प्रेमसागर

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प्रेमसागर  (1922) 
द्वारा लल्लूलाल जी

[ आवरण-पृष्ठ ]
नागरीप्रचारिणी ग्रंथमाला—२७
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प्रेमसागर

संपादक
ब्रजरत्नदास बी० ए० एल-एल० बी०


प्रेमसागर.pdf


काशी नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा
प्रकाशित


तृतीय संस्करण ]
[ मूल्य ८
२०१०
[ प्रकाशक ]

3०५8 ५)

मुद्रूक- महराय

नागरी मुद्रण,नागरीप्रचारिणी सभा, पाशी

[ अनुक्रमणिका ]अनुक्रमणिका

वक्तव्य लल्लुलालजी का जीवनचरित्र गद्य-साहित्य का विकास ग्रंथकार की भूमिका १ अध्याय मुखबंध २ , देवकीविवाह, बालकवध

३ गर्भस्तुति 
४ कृष्णजन्म

५ कंस-उपद्रव ६ , कृष्ण-जन्मोत्सव ७ , पूतनाबध ८ , शकटभंजन, तृणावर्तवध ९ , विश्वदर्शन १० , दामबंधन ११ । यमलार्जुनमोक्ष १२ , बत्तासुर-बकासुरवध १३ अघासुरवध १४ ब्रह्मा-वत्सहरण १५ । ब्रह्मास्तुति १६ ॥ धेनुकवध १७ ।। कालीमर्दन १८ , दावाग्निमोचन १९ । प्रलंबेवध [ अनुक्रमणिका ]________________

२० अध्याय दावाग्निमोचन २१ , वर्षा-शरद-वर्णन २२ ,, गोपी-वेणु-गीत २३ । चीरहरण " द्विजपनीयाचन र गोवर्धनपूजन লধা कृष्णाप्रशंसा इंद्रस्तुति वरुणलोकगमन " रासक्रीड़ारंभ गोपीविरह-वर्णन गोपीजन-विरहकथा गोपीकृष्ण-संवाद ३४ , रासलीला-वर्णन ३५ , विद्याधरमोक्ष, शंखचूड़वध गोपीगीतवर्णन कंस-नारद-संवाद व्योमासुरवध ३९ ॥ अक्रूर-वृंदावनगसन १०३ १८७ १११ १९७ १२० १२२ १२७ ४१ , अरस्तुति ४२ , पुर-प्रवेश ४३ , कंसस्वप्रदर्शन ४४ , कुवलियावध १२८ १३४ १३८ [ अनुक्रमणिका ]________________

१४५ १५७ १६२ १७२ १७६ १८४ १९० २८२ २१२ २२२ '४५ अध्याय कंसासुरवध ४६ , शंखासुरवध ४७ , उद्धववृंदावनगमन ४८ , उद्धवगोपीसंबोधन " कुब्जाकलिवर्णन " अरहस्तिनापुरगमन " जरासंधपराजय " कालयवनमरण, मुचकुंदतारण, द्वारकागमन " श्रीकृष्णप्रति रुक्मिणीसंदेश 2 रुक्मिणीहरण रुक्मिणीचरित्र प्रद्युम्नजन्म, संबरवध , जाम्बन्ती-सत्यभामा-विवाह " शतधन्वावध ५९ , श्रीकृष्णपंचविवाह ६० , भौमासुरवध ६१ , श्रीरक्मिणीमानलीला ६२ , अनिरुद्धविवाह, रुक्मवध ६३ , ऊषास्वप्न ऊषाचारित्र " राजानृगमोक्ष ६६ , बलभद्रचरित्र ६७ , नृपपौडूकमोक्ष ६८, द्विविद-कपिवध ६९ " शांविवाह २२९ २३९ २४९ २७१ २७६ २८४ ३२९ ३३४ [ अनुक्रमणिका ]________________

३४२ ३४९ ३६४ ३८१ ७० अध्याय नारदमायादर्शन ७१ , राजायुधिष्ठिरसंदेश ७२ , श्रीकृष्ण-हस्तिनापुरगमन ७३ , जरासंधवध " राजाओ का मोक्ष शिशुपालमोक्ष " दुर्योधनमानमर्दन शाल्वदैत्यवध सूतवध श्रीबलराम की तीर्थयात्रा " सुदामाचरित्र ८१ , सुदामादरिद्रगमन, सुदामा का ऐश्वर्य " श्रीकृष्ण-बलराम की कुरुक्षेत्र-यात्रा , श्रीकृष्ण की रानियो और द्रौपदी की बातचीत ८४ , बसुदेवजी का यज्ञ ८५ , देवकी का मृतकपुत्रयाचन , सुभद्राहरण, श्रीकृष्णचंद का मिथिलागमन ८७ , नरनारायण-नारदसंवाद ८८ , रुद्रमोक्ष, वृकासुरवध ८९ , विंजकुमारहरण ९. , द्वारिकाविहारवर्णन ३८८ ३९१ ३९८ ३९९ ४०३ ४१३

