥१॥
     सन्दर्भ-- निष्काम भक्त विपय वासना का परित्याग कर देते हैं।
    भावार्थ-- प्रत्येक मनुष्य ईश्वर प्राप्ति के मार्ग सह्ज(आसान) ही
    कह्ता है किन्तु उस सहज को कोइ जानता नही है। परमात्मा को कोइ 
    नही जान पाता है। जो सरलतापूर्वक विषय वासनाओ का परित्याग कर 
    देते हैं उन्ही को सरल एवं निष्काम भक्त कहना चाहिए।
   शब्दार्थ-- चीन्हैं= जानना ।
   विशेष --पुनरुक्ति अलकार ।
   
    सह्ज सह्ज सब कोई कहै, सह्ज न चीन्हैं कोइ।
    पाँचू राखै परसती, सह्ज कही जै सोइ॥२॥ [ २०६ ]२०६]
                                                  [कबीर की साखी

सन्दर्भ--पचेन्द्रियो को वश मे करने वाला व्यक्ति हो सच्चा निष्काम भक्त है।

भावार्थ--ईश्वर प्राप्ति को सभी सरल कह्ते है किन्तु उस सरल ब्रह्म् को कोइ पह्चान नही पाता है। जो व्यक्ति पांचो इन्द्रियो को अपने वश मे कर लेता है वही सहज और निष्काम भक़्त होत है।

शब्दर्थ-- पाँचू=पाँचो इन्द्रियो को परसती=वश मे। विशेष- पुनरुक़्ति अलंकार।

सहजैं सह्जैं सब गए, सुत बित काँमणि कांम । एकमेक है मिलि रह्या, दाखि कबिरा राम॥३॥

सन्दर्म्-- संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। केवल ईश्वर भक्त ही परमात्मा मे तदाकार हो जाता है।

भावार्थ--कबिरदास जी कहते हैं कि पुत्र,धन,स्त्री और कामनाएं धीरे- धीरे एक एक करके सभी चले गये। और सब के नष्ट होने पर सब से वैरागय होने पर भक्त कबीर ईश्वर से मिल कर एकाकार हो गये।

शब्दार्थ --सह्जैं सह्जैं=शनै:शनै।

सह्ज सहज सबको कहै,सहज न चीन्हैं कोइ । जिन्ह सह्जैं हरिगी मिलै, सहज कहीजै सोइ ॥४॥४०५॥

संदर्म-- ईश्वर को सरलता से प्राप्त कर लेना ही सहजावस्था है। भावार्थ--ईश्वर प्राप्ति को सरल तो सभी कहते है किन्तु उस सरल को (ब्रहम् को) कोइ जान नही पता है। जिस व्यक्ति को सुगमता से प्रभु मिल जायें यही सहन साघक है और वही अवस्था सहजावस्था है। शब्दार्थ--हरि जी = परब्रम्ह,परमात्मा । [ २०७ ]२२. साँच कौ श्र्पग्ड्

कबीर पूँजी साह् की,तूँ जिन खोवैष़्वार । ख्ररी विगूचनि होइगी, लेखा देती बार ॥२॥

सन्दर्भ् :जीव को स्म्वोधित करते हुए कबीर दास जी कहते हैं कि आत्मा के सच्चे रूप को भुला देने से बडी परेशानी होगी।

भावार्थ् : कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव !तू परमात्मा रूपी सेठ को दी हुई पूंजी को व्यर्थ हो नष्ट मतकर अन्यथा मृत्यू के उपरान्त कर्मो का लेखा-जोखा देते समय तुम्हे भारी कठिनाई मे पडना होगा।

  शब्दार्थ-  प्वार = व्यर्थ। विगुचनि= कठिनाई।

लेखा देरगां सोहरा, जे दिल साँचा होइ। उस चंगे दीवांन मैं, पला न पकड़ै कोइ ॥२॥

सन्दर्भ-सत्य प्रिय व्यक्ति को परमत्मा के समक्ष कोई कष्ट नहीं होता हैं।

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि यदि तुम्हारा मन सच्चा हैं तो परमात्मा के समक्ष तुम्हे अपने कर्मो का हिसाब देने मे आनन्द हो ॥॥॥। का दामन नही कोई पकड सकता है कोई उसको निकाल नही सकता है।

 शब्दार्थ- सोहरा= अच्छा। पला=दामन।

कबीर चित चमंकिया, किया पयना दूरि। काइथि कागद काढिया,तब दरगह़ लेख पूरी॥२॥

सन्दर्भ- सच्चा व्यक्ति हिसाब किताब मे ख्ररा निकलता है और जीव सत्कर्मो के द्वारा ही जीवनमुक्त हो पाता है।

भावर्थ- कबीर दास जो कहते है कि मेरे आत्मा ने दूर देश--ब्राम्हा के समीप प्रयारग किया तो चित प्रसन्न हो गया और वहा पर जब चित्रगुप्त ने मेरे कर्मो का लेखा-जोखा निकाला तो वह पूरग्ं निकला।