४१६ ४२२ [ वक्तव्य ]
वक्तव्य

हिंदी गद्य साहित्य में प्रेमसागर एक प्रसिद्ध ग्रंथ है और अब तक इसके अनेकानेक संस्करण छप भी चुके हैं। शिक्षा-विषयक संग्रहो में बहुधा इसका कुछ न कुछ अंश उद्धृत किया जाता है। इस प्रकार पठित समाज में इसका बहुत प्रचार है। परंतु इधर इसके जितने संस्करण निकले हैं, वे सभी संस्कृतविज्ञ विद्वानों द्वारा शुद्ध कर दिए गए हैं, पर वे लल्लूजीलाला के प्रेमसागर से कितने भिन्न हैं, यह इस संस्करण से मिलान करनेपर मालूम हो सकता है। उन्होने संस्कृत के शब्दों को जो रूप दिया था, उनका इन नए संस्करणों में संस्कृत रूप ही दिया गया है, जिससे उस समय की शब्दरचना का ठीक ज्ञान नहीं हो सकता। इसी कमी को पूरा करने के लिये प्रेमसागर की वह प्रति प्राप्त की गई, जिसे स्वयं लल्लूजीलाल ने अपने यंत्रालय संस्कृत प्रेस में सन् १८१० ई० में प्रकाशित किया था। यह प्रति कलकत्ते की इम्पीरियल लाइब्रेरी से प्राप्त हुई थी, दूसरी प्रति जो सन् १८४२ ई० में प्रकाशित हुई थी, वह कलकत्ते के बोर्ड औव एक्जामिनर्स के पुस्तकालय से मिली है। उस पर लिखा है ‘श्रीयोगध्यानमिश्रेण परिष्कृत्य यथामति समंकितं लालकृतं प्रेमसागर पुस्तक॥’

पहली प्रति के टाइटिल पृष्ठ पर ‘हिदुवी’ था, परंतु वह दूसरी प्रति के टाहटिल पृष्ठ पर परिष्कृत होने से हिन्दी हो गया है। संपादक ने यथामति इस प्रति मे बहुत सा संशोधन कर दिया है। जब तीस बत्तीस वर्ष बाद ही के संस्करण में इतना संशोधन हो [  ] गया था, तब आधुनिक संस्करणों के विषय मे कुछ तर्क वितर्क करना व्यर्थ है। इन दोनो प्रतियो का नाम क्रमात् क और ख रखा गया है और इन दोनों में जहाँ कोई पाठांतर मिला है, वह फुटनोट में दे दिया गया है। इस संस्करण का मूल आधार प्रथम प्रति है, परंतु दूसरी से भी साथ साथ मिलान कर लिया गया है।

इन दोनो प्रतियो के देखने से ज्ञात होता है कि लल्लूजी ने विभक्तियो को प्रकृति से अलग रखना ही उचित समझा था और उनके अनंतर भी यह प्रथा बराबर सर्वमान्य रही। अब उन्हे मिलाकर लिखने की प्रथा अधिक प्रचलित हो रही हैं, यहाँ तक कि 'होने से' भी मिलाकर लिखा जाने लगा है। कविता मे ऐसा करने से कुछ कठिनता हो सकती है जैसे 'मन का मनका फेर' मे मिलाने से होगा। प्रथम प्रति मे 'गये, आये' आदि में ये के स्थान पर ए का बहुधा प्रयोग किया गया है जो दूसरी प्रति मे से एक दम निकाल दिया गया है। इन प्रतियो मे पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार ही व्यवहार में लाया गया है।

इनके सिवा सन् १८६४ ई० की नवलकिशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित एक प्रति मेरे पुस्तकालय में थी, जो उर्दू लिपि में छपी थी और इसे रूपांतरित करने का कार्य लाला स्वामीदयालजी ने किया था। यह प्रति रायल साइज़ के १७९ पृष्ठो की है और इसमे प्रायः बीस चित्र कृष्णलीला-संबंधी दिए है । इसमें प्रत्येक अध्याय के आरंभ उसके शीर्षक, जो इस संस्करण की विषयसूची मे दे दिए गए हैं, दिए हुए हैं। इस संस्करण का प्रथम अध्याय उर्दू प्रति में दो भागो में विभक्त है। छठे पृष्ठ के नए पैरा से प्रथम अध्याय प्रारंभ किया गया है और पूर्व अंश पर [  ]

अध्याय न देकर 'अथ कथा अरंभ' शीर्षक दिया गया है। पाठ भी बहुत शुद्ध है, पर इसे शुद्ध पढ़ने में वही सफल हो सकते है, जो उर्दू अच्छी तरह जानते हुए हिंदी भी अच्छी जानते हो। कहीं कहीं रूपांतरकार ने क्रिया पद को आगे पीछे हटाकर वाक्य को ठीक कर दिया है। इससे भी मिलान करने में सहायता ली गई है।

प्रेमसागर की कथा कृष्णालीला अति प्रसिद्ध है और इस विषय की पुस्तको को प्रत्येक हिंदू अनेक बार आवृति कर लेने पर भी बड़े चाव से पढ़ा करना है। श्रीमद्भागवत के दृशम स्कंध में कृष्णलीला विस्तारपूर्वक नब्बे अध्यायों में कही गई है जिसका चतुर्भुज मिश्र ने दोहे चौपाइयों में अनुवाद किया था। इसी अनुवाद के आधार पर लल्लूजीलाल ने नब्बे ही अध्यायों में यह ग्रंथ खड़ी बोली में तैयार किया था। परंतु ब्रज भाषा का कितना मिश्रण इस ग्रंथ में रह गया है, वह इसके किसी पृष्ठ के पढ़ने से मालूम हो सकता है। ब्रज भाषा का मेल तो जो कुछ है सो ठीक ही है, कविता की तुकबंदी ने भी पीछा नहीं छोड़ा है और स्थान स्थान पर वह अपना स्वाद चखाती जाती है, जैसे-वह वृषभ रूप बनकर आया है नीच, हमसे चाहता है अपनी मीच ।

यह वह समय था जब पद्य से गद्य का प्रादुर्भाव हो रहा था इसीसे छोटे छोटे वाक्यो में इस तुकबंदी से पीछा नहीं छूटा था। दूसरा यह भी कारण था कि जिस ग्रंथ के आधार पर यह पुस्तक लिखी गई थी, वह भी ब्रजभाषा के पद्यो में था। इस से यह न समझना चाहिए कि इसके पहले गद्य के ग्रंथ नहीं थे।


  • प्रथम संस्करण मे इसका उल्लेख भूल से नहीं हुआ था। [  ]इस धारणा को प्रिर्मूल करने के लिये हिंदी गद्य साहित्य के विकास पर एक छोटा सा निबंध साथ ही दे दिया गया है। कहने का मतलब यह है कि वह खड़ी बोली के साहित्य का आरंभिक काल था। यद्यपि जठमल का गद्य खड़ी बोली में ही है, परंतु वे राजपूताने के रहनेवाले थे और लल्लूजी आगरा - निवासी थे तथा इनका आधार भी ब्रज भाषा था, इसलिए इसपर उस भाषा का प्रभाव बना हुआ था। पं० सदल मिश्र, इंशाअल्लाह खाँ और मुं० सदासुख आदि ब्रजवासी नहीं थे; इसी से उन लोगों की भाषा मे ब्रज भाषा का पुट प्रायः नहींं रह गया है।

साथ ही यह विचार उत्पन्न होता है कि दो तीन शताब्दी पहले हम लोग अनेक प्रान्तो में जिस भाषा में बातचीत करते थे, उसके रूप का किस प्रकार पता लग सकता है। इसका एक सरल उपाय है और उससे दृढ़ आशा है कि उस व्यावहारिक बोलचाल की भाषा का अवश्य बहुत कुछ पता लग सकेगा। यदि तीर्थ-स्थानो के पंडो की बहियाँ, समय और भाषा की दृष्टि से जॉची जाये तो इससे उक्त भाषा के साथ साथ ऐतिहासिक घटनाओं पर भी बहुत कुछ प्रकाश पड़ने की आशा की जा सकती है। हिंदी के साहित्यप्रेमियों को, जो तीर्थस्थानों के रहनेवाले हैं, इस ओर दृष्टि देकर हिंदी साहित्य के इतिहास के इस अंग की भी पूर्ति करने में सहायक होना चाहिए।

भागवत की कृष्ण-कथा का माधुर्य भी दो बार अनुवादित हीने से धुले हुए रंग के समान प्रेमसागर में फीका पड़ गया है। जितने दोहे चौपाइयाँ इस रचना में आई हैं, उनकी कविता बहुत ही साधारण श्रेणी की है और छंदोभंग का दोष भी है। इस [  ]प्रकार यह ग्रंथ खड़ी बोली के आरंभिक काल का होने से और कृष्ण-कथा के कारण मान्य समझा जाता है, नहीं तो इसमें किसी प्रकार की गुण नहीं है ।