  शब्दार्थ--चमकिया=प्रसन्न हुआ। पयाना=प्रयाग। काइथि=कायास्थ, चित्रगुप्त। दरिगह=दरवार। [ २०८ ]काइथि  कागद काढ़िया,तब लेखौ वार मन पार । i

जब लग सांस सरीर में,तब लग रांम सँभार ॥४॥

सन्दभ-जीवन रहते ही पापो के नाश हेतु राम नाम का जप करते रह्ना चाहिए।

भावार्थ-मरणोपरन्त परमात्मा के दरवार में जिस समय चित्र गुप्त तेरे कर्मो का हिसाब-किताब लगाकर् देखेगा उस समय तेरे कुकर्मो का कोई वारपार न होगा। नरक भोगना अवश्यंभावी हो जावेगा। इसलिए हे जीव। जब तक तेरे शरीर मे प्राण हैं तब तब सच्चे ह्रदय से राम नाम को अवश्य स्मरण कर जिससे पाप नष्ट होएक जायं।
  शब्दार्थ्-सास-प्राण।  
     यहु सब भूठी बंदिगी, बरियां प्ंच निवाज ।
     साचै मारै भूठ पढ़ि,काजी करै अकाज ॥५॥
  सन्दर्भ-परमत्मा एक और सवंव्यापक है ।
  भावार्थ-कबीरदास जी केहते हैं कि मुसलमानो का पांच बार नमज़ पढ़ना और परमात्मा की प्राथंना करना सब व्यथं है क्योकि तू उन कुरान की आयतो पर स्वयं तो आचरनण करता नही है और इस प्रकार कितना बड़ा अनर्थ करता है ।

शब्दार्थ-बंदिगो=अर्चना,पूजा । बरिया पंच = पांच वार ।

   कबीर काजी स्वादि बसि, ब्रह्म हतै तब दोइ ।
   चढ़ि मसीति एकै कहै, दरि क्यूँ साँचा होइ ॥६॥ 

सन्दर्भ-इश्वर और जीव एकही हैं उनमे कोई भेद नही है । भावार्थ- कबीरदास जी कह्ते हैं कि काजी जिस समय अपनी जिह्वा के स्वाद हेतु बकरे का हनन करना है तो वह यही समभकर मारता है कि ब्रह्म और जीव दोनो अलग हैं यद्यापि वास्तव ब्रह्म हो है किन्तु मसजिद मे खड़े होकर जिस समय वह यह् कहने लगता है कि अल्लाह एक है उस समय उसकी बात को सत्य कैसे माना जा सकता है

    शब्दार्थ- मसीति=मसजिद ।
     काजी मुल्ला भ्रंमियां, चल्य दुनीं कै साथि ।
     दिल थै दीन बिसारीया, करद लई जब हाथी ॥७॥

सन्दर्भ-धर्म का जीव हिसा से कोई सम्बन्ध नही है । भावार्थ-कबीरदास जी कह्ते कि काजी और मुल्ल जी धर्मिक गुरु [ २०९ ]सांच कौ अग ]

  होते  है वे भी दुनिया के साथ ही साथ ही साथ चलते हैं। वे भी जिस समय निरीह पशुओं को हिंसा हेतु कटार अपने हाथ मे उठा लेते हैं ।
   शब्दार्थ - भ्रमियां = भ्रम ग्रस्त । दुनी = दुनियाँ । दीन = धमं । करद = कटार ।
     जोरि करि जिबहै करैं, कहते हैं ज हलाख ।
     जब दफतर देखैगा दई, तब ह्वैगा कौंणा  हवाल ॥८॥
   सन्दर्भ- जीव हिंसा धमं के प्रतिकूल है ।
   भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि मुसलमान निरीह पशुओ को पकड़कर काटते हैं उस समय कहते हैं कि यह हलाल है धार्मिक विधान के अनुकूल है। किन्तु जब मृत्यु के उपरान्त विवाता के यहां कर्मों क हिसाब-किताब होगा उस समय तेरा क्या हाल होगा।
   शब्दार्थ-जिबहै=बध । दई=प्रभु।
     जोरी कीयां जुलम है,मांगै न्याव खुदाइ ।
     खालिक दरि खूनी खड़ा, मार मुहे मुहिं खाइ ॥९॥
   सन्दर्भ--किसी व्यक्ति के साथ वल प्रयोग करना अत्याचार है ।
   भावार्थ--जीव वध मे शक्ति का प्रयोग करना बहुत बडा अपराध है ।

ईश्वर प्रत्येक प्राणी से न्याय पूर्ण व्यवहार की आशा करता है। यही खुनी व्यक्ति जिस समय परमात्मा के दरबार मे खडा होगा उस समय उसके मुँह पर अनवरत प्रहार किए जाएगे और उसे उतना ही कष्ट दिया जायगा जितना वह दुसरो को दे चुका है।