अस्तु, जो कुछ हो, यह संस्करण अपने असली रूप में पाठको के आगे रखा जाता है। अब यह उन्हीं लोगों पर निर्भर है कि इसे अपनाकर संपादन के कार्य-श्रम को सफल करें। इस संपादन कार्य में बा० श्यामसुंदरदासजी ने गुरुवत् मेरी बहुत सहायता की है, जिसके लिये यह लिखना कि मैं उनका अत्यंत अनुगृहीत हूँ, अनावश्यक है।

कृष्णजन्माष्टमी । }

सं० १९७९    }  व्रजरतनदास [ लेखक-परिचय ]________________

श्री लल्लूजीलाल का जीवन-चरित इनका नाम लल्लूलाल, लालचंद या लल्लूजी था और कविता में उपनाम लाल कवि था। ये आधुनिक हिदी गद्य के और उसके आधुनिक स्वरूप के प्रथम लेखक माने जाते हैं । ये आगरा निवायी गुजराती औदीच्य ब्राह्मण थे और उस नगर के बलका की बस्ती गोकुलपुरा में रहते थे। इनके पिता का नाम चैनसुखजी था जो बड़ी दरिद्रावस्था में रहते थे और पुरोहिताई तथा आकाश वृत्ति से किसी प्रकार अपना कार्य चलाते थे। इनके चार पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः लल्लूजी, दयालजी, मोतीरामजी और चुन्नीलालजी थे। सब से बड़े लल्लूजीलाल थे जिनके जन्म का समय निश्चित रूप से अभी तक ज्ञात नहीं हुआ है ; पर संभवतः इनका जन्म सं० १८२० वि० के लगभग हुआ होगा ।' इन्होने धर ही पर कुछ संस्कृत, फारसी और ब्रज भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। जब सं० १८४ - वि० में इनके पिता स्वर्ग को सिधारे, तब अधिक कष्ट होने के कारण यह सं० १८४३ वि० में जीविका की खोज में मुर्शिदाबाद आए । यहाँ कृपासखी के शिष्य गोस्वामी गोपालदासजी के परिचय और सत्संग से इनक्की पहुँच वहाँ के नवाब मुबारकुद्दौला के दरबार में हो गई। नवाब ने इनपर प्रसन्न होकर इनकी जीविका बाँध दी जिससे ये आराम से वहाँ सात वर्ष तक रहे। सं० १८५० वि० [  ]में गोस्वामी गोपालदासजी की मृत्यु हो जाने और उनके भाई गोस्वामी रामरंग कौशल्यादासजी के बर्दबान चले जाने से इनका चित्त उस स्थान से ऐसा उचाट हुआ कि नवाब के आग्रह करने पर भी उनसे विदा हो ये कलकत्ते चले गए।

नाटौर की प्रसिद्ध रानी भवानी के दत्तक पुत्र महाराज रामकृष्ण से कलकत्ते में इनका परिचय हो गया और यह कुछ दिन उन्हींके आश्रय में वहाँ रहे। जब उनके राज्य का नए रूप से प्रबंध हो गया और उन्हें उनका राज्य भी मिल गया, तब यह भी उनके साथ नादौर गए। कई वर्ष के अनंतर जब उनके राज्य में उपद्रव मचा और वह कैद किए जाकर मुर्शिदबाद लाए गए, तब यह भी उनसे विदा होकर सं॰१८५३ वि॰ में कलकत्ते लौट आए जहाँ कुछ दिन तक चितपुर रोड पर रहे। यहाँ के कुछ बाबू लोगों ने प्रकट मैं तो इनका बहुत कुछ आदर सत्कार किया, पर कुछ सहायता न की, क्योंकि वे लिखते हैं कि "उन्ही के थोथे शिष्टाचार में जो कुछ वहाँ से लाया था सो बैठकर खाया।" जब कई वर्ष इन्हें जिविका का कष्ट बना रहा, तब अंत में घबराकर जिविका की खोज में यह जगन्नाथपुरी गए। जब जगदीश का दर्शन करने गए थे, तब स्वरचित निर्वेदाष्टक सुनाकर उनकी स्तुति की थी, जिसका प्रथम दोही यों है―