    शब्दार्थ-खलिक=इश्वर । दरि=द्वार ।
          सांई सेती चोरियाँ, चोरां सेती गुझ ।
          जांनैगा रे जीवड़ा,मार पडैगी तुझ ॥१०॥
    सन्दर्भ-ईश्वर से चोरी करना अक्षम्य अपराध है।
    भावार्थ-ऐ जीव! तू परमात्मा से तो चोरि करता है और काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह आदि चोरो से तू मित्रता रकता है। हे जीव! जब तेरे इस आचरण पर परमात्मा तुझे  दण्ड देगा तब  तुझे   अपने कपट पूर्ण व्यवहार का अनुमान होगा।
       शब्दार्थ- -गुझ    = मित्रता। जीवडा= जीवात्मा।
      क०  सा०  फा०  - १४ [ २१० ]२१०                                   कबीर की साखी

सेप स्बूरी बाहिरा, क्या हज काबै जाइ | जिनकी दिल स्याबति नहीं, तिनकौ कहाँ खुदाइ ||११|| सन्दर्भ-ईशवर प्रप्ती के लिए भ्रम संशय का त्याग आवश्यक हैं| भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि हे शेख ! तू सतोष से परे हैं फिर तेरे हज और कावे जाने से कोई लाभ नहीं हैं जिनका ह्र्दय सच्चा नहीं हैं उन्हे ईशवर कही भी प्राप्त होता हैं | शब्दार्थ-सबूरी=सव्र, संतोष| स्यावति=पूएं, स्च्चा|

खूब खाँड हैं खीचड़ी, माँहि पड़ै टुक लूऍ | पेड़ा रोटी खाइ करि, गला कटावै कौए||१२|| सन्दर्भ-मरएपरान्त दणड से बचने के लिए सादा जीवन ०यतीत करना श्रेयष्कर है। भावार्थ-यदि खिचड़ी मे थोडा सा नमक पड जाय तो वही खाँड के समान मघुर हो जाती हैं| पेडा ओर रोटी खा करके भी मृत्यु के उपरान्त अपना गला मौन कटावे? कप्ट कौन सहन करे? शब्दार्थ-टुक=थोडा सा| लूऍ=नमक|

पापी पूजा बैसि करि, भषै माँस मद दोइ| तिनकी दृष्या मुकति नहिं, कोटि नरक फल होइ||१३|| सनदर्भ-घमं के नाम पर जीव हिंसा करने वालो को मुक्ति नहीं मिलती हैं| भावार्थ-पापी लोग पूजा के नाम पर बैठकर मास ओर मदिरा का सेवन करते है ऐसे पापियो की इस दशा पर उन्हे मुक्ति नहिं मिल पाती हैं उनको तो करोड़ो नरको का फल भोगना पडता हैं| यातनायें सहन करनी पडती हैं| शब्दार्थ-वैसीकरि=बैठकर| दष्या=दशा, मुकति=मुक्ति मोक्ष| सकल वरए इकत्र हैं, सकति पूजि मिलि खाँहिं| हरि दासनि की भ्रॅंति करि, केवल जमपुर जाँहिं||१४|| सन्दर्भ-शक्तो के जीव हिंसा के प्रति विरोध प्रदर्शित है| भावार्थ-शाक्ति मम्प्रदाय को मानने वाले सभी लोग एकत्र होकर बलि चढाकर शाक्ति की पूजा करते हैं ओर फिर सभी मिलकर प्रसाद के रुप मे उसका भक्षण करते हैं वे केवल ईश्वर-भक्ति बनने के भ्रम मे पडे रहते हैं वासविकता तो यह कि वे लोघे यमलोक जाते हैं| शब्दार्थ-सकति=शक्ति| [ २११ ] साच कौ अग


कबीर लज्या लोक की, सुमिरै नाँही साच ।

जानि बूभि कंचन तजै, काठा पकड़ै काच ॥१२॥

सन्द्रर्भ- कुरीतियो का पालन किसी भी प्राकार श्रेयष्कर नहीं है।

भवार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य लोक लज्जा के भय से सत्य क विस्मरण कर कुरितियो का पालान करता है।ऐसा व्यक्ति जान-वूभ करके सोना रुपी परमात्मा का त्याग कर काँच रुपी असत्य को अपना रहा है। शब्दार्थ - लज्या = लज्जा ।

कबीर जिनि जिनि जाँएयाँ,करता केवल सार।

सो प्राँणी काहै चलै झूठे जग की लार॥१६॥

संदर्भ- इशवर के अस्तित्व को समभ लेने के बाद मिध्याचरनण नहीं होते हैं।

भवार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि जिन-जिन लोगो ने यह समभ लिया है कि इस द्रष्टि का कर्ता ब्रह्म ही सब कुछ है वह असली तत्व है वे व्यकित मोहान्धकर मे पड़कर सांसारिक मिध्या मार्ग पर आचराण नहीं करते हैं।

शब्दार्थ-जिनि जिनि = जिन्होने। करता- कर्त्ता। लार पंक्ति।

झूठे कौ झूठा मिलै दूएँ बधै सनेह ।

झूठे कूँ सांचा मिलै, तबही टूटै नेह ॥१७॥४२५॥

संदर्भ- मैश्री समान गुणो मे होती है। भावार्थ- यदि भूठे (ईश्वर विमुख) व्यक्ति से भूठा (ईश्वर विमुख) व्यक्ति मिल जाता है परिचय बढ़ता है तो स्नेह दूना बढ़ जाता है मैंनो बढ़ जाती है। और यदि ईश्वर विमुख से इश्वर-प्रेमी मिल जाता है तो स्नेह सम्बन्ध टूट जाता है । मैश्री समाप्त हो जाती है। शब्दार्थ- दुणा = दुगुना। बधै= बढ़ै । [ २१२ ] २३ भ्रम बिधौं सण कौ प्रंग

              पाहण केरा पूतला, करि पूजै करतार |
             इही भरोसै जे रहे, ते घूड़े काली धार ||१||

सन्दर्भ- कबीर का मूर्ति पूजा के प्रति विरोध प्रदर्शित है। भावार्थ- मनुष्य पत्थर के पूतले को-मूर्ति को- ईश्वर मानकर पूजते हैं और जो इस पाषाण मूर्ति को ईश्वर ही मानते रहते हैं वे काली धारा मे डूब जाते हैं। शब्दार्थ- पाहण-पाषाण । पूतला- मूर्ति।

              काजल केरी कोठरी, मसि के कर्म कपाट ।
              पाँहनि बोई पृथमीं, पंडित पाड़ी बाट ॥२||

सन्दर्भ- कबीरदास ने मूर्ति पूजा को ढोग बताया है। भावार्थ- यह संसार काजल की कोठरी के समान है उसमे कालिमा यूक्त कर्मों-कुकर्मों के किवाड लगे हुए हैं और पंडितो ने अपना ढोग रचकर सम्पूर्ण पृथ्वी को पत्थरो की मूर्तियो से ढंक दिया है मानो उसी रास्ते से वे स्वर्ग जाने की तैयारी कर रहे हो। शब्दार्थ- पृथ्मी- पृथ्वी। पाड़ी-निकाली।

                पाहन कू का पूजिए, जे जनम न देई जाब।
               आंधा नर आसामुषी, यौहिं खोवै श्राव ||३||

सन्दर्भ- पत्थरो की पूजा व्यर्थ है| भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि उस पत्थर को पूजने से क्या लाभ ? जो जीवन भर उत्तर ही नहीं देती हैं और विभिन्न प्रकार की प्रकार की आशाओ को लगाए हुए मनुष्य मूर्ति पूजा कर करके अपने आत्म-सम्मान को व्यर्थ ही नष्ट कर रहा है। शब्दार्थ- जाब- जवाब,उत्तर । आन्धा- आज्ञानी ।

                हम भी पॉंहन पूजते, होते रन के रोफ ।
             सतगुरु की कृपा भई, डारया सिर थै बोफ ||४||

सन्दर्भ- कबीरदास कहते हैं कि हमने सतगुरु की कृपा से मूर्ति पृजामही की है। [ २१३ ]भ्रम विधौं सण कौ अंग

  भावार्थ --यदि हम भी पत्थरो की पूजा करते होते तो युद्ध के गधो के समान सैनिको के खाद्य पदर्थ ढोया करते किंतु मेरे ऊपर तो सतगुरु की कृपा हो गई जिससे मेरे सिर से इन मूर्तियो का निरर्थक बोझ उतर गया।

शब्दर्थ -- रोभ = गधा खच्चर ।

   जेती देषौं श्रात्मा, तेता सालिग राम ।
   साधू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सूकाम ॥५॥

संदर्भ - बहु देवो पास्नना पर व्यग्य है। भावर्थ - इस संसार मे जितनी जीवात्मायें हैं संख्या में उतनी ही शालिग्राम की मूर्तियां हैं अर्थत् प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग देवता की पूजा करता है। कबीरदास जी कहते हैं कि साधू तो स्वयं ही देवता है फिर पत्थरों की पूजा करने से क्या लाभ ?

    शब्दार्थ -- प्रतषि = प्रत्यक्ष ।
       सेवै सालिग राम कू, मन की भ्रांति न जाइ ।
       सीतलता सुपनैं नहीं, दिन दिन श्रधकी लाइ ॥६॥
    संदर्भ - मन का भ्रम मूर्ति पूजा से दूर नहीं हो सकता है ।
    भावार्थ - पत्थर की बनी हुई शालिग्राम की मूर्ति की पूजा करने से मन का भ्रम दूर हो सकता है। ऐसे मूर्ति पूजको को स्वप्न मे भी शान्ति प्रप्त नहीं हो सकती है दिन प्रतिदिन अशान्ति को अग्निं अधिकाधिक तीव्रता से प्रज्वलित होती है ।