विश्वभर बनि फिरत हौ, भले बने महराज।
हमरी ओर निहारि कै, लखौ आपुनो काज॥

संयोग से नागपुर के राजा मनियाँ बाबू भी उसी समय जगदीश के दर्शन को आए हुए थे और वे खड़े खड़े इनकी इस दैन्य स्तुति को जिसे यह बड़ी दीनता के साथ पढ़ रहे थे, सुनते [  ]रहे । इससे उन्हें इनपर बड़ी दया आई और उन्होने इनसे परिचय करके अपने साथ मागपुर लिया जाने के लिये बहुत आग्रह दिखलाया । इनका विचार भी वहाँ जाने का पक्का हो गया था। पर अभी तक इनके अदृष्ट ने इनका साथ नहीं छोड़ा था जिससे यह उनके साथ नहीं जा सके और कलकत्ते लौट आए। विदा होते समय मनियाँ बाबू ने सौ रुपये भेट देकर इनका सत्कार किया था।

इन्हीं दिनो साहब के पठन पाठन के लिये जब कलकत्ते में एक पाठशाला खुलीं, तब इन्होने गोपीमोहन ठाकुर से जाकर प्रार्थना की। उन्होंने अपने भाई हरिमोहन ठाकुर के साथ इन्हें भेजकर पादरी बुरन साहब से इनकी भेट करा दी। उन्होने आशा भरोसा तो बहुत दिया, पर एक महीना व्यतीत हो जाने पर भी जब उनका किया कुछ नहीं हुआ, तब दीवान काशीनाथ खत्री के छोटे पुत्र श्यामाचरण के द्वारा डाक्टर रसेल से एक अनुरोध-पन्न पाप्त करके इन्होंने डाक्टर गिलक्राइस्ट से भेद की जो उन दिनों फोर्ट विलियम कॅालेज के प्रिंसिपल थे । इन्हीं गिलक्राइस्ट साहब का, जो उस समय हिंदी और उर्दू भाषाओं को स्वरूप निश्चित कर रहे थे, सत्संग ललूलालजी की विख्याति का मूल कारण हुआ ।

साहब ने इन्हें ब्रज भाषा की किसी कहानी को हिंदी गद्य में लिखने की आज्ञा दी और अर्थ-साहाय्य के साथ साथ इनके पार्थनानुसार दो मुसलमान लेखक को, जिनका नाम मजहरअली खों चिली और काजिम अली जब था, सहायतार्थ नियुक्त कर दिया । तब इन्होने एक वर्ष ( सं० १८५६ वि०) में परिश्रम करके चार पुस्तक का ब्रज भाषा से रेखते की बोली मैं अनुवाद [  ]किया। इन पुस्तकों के नाम सिहासनबत्तीसी, बैतालपचीसी, शकुंतला नाटक और माधोनल है ।

आगरे के तैराक बहुत प्रसिद्ध होते है और लल्लजी भी वहाँ के निवासी होने के कारण तैरना अच्छा जानते थे । दैवात् एक दिन उन्होने तट पर टहलते समय एक अँगरेज को गंगाजी में डूबते देखा । तब उन्होंने निडर होकर झटपट कपड़े उतार डाले और गंगाजी में कूद दो ही गोते में उसे निकाल लिया । वह अँगरेज ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई पदाधिकारी था। उसने अपने ! णिरक्षक की पूरी सहायता की और इन्हें कुछ धन देकर छापाखाना खुलवा दिया । उसी के अनुरोध से फोर्ट विलियम कालेज में इनकी वि० सं० १८५७'भे पचास रुपए मासिक की आजीविका लग गई। बस इसके अनंतर इनकी प्रतिष्ठा और ख्याति बराबर बृढ़ती चली गई। उन्होंने अपने प्रेस में, जिसका नाम संस्कृत प्रेस रखा था, अपनी पुस्तके छपवाकर बेचना आरंभ कर दिया । कंपनी ने भी इस प्रेस के लिये बहुत कुछ सहायता दी जिससे इसमें छपाई का अच्छा पबंध हो गया । यह यंत्रालय पहले पदलडॉगा में खोला गया था। इनके प्रेस की पुस्तक पर सर्वसाधारण की इतनी श्रद्धा हो गई थी कि इनकी प्रकाशित रामायण ३०) ४०), ५०) को और प्रेमसागर १५), २०), ३०) को थिक जाते थे । इनके छापेखाने के छपे हुए ग्रंथो को एक शताब्दी से अधिक _________________________________________________

१ विहारीविहार और सरस्वती के द्वितीय वर्ष की २ री सख्या में स० १८५७ वि० को सन् १८०४ ई० माना है, जो अशुद्ध है । सन् १८०० इ० चाहिए। देखिये जी. ए. प्रिअर्सन संपादित लालचद्रिका पु० १२ । [ १० ]
होगया, पर वे ऐसे उत्तम, मोटे और सफेद बाँसी कागज पर छपे थे कि अब तक नए और दृढ़ बने हुए हैं ।