शब्दार्थ - अधकी = अधिक । लाई = संताप की अग्नि ।

       सेवैं सालिगराम कूँ, माया सेती हेत ।
       चोढ़े काला कापड़ा, नाँव धरावै सेत ॥ ७ ॥
    संदर्भ - कुकर्म करके कोई व्यक्ति धर्मचारी कहे जाने के योग्य है ?
    भवार्थ - सांसारिक माया जन्य आकर्षण के हेतु जो व्यक्ति शालिग्राम की पूजा किया करते हैं वे व्यक्ति काला वस्त्र धारण करके भी श्वेत वस्त्र बारी बनना चाहते हैं ढोग रचकर भी धरर्माचारी बनना चाहते हैं ।
  शब्दार्थ - सेत = श्वेत ।
  जप तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत वेसास ।
  सूवै सैंवल सेविया यौ, जग चल्या निरास ॥ ८ ॥ [ २१४ ]                                                          [कबीर की साखी

२१४]

     सन्धर्भ-जप,तप,आदि पर विश्वास करने वालो को निराशा ही हाथ लगती है ।
     भावार्थ-जप,तप,तीर्थ,ब्रत,एवं बिभिन्न देवताओ मे विश्वास करना निरर्थक है,थोथा है। उसमे तो व्यक्ति को उसी प्रकार निरशा हाथ लगती है जिस प्रकार सेंबर के फल मे टोट के मारने से तोते को निराशा ही होती है।
         शव्दाथॆ-थोथरा =थोथा। सूवै=सुआ,तोता।
         विशेष-उपमा अलंकार ।
              तीरथै तै सध चेलड़ी,सब जग मेल्या छाइ।
             कबीर मूल निकंरिया,कौए हलाहल खाइ ॥ ६ ॥
         सन्दर्भ-कबीर के मतानुसार तीथँ ब्रतादि सब व्यथँ है।
  सन्दर्भ-कबीर के मतानुसार तीथे ब्रतादि सब व्यथँ हैं।
   भावार्थ-तीथं ब्रत आदि जगली देल के समान फैलकर पुरे संसार मे छाए हुए हैं किन्तु कबीरदास जी ने इस मूल को जड से ही नषट कर दिया है फिर इसके विषाॠ फलो को कौन खाता। अर्थात् संसार इनके विषय प्रभाव से बच गया।
शव्दार्थ-बेलड़ी=बेल।

मन मथुरा दिल द्वारिका,काया कासी जाँगि। । दसवाँ दू।रा देहुरा, तामें जोति पिछाँगि। ॥१०॥ सन्दर्भ-सभी तीथं स्थान और योग की क्रियायें शरीर मे हो विद्यमान हैं। भावार्थ-हे मनुषयो । मन मे ही मथुरा है और दिल मे द्वारिका और इस शरीर को ही पवित्र काशी नगरी सभभो जिसमे ब्रह्माण्ड ही इस शरीर रुपी मंदिर का दरवाजा है इसलिए उसमे प्रज्ज्वलित निरंजन पुरुष की ज्योति को पहिचानना ही श्रेयष्कर है। शब्दार्थ-दसवाँ द्वार=दशम द्वार,ब्रह्म रंध्र।

विशेष-रुपक अलकार ।
      कधीर दुनियाँ देहुरै,सीस नवाँवण जाइ।
     हिरदा भितरि हरि वसैं,तूँ ताही सौं ल्यौ लाइ ॥११॥४३६
  संदर्भ- ह्रदय स्स्थित परमात्त्मा का ध्यान लगाने से ही परमात्त्मा की प्राप्ति हो सकती है।
भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि इस संसार के सभी वयक्ति मंदिर मे ईश्वर वा निवास समभकर वहाँ सिर झुकाने जाते हैं किन्तु प्रभु तो तेरे ह्रदय कि [ २१५ ]भेष कौ अंग़़]८                                                      [२१५

भीतर ही निवास क२ते है तू उन्हो से अपने प्रभु की लौ लगा उन्ही की प्राप्ति का प्रयत्न कर । शब्दाथ- देहुरै= मन्दिर मे । ल्यौ = ध्यान ।

                          ॥ २४. भेष को ऋप्रगङ ॥

"कर सेती माला ज़पै, हिरदै बहै डंडूल। पग तौ पाला मै गिल्या, भाज्र लागी सूल ॥१॥" सन्दर्भ-- सासारिक मनुष्य माया जाल मे फंसे रह्ते हे। भावार्थ-- हे जीवात्मा। तू हाथ से माला जप रहा है इस वात का प्रदर्शन कर रहा है कि मैं ईश्वर भक्त हूँ किन्तु मेरा ह्र्द्य माया जाल मे फ्ंसा हुआ है । विषय-वास्ना रपो पाले मे तेरे गल गये है अब यदि इससे भागने का भी प्रयास करेगा तो तेरे पैरो मे कांट चुभ जायगे । शब्दार्थ-- सेती = से। डडुल= माया जाल ।