लल्लूजी चौबीस वर्ष तक फोर्ट विलियम कालेज में अध्यापक रहे और वि० सं० १८८१ मे पेंशन लेकर स्वदेश लौटे । वे अपना छापाखाना भी आते समय नाव पर लादकर साथ ही आगरे लाए और वहाँ उसे खोला । अगरे में इस छापेखाने को जमाकर ये कलकत्ते लौट गए और वहीं इनकी मृत्यु हुई। इनकी कब और कैसे मृत्यु हुई, इसका नुते इनके जन्म के समय के समान निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हुआ । परंतु पैशन लेते समय इनकी अवस्था लगभग ६० वर्ष के हो चुकी थी ।

यद्यपि इनके भाइयों को संतान थी, पर ये निस्संतान ही रहे । इनकी पत्नी को इन पर असाधारण प्रम था और वे इनके कष्ट के समय बराबर इनके साथ रहो । ये वैष्णव तो अवश्य ही थे, पर किस संप्रदाय के थे, सो ठीक नहीं कहा जा सकता । संभवतः ये राधावल्लभीय ज्ञात होते है ।

इतना तो स्पष्ट ही विदित है कि ये कोई उत्कट विद्वान् नहीं थे और न किसी विद्या के आचार्य होने का गर्व ही कर सकते थे । संस्कृत का बहुत कम ज्ञान रखते थे, उर्दू और अंगरेजी भी कुछ कुछ जानते थे, पर व्रज भाषा अच्छी जानते थे। कवि भी ये कोई उच्च कोटि के नहीं थे । परंतु जिस समय थे अपनी लेखनी चला रहे थे, उस समय ये वास्तव में ठेठ हिंदी का स्वरूप स्थिर कर रहे थे । हिदी गद्य के कारण ही ये प्रसिद्ध और विख्यात हुए हैं। कुछ लोगो का यह कथन है कि यदि येआजक तोल होते [ ११ ]
कदापि इतने यश के भागी न होते। पर यह तो न्यूटन आदि जगत्पसिद्ध विद्वानों के लिये भी कहा जा सकता है।

लल्लूजीलाल के ग्रंथों की सूची

( १ ) सिंहासनबत्तीसी―इस पुस्तक में प्रसिद्ध राजा विक्रम के सिहासन की ३२ पुतलियो की कहानियाँ हैं, जिसे सुंदरदास ने संस्कृत से ब्रज भाषा में लिखा था। उसी का वि॰ सं॰ १८५६ में लल्लूजी ने हिंदी में अनुवाद किया। उदाहरण― खुदा ने जब से उसे दुनिया के परदे पर उतारा सब बेसहारों का किया सहारा और रूप उसको देखकर चौदहवीं रात के चाँद को चकाचौध आती, बड़ा चतुर सुघर और गुणी था, अच्छी जितनी बात सब उसमें समाई थी।

( २ ) बैतालपचीसी―संस्कृत में शिवदास कृत वेलालपंचविंशतिका नामक ग्रंथ है, जिसका सुरति मिश्र ने ब्रज भाषा में अनुवाद किया था। उसी का हिंदी अनुवाद मजहरअली विला की सहायता से हुआ था। उदाहरण―इबतिदाय दास्तान यो है कि मुहम्मद शाह बादशाह के जमाने में राजा जैसिह सवाई ने जो मालिक जैनगर को थी सुरति नामक कवीश्वर से कहा कि वैतालपचीसी को जो जबान संस्कृत में है तुम ब्रजभाषा में कहो। तब मैने बमूजिब हुकुम राजा के ब्रज की बोली में कही। सो हम उसको ज़बान उर्दू में छापा करते हैं जो खास और आम के समझने में आवै।

( ३ ) शकुन्तला नाटक―संस्कृत से हिंदी अनुवाद। [ १२ ]( ४ ) माधोनल-( माधवानल ) नामक संस्कृत की पुस्तक सं० १५८७ वि० की लिखी हुई बंगाल एशाटिक सोसाएदी में सुरक्षित है। इसी के आधार पर सं० १७५५ वि० के लगभग मोतीराम कवि ने ब्रज भाप में एक कहानी लिखी थी, जिसकी यह हिंदी अनुवाद है।

( ५ ) माधवविलास-रघुराम नामक गुजराती कवि के समासार और कृपाराम कवि द्वारा पद्मपुराण से संग्रहीत योगसार नामक दोनों ग्रंथो को मिलाकर लल्लूजी ने माधवविलास नाम से इस पुस्तक को पहले छपवाया । इस पुस्तक में गद्य पद्य दोनो हैं और यह ब्रज भाषा में है । रधुराम नागर की एक अन्य रचना माधव-विलास शतक खोज में मिली है।