"कर पकरै श्रॅगुरी गिनैं , मन घायै चहुॅ श्रोर । जाहि फिरांया हरि मिलै ,सो भया काठ की ठौर ॥२॥" सन्दर्भ-- ईश्वर की प्राप्ति सासारिक विष्य वासनाऔ से मन को अंलग कर देने मे होती है। भावार्थ--ढोगी साघक हाथ मे माला लेकर उंगलियो से उनकी मनकाओ को गिनता जाता है किन्तु मन जिसको स्थिरता से ही साघना सभ्भव है वह चारो ओर दौ़ड रहा है। जिस मन को संसार की ओर से घुमा देने पर अलग कर देने पर ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है वह मन तो काठ के समान जड़ हो गया है। शब्दार्थ--वोर=अोर । काठ की ठोर=काष्ठवत ।

"माला पहरैं मनसुषी, ताथैं कछू न होइ । मन माला कौं फेरता, जुग उजियारा सोइ ॥३॥" सन्दर्भ--मन को माला को फेरने से ही ईश्वर प्राप्ति सभव है। [ २१६ ] २१६] कबीर के साखी भावार्थ्-मनुष्य माला को गले मे पहन कर उसे वर्थ ही घुमाता रहता है किन्तु उसका मन वहिमुला हो जाता है वह संसारिक विष्य वासगाऔ मे लिपता रहता है । इस प्रकर की पूजा से उपासना से कोई लाभ नही है।यदि वह मन की माला को सच्चे ह्रदय से फेरे तभी उसका यह लोक और परलोक दोनो सुधरेगा।

शब्दार्थ- मनसुषी = एक प्रकर की माला का नाम।
  माला पहरैं मनसुषी , बहुतैं फिरैं क्षचेत । 
  गागी रोलै बहि गया, हरि सूं नाहीं हेत ॥४॥
स्ंदर्भ-मन पवित्र होने से हो जप तप उपासनादि का फल प्राप्त होता है।
भावार्थ- इस संसार मे बहुत से व्यक्ति मनसुखो माला को पहने अचेता वस्था-अघाना वस्था मे घूमा करते हैं किन्तु जिस व्यक्ति का ईश्वर से सच्चा प्रेम नहीं हैं वह गंगा जैसी पवित्र नदी के पास भी जाकर स्नान नहीं कर पाता वरना उसके प्रवाह मे प्रवाहित हो जाता है।उसका कल्यान नहीं हो पाता है।
शब्दार्थ- अचेत=अज़ान । गागी =गंगा के। रोलै=धारा मे । हेत= प्रेम,भक्ति ।
  कबीर माला काठ की,कहि समझावे तोहि ।
  मन न फिरावे क्षापणा, कहा फिरावे मोहि॥५॥
संदर्भ-सच्ची भक्ति तो संसार से चित वुक्ति को हटाकर प्रभु के केन्द्रित करना है।
भावार्थ-काष्ठ की माला, माला घुमाने वाले साषक को समझाती हुई कहती है कि ऐ साघक!तू यदि अपने मन को परमाप्ता की और उप्मुख नही करता है तो फिर मुक्भे घुमाने से क्या लाभ? कबीर कहते है कि सच्ची उपासना तो मन को प्रभु की और लगाना ही हो ।

शब्दार्थ-आपरणा = अपना |
  कबीर माला मन की क्षोर संसारी भेष |
  माला पहेर्या हरि मिलै , तो क्षरहट कै गलि देष ॥६॥
संदर्भ-नही माला पहनने से ईश्वर की प्राप्ति होती है ? 
भावार्थ- कबीरदादस जी केहते है कि वास्विक माला तो मन की होनी चाहिए और मालाएं तो म दिखावा मात्र हैं। यदि माला के पहनने से ही प्रभु [ २१७ ]भेष कौ अंग]                                                         [२९७
 

प्रप्ति सम्भव होतो तो रहटको क्यो न प्रभु प्रप्ति हो जाति जिसके गले मे वल्टियो की माला हमेशा घूमा करतो है।

   शब्दार्थ-भेष=दिखवा । अरहट-रहट ।
             माला पहॄरयाँ कुछ नही,रुल्य मुवा इहि भार।
             बहरि ल्य हिंगलू,भीतरि भरी भँगारि ॥७॥
    संदर्भ- माला पेह्नना तब तक व्यर्थ है जब तक मन विषय-वासना से अलग न हो।
     
    भावार्थ- कबीरदास जी कहते है कि माला पहनने से कुछ नहीं होता है 
    व्यर्थ मे ही शरीर उसके भार से दवा रहता है। बाहर से तो गेरूआ वस्त्र धराण 
    कर लोग सधुओ का-सा वाना बनाए रह्ते है किन्तु उनके अनुकराण मे विषय-
    वासानाएँ भरी रह्तो है।
         शब्दार्थ-रुल्य=शरिर। होग्लु=गेरु। भंगारि=गन्दगी।
        माला पहॄरयाँ कुछ नहीं,कती मन कै सथि।
        जब लगि हरि प्रगटै नहिं,तब लग पडता ह्राथि ॥५॥
    संदर्भ- माला धराण करने के साथ-साथ परमात्मा का करना भी 
  आवश्याक है।
 