( ६ ) सभाबिलास-यह एक प्रसिद्ध पुस्तक है जिसमें माना प्रकार के नीति विषयक पद्यों का संग्रह है। |

( ७ ) प्रेमसागर-सं० १६२४ वि० में चतुभुजदास जी ने ब्रज भाषा में श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का दोहों और चपाइयों में अनुवाद किया था। इसी ग्रंथ के आधार पर वि० सं० १८६० में लल्लूजी लाल ने प्रेमसागर की रचना की । यह भागवत का पूर्ण अनुवाद न होकर उसका संक्षिप्त रूप है। इसका प्रथम संस्करण वि० सं० १८६७ में प्रकाशित हुआ था। यह एक प्रसिद्ध ग्रंथ है अर पाठ्य पुस्तक में इसका कुछ न कुछ अंश अवश्य संगृहीत रहता है।

( ८ ) राजनीति- ब्रज भाषा में हितोपदेश का सं० १८६९ वि० में अनुवाद करके यह नाम रखा था ।। |

( ६ ) भाषा क़ायदा-हिंदी भाषा का व्याकरण । उर्दू में [ १३ ]
छोटे व्याकरण को कायदा कहते हैं। ऐसा नाम रखने से यह ज्ञात होता है कि इसके प्रणयन में इन्हें मुसलमान लेखको से सहायता मिली होगी। यह ग्रंथ छपा था, पर प्रकाशित नहीं हो सका। इसकी एक प्रति बंगाल एशाटिक सोसाएटी में सुरक्षित है।

( १० ) लतायफ़ हिंदी―उर्दू, हिंदी और ब्रज भाषा की १०० कहानियों का संग्रह है। छोटी छोटी कहानियों और चुटकुले को लतीफ कहते हैं, जिसका बहुवचन लतायफ है। यह न्यू-एन्साइक्लोपीडिया-हिंदुस्तानी के नाम से प्रकाशित हुआ था।

( ११ ) लालचँद्रिका―सं० १८७५ वि० में अनवरचंद्रिका अमरचंद्रिका, हरिप्रकाश टीका, कृष्ण कवि की कवितवाली टीका, कृष्णलाल की टीका, पठान सुलाने की कुँडलियो-वाली टीका और संस्कृत टीका की सहायता से उन्होंने महाकवि बिहारीलाल की सतसई पर इस नाम की गद्य टीका तैयार की। इसमें नायिका भेद और अलंकार भी दिए है और इसे आज़मशाही क्रम के अनुसार रखा है। डाक्टर ग्रियर्सन ने इसे संपादित करके सं॰ १९५२ वि॰ में पुनः प्रकाशित किया।

उदा॰—उमग के, अश्य और ही लिये, बात करती थी। सो रहीं अबकहीं बातें। देखकर खिसानी नायक की आँखें, करीं रिस भरीं आँखै नायका ने।

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[ इतिहास ]
गद्य साहित्य का विकास

मनुय्य जिसके द्वारा अपने विचारों को एक दूसरे पर प्रकट करता है, उसे बोली या भाषा कहते हैं । भाषा की यह परिभाषा एक प्रकार से रूढ़ि सी मान ली गई है, यद्यपि इसके अंतर्गत वे संकेतादि भी आ जाते है जिनसे आपस में बहुत कुछ विचार प्रकट किए जाते हैं या किए जा सकते है। परंतु वे इस परिभाषा के अंतर्गत नहीं समझे जाते। इन भाषाओ का नामकरण प्रायः उन देशो, प्रातो या जातियों के नाम पर किया जाता है जिन देशो, प्रांतो या जातियो मे वे बोली जाती हैं। संसार की लगभग सभी भाषाओ का नाम किसी देश या जाति के नाम पर होता है।

आपस मे बात-चीत करते या आवश्यकतानुसार कुछ बोलते समय पद्य का कभी व्यवहार नहीं किया जाता, सर्वदा गद्य मे ही विचार प्रकट किया जाता है। परंतु यह एक आश्चर्य की बात है कि जिस किसी भाषा के साहित्य को उठाकर देखिए, सब का आरंभ पध से ही हुआ है। क्या उन प्रतिभाशाली आदि कवियो के मस्तिष्क में छंद ही भरे थे ? क्या वे छंदो में ही बातचीत करते थे ? हर एक साहित्य के प्रारंभिक ग्रंथों में बहुधा देखा जाता है कि उनमें मनुष्यो के धार्मिक विचारो, हर्ष, शोक आदि मानसिक विकारो और दैवी चरित्रो का वर्णन होता है। कविता मनुष्य का हार्दिक उद्गार होने के कारण पहले ही निकल पड़ती है। इन विषयो के लिए पद्य ही अधिक उपयुक्त है और कविता ही के द्वारा [ १५ ]धार्मिक विचारों में प्रोत्साहन, मानसिक विकारों में उत्तेजना और देवता पर श्रद्धा झटपट उत्पन्न कराई जा सकती है। गहन विषयो के ग्रंथ भिन्न भिन्न देशी या जातियों की सभ्यता के अनुगामी होते है। ज्यों ज्यो कोई जाति अधिक उन्नति करती जाती है, त्यो त्यो उसके साहित्य के विषय भी अधिक गहन होते जाते है। कुछ समय पहले जिस एक शब्द से एक विषय के सब शास्त्री का बोध हो जाता था, उससे अब उस विषय की किसी एक शाखा मात्र का बोध होता है। इन गहन विषयों के लिए जब गद्य की आवश्यकता पड़ती है, तब उसकी उत्पत्ति आप से आप हो जाती है।

हिंदी साहित्य में भी यही हुआ है। पद्य जो अस्वाभाविक है। वह तो पहिले ही बिना प्रयत्न के बन गया, पर जो स्वाभाविक और नित्यप्रयुक्त है, उसे बनाने का अभी तक प्रयत्न होता जा रहा है। हिंदी कविता का आरंभ-काल तो आठवीं शताब्दी से माना जाता है और गद्य का जन्म हुए केवल एक शताब्दी माना गया है। इस पर भी अभी इस गद्य का स्वरूप पूर्ण रूप से निश्चित और सर्वग्राह्य नहीं हुआ है। कोई उसे अपने देश के अलंकारों से सजाना चाहता है तो कोई उसे फारस के अलंकारों और वस्त्रों से अच्छादित करना चाहता है। पद्य में ब्रज भाषा, अवधी, खड़ी बोली आदि का जो झमेला है, वही बहुत है। फिर गद्य को जिसे बहुत सा रास्ता तै करना है, क्यो व्यर्थ इतनी ड्रिल कराई जाती है, यह नहीं कहा जा सकता।

हिंदी की उत्पत्ति के विषय में अभी तक यही निश्चित हुआ है कि यह प्राकृत के रूपांतर अपभ्रंश अर्थात् चीन हिंदी से बिगड़ कर बनी है अब यह देखना चाहिए कि यह हिंदी शब्द कहाँ से [ १६ ]आया और इसकी क्या व्युत्पत्ति है। पश्चिम के विदेशियों ने भारत वर्ष का नाम हिंद या हिंदोस्तान रखा। मुसलमानों ने अपनी मनोवृत्ति के अनुसार हिंदू या हिंदी शब्द का अर्थ चोर, डाकू या दास कर दिया, शायद इस कारण कि जब उनका भारत पर अधिकार हुआ तब उन्होंने इस देश के निवासियो को दास कहना उचित समझा। फारसी में जादूगरनी के लिए 'हिदूजन' शब्द का प्रयोग होता है जिसका अर्थ 'हिदू स्त्री' है। तात्पर्य्य यह है कि हिंद या इससे बने हुए शब्दों का घृणित अर्थ कर दिया गया। इसी हिद या हिंदुओं की बोली हिंदुवी या हिदी कहलाई। अब यह विचारणीय है कि मुसलमानों और हिंदुओं के संपर्क के पहिले यह शब्द बन चुका था जिसका मुसलमानों ने पीछे बुरा अर्थ अपने कोष में लिख दिया या उसी समय गढ़ा गया। यह बात सिद्ध है कि यह शब्द मुहम्मद साहब से हजारों वर्ष पहले प्राचीन पारसियों के द्वारा प्रयुक्त हुआ जो यहाँ के 'स' का उच्चारण प्रायः 'ह' के समान किया करते थे। वे सिंधु नद के किनारे के प्रदेश को 'हिद' और वहाँ के निवासियों को 'हिदी' कहा करते थे। उनके चित्त में इन शब्दों का कोई बुरा अर्थ नहीं था। इस देश के रहनेवालो पर घृणा रखने के कारण मुसलमानों ने बाद को इसका घृणित अर्थ रख लिया।

निर्विवाद रूप से यह मान लिया गया है कि हिंदी साहित्य के गद्य का और ईसवी उन्नीसवीं शताब्दी का जन्म साथ ही हुआ है और हिंदी गद्य के जन्मदाता श्रीलल्लूजी लाल हुए है। परंतु देखा जाता है तो ये दोनों बाते ठीक नहीं जान पड़ती हैं। इनके कई शताब्दी पहिले की गद्य पुस्तके वर्तमान हैं, यद्यपि वे ब्रज भाषा,