  भावार्थ- कबीरदास जी कहते है माला पहेन लेने से हो कुछ नहि होना
  जब तक मन नाना प्रकार के माया जनय आकषंको मे फँसा रहेगा तब तक प्रभु 
 भक्ति से कोई लाभ नही। माला पर हाथ तो तभी तक पड्ता है जब तक ईश्वर 
 का स्वरुप समक्ष प्रकट नही हो जाता है और जैसे हो ईश्वर की प्रप्ति हो 
  जाती है वैसे हो इन बहरी आडम्बरो से कोइ लाभ नही।
     शब्दार्थ-करती=माया जन्य आकषंण।
           माला पहॄरयाँ कुछ नहीं,गाँठि हिरदा की खोइ।
          हरि हरनू चित राखिये, तौ ऋमरापुर होइ ॥६॥
     संदर्भ- माला धारण की व्यथंता की ओर कबीर का सकेत है।
    भावार्थ- माला धराण करने से कोइ लाभ नही है जब ह्रदय के भीतर
    माया,मोह,राग और द्वेश की गाँंठ न खोल दो जाये यादि हरि 
    च्ररनो मे चित को लगा रखा जाय तो एक दिन परमात्मा की प्रप्ति अवश्य होगी ।
           
       शब्दार्थ-गाँठि= माया जनित राग्द्र्वेश। अमरापुर=स्व्गँपुरो।
             माला पहॄरयाँ कुछ नहीं,भगति न ॠई हाथि ।
         माथा मुंछ मुंडाई करि, चल्या जगत कै साथि ॥२०॥ [ २१८ ]सदभ-माला धारए करने से प्रभु-प्राणभव नही है।                             भावाथ्र- करने से कोई लाभ नही उससे भकित की

प्रकित सभव नही है।सिर और मुछौ को मुङवाकर सासारिक दोगिओक कि साथ चलने से कोई लाभ नही,ईशवर प्राप्ति के लिये तो सच्चे उपासक की भाति आचरख करना चाहीए। शब्दाथ्-मुछ=मुछ। साई सेती साच चलि,औरा सू सुध भाइ। भावे लम्बे केस करि, भावे घुरङि मुङाई॥११॥ सदभ-एक मनुष्य के दोसरे मनुष्य के साथ सरल व्य्वहार करना चाहिए और ईश्वर के साथ भी सत्य आचरय करना चाहिए । भावाथ्-हे जीव तु स्वामी(परमात्म)के साथ सत्य का आचरग कर और साथ ही अन्य प्रारियो के साथ भी तू सरल भाव से आचरग कर और उसके वाद चाहे तू लवे लये बाल बदा ले और चाहे सिर मुङवा ले। शब्दभ-सुधमाह=सीघे भाव से। घुरङि=पूरग रुपीऍ।

   केसो कहा बिगाङिया,जे मूङे सो बार ।

मन को काहे न मूङिये,जामै बिषय बिकार॥१२॥ सद्बभ-कबीरदास जो सिर मुङाने के पक्ष मे न होकर मन को बिषय वास- नाशो से अलग करने के पक्ष मे है। भावाभ-कबीरदस जी कहते है कि इन वालो ने तेरा क्या बिगादा है जो तू इनको बार-बार मुङयाता रहता है। बास्तब मे तू मन को क्यो नही मु ङ बाता जिसमे नाना प्रकार के सासारिक विषय बासनाए भरी हुई है?

    शब्दाथ-केसो=वालो मे।
      मन मैवासी मङि ले,केसो मूङे काई।
      जे कुछ किया सु मन किया,केसो कीया नाही॥१३॥
    सदभ-सिर मुङवाने की उतनी आवश्यकत नही है जितनी मन को

बिपयो से अलग करने की है।

      भावाथ-हे दोगी साधुओ !तू बारम्वार सिर ही क्यो मुङवाया करता है।
   बिषयो से अलग करने की है ।
      भावाथ-हे दोगी साधुओ!तू बारम्बार सिर ही क्यो मुङवाया करता है।

मनरुपी मदमस्त ङाकू वो मूङ कर क्यो नही स्वच्छ करता जो कुछ भी पाप कम किए है वे सभो मन मे किए है बालो ने कुछ भी नही किया है फिर उनकी सफाई से क्या लाभ?

    शब्दाथ-मै वासी=मदमस्त ङाकू।काइ=क्यो। [ २१९ ]भेप कौ अंग]                                                     [२१६
       मूंड मूडावत दिन गए,अजहू न मिलिया राम ।
       रांम नांम कहु क्या करै,जे मन के औरे काम ॥१२४॥ 
सन्दभ॔-सासारिक कार्या मे रत होकर मन राम नाम का स्मरएा नही कर 
 पाता है।
      भावार्थ-सिर को मु डवाते हुए मनुष्य की पूरी आयु क्षीएा हो गई किन्तु
 अन्तिम समय तक राम (व्र्हा) न्ही मिल सके । जब मन ही नाना प्रकार के माया
 जाल मे फंसा हुआ है तो फिर भला बाहर से राम नाम का उच्चारएा ही वया कर
 सक्ता है ?
   श्ब्दार्थ-दिन गए=आयु व्यनीत हो गई ।
      
       स्वांग पहरि सो रहा ,खाया पीया षूंदि ।
       जिहि सेरी साधू नीकले,सा तौ मेल्ही मूंदि ॥१४॥

सन्दर्भ - उपासना के वास्तविक मागं पर कुकमौ॔ के कारएा साधक नही चल पाते है वे ऐश आराम मे हो लगे रहते हैं।

       भावार्थ-हे कपटो साधक। तू रग विरगे कपडो को ही पहनकर आनन्द-

पूवंक खा-पीकर मौन उडाता रहा किन्तु जिस मागं से होकर साधु जाते हैं अपने कुकमौ॔ के कारण तूने उस मागं को अपने लिए बन्द कर लिया है। उस पर तू चल ही नही सक्ता।

    शब्धर्थ- सोरहा=सुन्दर। बूंदि=आनद पूवंक। सेरी=गली। मेल्ही
मूंदि=ब्न्दू कर ली।
       
       बैसनौ भया तौ का भया,बूका नहीं बिबेक ।
       छापा तिलक बनाइ करि,दगध्या लोक श्रनेक ॥१६॥ 
 
  सन्दर्भ- केवल वैष्एाव मत मे दीक्षित हो जाने से ही प्रभू प्राप्ति नही 

होती है।

 भावार्थ - यदि तूने विवेक की  की ञान प्राप्ति नही की तो फिर वैष्एाव

मत मे दीक्षित होकर वैष्एाव वन जाने से ही क्या लाम हुआ?छापा-तिलक आदि लगाकर अनेको लोग इस सासारिक तापो मे दग्घ होते रहते है। वास्तविकता तो यह है कि प्रभ वेष भूषा से नही वरन् सच्ची भक्ति से ही प्राप्त होते है।

शब्दाथ॔-वैसनो=वैष्एाव।बुआ=समआ।

       तनकौ जोगी सब करे, मनकों बिरला कोइ ।
       सब बिधि सहजैं पाइए,जेमन जोगी होइ ॥१७॥

सन्दर्भ--मन इच्छारहित होकर ही सिद्धियो को प्राप्त कर सक्ता है। [ २२० ]२२०] [कबीर की साखी

    भावार्थ- इस शरीर को गेरुआ वस्त्रादि से ढंक कर तथा तिलक आदि लगातार सभी योगी बना देते हैं शरीर देखने से ऐसा लगता है कि योगी ही हैं किन्तु मन को विरला व्युक्ति ही साधु बना पाता है और यदि वास्तव मे किसी का मन योगी हो जाय तो वह सहज रुप से ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। 
         शब्दार्थ् - सहजैं = परमात्मा को।
        कबीर यहुतौ एक हैं, पङदा दीया भेष।
        भरम करम सब दूरि कर, सब ही माँहि श्रलेख॥१८॥
   
     संदर्भ- जीवात्मा और परमत्मा एक हैं। भ्रम के कारएा ही दोनो में भेद देखाई दैता है।
      भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि आत्मा और परमत्मा वास्तव मे एक हैं किन्तु माया के आवरएा के कारएा दोनो मे भेद दिखाई पडता है। यदि भ्रम और कुकर्मो को दुर कर दिय जाय तो वह अलक्ष व्रहा प्रत्येक प्राएी मे त्राप्त हो सकता है। 
       शब्दार्थ- यहु तो =आत्मा और परमत्मा। अलेख= अलक्ष परमत्मा।


            भरम न भागा जीय का, श्रनन्तहि धरिया भेष।
            सत गुरु परचै बाहिरा, श्र्न्तरि रहया त्र्पमेष॥१६॥
      सन्दर्भ- ह्रदयस्थित व्रझ का परिचय विना सच्चे गुरु के नही हो सकता है।
     भावार्थ- हे जीव! तेरा भ्रम समाप्त नही हुआ तू भ्रम जाल मे ही पडा रहा यद्यपि अनेकानेक योनियो मे तूने जन्म ग्रहएा किया। बिना सतगुरु के उन अन्त करएा मे परिव्यप्त अमक्ष व्रझ को प्राप्ति नही हो पाती है।


       शब्दार्थ- प्रन्तहि= अनके। भेष= शरीर।
      जगत जहदम राअचिया, जुती कुल की लाज।
      तन बिनसें कुम बिनसि हैं, गहयौं न राम जिहाज॥२०॥

      सन्दर्भ-    ससार-सागर को पार करने के लिए राम नाम रुपी नोका का संबल आवश्यक है।
     भावार्थ - मनुष्य अपनी मिध्य प्रतिष्ठ के लोभ मे ऐसे कार्य करता रहना है जिससे नरक की सूप्टि होती रहती है और वस्तविकता तो यह है कि इन शरीर के नप्ट होते ही सारी मर्यादायॅ स्वतः नप्ट जायेगी फिर संसार सागर से पार जाने के लिये राम नाम रूपी नौका का आश्रय क्यो नही ग्रहण् करता? [